रात सपना बहार का देखा!

रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा,
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम|

सुदर्शन फ़ाकिर

हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझसे!

हाए उस वक़्त को कोसूँ कि दुआ दूँ यारो,
जिसने हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझसे|

जाँ निसार अख़्तर

जो दीवाना मर गया कब का!

वो ज़माना गुज़र गया कब का,
था जो दीवाना मर गया कब का|

जावेद अख़्तर

गुज़रता है गुज़र जाएगा!

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा|

अहमद फ़राज़

शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते!

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते.
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते|

गुलज़ार

वक़्त का एहसास नहीं रहता है!

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए,
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है|

अहमद मुश्ताक़

चाहिए इक उम्र असर होते तक!

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक|

मिर्ज़ा ग़ालिब

बाज़ी बिछी है और मैं हूं!

मुक़ाबिल अपने कोई है ज़ुरूर कौन है वो,
बिसाते-दहर है, बाज़ी बिछी है और मैं हूं|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया!

कुछ और वक़्त चाहते थे कि सोचें तेरे लिये,
तूने वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया|

मुनीर नियाज़ी