देखी थी कोई बरसात कहाँ!

मेरी आबला-पाई* उनमें याद अक्सर की जाती है,
काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ|

*पैर के छाले

राही मासूम रज़ा

ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल!

हम थके-हारे हैं ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल,
कहीं साया जो नज़र आया है घबराए हैं|

राही मासूम रज़ा

तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ!

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ,
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ|

बशीर बद्र

मिलावट न करो छाँव में!

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो,
धूप की तुम तो मिलावट न करो छाँव में|

क़तील शिफ़ाई