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मैं छः सेवक रखता हूँ – रुड्यार्ड किप्लिंग

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Keep Six Honest’ का भावानुवाद-

 

 

मैं छः सेवक रखता हूँ

 

मैं अपने पास छः ईमानदार सेवक रखता हूँ
(मैं जो कुछ भी जानता हूँ, उन्होने ही मुझे सिखाया है);
उनके नाम हैं-‘क्या’ और ‘क्यों’ और ‘कब’,
तथा ‘कैसे’ और ‘कहाँ’ और ‘कौन’।
मैं उनको भेजता हूँ भूतल पर और समुद्र में,
में उनको भेजता हूँ पूर्व और पश्चिम में;
लेकिन मेरे लिए काम करने के बाद,
मैं उनको आराम करने देता हूँ।

 

मैं उनको नौ बजे से पांच बजे तक आराम करने देता हूँ,
क्योंकि तब मैं व्यस्त होता हूँ,
मैं उनको नाश्ता, भोजन और चाय भी दिलाता हूँ,
क्योंकि वे भूखे प्राणी हैं।
लेकिन इस बारे में अलग-अलग लोगों के, अलग विचार हैं;
मैं एक छोटी बच्ची को जानता हूँ-
उसके पास एक करोड़ सेवक हैं,
जिनको वह बिल्कुल आराम से नहीं बैठने देती!

 

वो उनको रवाना कर देती है अपने कामों के लिए विदेशों में,
जैसे ही उसकी आंखें खुलती हैं-
दस लाख ‘कैसे’, बीस लाख ‘कहाँ’,
और सत्तर लाख ‘क्यों’!

 

 

-Rudyard Kipling

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ

I Keep Six Honest

 

I keep six honest serving-men
(They taught me all I knew);
Their names are What and Why and When
And How and Where and Who.
I send them over land and sea,
I send them east and west;
But after they have worked for me,
I give them all a rest.
I let them rest from nine till five,
For I am busy then,
As well as breakfast, lunch, and tea,
For they are hungry men.
But different folk have different views;
I know a person small-
She keeps ten million serving-men,
Who get no rest at all!
She sends’em abroad on her own affairs,
From the second she opens her eyes-
One million Hows, two million Wheres,
And seven million Whys!

– Rudyard Kipling

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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प्रारंभ- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Beginning’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

प्रारंभ

 

कहाँ से आया हूँ मैं, कहाँ से उठाया था तुमने मुझे?” शिशु ने पूछा
अपनी मां से।
वह बोली, आधा रोते, आधा हंसते हुए, और शिशु को
अपने स्तनों से कसकर चिपकाते हुए-
“तुम मेरे हृदय में छिपे थे, मेरी अभिलाषा के रूप में, मेरे प्रिय।

 

तुम उन गुड़ियाओं में थे, जिनसे मैं बचपन में खेलती थी, और जब हर सुबह
मिट्टी से मैं, अपने ईश्वर की मूर्ति बनाती थी, तब भी मैं तुम्हारा
अधबना रूप बनाती थी।

 

तुम स्थापित थे, हमारे घर में, ईश्वर की मूर्ति में, उसकी पूजा में भी
हम तुम्हारी पूजा करते थे।
मेरी जीवन और मेरी मां के जीवन की, हर आशा में, हर प्यार में,
हमेशा तुम जीते रहे हो।

 

वह अमर आत्मा, जो हमारे घर में शासन करती है, तुम्हारी
युग-युगों से सूश्रुषा होती रही है।

 

एक नवयुवती बनने पर जब मेरा हृदय, अपनी पंखुड़ियां खोल रहा था, तुम उसमें
सुगंध की तरह मंडरा रहे थे।

 

तुम्हारी मृदुल कोमलता, मेरे युवा अंगों में खिल रही थी, जैसे सूर्योदय से पहले
आकाश में आभा नजर आती है।

 

