डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा!

बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन,
जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ!

कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब* के साथ,
कि आज धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ|
*कष्ट, उत्पीड़न
शहरयार

सवेरा दिखाई पड़ता है!

उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है,
मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है|

जाँ निसार अख़्तर

कहीं शाम तक न पहुँचे!

नयी सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे।

शकील बदायूँनी

सूरज का निकलना जारी है!

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है|

राजेश रेड्डी

सूरज से निकलते रहिए!

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए|

कुँअर बेचैन

फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो!

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो,
कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो|

राहत इन्दौरी

सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर!

इन अंधेरों से ही सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर’,
रात के साये जरा और निखर जाने दे।

नज़ीर बाक़री

कोई सहर दे या अल्लाह!

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके,
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह|

क़तील शिफ़ाई