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लंदन फिर से छूटा जाय!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
डेढ़ महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर कुछ दिन बंगलौर में रुककर, अगले सप्ताह गोवा पहुंचेंगे।

 

 

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोवा में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक आकर्षक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर से थोड़ा दूर ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है, पिछले वर्ष जिस मकान में थे वहाँ तो घर को छूते हुए ही बहती थी, अब नए घर के बगल से नहर बहती है, जिसके पार ‘कैनरी व्हार्फ’ के अंडरग्राउंड और ओवरग्राउंड दोनो स्टेशन हैं, एक ‘जुबिली लाइन’ का और दूसरा ‘डीएलआर’ लाइन का।

 

 

दिन भर पहले रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। इस बार हर कुछ ही सेकंड बाद ‘डीएलआर’ लाइन की ट्रेन सामने से जाती हुई दिखाई देती हैं। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला। कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

 

 

शाम को जब 6 से 7 बजे तक वॉक के लिए जाता हूँ, इस बार मेरा ‘वॉक’ का ठिकाना ‘कैनरी व्हार्फ रिवर फ्रंट’ है, नदी किनारे यह आकर्षक स्थान विकसित किया गया है, जहाँ क्रूज़ आदि से लोग आते-जाते हैं और हाँ बड़ी संख्या में लोग यहाँ वॉक, साइक्लिंग और कुदरत का आनंद लेने के लिए भी आते हैं, शाम के समय यहाँ सूर्यास्त का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है, जैसा गोवा में ‘मीरामार बीच’ पर भी मैं देखता हूँ।

 

 

एक और गतिविधि जो यहाँ बहुत सामान्य है, वह है ‘बार’ की रौनक, मैं जब ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के सामने से होकर गुज़रता हूँ, और जब ‘रिवर फ्रंट’ पहुंचता हूँ वहाँ भी, मदिरालय में पीने वालों की इतनी भीड़ होती है, कि वे विशाल ‘बार’ के भीतर नहीं समा पाते और काफी संख्या में उनको बाहर खड़े होकर ही पीनी पड़ती है, ऐसा लगता है कि जैसे शराब मुफ्त में बंट रही हो, मदिरालय के सामने से गुज़रने में थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन मैंने किसी को पीकर बहकते हुए तो नहीं देखा। भारत में तो बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि पीकर बहके नहीं, तो पैसा बेकार ही खर्च किया!

 

 

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। लंदन का तो यह दूसरा ट्रिप है, पिछले वर्ष एक माह के लिए आया था, इस बार डेढ़ माह का प्रवास था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

 

 

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद है कि एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

 

 

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद अपने देश में पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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क्लासिक बोट फेस्टिवल, लंदन!

लंदन प्रवास के इस वर्ष के अनुभवों के अंतर्गत आज मैं बात करूंगा ‘क्लासिक बोट-फेस्टिवल’ की, जिसे हम आज देखने गए और मैं आज इसी का अनुभव शेयर कर रहा हूँ।

 

सभी प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर यह भी परंपरा होती है कि वे समय-समय पर ऐसे विभिन्न मेले, उत्सव आदि आयोजित करते रहते हैं जिससे पर्यटकों के उत्साह में कुछ अतिरिक्त उछाल आता है। मैं गोवा में ऐसे आयोजनों के बारे में तो जानता ही रहा हूँ। अभी लंदन में हूँ तो यहाँ आजकल ‘ऑटम फेस्टिवल’ भी आयोजित हो रहे हैं।

इसी क्रम में आज हम ‘सेंट केथरिन पायर’ पर गए, यहाँ 6 से 8 सितंबर तक ‘क्लासिक बोट फेस्टिवल-2019, का आयोजन किया गया है, जिसका आज अंतिम दिन था। यह स्थान टॉवर ब्रिज के बगल में है। एक बात और लंदन नगर क्योंकि थेम्स नदी के दोनों तरफ बसा है, और यहाँ नगर में अनेक नहरें इस मुख्य नदी से निकाली गई हैं। यहाँ पर अनेक आयोजन भी नदी और बोटिंग से जुड़े होते हैं।

 

अक्सर यहाँ इस प्रकार के आयोजन होते रहते हैं, एक तो विशाल शिप ‘कटी सार’ ग्रीनविच पर प्रदर्शनी के रूप में खड़ा हुआ है, जिसको देखने के लिए भारी संख्या में लोग आते हैं। इसके अलावा यहाँ अक्सर रंग-बिरंगी पालयुक्त नावें, ‘याच फेस्टिवल’ के आयोजन के रूप में निकलती रहती हैं। इसी प्रकार समय-समय पर बोटिंग के, कंपिटीशन, फेस्टिवल आदि भी आयोजित होते रहते हैं।

