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शिशु देवदूत – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Child Angel’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

शिशु देवदूत

 

वे चिल्लाते हैं, झगड़ते हैं, वे शंका करते हैं और निराश होते हैं, उनकी यह कलह अंतहीन है।
तुम्हारा जीवन, उनके बीच रोशनी की एक लपट की तरह हो
मेरे बच्चे, कभी मंद न होने वाली, विशुद्ध, और यह उनको प्रसन्न और शांतचित्त बना दे।
वे क्रूर हैं, लालसा और ईर्ष्या से भरे हुए, उनके शब्द ऐसे हैं, जैसे
छुपाये हुए चाकू, खून के प्यासे।

 

जाओ और उनके क्रोध भरे हृदयों के बीच खड़े हो जाओ मेरे बच्चे, और
अपनी निर्मल दृष्टि उन पर पड़ने दो, जैसे संध्यावेला की क्षमादायी शांति
छा जाती है, दिन के संघर्षपूर्ण वातावरण के ऊपर।

 

उनको अपना चेहरा देखने दो, मेरे बच्चे, ताकि वे जान सकें अर्थ सभी बातों का;
ऐसा होने दो कि वे सब तुम्हे प्यार करें, और इस प्रकार आपस में भी प्यार करें।
आओ और अनंत के आंचल में स्थान ग्रहण करो, मेरे बच्चे।

 

सूर्योदय के समय, अपने हृदय को, खिलते पुष्प की तरह उभरने दो,
और सूर्यास्त के समय, शांतिपूर्वक अपने शीश को झुका लो, और इस प्रकार
दिन की प्रार्थना को पूर्ण करो।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The Child Angel

 

They clamour and fight, they doubt and despair, they know no end to their wrangling.
Let your life come amongst them like a flame of light, my
child, unflickering and pure, and delight them into silence.
They are cruel in their greed and their envy, their words are like
hidden knives thirsting for blood.
Go and stand amidst their scowling hearts, my child, and let
your gentle eyes fall upon them like the forgiving peace of the
evening over the strife of the day.
Let them see your face, my child, and thus know the meaning
of all things; let them love you and thus love each other.
Come and take your seat in the bosom of the limitless, my
child. At sunrise open and raise your heart like a blossoming
flower, and at sunset bend your head and in silence complete the
worship of the day.

 

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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