मुझे उन का कोई पता नहीं!

इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं,
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं|

बशीर बद्र

कुछ दिन ठहर के देखते हैं!

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं|

अहमद फ़राज़

अपनी भी तबियत नहीं मिलती!

कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी खफा हैं,
हर एक से अपनी भी तबियत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली