मैं जो डूबा, उभर गया कोई!

इश़्क भी क्या अजीब दरिया है,
मैं जो डूबा, उभर गया कोई|

सूर्यभानु गुप्त

दीप ही दीप धर गया कोई!

मैं अमावस की रात था, मुझमें,
दीप ही दीप धर गया कोई|

सूर्यभानु गुप्त

पत्थरों तक अगर गया कोई!

मूरतें कुछ निकाल ही लाया,
पत्थरों तक अगर गया कोई|

सूर्यभानु गुप्त

मुझसे होकर गुज़र गया कोई!

आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी,
मुझसे होकर गुज़र गया कोई|

सूर्यभानु गुप्त

रस्तों की धूल थे पहले!

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं,
वे ही रस्तों की धूल थे पहले|

सूर्यभानु गुप्त