नाम सुनता हैं तुम्हारा तो—

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर,
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता है|

राहत इन्दौरी

लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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