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शिशु की दुनिया – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Baby’s World’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

शिशु की दुनिया


चाहता हूँ कि मैं, अपने शिशु के हृदय की दुनिया के शांत किनारे पर बैठ जाऊं,
मैं जानता हूँ कि इसमें सितारे हैं, जो उससे बात करते हैं, और आकाश जो उसे प्रसन्न करने के लिए
अपने नादान बादलों और इंद्रधनुषों के साथ, उसके चेहरे पर झुक जाता है|
जो ऐसा विश्वास दिलाते हैं कि वे मूक हैं, और दिखाते हैं, कि वे कभी चल-फिर नहीं सकते|
वे चुपके से खिसक कर उसकी खिड़की तक आ जाते हैं,अपनी कहानियों,
और चमकीले खिलौनों से भरी तश्तरियों के साथ|
मैं चाहता हूँ कि मैं उस मार्ग पर चल सकूँ, जो मेरे शिशु के मन से होकर निकलता है और सभी सीमाओं के पार चलता चला जाता है;
जहां कल्पित राजाओं के दूत, निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, ऐसे राज्यों के बीच, जिनका इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है;
जहां विवेक अपने ही नियमों से पतंगें बनाकर उनको उड़ाता है, सत्य, तथ्यों को उनकी बेड़ियों से मुक्त करता है|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Baby’s World


I wish I could take a quiet corner in the heart of my baby’s very
own world.
I know it has stars that talk to him, and a sky that stoops
down to his face to amuse him with its silly clouds and rainbows.
Those who make believe to be dumb, and look as if they never
could move, come creeping to his window with their stories and with
trays crowded with bright toys.
I wish I could travel by the road that crosses baby’s mind,
and out beyond all bounds;
Where messengers run errands for no cause between the kingdoms
of kings of no history;
Where Reason makes kites of her laws and flies them, the Truth
sets Fact free from its fetters.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इतना मधुर कैसे गाते हो तुम – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘How You Sing So Well?’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


तुम इतना मधुर कैसे गाते हो?

अरे प्रबुद्ध मित्र, तुम इतना मधुर कैसे गा लेते हो?

मैं चकित होकर सुनता हूँ,

 पूर्णतः आह्लादित!

तुम्हारे गीत पूरे विश्व को चमत्कृत करते हैं,

 और स्वर्ग लोकों में फैल जाते हैं,

यह पत्थरों को पिघलाते हैं, मार्ग की प्रत्येक वस्तु को चालित करते हैं,

अपने साथ ये स्वार्गिक संगीत ले जाते हैं|  

यद्यपि तुम्हारी धुनों को मेरे स्वर, पकड़ नहीं पाते,

मैं उस महान शैली में गाना चाहता हूँ

परंतु जो मैं कहना चाहता हूँ, वह फंसा रह जाता है,  

 और मेरी आत्मा पराजित होकर चीत्कार करती है!

ये तुमने मेरे भीतर कैसी निश्चिंतता भर दी है?  

तुम्हारे संगीत ने मुझे पूर्णतः मुग्ध कर दिया है!

                                                     रवींद्रनाथ ठाकुर






और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


How You Sing So well

O wise one, how do you sing so well?
I listen in amazement,
completely enthralled!
Your melodies light up the world
And waft across heavens,
Melting stones, driving everything in the way,
Carrying along with them heavenly music.
Though the tunes keep eluding my voice
I feel like singing in that superb vein
What I would like to say get stuck
And my soul cries out, defeated!
What trap have you ensnared me into?
Your music has me fully in its thrall!


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Keep me fully glad’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए



मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए, कुछ न होते हुए भी| केवल मेरा हाथ अपने हाथ में ले लीजिए|
गहराती रात्रि के अंधकार में, मेरे हृदय को लीजिए और उसके साथ खेलिए,जैसे चाहो|

मुझे अपने साथ बांध लीजिए, बिना किसी बंधन के|
मैं स्वयं को आपके चरणों में बिछा दूंगा, और वहीं पड़ा रहूँगा| बादलों से ढके आकाश के नीचे, मैं मौन का मौन से मिलन कराऊंगा|

मैं अपने सीने को धरती से सटाकर लेटा हुआ, रात्रि का एक हिस्सा बन जाऊंगा|
मेरे जीवन को प्रसन्न बना दीजिए, बिना कुछ पाए|


वर्षा, आकाश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक बुहार देती है| चमेली के पुष्प, भीगी बेकाबू हवा में, अपनी सुगंध के साथ उत्सव मनाते हैं| बादलों के पीछे छिपे हुए सितारे, गोपनीय रूप से आनंद मनाते हैं|

मुझे अपना हृदय भर लेने दो, जिसमें कुछ न हो, बस मेरे आनंद की ही अपनी गहराई हो|

-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Keep me fully glad



Keep me fully glad with nothing. Only take my hand in your hand.
In the gloom of the deepening night take up my heart and play with it as you list. Bind me close to you with nothing.
I will spread myself out at your feet and lie still. Under this clouded sky I will meet silence with silence. I will become one with the night clasping the earth in my breast.

