तेज धूप में!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि, जो कवि सम्मेलनों में मुख्यतः हास्य-व्यंग्य की कविताओं के लिए जाने जाते थे- स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की रचना शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं जैसे- ‘अमौस्या का मेला’ अथवा ‘मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना’ बहुत सफल रचनाएं थीं| मेरी आयोजनों में आमंत्रित करने का कारण उनसे बहुत अच्छी मित्रता हो गई थे|

लीजिए, प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का लिखा यह नवगीत-

तेज़ धूप में
नंगे पाँव
वह भी रेगिस्तान में,
मेरे जैसे जाने कितने
हैं इस हिन्दुस्तान में ।

जोता-बोया-सींचा-पाला
बड़े जतन से देखा भाला
कटी फ़सल तो
साथ महाजन भी
उतरे खलिहान में ।

जाने क्या-क्या टूटा-फूटा
हँसी न छूटी गीत न छूटा
सदा रह
तिरसठ का नाता
बिरहा और मचान में ।

जीना भी है मरना भी है
मुझको पार उतरना भी है
यही सोचता रहा
बराबर
बैठा कन्यादान में ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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