ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया!

शहर को बरबाद करके रख दिया उसने ‘मुनीर’,
शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया|

मुनीर नियाज़ी

इनायत का तलबगार नहीं हूँ!

या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से,
मैं उसकी इनायत का तलबगार नहीं हूँ|

अकबर इलाहाबादी

क्या क्या जुल्म न ढाया लोगों ने!

हम को दीवाना जान के क्या क्या जुल्म न ढाया लोगों ने,
दीन छुड़ाया, धर्म छुड़ाया, देस छुड़ाया लोगो ने|

कैफ़ भोपाली

धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ!

कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब* के साथ,
कि आज धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ|
*कष्ट, उत्पीड़न
शहरयार

ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है!

जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं,
कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है|

जावेद अख़्तर

मसअला बन कर खड़ा हो जाऊँगा!

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं,
मैं गिरा तो मसअला बन कर खड़ा हो जाऊँगा|

वसीम बरेलवी

आज सता ले मुझको!

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ,
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको|

क़तील शिफ़ाई

न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा!

इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
है यक़ीं अब न कोई शोर-शराबा होगा
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा|

साबिर दत्त

ज़िंदगी के सताए हुए हैं!

इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाए हुए हैं,
मौत ने हमको बख्शा है लेकिन, ज़िंदगी के सताए हुए हैं|