स्वर्ग की पहली लाडली, सुबह की पहली किरण के साथ जन्मी, तुम
ऊपर से उतरी हो, विश्व-जीवन के प्रवाह के साथ, और अंततः
मेरे हृदय में आकर रुक गई हो।

 

जैसे ही मैं तुम्हारे चेहरे को गौर से देखती हूँ, मैं रहस्य से अभिभूत हो जाती हूँ; तुम जो सभी की थीं,
अब मेरी हो गई हो।

 

तुम्हे खोने के डर से, मैं तुम्हे कसकर अपने स्तनों से चिपटा लेती हूँ। वह
क्या जादू है, जिसने दुनिया के इस खजाने को, मेरी इन नाज़ुक बांहों के घेरे में
समो दिया है?”

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The Beginning

 

Where have I come from, where did you pick me up?” the baby asked
its mother.
She answered, half crying, half laughing, and clasping the
baby to her breast-
“You were hidden in my heart as its desire, my darling.
You were in the dolls of my childhood’s games; and when with
clay I made the image of my god every morning, I made the unmade
you then.
You were enshrined with our household deity, in his worship
I worshipped you.
In all my hopes and my loves, in my life, in the life of my
mother you have lived.
In the lap of the deathless Spirit who rules our home you have
been nursed for ages.
When in girlhood my heart was opening its petals, you hovered
as a fragrance about it.
Your tender softness bloomed in my youthful limbs, like a glow
in the sky before the sunrise.
Heaven’s first darling, twain-born with the morning light, you
have floated down the stream of the world’s life, and at last you
have stranded on my heart.
As I gaze on your face, mystery overwhelms me; you who belong
to all have become mine.
For fear of losing you I hold you tight to my breast. What
magic has snared the world’s treasure in these slender arms of
mine?”
Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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सबसे पहले चमेली पुष्प – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The First Jasmines’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

 सबसे पहले चमेली पुष्प

 

आह, ये चमेली के फूल, ये सफेद चमेली के फूल!
मुझे याद आता है वह पहला दिन, जब मैंने अपने हाथ भर लिए थे, चमेली के फूलों से,
चमेली के इन सफेद फूलों से।

 

मैंने प्यार किया है सूरज की रोशनी से, आसमान से और हरी-भरी धरती से;
मैंने आधी रात के गहन अंधकार में, नदी की द्रवीय गुनगुनाहट सुनी है मैंने ;
शरद ऋतु के सूर्यास्त अक्सर सामने आए हैं, वीरान बंजर क्षेत्र में सड़क के किसी मोड़ पर;
जैसे कोई दुल्हन उठाती हो अपना घूंघट, अपने प्रेमी को स्वीकार करने के लिए।
लेकिन मेरी स्मृतियों में अभी भी मधुरता भरी है, चमेली के उन पहले श्वेत पुष्पों की,
जो मैंने अपनी हथेलियों में भर लिए थे, जब मैं बच्चा था।

 

जीवन में खुशी के  दिन आए हैं, और मैं हंसा हूँ,खुशदिल लोगों के साथ,पर्व की रातों में।
बरसात की धुली हुई सुबहों में मैंने एकांत में अनेक गीत गुनगुनाए हैं।
मैंने अपनी गर्दन पर शाम के समय प्रेम से बुने गए बकुला-वस्त्र लपेटे हैं।
परंतु अभी भी मेरी स्मृतियों में भरी हुई है, सबसे पहले वाले श्वेत चमेली पुष्पों की गंध,
जिनको मैंने अपनी हथेलियों में भर लिया था, जब मैं छोटा बच्चा था।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The First Jasmines

 

Ah, these jasmines, these white jasmines!
I seem to remember the first day when I filled my hands with
these jasmines, these white jasmines.

 

I have loved the sunlight, the sky and the green earth;
I have heard the liquid murmur of the river thorough the
darkness of midnight;
Autumn sunsets have come to me at the bend of a road in the
lonely waste, like a bride raising her veil to accept her lover.
Yet my memory is still sweet with the first white jasmines
that I held in my hands when I was a child.

