मेरी दिल्ली!

आज फिर से लंबे समय बाद दिल्ली-गुड़गांव क्षेत्र में आया हूँ| कुछ लिख पाऊँगा तो लिखूँगा, फिलहाल दिल्ली की एक पुरानी यात्रा से जुड़ा आलेख शेयर कर रहा हूँ|

काफी लंबे समय के बाद दिल्ली आना हुआ, उस दिल्ली में जो लगभग डेढ़ वर्ष पहले तक मेरी थी, उसी तरह जैसे और भी लाखों, करोडों लोग इस या किसी भी महानगर को अपना मानते हैं। एक फिल्म जिसका मैंने पहले भी अपने ब्लॉग में ज़िक्र किया है- ‘कांकरर्स ऑफ दा गोल्डन सिटी’, इस फिल्म में एक आदमी आता है महानगर और कहता है कि एक दिन मैं इस शहर का मालिक बन जाऊंगा, लेकिन फिल्म के अंत में वह लुट-पिटकर वापस लौटता है।

हर कोई मुकेश अंबानी तो नहीं हो सकता, वैसे मुकेश अंबानी भी किसी महानगर का मालिक होने का दावा नहीं कर सकता। हद से हद उसका अपना परिवार बहुत सी मंज़िलों वाले घर में रह लेगा, जिसमें सोचना पड़े कि आज किस ‘फ्लोर’ को धन्य किया जाए! मुझे लगता है कि पुराने जमाने के महलों में भी इस तरह की दुविधा रहा करती होगी!

फिर दिल्ली में तो जहाँ आज के बहुत सारे नव धनाढ्य रहते हैं, वहीं बहुत से महल और किले भी हैं, जिनमें से कुछ तो खंडहर भी बन चुके हैं।

इस बार जब फिर से दिल्ली आया, किसी हद तक एक टूरिस्ट की हैसियत से तो यही खयाल आया कि वह कौन सी प्रमुख बात है जो दिल्ली को दिल्ली बनाती है!

राजा-महाराजाओं के किले तो हैं ही, जिनमें मुगल काल और यहाँ तक कि महाभारत काल तक की यादें समेटी गई हैं। इसके बाद ब्रिटिश शासकों ने भी- आज का राष्ट्रपति भवन (जो शायद वायसराय हाउस था), संसद भवन, सचिवालय, बोट क्लब और ढ़ेर सारी इमारतें बनवाई थीं, जो स्थापत्य कला की बेजोड़ धरोहर हैं।

महल और सरकारी इमारतें तैयार कराने में जहाँ शासकों का हाथ होता है, वहीं कुछ मंदिर-मस्ज़िद भी शासक बनवाते हैं, इस काम में कुछ श्रद्धालु पूंजीपतियों का भी योगदान होता है, जैसे बहुत से स्थानों पर बने लक्ष्मी नारायण मंदिर आज ‘बिड़ला मंदिर’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्होंने उनको बनवाया है। इसमें भी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। बिड़ला जी का अधिक जोर मंदिर बनवाने पर है तो टाटा जी का अस्पताल अथवा रोग-अनुसंधान संबंधी संस्थान बनाने पर ज्यादा ध्यान रहा है।

हाँ एक बात और कि बेशक कुछ पहल करने वाले तो रहते ही हैं, लेकिन आज के समय में भी बहुत सारे नए-नए मंदिर श्रद्धालु जनता के पैसे से बनते जाते हैं। इसमें भी यह देखना पड़ता है कि आजकल कौन से भगवान ज्यादा चल रहे हैं। आप स्वयं भी देखें तो मालूम हो जाएगा कुछ भगवान तो पिछले दस-बीस सालों में ही ज्यादा पॉपुलर हुए हैं! वैसे पिछले कुछ समय में ही दिल्ली में लोटस टेंपल और मयूर विहार के पास बना अक्षर धाम मंदिर आधुनिक समय की बड़ी उपलब्धि हैं।

खैर मैं भटकता हुआ कहाँ से कहाँ आ गया, मैं बात इस विषय पर करना चाह रहा था कि आखिर वह क्या है जो दिल्ली को दिल्ली बनाता है! दिल्ली देश की राजधानी तो है ही, देश भर के लोग यहाँ के लगभग सभी इलाकों में इस तरह रहते हैं कि इस महानगर की अपनी अलग कोई पहचान है ही नहीं। दिन-दहाड़े यहाँ कोई किसी को मारकर चला जाए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता!

हाँ पहचान बनाने वाले तत्वों में एक तो देश की राजनैतिक सत्ता यहाँ पर है, ये देश की राजनैतिक राजधानी है, सांस्कृतिक राजधानी कहने में तो संकोच होता है, हालांकि कुछ ऐसे संस्थान यहाँ पर हैं, जैसे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, और भी बहुत हैं, जिनका योगदान इस बेदिल नगर को सांस्कृतिक केंद्र बनाने में है।

और बहुत सारी संस्थाएं आदि हैं, जैसे देश का सर्वोच्च न्यायालय यहाँ है, जो समय-समय पर देश में हलचल पैदा करता रहता है। बहुत बड़ी भूमिका इस संस्थान की है, लोकतंत्र को मजबूत बनाने में!

एक और स्थान है दिल्ली में जहाँ प्राचीनता की मिसाल- पुराना किला है और उसके बगल में ही प्रदर्शनी मैदान है, जहाँ आधुनिकतम विकास की मिसाल बहुत सी प्रदर्शनियों से मिलती है। यहाँ लगने वाले ‘पुस्तक मेले’ भी साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

बस ऐसे ही कुछ स्थानों, संस्थानों, गतिविधियों के बारे में बात करने का मन था, जो इस बेदिल शहर को अच्छी पहचान दिलाते हैं। वैसे बुरी पहचान दिलाने वाले तत्व तो बड़े शहरों में होते ही हैं।

आगे अगर टाइम मिला और मूड भी हुआ तो इन स्थानों, संस्थानों और गतिविधियों के बारे में बात करूंगा, जो राजधानी दिल्ली की पहचान हैं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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पेलोलिम- गोवा की एक खूबसूरत ‘बीच’!

गोवा में रहते हुए कई वर्ष बीत चले, जब लोग यहाँ बाहर से घूमने के लिए आते हैं, तब उनका लक्ष्य होता है कि सीमित समय में जितना हो सकता है, उतना गोवा देख लें| मुख्य आकर्षण तो यहाँ के समुद्र-तट, यहाँ की खूबसूरत ‘बीच’ ही हैं, कुछ पुराने चर्च, फोर्ट आदि हैं, जहां फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, मेरे घर के सामने ही ‘मीरामार बीच’ का इलाका है, बॉल्कनी से ही ‘बीच’ दिखाई देती है और वहाँ जाने के लिए बस सड़क पार करनी होती है, बाईं तरफ बढ़ जाओ तो ‘दोना पावला व्यू पाइंट’, जिसे ‘लवर्स पाइंट’ भी बोलते हैं और दाहिनी तरफ जाने पर ‘मीरामार बीच’| मेरी शाम की सैर ‘बीच’ के साथ-साथ ही होती है| बहुत अच्छा लगता है जब लोगों को अपनी फोटो में शाम के डूबते सूरज को ‘ट्रिक’ से अपनी मुट्ठी में कैद करने अथवा हथेली पर रखने का उपक्रम करते देखता हूँ, और फोन पर उत्साह से यह बताते हुए सुनता हूँ, ‘मैं अभी मीरामार बीच पर हूँ’|

खैर क्योंकि अब गोवा में ही हूँ, इसलिए कोई जल्दी नहीं रहती सभी जगहों को देखने का टार्गेट पूरा करने की| क्योंकि पणजी में ही हूँ, तो यहाँ का चर्च, बाज़ार, कला अकादमी आदि तो देखते ही रहते हैं| आधा गोवा तो हमने परिवार के साथ बाहर ‘डिनर’ करने के क्रम में देख लिया है| बच्चों को इस बात की जानकारी रहती है कि आजकल कहाँ अच्छा खाना और सर्विस मिलती है|

अब मैं आज के इस आलेख के मुख्य विषय पर आता हूँ| जैसे मीरामर, केलेंगुट, वाघा आदि बहुत सी बीच तो हम गाड़ी में घूमते हुए पहले ही देख आए हैं| पिछले माह हम उत्तरी गोवा में ‘आरंबोल’ बीच गए थे, जो बहुत खूबसूरत बीच मानी जाती है, वहाँ हमने दो दिन का प्रवास किया था और वह बहुत अच्छा अनुभव रहा था|

इस बार हमारा प्रोग्राम बना दक्षिणी गोवा में ‘पेलोलिम’ बीच जाने का, जिसके बारे में मेरे बेटे ने बताया कि यह गोवा की सबसे खूबसूरत ‘बीच’ है| मैं यह भी बता दूँ कि हम गोवा में पिछले 3-4 वर्ष से हैं लेकिन मेरे बेटे यहाँ आने से पहले ही गोवा को खंगाल चुके थे|

हाँ तो, ‘पेलोलिम’ बीच के बगल में ही रुकने के लिए ‘आर्ट रिज़ॉर्ट’ है जिसमें बहुत खूबसूरत तरीके से समुद्र के किनारे ही ‘कॉटेज’ बनाए गए हैं और पेंटिंग्स का डिस्प्ले आदि, सभी कुछ अत्यंत सुरुचिपूर्ण है|