Make my life glad with nothing.
The rains sweep the sky from end to end. Jasmines in the wet untamable wind revel in their own perfume. The cloud-hidden stars thrill in secret. Let me fill to the full my heart with nothing but my own depth of joy.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘When You Ask Me To Sing’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो!



जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो,
मेरा हृदय गर्व से फूल जाता है|
जब मैं अर्थपूर्ण दृष्टि से तुम्हारी तरफ देखता हूँ,
मेरी आँखें आंसुओं से भीग जाती हैं|
मेरे भीतर जो कुछ भी कठोर और कटु है,
वह पिघलकर स्वार्गिक संगीत में ढल जाता है|
मेरी सभी प्रार्थनाओं और विचारों को
पंख लग जाते हैं, और वे खुशी के गीत गाने वाले पक्षी बन जाते हैं|



तुम मेरे गीतों से संतुष्ट होते हो,
मुझे मालूम है इनसे तुम्हें प्रसन्नता मिलती है|
ये मुझे तुम्हारी संगत में ले जाते हैं,
जहां मैं अपने विचारों के बल पर नहीं पहुँच सकता|
मुझे मेरे गीतों के माध्यम से स्वीकार करो!
मेरे गीतों के माध्यम से, मैं स्वयं को भूल जाता हूँ

और फिर मैं स्वयं को अपने स्वामी का मित्र कह पाता हूँ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


When You Ask Me To Sing!


When you ask me to sing
My heart swells with pride
As I look intently at you
My eyes moisten with tears
All that is hard and bitter in me
Melts into heavenly music
All my prayers and thoughts
Take wings like merry birds.



You are content with my songs
I know they please you.
They admit me to your company
The One I can’t reach through thought
Accepts me through my songs!
My songs make me forget myself
And let me call my Lord my friend.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुक्त प्रेम- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Free Love’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मुक्त प्रेम


इस दुनिया में जो लोग मुझसे प्रेम करते हैं,वे मुझे मजबूती से पकड़कर सुरक्षित रखना चाहते हैं|
परंतु तुम्हारे प्रेम की स्थिति अलग है, जो उनके प्रेम से कहीं अधिक है,
और तुम मुझे मुक्त रखते हो|

कहीं मैं उनको भूल न जाऊं, इसलिए वे मुझे अकेला नहीं छोड़ते|
परंतु एक-एक करके दिन बीतते जाते हैं, तुम तो दिखाई नहीं देते|

भले ही मैं तुमको अपनी प्रार्थनाओं में याद न करूं, अपने दिल में न रखूं,
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम, मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Free Love


By all means they try to hold me secure who love me in this world.
But it is otherwise with thy love which is greater than theirs,
and thou keepest me free.

Lest I forget them they never venture to leave me alone.
But day passes by after day and thou art not seen.

If I call not thee in my prayers, if I keep not thee in my heart,
thy love for me still waits for my love.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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खेल का मेरा साथी- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Playmate’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

My Playmate!



अब मेरे मुख से , कोई शोर भरे स्वर नहीं निकलेंगे, ऐसी है मेरे स्वामी की इच्छा| अब मैं केवल धीमे स्वर में ही बात करूंगा|
मेरे हृदय की ध्वनि, किसी गीत को गुनगुनाने में ही अभिव्यक्त होगी| लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, राजा के बाजार की तरफ, सभी विक्रेता और खरीदार वहाँ हैं| परंतु मुझे असमय ही दूर जाना है, भरी दोपहरी में, कार्य की व्यस्तता के बीच|
चलो फिर पुष्पों को मेरे बगीचे में खिलने दो, यद्यपि ये उनके खिलने का समय नहीं है, और दोपहरी में मधुमक्खियों को अपनी सुस्त धुन में गुनगुनाने दो|
मैंने कितने ही घंटे बिताए हैं, अच्छे और बुरे की पहचान करने में, परंतु अब मेरे पास आनंद है, जब खाली दिनों में मेरे खेल का साथी, मेरे हृदय को अपनी ओर खींचता है, मुझे नहीं मालूम कि अचानक आया यह बुलावा, किस निरर्थक असंगति के लिए है!


