मैं तो वही खिलौना लूँगा!

आज मैं अपने जमाने में हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि रहे स्वर्गीय सियाराम शरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में बाल हठ दिखाया गया है एक साधारण बालक का और एक राजकुमार का, जिनको दोनों को एक दूसरे के खिलौने पसंद आते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सियाराम शरण गुप्त जी की यह कविता –


मैं तो वही खिलौना लूंगा मचल गया दीना का लाल
खेल रहा था जिसको लेकर राजकुमार उछाल-उछाल।
व्यथित हो उठी मां बेचारी- था सुवर्ण-निर्मित वह तो !
‘खेल इसी से लाल, नहीं है राजा के घर भी यह तो !


‘राजा के घर! नहीं-नहीं मां, तू मुझको बहकाती है,
इस मिट्टी से खेलेगा क्या राजपुत्र, तू ही कह तो ।
फेंक दिया मिट्टी में उसने, मिट्टी का गुड्डा तत्काल,
‘मैं तो वही खिलौना लूंगा – मचल गया दीना का लाल ।

‘मैं तो वही खिलौना लूंगा – मचल गया शिशु राजकुमार,
‘वह बालक पुचकार रहा था पथ में जिसको बारम्बार ।
‘वह तो मिट्टी का ही होगा, खेलो तुम तो सोने से ।
दौड पडे सब दास-दासियां राजपुत्र के रोने से ।

‘मिट्टी का हो या सोने का, इनमें वैसा एक नहीं,
खेल रहा था उछल-उछलकर वह तो उसी खिलौने से ।
राजहठी ने फेंक दिए सब अपने रजत-हेम-उपहार,
‘लूंगा वहीं, वही लूंगा मैं! मचल गया वह राजकुमार ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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टूटे हुए खिलौने का!

है पाश-पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है,
वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का |

जावेद अख़्तर

खो जाए तो सोना है!

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है|

निदा फ़ाज़ली