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फूटा प्रभात!

सुमधुर गीतों के अमर रचयिता स्वर्गीय भारत भूषण जी के अनेक सुंदर गीत मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स के माध्यम से शेयर किए हैं| आज सोचता हूँ कि उनके हमनाम स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक रचना शेयर करूं |

भारत भूषण अग्रवाल जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए थे तथा वे अज्ञेय जी द्वारा संपादित काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में एक प्रतिष्ठित कवि के रूप में सम्मिलित थे, जो अपने आप में हिन्दी कविता की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है|

लीजिए आज प्रस्तुत है भारत भूषण अग्रवाल जी द्वार प्रातः के सूर्योदय को अंकित करती एक सुंदर रचना-

फूटा प्रभात, फूटा विहान
बह चले रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्झर के स्वर
झर-झर, झर-झर।

प्राची का अरुणाभ क्षितिज,
मानो अम्बर की सरसी में
फूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज।


धीरे-धीरे,
लो, फैल चली आलोक रेख
घुल गया तिमिर, बह गई निशा;
चहुँ ओर देख,
धुल रही विभा, विमलाभ कांति।
अब दिशा-दिशा
सस्मित,
विस्मित,
खुल गए द्वार, हँस रही उषा।


खुल गए द्वार, दृग खुले कंठ
खुल गए मुकुल
शतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुंजार लिए
खुल गए बंध, छवि के बंधन।

जागो जगती के सुप्त बाल!
पलकों की पंखुरियाँ खोलो, खोलो मधुकर के अलस बंध
दृग भर
समेट तो लो यह श्री, यह कांति
बही आती दिगंत से यह छवि की सरिता अमंद
झर-झर।


फूटा प्रभात, फूटा विहान,
छूटे दिनकर के शर ज्यों छवि के व‌ह्नि-बाण
(केशर फूलों के प्रखर बाण}
आलोकित जिनसे धरा
प्रस्फुटित पुष्पों से प्रज्वलित दीप,
लौ-भरे सीप।

फूटीं किरणें ज्यों वह्नि-बाण, ज्यों ज्योति-शल्य
तरु-वन में जिनसे लगी आग।
लहरों के गीले गाल, चमकते ज्यों प्रवाल,
अनुराग लाल।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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