 

Many a glad day has come in my life, and I have laughed with
merrymakers on festival nights.
On grey mornings of rain I have crooned many an idle song.
I have worn round my neck the evening wreath of bakulas woven
by the hand of love.
Yet my heart is sweet with the memory of the first fresh
jasmines that filled my hands when I was a child.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कठोर दयालुता- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Strong Mercy’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

कठोर दयालुता

 

मेरी इच्छाएं बहुत हैं और मेरी पुकार अति कातर है,
परंतु हमेशा तुमने मेरी रक्षा की है अपने कठोर इंकार से;
और यह कठोर उदारता मेरे जीवन में गहरे, बहुत गहरे पैठ गई है।

 

दिन प्रतिदिन तुम मुझे अपने दिए हुए उन सामान्य परंतु महान उपहारों के योग्य बनाते जाते हो,
जो तुमने मुझे बिना मांगे ही प्रदान किए हैं- यह आकाश और प्रकाश, यह शरीर और
यह मस्तिष्क—और इस प्रकार तुमने मुझे अत्यधिक इच्छाओं के खतरों से बचा लिया है।

 

ऐसे भी अवसर आए हैं जब मैं सुस्ती से पड़ा रहा हूँ,
और ऐसे भी जब मैं अचानक जागा हूँ और अपने लक्ष्य को खोज में तेजी से दौड़ा हूँ;
परंतु तुमने निर्दयतापूर्वक स्वयं को मुझसे छिपा लिया है।

 

दिन प्रतिदिन तुम मुझे इस योग्य बना रहे हो कि तुम मुझे पूरी तरह स्वीकार कर सको,
इसके लिए तुम हमेशा बार-बार, इंकार कर देते हो, जिससे मैं अनिश्चित इच्छाओं के कारण होने वाले संकट से बचा रहूं।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Strong Mercy

 

My desires are many and my cry is pitiful,
but ever didst thou save me by hard refusals;
and this strong mercy has been wrought into my life through and through.

 

Day by day thou art making me worthy of the simple,
great gifts that thou gavest to me unasked—this sky and the light, this body and the
life and the mind—saving me from perils of overmuch desire.

 

There are times when I languidly linger
and times when I awaken and hurry in search of my goal;
but cruelly thou hidest thyself from before me.

 

Day by day thou art making me worthy of thy full acceptance by
refusing me ever and anon, saving me from perils of weak, uncertain desire.

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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बहती हवा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Passing Breeze’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

बहती हवा

 

 

हाँ, मुझे मालूम है, यह और कुछ नहीं तुम्हारा प्रेम ही है,
ओ मेरे हृदय के प्रियतम —यह सुनहरी रोशनी, जो पत्तियों पर नृत्य करती है,
वे आलसी बादल, जो आकाश के आर-पार तैरते हैं,
यह बहती हवा जो मेरे मस्तक पर अपनी शीतलता छोड़ जाती है।

 

सुबह की रोशनी ने मेरी आंखों को चकाचौंध कर दिया है—                                                                                                                                यह तुम्हारा संदेश है,  मेरे हृदय के लिए।
तुम्हारा चेहरा आकाश में दिख रहा है, तुम्हारी आंखें, मेरी आंखों मे झांकती हैं,
और मेरा हृदय ने तुम्हारे चरणों को छू लिया है।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Passing Breeze

 

Yes, I know, this is nothing but thy love,
O beloved of my heart—this golden light that dances upon the leaves,
these idle clouds sailing across the sky,
this passing breeze leaving its coolness upon my forehead.
The morning light has flooded my eyes—this is thy message to my heart.
Thy face is bent from above, thy eyes look down on my eyes,
and my heart has touched thy feet.