इन स्थानों की प्राकृतिक सुंदरता तो देखने और अनुभव करने के लिए ही होती हैं, मैं इनका वर्णन क्या कर पाऊँगा, लोगों ने यहाँ समुद्र में बैठक करने का खूब आनंद लिया और बोटिंग के लिए आसपास के कुछ स्थलों को भी देखा, जिनमें ‘बटरफ्लाई बीच’, ‘हनीमून बीच’ आदि शामिल हैं| एक अनुभव जो अब तक नहीं हो पाया था, वह है बोटिंग के दौरान ‘डॉल्फ़िंस’ को देखने का, इससे पहले कई स्थानों पर हम गए थे, परंतु नहीं देख पाए थे, यहाँ उनको भी देख लिया, यद्यपि उनके शरीर का कुछ भाग ही पानी से बाहर निकलते हुए देखा, परंतु अनेक बार देखा| ऐसा लगता है कि ‘डॉल्फ़िंस’ के कुछ परिवार उस क्षेत्र में थे|



कुल मिलाकर ‘पेलोलिम’ बीच पर दो दिन का यह प्रवास बहुत अच्छा अनुभव रहा और गोवा ‘विजिट’ पर आने वाले साथी इसको भी अपने गंतव्य स्थलों में शामिल कर सकते हैं और चाहें तो कुछ दिन यहाँ बिता सकते हैं|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पंजिम, मांडवी नदी और मीरामार!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


पिछले दिनों मैंने देश-विदेश के कुछ स्थानों के भ्रमण पर आधारित ब्लॉग लिखे, जिनका प्रारंभ मैंने लंदन से किया था और इस बात को भी रेखांकित किया था कि लंदन के जीवन में थेम्स नदी की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है!


मैं पिछले कई वर्षों से गोआ के, पंजिम में रह रहा हूँ और अभी तक यहाँ से संबंधित कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी है। इसका कारण यह भी है कि गोआ वैसे ही ट्रैवेल ब्लॉगर्स का हॉट फेवरिट है, बहुत ब्लॉग लिखे जाते हैं, यहाँ के बारे में। मेरा भी जब मन होगा, जब एक टूरिस्ट की तरह गोआ घूमूंगा तब शायद यहाँ के स्थानों के बारे में ट्रैवल ब्लॉग लिखूंगा। आज पंजिम, मीरामार और मांडवी नदी के बारे में बात कर लेता हूँ, जहाँ मुझे एक टूरिस्ट के रूप में नहीं बल्कि सामान्यतः कुछ कामों के लिए जाना पड़ता है।

जैसे नदी अथवा समुद्र वाले टूरिस्ट स्पॉट्स में सामान्यतः होता है, नाव अथवा शिप में यात्रा करना वहाँ की एक प्रमुख गतिविधि होती है, वह गोआ में, पंजिम में भी है। इसके अलावा यहाँ एक तरह से कई द्वीप हैं और कुछ स्थानों पर जाने के लिए सड़क मार्ग के मुकाबले जलमार्ग से जल्दी पहुंचा जा सकता है। गोआ में शिप में और अन्यत्र चलने वाले कैसिनो भी काफी लोकप्रिय हैं। वैसे यहीं के निवासी होने के नाते हम किसी विशेष अवसर पर अक्सर, सी-बीच पर स्थित किसी रेस्टोरेंट में भोजन के लिए चले जाते हैं।


अपने क्षेत्र पंजिम, गोआ के बारे में आज बात करते हुए आइए हम, पंजिम बस स्टैंड से मांडवी नदी के साथ-साथ मीरामार बीच की तरफ आगे बढ़ते हैं, मांडवी नदी का काफी चौड़ा पाट, समुद्र जैसा ही स्वरूप दिखाता है, नदी का नजारा वास्तव में देखने लायक है, इसमें अनेक आकर्षक नौकाएं और शिप दिखाई देते हैं, जिनमें चलने वाले कैसिनो भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर, कंपाल में गोआ वन विभाग द्वारा विकसित किया गया विशाल पार्क है, जहाँ टूरिस्ट लोग विश्राम कर सकते हैं और प्राकृतिक छटाओं को निहार सकते हैं। इसके बाद नदी के किनारे पर ही ‘कला अकादमी’ का विशाल भवन है, जो एक बड़ा आकर्षण का केंद्र है, यहाँ सांस्कृतिक गतिविधियां चलती रहती हैं। जिनमें जहाँ हल्के-फुल्के नाटक होते हैं, वहीं गंभीर प्रस्तुतियां भी होती हैं। इस संस्थान के बारे में मौका मिलेगा तो बाद में विस्तार से लिखूंगा।


