इन्हें निकाल के चल!

अगर ये पाँव में होते तो चल भी सकता था,
ये शूल दिल में चुभे हैं इन्हें निकाल के चल।

कुँअर बेचैन

जूड़े में सजा ले मुझको!

मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको|

क़तील शिफ़ाई

लहू अपना पिलाया होगा!

बानी-ए-जश्न-ए-बहारां ने ये सोचा भी नहीं,
किसने कांटों को लहू अपना पिलाया होगा|

कैफ़ी आज़मी

कांटे चुभा लिए!

चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास,
हमने खुशी के पाँवों में कांटे चुभा लिए|

कुंवर बेचैन