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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घर तक की यात्रा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Journey Home’ का भावानुवाद-

 

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

घर तक की यात्रा

 

मेरी यात्रा में बहुत समय लगता है और रास्ता भी बहुत लंबा है।

 

मैं प्रकाश की प्रथम किरण के रथ पर बाहर आया, और मैंने निहारा-
अनेक दुनियाओं से होकर गुजरे अपने सफर को, जिसने अनेक तारों और उपग्रहों पर अपनी यात्रा के निशान छोड़े।

 

यह सबसे लंबा रास्ता  है, जिससे होकर आप स्वयं के सबसे निकट पहुंचते हैं,
और यह प्रशिक्षण भी बहुत जटिल है, जिसके माध्यम से हम धुन की .जटिल, सरलता तक पहुंचते हैं।

 

इस राह के यात्री को, अपने दरवाजे तक पहुंचने से पहले, हर पराये दरवाजे को खटखटाना पड़ता है,
और व्यक्ति को, अंततः अंतरतम में स्थापित मूर्ति तक पहुंचने से पहले, अन्य सभी बाहरी दुनियाओं की यात्रा करनी होती है।

 

मेरी आंखें अचंभित रह गईं, और इसके बाद ही मेरे मुंह से निकला ‘अरे तुम तो यहाँ पहुंच गए!’

 

और फिर यह प्रश्न और पुकार ‘अरे कहाँ’, आंसुओं की हजारों धाराओं के रूप में पिघल गए,
और उन्होंने दुनिया को ‘मैं हूँ’ की हुंकार भरी  बाढ़ से आश्वस्त कर दिया।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Journey Home

 

The time that my journey takes is long and the way of it long.
I came out on the chariot of the first gleam of light, and pursued my
voyage through the wildernesses of worlds leaving my track on many a star and planet.
It is the most distant course that comes nearest to thyself,
and that training is the most intricate which leads to the utter simplicity of a tune.
The traveler has to knock at every alien door to come to his own,
and one has to wander through all the outer worlds to reach the innermost shrine at the end.
My eyes strayed far and wide before I shut them and said `Here art thou!’
The question and the cry `Oh, where?’ melt into tears of a thousand
streams and deluge the world with the flood of the assurance `I am!’

.
-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मेरे जीवन के स्वामी- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Lord Of My Life’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 मेरे जीवन के स्वामी

 

 

 

आप मेरे अस्तित्व के अंतरतम में बसी आत्मा हो,
क्या आप प्रसन्न हो, मेरे जीवन के स्वामी?
क्योंकि मैंने आपको समर्पित किया है, मेरा प्याला, जो भरा है
पीड़ा और प्रसन्नता से, जिनको मेरे हृदय के
कुचले हुए अंगूरों ने समर्पित किया था;
मैंने रंगों और गीतों की धुन से आपकी शैया की चादर बुनी है,
और अपनी आकांक्षाओं के पिघले हुए सोने से
मैंने आपके समय बिताने के लिए खिलौने तैयार किए हैं।
मुझे नहीं मालूम कि आपने मुझे अपनी सहगामी के रूप में क्यों चुना,
मेरे जीवन के स्वामी।

 

क्या आपने जमा किया मेरे दिन और रातों को-
मेरे कर्मों और स्वप्नों को, जिससे आपकी कला का स्वरूप विकसित हो सके,
और आपके संगीत के तारों में, मेरे पतझड़ और वसंत के गीत सज जाएं,
और मेरे वयस्क क्षणों के पुष्प, आपके मुकुट के लिए एकत्रित किए हैं क्या?

 

मैं देखती हूँ कि आपकी आंखें मेरे हृदय के अंधकार में झांकती हैं,
मेरे जीवन के स्वामी,
मैं सोचती हूँ कि क्या आपने मेरी असफलता और गलतियों को क्षमा कर दिया  है।
क्योंकि ऐसे बहुत सारे दिन थे, जब मैंने कोई सेवा नहीं की,
और विस्मृति से भरी रातें, वे पुष्प भी बेकार थे,
जो आप पर चढ़ाए नहीं गए और छाया में पड़े-पड़े मुरझा गए।

 

अक्सर मेरे साज़ के कसे हुए तार, आपकी धुनों
के खिंचाव के सामने ढीले पड़ गए।
और अक्सर बर्बाद हुए घंटों के बारे में सोचकर,
मेरी वीरान शामें आंसुओं से भर गईं।

