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ब्लैक आउट में रोशनी की तरह!

मैंने पहले भी सूर्यभानु गुप्त जी की कुछ रचनाएँ शेयर की हैं| वे बहुत सुंदर रचनाएँ, विशेष रूप से गज़लें लिखते हैं, जिनमें उन्होंने अनेक एक्सपेरीमेंट किए हैं| कुछ शेर तो उनके मुझे अक्सर याद आते हैं, जैसे – ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं, नदी बांध के पत्थर उतर गया हूँ मैं’, ‘दिल वाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘शाम अजायब घर के आगे, बैठा था भूखा-प्यासा, अपने मरे हुए दादा की, फोटो एक सम्राट लिए; आदि-आदि| वैसे सूर्यभानु गुप्त जी ने कुछ प्रयोग धर्मी फिल्मों और टीवी सीरियल्स के लिए भी गीत आदि लिखे हैं|


आज की इस गजल में भी काफी एक्सपेरीमेंट भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर देखे जा सकते हैं-



अपने घर में ही अजनबी की तरह,
मैं सुराही में इक नदी की तरह|

एक ग्वाले तलक गया कर्फ़्यू,
ले के सड़कों को बंसरी की तरह|

किससे हारा मैं, ये मेरे अन्दर,
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह|

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ,
चाँद पर पहले आदमी की तरह|


अपनी तनहाइयों में रखता है,
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह|

मैंने उसको छुपा के रक्खा है,
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह|

टूटे बुत रात भर जगाते हैं,
सुख परेशां है गज़नवी की तरह|

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर,
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह|


वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा,
और मैं रेत की घड़ी की तरह|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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