यहाँ से कुछ दूर आगे चलने पर हम मीरामार बीच पर पहुंच जाते हैं, जो काफी टूरिस्टों को आकर्षित करती है, विशेष रूप से इस बीच के बाहर चौपाटी है, जैसे मुंबई में है, शायद सभी जगह समुद्र के पास टूरिस्टों को खाने-पीने का आकर्षण प्रदान करने के लिए होती हो, यहाँ विशेष रूप से रात में बहुत भीड़ होती है, जब टूरिस्ट लोग दिन भर की भागदौड़ के बाद चटपटे व्यंजनों तथा आइस-क्रीम और कुल्फी का आनंद लेते हैं। (वैसे फिलहाल चौपाटी की गतिविधियां बंद हैं, शायद बाद में कुछ नया निर्माण होने के बाद यह फिर से चालू होगी|)इससे कुछ दूर जाने पर दोना-पाओला का व्यू पाइंट भी एक आकर्षण का केंद्र है।
पंजिम, मांडवी नदी और मीरमार बीच के बारे में, आज इतना ही।


नमस्कार।
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बोल बोल आरंबोल!

आज मैं गोवा की एक बेहद खूबसूरत बीच – ‘आरंबोल’ के बारे में बात करूंगा| पिछले कई वर्षों से गोवा के पंजिम नगर में रह रहा हूँ, और इसके बारे में भी हमेशा दुविधा में रहता हूँ कि इसे ‘पणजी’ कहूँ या ‘पंजिम’ कहूँ, क्योंकि ये दोनों नाम ही लिखे मिल जाते हैं|


हाँ तो गोवा में मीरामार बीच तो हमारे घर के सामने ही है, ऐसे कि हमारी बाल्कनी से ही ‘बीच’ दिखाई देती है| शाम को बीच पर ही टहलने जाता हूँ, और जब किसी को फोन पर बड़े उत्साह से बोलते हुए सुनता हूँ- ‘गोवा में हूँ, मीरामार बीच पर’ तो खयाल आता है कि अरे मैं तो यहाँ ही रहता हूँ|

खैर मीरामार के अलावा कुछ और ‘बीच’ भी देखी हैं लेकिन बहुत सारी ‘बीच’ देखनी अभी बाकी हैं| हाँ ये भी मानना होगा कि गोवा में जो कुछ बेहद खूबसूरत ‘बीच’ हैं उनमें आरंबोल (Arambol) बीच भी शामिल है, जिसे देखने के लिए मैं और मेरी पत्नी गए, शुक्रवार को वहाँ जाकर हम रविवार की शाम को वहाँ से वापस लौटे|
गोवा की राजधानी ‘पंजिम’, जहां मैं रहता हूँ, वहाँ से ‘आरंबोल’ लगभग 43 किलोमीटर दूर है| एक बात और कि ये बीच जहां बेहद खूबसूरत स्थान है, सूर्यास्त देखने और कैमरे में क़ैद करने के लिए भी बहुत अच्छा स्थान है, वहीं यहाँ ज्यादा भीड़ भी नहीं रहती है| अतः यदि आप गोवा में बीच-भ्रमण की योजना बनाते हैं, तो उसमें ‘आरंबोल’ को भी शामिल करना उचित होगा|

वैसे जब आप आरंबोल भ्रमण के लिए जाते हैं तब आप यहाँ संगीत कार्यक्रमों का भी आनंद लेने का भी अवसर खोज सकते हैं| जैसे एक बेहद खूबसूरत स्थान यहाँ है ‘गार्डन ऑफ ड्रीम्स’, ये बेहद आकर्षक स्थान है, जैसे किसी बगीचे में ही हल्की ठंडक के बीच बैठकों के लिए छोटे-छोटे कमरे जैसे बने हैं, जिनमें सुविधा के अनुसार आप कुर्सियों, सोफ़े और बीन बैग्स पर बैठे रहें, लेट जाएँ, गप्पें मारते रहें, स्वल्पाहार का आनंद लेते रहें, यहाँ बहुत से कर्मचारी और वालन्टियर सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, और इस परिसर के बीचोंबीच कलाकार लोग अपनी प्रस्तुति करते रहते हैं, जिनमें कभी-कभी ‘लकी अली’ भी आए हैं| कभी ये प्रस्तुतियाँ बहुत ही सुंदर हो जाती हैं| ‘गार्डन ऑफ ड्रीम्स’ के अलावा ऐसी गतिविधियां और स्थानों पर भी होती हैं, जिनकी जानकारी आप वहाँ जाने पर ले सकते हैं|

इस प्रकार गोवा भ्रमण के दौरान एक बेहद खूबसूरत ठिकाना है- आरंबोल बीच और इसके आसपास का क्षेत्र|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|


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लंदन में शॉपिंग का एक और दिन!

