नाम पे जिसके उबल पड़े!

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर,
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े|

कैफ़ी आज़मी

इतना फ़ासला क्यूँ है!

सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से,
मेरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है|

राही मासूम रज़ा

गहराई का अंदाज़ा न करने देगा!

कैसा दरिया है कि प्यासा तो न मरने देगा,
अपनी गहराई का अंदाज़ा न करने देगा|

वसीम बरेलवी

रिश्ता था जब सराब के साथ!

तो फिर बताओ समंदर सदा को क्यूँ सुनते,
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ|

शहरयार

अजब तिश्नगी है और मैं हूं!

किसी मक़ाम पे रुकने को जी नहीं करता,
अजीब प्यास, अजब तिश्नगी है और मैं हूं|

कृष्ण बिहारी ‘नू
र’

कहीं तिश्नगी बेहिसाब है!

कहीं आँसुओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ,
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है|

राजेश रेड्डी

दौलत-ए-बेदार की तरह!

इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है के एक जाम,
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी

मैं तो मगर प्यासा नहीं!

जा दिखा दुनिया को मुझको क्या दिखाता है ग़ुरूर,
तू समुंदर है तो है, मैं तो मगर प्यासा नहीं|

वसीम बरेलवी

प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं!

वो समझता था उसे पाकर ही मैं रह जाऊँगा,
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं|

वसीम बरेलवी

अपना मुकद्दर लेके आया है!

कोई इक तिशनगी कोई समुन्दर लेके आया है,
जहाँ मे हर कोई अपना मुकद्दर लेके आया है|

राजेश रेड्डी