इसी क्रम में यह आयोजन विशेष महत्व का था, जिस प्रकार पुरानी विंटेज कारों की प्रदर्शनी बहुत से स्थानों पर होती रहती है, इसी प्रकार यह ‘क्लासिक बोट्स’ की प्रदर्शनी थी, जिसमें ऐसी पुराने समय की नावें लगाई गई थीं जिनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। कोई समय था जब नदियों और समुद्र में इन नावों का आधिपत्य रहता था, आज ये नावें अपने उन्नत इतिहास के बारे में बताने के लिए ‘सेंट केथरिन डॉक्स’ के सीमित क्षेत्र में सजी हुई खड़ी थीं, दर्शक इनके भीतर जाकर इनके प्रत्येक भाग को देख सकते थे।

जैसा कि होता है, इस बोट फेस्टिवल के एक अंग के रूप में अनेक आयोजन और गतिविधियां रखी गई थीं, जिनमें एक बैंड द्वारा गीत-संगीत की प्रस्तुति भी विशेष रूप से मोहने वाली थी, बाकी खाने-पीने के स्टॉल तो ऐसे में होते ही हैं।

 

 

इस प्रदर्शनी में एक अत्यंत सुंदर और सोने की नक्काशी से सजी नाव महारानी की भी थी, जिसे केवल बाहर से देखा जा सकता था। बाकी सभी ऐतिहासिक महत्व वाली नावों के भीतर जाकर हमने उनको देखा।

इस आकर्षक प्रदर्शनी का आनंद लेने के बाद हम वहाँ से ही नगर भ्रमण कराने वाले क्रूज़ में बैठकर ग्रीनविच तक गए और यहाँ भी नदी तट पर बने भवनों आदि के बारे में कमेंट्री के माध्यम से रोचक जानकारी प्राप्त की। यहीं हमें यह भी बताया गया कि नदी किनारे जहाँ नाव, क्रूज़ आदि रुकते हैं ऐसे अधिकांश स्थानों को ‘व्हार्फ’ कहा जाता है, उसका अर्थ है ‘वेयरहाउस एट रिवर फ्रंट’।

इस प्रकार ग्रीनविच पर विख्यात शिप ‘कटी सार’ को एक बार फिर से देखने के बाद हम वहाँ से ट्रेन पकड़कर अपने घर की ओर रवाना हो गए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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लंदन की आंख!

लंदन प्रवास जारी है और आज हम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी देखने गए थे। इसका विवरण कल दूंगा, फिलहाल पिछले वर्ष ‘लंदन आइ’ देखने का अनुभव दोहरा रहा हूँ-
चलिए एक बार फिर से लंदन की यात्रा पर निकलते हैं। लंदन के बहुत सारे स्थान जैसा मैंने पहले बताया था, हमने क्रूज़ की यात्रा के दौरान देखे था। अब बारी थी इनमें से एक-दो को पास से देखने की। इसी प्रयास में हम कल ‘लंदन आइ’ और ‘टॉवर ब्रिज’ की यात्रा में निकले।

 

एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूँ, मुझमें ‘ट्रैवल ब्लॉगर्स’ जैसा धैर्य नहीं है, मैं सामान्यतः किसी भाव को लेकर ब्लॉग लिखना शुरू करता हूँ और बहुत सी बार ब्लॉग पोस्ट खत्म होते-होते सोचता हूँ, अरे क्या मैंने इस विषय में लिखने के बारे में सोचा था! लेकिन ट्रैवल ब्लॉगिंग में एक जगह ‘फोकस’ रखकर लिखना होता है। ठीक है जी, मैं कोशिश करूंगा।

 

 

तो कल हम निकले, यह लक्ष्य बनाकर कि आज ‘लंदन आइ’ और ‘टॉवर ब्रिज’ देखना है। अधिक समय बर्बाद न हो, इसलिए हमने घर से सीधे ‘लंदन आइ’ का रुख किया। ‘लंदन आइ’ जैसा कि आप जानते ही होंगे एक ‘आकाशीय झूला’ है, जो इतना बड़ा है और इतना धीरे चलता है कि अगर आप इसे थोड़ा भी दूर से देखें तो यह हमेशा रुका हुआ ही लगता है, एकदम पास जाने के बाद पता चलता है कि यह धीरे-धीरे चल रहा है। अपना एक फेरा यह लगभग आधे घंटे में पूरा करता है।

 

जिस ऊंचाई पर यह झूला ले जाता है, वहाँ जाने के बाद लंदन में ऐसा कौन सा प्रमुख स्थान है, जो आप नहीं देख सकते, लेकिन कुछ स्थानों को देखने के लिए दूरदृष्टि भी जबर्दस्त चाहिए ना जी!

