ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं!

प्यास बुनियाद है जीने की बुझा लें कैसे,
हमने ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं|

राही मासूम रज़ा

मैं तो मगर प्यासा नहीं!

जा दिखा दुनिया को मुझ को क्या दिखाता है ग़ुरूर,
तू समुंदर है तो है मैं तो मगर प्यासा नहीं|

वसीम बरेलवी  

प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं!

वो समझता था उसे पाकर ही मैं रह जाऊँगा,
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं|

वसीम बरेलवी

मरघट!

किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों से जिन कवियों को सुनने में मुझे काफी आनंद आता था, उनमें स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी भी शामिल थे| उनके एक गीत की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं-



एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो,

उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है|


लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने जीवन की नश्वरता के बारे में काफी सुंदर अभिव्यक्ति की है –

किसलिए बता वन-उपवन में तू घूम रहा मारा-मारा
सब गीत धरे रह जायेंगे टूटेगा जिस दिन इकतारा
हर घाट-घाट पनघट-पनघट घूमा फिर भी घट खाली है
यह प्यास नहीं केवल तेरे दुर्बल मन की कंगाली है
तेरा तीरथ तो घट में है बाहर छलकी अंधियारी है
यह राग साँस की सरगम का घर जाने की तय्यारी है
जब तक प्रतिबिम्ब लगे मैला, दर्पण को रख अपने आगे
पूजा का दीपक बनकर जल जब तक न मौन प्रतिमा त्यागे
है तेरे पीछे लगा हुआ कबसे मरघट का अंगारा

किसलिए…

हँस-हँसकर जीवन जीने से आँसू का ऋण चुक जाएगा
तप की ज्वाला से दूर न जा प्रभु से अंतर बढ जायेगा
जीवन की गीता एक दिवस अक्षर-अक्षर हो जाएगी
तेरे यश-गौरव की गाथा धीरे-धीरे सो जाएगी
माटी मे खोएगी माटी, सूरज भी क़र्ज़ चुकाएगा
जल अपना कण-कण छीनेगा, ले प्राण पवन उड़ जायेगा
तेरी काया का ताजमहल हो जायेगा पारा-पारा


किसलिए…

हाथों से दान किया कितना आँखों से क्या-क्या काम लिया
कानों से क्या-क्या सुना बता, वाणी से क्या गुणगान किया
यह चरण ले गए कहाँ तुझे तेरे आचरण बताएँगे
यदि सदुपयोग किया होगा तो यह फिर भी मिल जायेंगे
जिसकी चादर उजली होगी वोह उसको गले लगाएगा
मैली चादर वाला उस दिन बस दूर खडा घबराएगा
उसके आगे सब नीर-क्षीर छट जायेगा न्यारा-न्यारा
क्यूँ घूम रहा मारा-मारा सब गीत धरे रह जायेंगे
टूटेगा जिस दिन एकतारा

किसलिए…

सुधियों के सागर की लहरें घायल सी तट पर डोलेंगी
स्मृतियाँ बनकर नेह-नीर हर घट मैं करुणा घोलेंगी
पथ मैं तृष्णा के दलदल में क्यूँ बचकर निकल न पाता है
तू सज़ा रहा जितना मठ को उतना मरघट मुस्काता है
बाहर चन्दन सा महक रहा यह जग अंदर से खारा है
आगमन-गमन की चक्की मे,पिसते हर पंथी हारा है

क्यूँ भटक रहा है त्रण जैसा तू थका-थका हारा-हारा

किसलिए…


खिलकर झर जाएगा गुलाब, पागल सुगंध हो जायेगी
तू बना रहा जिसका माली सारी बगिया मुरझायेगी
मन की दासी इन्द्रियाँ सभी संयमी बनी सो जाएँगी
आड़ी-तिरछी सब रेखाएं उस दिन सीधी हो जायेंगी
कितना खोया,कितना पाया, कितना रोया कितना गाया
तू लगा रहा अपनी धुन मे जीवन भर समझ नहीं पाया
अंतिम क्षण तेरे नैनों मे होगा आंसू खारा-खारा

किसलिए…

रह जायेंगे सब मीत खड़े सब चित्र टंगे रह जायेंगे
चिंतन की चादर मे लिपटे सब छंद पड़े रह जायेंगे
धूमिल हो जायेंगी छवियाँ, केवल चर्चा रह जायेंगी
अधरों पर धरी कोई बंसी फिर तेरा गीत न गाएगी
ये प्रश्न कौन है क्या है तू?जब-जब अंतर मे अटकेगा
खटकेगा जब तक यह काँटा तू युगों-युगों तक भटकेगा
घायल हिरनी सा मरुथल पर तू थका-थका हारा-हारा


किसलिए…

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

कभी क़तरा है बहुत!

तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है!

सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से,
मिरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है|

राही मासूम रज़ा

मैंने भी जाम रख दिया!

शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही,
उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया|

अहमद फ़राज़

इक समुंदर कह रहा था-

मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया,
इक समुंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए|

राहत इंदौरी

छोड़ आए वो दरिया होगा!

प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली,
जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा|

निदा फ़ाज़ली

वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है!

साक़ी से जो जाम ले न बढ़कर,
वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है|

अली सरदार जाफ़री