दो वर्षों में किए गए लंदन प्रवास के जो अनुभव मैं शेयर कर रहा था, आज उसकी अंतिम कड़ी है, अर्थात अगस्त-सितंबर में डेढ़ माह के लंदन प्रवास से संबंधित यह अंतिम आलेख है, लीजिए इसको भी झेल लीजिए|

इस वर्ष के लंदन प्रवास का आज अंतिम रविवार था। यह तो निश्चित ही है कि विज़िट करने और कराने वालों में महिलाएं भी हों तो कुछ समय तो शॉपिंग को भी देना ही पड़ता है। वैसे एक-दो बार छिटपुट शॉपिंग पहले भी हो चुकी है, एक दिन तो ‘ओ-2’ में ही लंच और उसके बाद शॉपिंग की गई थी। ‘ओ-2’ जिसे लंदन का आधुनिकतम ईवेंट-प्लेस और शॉपिंग मॉल कह सकते हैं। उसके अलावा अपने घर के पास ही ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के पास अत्याधुनिक मॉल हैं, वे शायद कुछ महंगे तो हैं, वहाँ से भी शॉपिंग की जा चुकी थी। और भी एक-दो विशाल मॉल्स में हम गए थे, जिनमें से एक तो ‘ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट’ स्टेशन के पास था, उसका ज़िक्र भी मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट में किया है, वहाँ भी भारतीय सामान और भोजन के भरपूर विकल्प मौज़ूद थे।

आज शॉपिंग को निपटाने के लिए ‘वेस्टफील्ड’ मॉल, एक्ल्स्लूसिव शॉपिंग अभियान को संपन्न करने के लिए चुना गया। यह मॉल ‘स्ट्रैटफोर्ड स्टेशन’ के पास है, जो ‘डीएलआर’ और ‘जुबली लाइन’, दोनो में एक तरफ का अंतिम स्टेशन है, वैसे यहाँ नेशनल रेलवे और एक और लाइन का स्टेशन भी है, इस तरह भारतीय पैमानों से इसे जंक्शन तो कह ही सकते हैं।

हाँ तो शॉपिंग में तो मेरी भूमिका शून्य रहती है, मैं यह भी पसंद करता हूँ कि मैं एक स्थान पर बैठकर बाजार को देखता रहूं। खैर रेडीमेड कपड़ों की कुछ दुकानों में मैं गया, तीन-तीन मंज़िलों में और इतने क्षेत्र में फैली दुकानें, जितने में कुछ छोटे-मोटे मॉल पूरे आ जाते हैं। मॉल की विशालता देखकर मुझे ‘दुबई मॉल’ याद आ गया, हालांकि यह उतना बड़ा तो नहीं ही होगा लेकिन भव्यता में कहीं कम नहीं था।

वैसे मैं यह भी कह दूं कि हमारे भारतवर्ष में भी आज एक से एक सुंदर ‘मॉल’ मौज़ूद हैं। हर देश अपनी संस्कृति, विरासत, शिल्पकला आदि-आदि के साथ अपने बाजारों से भी दुनिया को आकर्षित करता है और मैं समझता हूँ कि बाजार की संस्कृति को भी हमने बहुत अच्छी तरह अपनाया है, और हम इस मामले में भी दुनिया को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

हाँ तो शॉपिंग के बारे में तो मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है, जो खरीदारों को खरीदना था, उन्होंने खरीद लिया, मेरी स्थिति तो वही थी चचा गालिब के शब्दों में ‘बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ।

हाँ ये जरूर है कि अगर आप बाज़ार को जानते हैं तो आपको अधिकांश प्रमुख जगहों पर भारतीय भोजन का विकल्प भी मिल जाएगा। उस मॉल के ही, ‘फूड कोर्ट’ में हमने एक दुकान देखी जिसका नाम था ‘इंडि-गो’ और वहाँ भारतीय व्यंजनों के अनेक विकल्प दिख रहे थे, जिनमें समोसा चाट, पूरी आदि-आदि अनेक डिश शामिल थीं, शायद और भी दुकानें होंगी, लेकिन हमने वहाँ खाना नहीं खाया।

हम वहाँ से लौटकर अपने घर के पास वाले स्टेशन ‘कैनरी व्हार्फ’ आए और यहाँ बगल के मॉल में, जिस दुकान पर हमने खाना खाया उसका नाम था- ‘चाय की’ (chai Ki), यहाँ पर हमने सभी भारतीय डिश ऑर्डर कीं और वे बड़ी स्वादिष्ट भी थीं, जिनमें इडली, मलाबर पराठा, पनीर टिक्का आदि शामिल थे।

इसके बाद हम शायद इस पड़ाव की अंतिम आउटिंग के बाद अपने घर लौट आए, जो कुछ फोटो खींच पाया, उनको शेयर करने का प्रयास कर रहा हूँ। एक फोटो अंत में ASDA मार्केट का दाल दिया है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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इंग्लैंड का टॉवर ऑफ लंदन!