खैर बड़े काम के लिए प्रयास भी बड़े करने पड़ते हैं। बाधाएं भी बड़ी आती हैं। मेरे बेटा-बहू, जो लंदन में ही रह रहे हैं और इन स्थानों को कई बार देख चुके हैं, वे हमें- पति-पत्नी को ये दिखाने ले गए थे। आधा घंटा तक बेटा लाइन में लगा रहा, तब टिकट मिल पाया। इस बीच हम वहाँ आसपास घूम लिए, जहाँ लगभग मेले जैसा माहौल रहता है।

एक बात और मैंने देखी लंदन में पैसा कमाने के लिए लोग सार्वजनिक स्थानों में बाकायदा माइक और साज़ के साथ गाना गाते हैं। बहुत से वेश बनाते हैं, जैसे कि कल हम वहाँ एक ‘चार्ली चैप्लिन’ और एक ‘गोल्डन लेडी’ से मिले। हाँ चैप्लिन जी कुछ मोटे ज्यादा हो गए थे, मुझे लगा कि ऐसे में वो फुर्ती कैसे दिखा पाएंगे, जो उनकी फिल्मों में देखने को मिलती है। (मुझे यह भी खयाल आता है कि भारत में ज्यादा जोर लोग एटीएम लूटने अथवा अन्य प्रकार के फ्रॉड सीखने पर लगा रहे हैं!)

 

बेटा जब टिकट लेकर आ गया, तब हम सबने वहाँ 360 डिग्री अनुभव वाली लगभग 10-15 मिनट की फिल्म देखी, जो ‘लंदन आइ’ अनुभव का एक हिस्सा है। भारत में भी ‘छोटा चेतन’ जैसी 3-डी फिल्म पहले बनी थी, और विशेष चश्मा पहनकर कुछ अलग अनुभव कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन मानना पड़ेगा कि इस अनुभव के सामने वह सब कुछ भी नहीं था, ऐसा लगा कि सब कुछ अपने तीन तरफ हो रहा है, कबूतर जैसे कान से टकराते हुए चला गया, कई बार अपना सिर हिलाना पड़ा, लगा कि कोई वस्तु टकरा जाएगी। सचमुच ‘लंदन आइ’ के आकाशीय झूले’ पर चढ़ने से पहले मिला यह अनुभव दिव्य था।

इसके बाद लगभग आधा घंटा और लाइन में लगे रहने के बाद आकाश-यात्रा का अपना नंबर आया, मैंने गिना नहीं लेकिन बहुत सारे अति सुंदर केबिन इस झूले में हैं, हर केबिन में 15-20 लोग तो आराम से आ ही जाते हैं, कुछ बैठ भी जाते हैं, वैसे चारों तरफ के दिव्य नजारे को देखने, अपने कैमरों में कैद करने के लिए अधिकतर लोग खड़े रहना ही पसंद करते हैं। नीचे बहती विशाल थेम्स नदी, उसके दोनो किनारों से झांकता लंदन का इतिहास और वर्तमान। ये सब ऐसा है जो बयान करने की चीज नहीं है और मेरी इतनी क्षमता भी नहीं है। बस यही कि अगर जीवन में मौका मिले तो ये अनुभव अवश्य कर लेना चाहिए।

(इस पोस्ट में मैंने रात में घर के पास से होकर गुज़रने वाले विशाल वाइकिंग शिप का चित्र भी डाल दिया है, जो मुझे बहुत सुंदर लगा था)।

आगे और बात कल करेंगे, आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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फिर वापस लंदन में!