 

लेकिन क्या मेरे दिन आखिर समाप्त हो गए हैं,
मेरे जीवन के स्वामी, जबकि आपके गले में पड़ी मेरी बाहें,
शिथिल हो रही हैं, मेरे चुंबन अपना अर्थ खोते जा रहे हैं?
तब इस निस्तेज दिवस के मिलन को यहीं समाप्त करें!
मेरे भीतर के पुरातन को मैं आनंद के नए स्वरूप में पुनर्जीवित करूं;
और फिर से एक बाहर विवाह हो जाए,
जीवन के एक नए उत्सव के रूप में।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Lord Of My Life

 

Thou who art the innermost Spirit of my being,
art thou pleased, Lord of my Life?
For I give to thee my cup filled with all
the pain and delight that the crushed
grapes of my heart had surrendered,
I wove with rhythm of colors and song cover for thy bed,
And with the molten gold of my desires
I fashioned playthings for thy passing hours.
I know not why thou chosest me for thy partner,
Lord of my life.

Didst thou store my days and nights,
my deeds and dreams for the alchemy of thy art,
and string in the chain of thy music my songs of autumn and spring,
and gather the flowers from my mature moments for thy crown?
I see thine eyes gazing at the dark of my heart,
Lord of my life,
I wonder if my failure and wrongs are forgiven.
For many were my days without service
and nights of forgetfulness; futile were the flowers
that faded in the shade not offered to thee.

Often the tied strings of my lute slackened
at the strains of thy tunes.
And often at the ruin of wasted hours
my desolate evenings were filled with tears.

But have my days come to their end at last,
Lord of my life, while my arms round thee
grow limp, my kisses losing their truth?
Then break up the meeting of this languid day!
Renew the old in me in fresh forms of delight;
and let the wedding come once again in
a new ceremony of life.

.
Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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सपने- लैंग्स्टन ह्यूजिस की कविता

आज, मैं विख्यात अंग्रेजी कवि लैंग्स्टन ह्यूजिस की एक छोटी सी परंतु महत्वपूर्ण संदेश वाली कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Dreams’ का भावानुवाद-

 

 

सपने

 

अपने सपनों को कसकर पकड़े रहो,
क्योंकि यदि स्वप्न मर गए तो
जीवन एक परकटे पक्षी के समान हो जाएगा-
जो उड़ नहीं सकता।
सपनों को कसकर पकड़े रहो
क्योंकि जब स्वप्न चले जाते हैं, तब
जीवन एक बंजर खेत के समान हो जाता है,
जिस पर बर्फ जम गई हो।

 

लैंग्स्टन ह्यूजिस

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Dreams

Hold fast to dreams
For if dreams die
Life is a broken-winged bird
That cannot fly.
Hold fast to dreams
For when dreams go
Life is a barren field
Frozen with snow.

 

-Langston Hughes

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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‘यदि’ – रुड्यार्ड किप्लिंग की कविता

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘If’ का भावानुवाद-

 

यदि

 

 

यदि आप शांत चित्त बने रहते हैं, जब आपके सभी साथी जीवन में हार रहे हों, और इसका दोष आपको दे रहे हों।
जब आपका आत्म-विश्वास बना रहता है, जबकि सभी आप पर संदेह कर रहे हों,
और आप उनके संदेह करने को भी गलत न मानते हों;
यदि आप प्रतीक्षा कर सकते हैं और ऐसा करने में आपका धैर्य समाप्त नहीं होता हैं,
अथवा, जब लोग आपके बारे में झूठ बोलते हैं, तब भी आप झूठ का सहारा नहीं लेते,
अथवा नफरत का सामना करने पर भी, आप नफरत को बढ़ावा नहीं देते,
और फिर भी स्वयं को बहुत अच्छा नहीं मानते और न ही बहुत बुद्धिमान प्रदर्शित करते हैं;

 