इस वर्ष का लंदन प्रवास भी अब संपन्न होने को है। वास्तव में यह अंतिम सप्ताहांत है लंदन में इस बार के डेरे का! इस क्रम में आज हम जहाँ घूमने गए वह था- ‘ टॉवर ऑफ लंदन’ जिसे विश्व धरोहरों अर्थात ‘वर्ल्ड हेरिटेज’ की श्रेणी में शामिल किया गया है। यह ‘टॉवर ब्रिज’ की बगल में ही है, जहाँ हम कई बार गए हैं और इसके अंदर से ‘टॉवर ब्रिज’ बहुत अच्छा दिखाई देता है। आज विशेष बात यह रही कि हमने ‘टॉवर ब्रिज’ को खुलते हुए भी देखा। मैं यह बात दोहरा दूं कि इंजीनियरिंग का बेमिसाल नमूना ‘टॉवर ब्रिज’ कुछ खास समयों पर खुल जाता है, अर्थात इसके बीच के भाग के दोनो हिस्से ऊपर उठ जाते हैं, जिससे ज्यादा ऊंचाई वाले शिप वहाँ से निकल सकते हैं।

खैर आज बात ‘ टॉवर ऑफ लंदन’ की कर रहे हैं, जैसा मैंने कहा कि ‘विश्व धरोहरों’ में शामिल यह विशाल किला इतिहास के अनेक स्वर्णिम और काले अध्यायों का गवाह रहा है। वहाँ पर जो लोग गाइड के रूप में बड़ा ही रोचक वर्णन इस ऐतिहासिक धरोहर का करते हैं, वे भी पूर्व-सैनिक होते हैं और उनसे इसके बारे में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यहाँ कितने ही राजा, रानियां सत्तारूढ़ रहे, कितने ही लोगों को यहाँ मृत्युदंड दिया गया आदि-आदि। वैसे इसका निर्माण सन 1078 में लॉर्ड विलियम ने कराया था।

हाँ पर सत्तारूढ़ रही रानियों, सम्राटों आदि के आकर्षक मुकुट, उनमें जड़े हीरे आदि, जिनमें भारत का कोहिनूर हीरा भी शामिल है, ये सब यहाँ प्रदर्शित सामग्री में शामिल थे, जिनको देखकर आंखें चकाचौंध होकर रह गईं। जहाँ अनेक ताज हीरों से जड़े और स्वर्ण-मंडित पोशाकें वहाँ सजी हैं वहीं खाने-पीने के बर्तन, विशाल थालियां, शराब के टब, यहाँ तक कि विशाल नमकदानियां आदि भी, सब सोने की बनी हुईं। दिक्कत ये है कि वहाँ उस भाग में फोटो खींचने की अनुमति नहीं है, बस जो आपने देखा है वह आपको ही मालूम है, कितना आप बता पाएंगे, यह आपकी क्षमता पर निर्भर है, लेकिन इतना कह सकते हैं कि बड़े से बड़ा पूंजीपति भी इतनी संपदा इकट्ठी नहीं कर सकता, और सोने के इतने भारी बर्तनों को उठाता कौन होगा! और हाँ शाही तलवारें भी तो रत्नजडित हैं।

इन महलों में जहाँ अपार ऐश्वर्य की झलक है, वहीं अत्याचार के धब्बे भी बहुत गहरे हैं, अनेक लोग, जिनमें सैनिक, पादरी और यहाँ तक कि राजकुमार और राजकुमारी भी शामिल रहे हैं, उनको यहाँ मृत्युदंड दिया गया और उनमें से अनेक के बारे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनको क्यों मारा गया।

जो भी हो यह किला ब्रिटिश रॉयल्टी के गौरवशाली और अन्यथा वाली श्रेणी में आने वाले इतिहास की एक अच्छी-खासी झलक देता है। यहाँ मृत्युदंड को कार्यान्वित करने वाले एक जल्लाद के बारे में गाइड महोदय बता रहे थे कि वह ‘पार्ट टाइम एग्जीक्यूटर’ और फुल-टाइम शराबी था, शायद ऐसा काम करने वाले लोगों के लिए यह जरूरी भी हो जाता है।