लंदन में रहते हुए, आज जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वह पिछले वर्ष का है। आज स्कॉटलैड यात्रा के बाद लंदन वापसी पर जो कुछ मन में आया था, उन मनोभावों की अभिव्यक्ति को फिर से दोहरा रहा हूँ-

 

 

स्कॉटलैंड की तीन दिन की यात्रा के बाद वापस लंदन लौट आए, हाँ एक बात है- ‘स्कॉटलैंड यार्ड’, जिसे बहुत बार फिल्मों में देखा और सुना, वो कहाँ है, न किसी ने पूछा और न बताया! खैर एक महीने के लंदन प्रवास में से आधा पूरा हो गया है। रोज जब सैर पर जाता हूँ तो वे ही गोरे दिखाई देते हैं, जिन्होंने लंबे समय तक हम पर राज किया था।

 

जैसा मैंने पहले बताया था, एशियाई मूल के लोग भी बड़ी संख्या में यहाँ हैं और कुछ खास इलाकों में अधिक बसे हैं।

 


एक बात जो शुरू में अजीब लगी थी, अब आदत पड़ गई है, सुबह जितनी जल्दी आंख खुल जाए सूरज की रोशनी दिखाई देती है और रात में साढ़े नौ-दस बजे तक रहती है। आजकल गर्मी और डे लाइट सेविंग के समय यह हालत है, जबकि घड़ी का समय भी एक घंटा आगे कर दिया जाता है ताकि बिजली की बचत की जा सके।

आजकल जहाँ लगभग 18 घंटे दिन की रोशनी रहती है वहीं सर्दियों में इसका उल्टा हो जाता है, और शाम 3 बजे ही अंधेरा हो जाता है।

जैसे भारत के अलग-अलग नगरों में स्थानों के अलग तरह के नाम होते हैं, जैसे पुरानी दिल्ली में- कटरा, हाता, छत्ता आदि, मंडी, बाग आदि भी बहुत से स्थानों में शामिल होते हैं, हैदराबाद में पेठ होते हैं, इंग्लैंड में जो नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिला अभी तक, वह है- ‘व्हार्फ’, जैसे पास में ही ट्यूब स्टेशन है- ‘कैनरी व्हार्फ’। ‘व्हार्फ’ होता है नदी किनारे विकसित किया गया वह, सामान्यतः ढलान वाला प्लेटफार्म, जिसके माध्यम से यात्री और सामान आसानी से बाहर आ सकें। और यहाँ नगर को एक सिरे से दूसरे तक जोड़ती, बीच में बहती थेम्स नदी है, तो इस तरह ‘व्हार्फ’ भी होंगे ही।


जैसे मुम्बई में नगर के बीचों-बीच दो रेलवे लाइनें हैं, जो मुम्बई की लाइफ-लाइन कहलाती हैं, उसी तरह लंदन में नगर के बीच से बहती ‘थेम्स’ नदी, मुझे लगता है कि सामान और यात्रियों के यातायात में इसकी काफी बड़ी भूमिका है।

भारत में जो लकड़ी की बॉडी वाले ट्रक दिखाई देते हैं, वे यहाँ नहीं दिखे, कुछ बड़े बंद ट्रक तो हैं, इसके अलावा कार के पीछे ट्रॉली जोड़कर भी सामान का यातायात होता है और नदी के मार्ग से भी जहाँ तक संभव है।

जैसा मैंने पहले बताया था यहाँ हमारे घर के पीछे ही थेम्स नदी बहती है, दिन भर जहाँ हम यात्री नौकाओं को देखते हैं, वहीं ऐसी नौकाएं भी देखते हैं, जिनके पीछे एक बड़ा कंटेनर जोड़कर, उसके माध्यम से, सामान्य ट्रक से शायद ज्यादा सामान ढ़ोया जाता है।

एक बात है कि दो चित्र जो मूर्तियों के हैं, एक खड़े हुए युवक की और दूसरी बैठे हुए वृद्ध व्यक्ति की। ये मूर्तियां हाल ही में कलात्मक गतिविधि के अंतर्गत एक अंडरग्राउंड ‘कैनरी व्हार्फ स्टेशन (जुबिली लाइन) के सामने’ और दूसरी उसके पास ही ‘कैबट पार्क’ में लगाई गई हैं और इनको मैंने इस बार जोड़ा है। ऊपर का चित्र तो ग्रीनविच रिवर फ्रंट का है, और वहाँ नदी के नीचे से उस पार जाने वाली सुरंग ‘टनल’  का भी चित्र है।

आज बस ऐसे ही कुछ ऑब्ज़र्वेशन लंदन नगर के बारे में देने का मन हुआ, आगे जो कुछ बताने लायक लगेगा, वो भी लिखूंगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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211. ओल्डमैन्ज़ डे ऑउट इन लंदन!

