रौशनी अपने मकान की!

औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की|

गोपालदास ‘नीरज’

काई है अब मकानों पर!

ऐसी काई है अब मकानों पर,
धूप के पाँव भी फिसलते हैं।

सूर्यभानु गुप्त

धूप के कारोबार चलते हैं!

बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में,
धूप के कारोबार चलते हैं।

सूर्यभानु गुप्त