वहाँ एक व्यक्ति कुछ अलग ही किस्म का वाद्य बजा रहा था, जो देखने में इकतारे जैसा था लेकिन वह उसको बजाने के लिए गोलाई में लीवर जैसा घुमा रहा था और उसकी आवाज बहुत ही मधुर आ रही थी। यह कलाकार भी काफी लोगों को आकर्षित कर रहा था। वैसे तो वहाँ दीवारों पर बनाए गए बंदर आदि भी लोगों को आकर्षित कर रहे थे।

यहाँ के रहस्यों में सात विशालकाय काले कौवे ‘रैवेन’ भी शामिल हैं, जिनके बारे में कभी कहा गया कि वे काम में बाधा डालते हैं, लेकिन फिर ये बताया गया कि जब तक वे रहेंगे तब तक ही ये परिसर और राजसत्ता भी सलामत रहेंगे। वैसे तो उनको मांस, चूहे आदि खिलाए जाते हैं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि उनको इंसान की उंगलियां खाना बहुत अच्छा लगता है।

यह भी कहा जाता है कि यहाँ अतृप्त आत्माएं काफी घूमती रहती हैं, अब उनसे मिलने के लिए तो कभी रात में चोरी-छिपे यहाँ का दौरा करना होगा। वैसे हमने वहाँ शाही महल और शाही पलंग का भी नज़ारा लिया। यह एक ऐसा परिसर है जहाँ महल और कारागार दोनो थे, जहाँ ऐश्वर्य और नर्क की यातना दोनो ही भरपूर रही हैं।

इसके कुछ प्रमुख भाग हैं- क्राउन ज्वेल्स- जहाँ पूरी धन-संपदा प्रदर्शित है, व्हाइट टॉवर, ब्लडी टॉवर, ट्रेटर्स गेट, चैपल रॉयल आदि-आदि।

कहा तो बहुत कुछ जा सकता है, लेकिन अभी इतना ही कहूंगा कि आप लंदन आते हैं तो आपको यह ‘विश्व धरोहर’ का दर्जा प्राप्त परिसर भी अवश्य देखना चाहिए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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क्लासिक बोट फेस्टिवल, लंदन!

लंदन प्रवास के इस वर्ष के अनुभवों के अंतर्गत आज मैं बात करूंगा ‘क्लासिक बोट-फेस्टिवल’ की, जिसे हम आज देखने गए और मैं आज इसी का अनुभव शेयर कर रहा हूँ।


सभी प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर यह भी परंपरा होती है कि वे समय-समय पर ऐसे विभिन्न मेले, उत्सव आदि आयोजित करते रहते हैं जिससे पर्यटकों के उत्साह में कुछ अतिरिक्त उछाल आता है। मैं गोवा में ऐसे आयोजनों के बारे में तो जानता ही रहा हूँ। अभी लंदन में हूँ तो यहाँ आजकल ‘ऑटम फेस्टिवल’ भी आयोजित हो रहे हैं।


इसी क्रम में आज हम ‘सेंट केथरिन पायर’ पर गए, यहाँ 6 से 8 सितंबर तक ‘क्लासिक बोट फेस्टिवल-2019, का आयोजन किया गया है, जिसका आज अंतिम दिन था। यह स्थान टॉवर ब्रिज के बगल में है। एक बात और लंदन नगर क्योंकि थेम्स नदी के दोनों तरफ बसा है, और यहाँ नगर में अनेक नहरें इस मुख्य नदी से निकाली गई हैं। यहाँ पर अनेक आयोजन भी नदी और बोटिंग से जुड़े होते हैं।


अक्सर यहाँ इस प्रकार के आयोजन होते रहते हैं, एक तो विशाल शिप ‘कटी सार’ ग्रीनविच पर प्रदर्शनी के रूप में खड़ा हुआ है, जिसको देखने के लिए भारी संख्या में लोग आते हैं। इसके अलावा यहाँ अक्सर रंग-बिरंगी पालयुक्त नावें, ‘याच फेस्टिवल’ के आयोजन के रूप में निकलती रहती हैं। इसी प्रकार समय-समय पर बोटिंग के, कंपिटीशन, फेस्टिवल आदि भी आयोजित होते रहते हैं।

इसी क्रम में यह आयोजन विशेष महत्व का था, जिस प्रकार पुरानी विंटेज कारों की प्रदर्शनी बहुत से स्थानों पर होती रहती है, इसी प्रकार यह ‘क्लासिक बोट्स’ की प्रदर्शनी थी, जिसमें ऐसी पुराने समय की नावें लगाई गई थीं जिनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। कोई समय था जब नदियों और समुद्र में इन नावों का आधिपत्य रहता था, आज ये नावें अपने उन्नत इतिहास के बारे में बताने के लिए ‘सेंट केथरिन डॉक्स’ के सीमित क्षेत्र में सजी हुई खड़ी थीं, दर्शक इनके भीतर जाकर इनके प्रत्येक भाग को देख सकते थे।