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


My Playmate




No more noisy, loud words from me, such is my master’s will. Henceforth I deal in whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.
Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.
Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time, and let the midday bees strike up their lazy hum.
Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him, and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जहां मन में नहीं है कोई भय- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Where The Mind Is Without Fear’ का भावानुवाद-
गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जहां मन में नहीं है कोई भय!


जहां मन भयमुक्त है, और मस्तक ऊंचा है गर्व से,
जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंट गई है,
दुनियादारी की संकीर्ण दीवारों से,
जहां शब्द उभरकर आते हैं, सच्चाई की गहराई से,
जहां अथक परिश्रम फैलाता है अपनी बाँहें, परिपूर्णता की ओर,
जहां तर्क की निर्मल धारा, ने नहीं खो दिया है अपना रास्ता
मृत आदतों के सुनसान रेगिस्तान में,
जहां मस्तिष्क को सदा आप मार्ग दिखाते हो मेरे प्रभु,
निरंतर विस्तारित होते, चिंतन और क्रियाशीलता में,
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे प्रभु, मेरे राष्ट्र को जागृत होने दो|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Where The Mind Is Without Fear

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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गीतांजलि-1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Gitanjali-1’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

गीतांजलि-1




तुमने मुझे अनंत बना दिया है, मेरे प्रभु, ऐसी है तुम्हारी प्रसन्नता| यह कमजोर सा पात्र, मेरा शरीर, आप इसे बार-बार भरते हो, बार-बार खाली करते हो, और फिर-फिर भर देते हो, ताज़ा जीवन से|

यह छोटी सी बांस की बांसुरी, तुम इसे साथ लेकर घूमे हो, पहाड़ों पर और घाटियों में, और इसके भीतर फूंकी हैं, ऐसी धुनें जो सदा नूतन और शाश्वत हैं|


तुम्हारे हाथों का अमर स्पर्श पाकर, मेरा छोटा सा हृदय आनंद की सारी सीमाएं भूल जाता है, और अनेक अनकही बातें कह डालता है|

तुम्हारे अनंत उपहार मेरे पास, मेरे इन छोटे-छोटे हाथों में ही आते हैं| युग बीत गए हैं, और अब भी उंडेलते जा रहे हो तुम अपनी करुणा, और अभी भी यहाँ जगह है, और भरने के लिए
|

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Gitanjali – 1


Thou hast made me endless, such is thy pleasure. This frail vessel thou emptiest again and again, and fillest it ever with fresh life.

This little flute of a reed thou hast carried over hills and dales, and hast breathed through it melodies eternally new.

At the immortal touch of thy hands my little heart loses its limits in joy and gives birth to utterance ineffable.

Thy infinite gifts come to me only on these very small hands of mine. Ages pass, and still thou pourest, and still there is room to fill.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
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मेरे मित्र- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता ‘Entertainment Times’ by TOI द्वारा ऑनलाइन शेयर की गई कुछ कविताओं से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Friend’का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मेरे मित्र


क्या तुम परदेस में हो, इस तूफानी रात में
प्रेम मार्ग पर अपनी यात्रा में मेरे दोस्त?
आकाश कराह रहा है, मानो निराश हो|


मेरी आँखों में आज रात नींद नहीं है|
बार-बार द्वार खोलकर बाहर देखती हूँ
घनघोर अंधेरे को, मेरे दोस्त!


मुझे अपने सामने कुछ दिखाई नहीं देता|
कहाँ गया वह तुम्हारा मार्ग!


पता नहीं स्याह काली नदी के किस धुंधले किनारे तुम चल रहे हो,
डरावने जंगलों के किस सुदूर छोर पर,
उदासी के किसी उलझे हुए जाल से होकर तुम तय कर रहे हो,
मेरे पास आने के लिए अपना रास्ता, मेरे मित्र?


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Friend



Art thou abroad on this stormy night
on thy journey of love, my friend?
The sky groans like one in despair.


I have no sleep tonight.
Ever and again I open my door and look out on
the darkness, my friend!


I can see nothing before me.
I wonder where lies thy path!


By what dim shore of the ink-black river,
by what far edge of the frowning forest,
through what mazy depth of gloom art thou threading
thy course to come to me, my friend?


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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