अभी लगभग एक माह तक और लंदन में हूँ और यहाँ सप्ताहांत में जब बाहर निकलूंगा तब वह अनुभव शेयर करता रहूंगा। मैं पिछले वर्ष भी यहाँ आया था, उस बार जून में आकर जुलाई में वापस गया था। मैं सोचता हूँ कि पिछले वर्ष के अनुभव भी साथ-साथ शेयर करता रहूं। उस समय पहली बार लंदन आया था सो जिज्ञासा भी अधिक थी, उत्साह अधिक था, उस बार बेटे का घर थेम्स नदी के किनारे पर था, इस बार कैनरी व्हार्फ ट्यूब स्टेशन के पास, थेम्स से जुड़ी नहर के किनारे है।

 

तो अब पुराने अनुभव भी लंदन यात्रा के शेयर करता रहूंगा, आज उसका पहला अनुभव शेयर कर रहा हूँ-

 

जैसा मैंने पहले बताया था, हम एक माह के लिए लंदन आए हुए हैं, यहाँ थेम्स नदी के किनारे पर अपने बेटे-बहू के घर में रह रहे हैं, घर की एक तरफ जिधर थेम्स नदी बहती है, उधर कांच की ही दीवार, दरवाजा है, दिन भर नावें और छोटे-मोटे शिप दिखाई देते रहते हैं। नदी के दूसरे किनारे पर ओ-2 कॉन्टिनेंटल और ईवेंट प्लेस है, जो पिछ्ले ओलंपिक के समय विकसित किया गया था, कल वहाँ भी जाना हुआ।

 

हाँ तो वीक-एंड होने के नाते, आज हम पति-पत्नी, अपने बेटे और बहू के साथ बाहर घूमने निकले। शुरुआत हुई यहाँ की लोकल बस से ट्यूब रेल स्टेशन ‘कैनेरी व्हार्फ’ और वहाँ से ट्यूब पकड़कर ग्रीन पार्क तक जाकर! वहाँ एक बर्थडे में भाग लेना था ना!
जी हाँ, ग्रीन पार्क ट्यूब स्टेशन है यहाँ लंदन में और उसके पास ही है बकिंघम पैलेस! कल क्वीन विक्टोरिया का जन्म दिन था, और हम क्योंकि कुछ देर में पहुंचे, तो हमें दूर से ही देखना पड़ा। बॉलकनी से रॉयल फैमिली के लोग, जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे, जहाँ हम थे, वहाँ से उनकी शक्लें साफ दिखाई नहीं दे रही थीं। हाँ जब हम पहुंचे तब तोपों की सलामी दी जा रही थी।

शाही परिवार रहता तो कहीं और है लेकिन ऐसे आयोजन के लिए बकिंघम पैलेस आता है। बहुत भीड़ थी, ठीक से देख भी नहीं पाए, इससे साफ तो अपना सलमान ही बॉलकनी से हाथ हिलाते हुए दिख जाता है, भले ही वो जेल से छूटकर आने पर हो। खैर फिर हमारे सामने ही रॉयल फैमिली के लोग वहाँ से वापस भी लौटकर भी चले गए और सेरेमॉनियल बैन्ड और घोड़े वगैरा भी।

महल से लौटकर फिर हमने ट्यूब पकड़ी, हाँ एक बात और, अपनी दिल्ली की मैट्रो से एक फर्क है यहाँ की ट्यूब में, प्लेटफॉर्म का किनारा पूरा कवर रहता है,और जैसे दीवार बनी हो, सिर्फ ट्यूब के डिब्बे के दरवाजे के सामने का हिस्सा खुलता है, जैसा हमने पहले दुबई में भी देखा था। (ऐसा जुबिली लाइन में है,बाकी लाइंस में प्लेटफॉर्म हमारे यहाँ की तरह खुले हुए हैं।)

हाँ तो ट्यूब पकड़कर हम ओ-2 एरिया में गए, जो हमारे घर से ही, नदी के पार दिखता है, लेकिन ट्यूब हमें टनेल के माध्यम से, नदी के नीचे होकर वहाँ ले जाती है। ओ-2 एरिया गुड़गांव के ‘किंगडम ऑफ ड्रीम्स’ जैसा भव्य है, बस अंदर फाल्स सीलिंग को आकाश का रूप नहीं दिया है।

जिसे साधारण भाषा में रोप-वे भी कह सकते हैं, यहाँ उसका अनुभव भव्य था, पूरे लंदन का नज़ारा बहुत ऊंचाई से उसमें दिखता है, और उसको कहते हैं- एमिरेट्स एयरलाइंस। इस दिव्य यात्रा के बाद, आज के सफर को विराम दिया, घर पहुंचकर।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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