यदि आप स्वप्न देख सकते हैं- -और स्वप्नों को अपना स्वामी नहीं बनने देते,
यदि आप सोच सकते हैं- -परंतु चिंतन को ही अपना लक्ष्य नहीं बना लेते,
यदि आप विजय और विपत्ति दोनो का सामना करते हैं
और इन दोनो बहुरूपियों को समभाव से देखते हैं, .
यदि आप उस सच को सुनने का साहस रखते हैं, जो आपने बोला है-
और धूर्त लोगों ने मूर्ख लोगों को फंसाने के लिए उसको अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है,
और जिन चीजों को पाने के लिए आपने अपना जीवन लगाया है, उनको टूटता देख सकते हैं,
और घिसे-पिटे औजारों से उनको दुबारा तैयार कर सकते हैं।

 

 

यदि आप अपनी जीती हुई वस्तुओं का एक ढेर लगा सकते हैं
और पलक झपकते ही इनको खो देने का जोखिम उठाने को तैयार हैं,
और उनको खो देने, और उसके बाद शुरू से पुनः प्रारंभ करने को तैयार हैं, ,
और कभी अपनी उस हानि को लेकर आह न भरने को तैयार हैं;
यदि आप अपने हृदय, मस्तिष्क और मांसपेशियों को इसके लिए तैयार रखते हैं
कि वे इन सबके चले जाने के बाद, पुनः आपका अनुकूल समय आने तक साथ दें,
और उस समय धैर्य बनाए रखें, जब आपके पास कुछ न हो,
सिवाय उस दृढ़ इच्छा के, जो उनसे कहे कि ‘धैर्य बनाए रखो!’

 

यदि आप लोगों की भीड़ से बात करते हो और अपने सद्गुण बनाए रखते हो,
अथवा शासकों के साथ रहते हो- -और तब भी अपनी सादगी बचाए रखते हो,
यदि न तो शत्रु और न प्रेम करने वाले मित्र, आपको कष्ट दे सकते हैं,
यदि सभी लोग आपके लिए समान हैं, लेकिन कोई भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है:
यदि आप किसी भी अक्षमाशील मिनट में
साठ सेकंड की दूरी तक दौड़ने दूरी भर सकते हैं,
तो यह पूरी धरा आपकी है, और यहाँ मौज़ूद सभी कुछ आपका है,
और- -ज्यादा बड़ी बात यह है कि- -तब आप एक मनुष्य हो, मेरे पुत्र!

 

 

-रुड्यार्ड किप्लिंग

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

If

 

If you can keep your head, when all about you Are losing theirs and blaming it on you;
If you can trust yourself when all men doubt you,
But make allowance for their doubting too:
If you can wait and not be tired by waiting,
Or, being lied about, don’t deal in lies,
Or being hated don’t give way to hating,
And yet don’t look too good, nor talk too wise;

 

If you can dream- -and not make dreams your master;
If you can think- -and not make thoughts your aim,
If you can meet with Triumph and Disaster
And treat those two impostors just the same:.
If you can bear to hear the truth you’ve spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to, broken,
And stoop and build’em up with worn-out tools;

 

If you can make one heap of all your winnings
And risk it on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings,
And never breathe a word about your loss:
If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your turn long after they are gone,
And so hold on when there is nothing in you
Except the Will which says to them: ‘Hold on! ‘

 

If you can talk with crowds and keep your virtue,
Or walk with Kings- -nor lose the common touch,
If neither foes nor loving friends can hurt you,
If all men count with you, but none too much:
If you can fill the unforgiving minute
With sixty seconds’ worth of distance run,
Yours is the Earth and everything that’s in it,
And- -which is more- -you’ll be a Man, my son!

 

-Rudyard Kipling

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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अगला किनारा- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Further Bank’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

अगला किनारा

 

 

मेरी लालसा है कि मैं जाऊं, नदी के अगले किनारे तक,
जहाँ नावें एक पंक्ति में, बांस के डंडों से बंधी रहती हैं,
जहाँ लोग प्रातः काल, अपनी नांवों से नदी पार जाते हैं,
अपने कंधों पर हल लिए, अपने सुदूर खेतों में हल जोतने के लिए;
जहाँ ग्वाले अपने रंभाते मवेशियों को तैराकर नदी की बगल में बने चरागाह में ले जाते हैं;
और वहाँ से वे सभी लोग शाम को वापस लौट आते हैं, सियारों को
जंगली घास से भरे हुए टापू पर चिल्लाते हुए छोड़कर।

 

मां, अगर तुम बुरा न मानो तो, मैं बड़ा होकर नाविक बनना चाहता हूँ
नदी में आर-पार चक्कर लगाने वाली ‘फैरी’ को चलाने वाला।

 

लोग ऐसा बताते हैं कि उस ऊंचे किनारे के पीछे, अजीब तालाब छिपे हैं,
जहाँ वर्षा बीत जाने के बाद जंगली बत्तखों के झुंड आते हैं, और
जहाँ ये पक्षी अपने अंडे देते हैं, वे चारों तरफ से बेंत उगने से
घिर जाते हैं;
जहाँ घोंघा पक्षी अपनी पूंछ के साथ नाचते नन्हे पैरों से, स्वच्छ कोमल कीचड़ में अपने पदचिह्न अंकित कर देते हैं;
जहाँ संध्या समय, श्वेत पुष्पों से सजी ऊंची घास
चंद्रमा की किरणों को अपने लहराते शीर्ष पर तैरने को आमंत्रित करती है।
मां, अगर तुम बुरा न मानो तो, मैं एक नाविक बनना चाहूंगा, फैरी बोट का
बड़ा होने के बाद।
मैं एक किनारे से दूसरे तक और फिर वापस चक्कर लगाऊंगा, 
जबकि नदी में नहाते हुए सभी लड़के-लड़कियां, आश्चर्य करेंगे
यह देखकर।

 

जब सूरज आकाश में चढ़कर सिर के ऊपर आ जाएगा, और सुबह थककर दोपहर हो जाएगी, तब
मैं दौड़ता हुआ तुम्हारे पास आकर कहूंगा,” मां, मुझे भूख लगी है।”
और जब दिन डूब जाएगा और छायाएं वृक्षों के नीचे पालथी मारकर बैठ जाएंगी, तब
मैं मार्ग में धूल उठने के साथ लौट आऊंगा।

 

मैं अपने पिता की तरह, शहर में काम करने के लिए, तुमसे 
दूर नहीं जाऊंगा।.
मां, अगर तुम बुरा न मानो तो, मैं नाविक बनना चाहूंगा
नदी के आर-पार जाने वाली फेरी-बोट को चलाने वाला।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The Further Bank

 

I long to go over there to the further bank of the river.
Where those boats are tied to the bamboo poles in a line;
Where men cross over in their boats in the morning with
ploughs on their shoulders to till their far-away fields;
Where the cowherds make their lowing cattle swim across to the
riverside pasture;
Whence they all come back home in the evening, leaving the
jackals to howl in the island overgrown with weeds.
Mother, if you don’t mind, I should like to become the boatman
of the ferry when I am grown up.
They say there are strange pools hidden behind that high bank.
Where flocks of wild ducks come when the rains are over, and
thick reeds grow round the margins where water-birds lay their
eggs;
Where snipes with their dancing tails stamp their tiny
footprints upon the clean soft mud;
Where in the evening the tall grasses crested with while
flowers invite the moonbeam to float upon their waves.
Mother, if you don’t mind, I should like to become the boatman
of the ferryboat when I am grown up.
I shall cross and cross back from bank to bank, and all the
boys and girls of the village will wonder at me while they are
bathing.
When the sun climbs the mid sky and morning wears on to noon,
I shall come running to you, saying, “Mother, I am hungry.”
When the day is done and the shadows cower under the trees,
I shall come back in the dust.
I shall never go away from you into the town to work like
father.
Mother, if you don’t mind, I should like to become the boatman
of the ferryboat when I am grown up.
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Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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