जैसा कि होता है, इस बोट फेस्टिवल के एक अंग के रूप में अनेक आयोजन और गतिविधियां रखी गई थीं, जिनमें एक बैंड द्वारा गीत-संगीत की प्रस्तुति भी विशेष रूप से मोहने वाली थी, बाकी खाने-पीने के स्टॉल तो ऐसे में होते ही हैं।


इस प्रदर्शनी में एक अत्यंत सुंदर और सोने की नक्काशी से सजी नाव महारानी की भी थी, जिसे केवल बाहर से देखा जा सकता था। बाकी सभी ऐतिहासिक महत्व वाली नावों के भीतर जाकर हमने उनको देखा।


इस आकर्षक प्रदर्शनी का आनंद लेने के बाद हम वहाँ से ही नगर भ्रमण कराने वाले क्रूज़ में बैठकर ग्रीनविच तक गए और यहाँ भी नदी तट पर बने भवनों आदि के बारे में कमेंट्री के माध्यम से रोचक जानकारी प्राप्त की। यहीं हमें यह भी बताया गया कि नदी किनारे जहाँ नाव, क्रूज़ आदि रुकते हैं ऐसे अधिकांश स्थानों को ‘व्हार्फ’ कहा जाता है, उसका अर्थ है ‘वेयरहाउस एट रिवर फ्रंट’।


इस प्रकार ग्रीनविच पर विख्यात शिप ‘कटी सार’ को एक बार फिर से देखने के बाद हम वहाँ से ट्रेन पकड़कर अपने घर की ओर रवाना हो गए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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एक बार फिर ओ-2 !

जैसा आप जानते हैं, इन दिनों मैं अगस्त-सितंबर 2019 में किए गए हमारे दूसरे लंदन प्रवास के अनुभव शेयर कर रहा हूँ| अब यह क्रम भी शीघ्र समाप्त होने वाला है और जल्दी ही मुझे अपने नियमित कार्यक्रम को फिर से अपनाना होगा| प्रस्तुत है आज का प्रसंग|

आज की हमारी मंज़िल थी- ओ-2, यह आप समझ लीजिए कि मार्केट-कम-ईवेंट ऑर्गेनाइज़ेशन प्लेस है। लंदन ओलंपिक्स के दौरान इसे बनाया गया था। हमारे घर से यहाँ आने के लिए थेम्स नदी के नीचे से ट्यूब रेल द्वारा एक अगले स्टेशन पर जाना होता है। इसको आप ऐसा समझ लीजिए कि एक ही छत के नीचे पूरा कनॉट-प्लेस है, बहुत सुंदर सज्जा के साथ, एक छत के नीचे ऐसे जैसे गुड़गांव में ‘किंगडम ऑफ ड्रीम्स’ है। हाँ छत को यहाँ आकाश का रूप नहीं दिया गया है।

यहाँ जैसे मुख्य बाज़ारों में होता है आपको सब कुछ मिल जाएगा, ब्रांडेड सामान, फैंसी सामान, मुझे तो वैसे खरीदारी का अनुभव नहीं है लेकिन यहाँ से मेरे बेटा-बहू ने हमारे लिए काफी कुछ खरीदा। यहाँ सिनमा हॉल तो हैं ही, ईवेंट भी होते रहते हैं, जैसे आज ही सुनिधि चौहान का कार्यक्रम शाम को हुआ होगा, हम तो खैर दिन में गए थे।

यहाँ खाने-पीने का भी पूरा एक बाज़ार है और हाँ उसमें दो-तीन दुकानें तो भारतीय भोजन भी प्रदान करती हैं। एक जिसमें हम गए, ‘जिमी’ज़ वर्ल्ड ग्रिल एंड बार’, बहुत शानदार रेस्टोरेंट था, ‘बार्बे क्यू नेशन’ की तरह, बफे सिस्टम वाला और यहाँ बहुत स्वादिष्ट भारतीय पकवानों की विशाल रेंज उपलब्ध थी, इतनी कि मैं वास्तव में ज्यादा खा गया, और फिर मीठे का तो मुझे विशेष शौक है, उसने भी भोजन की मात्रा बढ़ा दी। स्टॉफ में काफी लोग भारतीय और एशियाई थे।

विशेष रूप से रेस्टोरेंट में भारतीय झंडा भी लगा था और सजावट बहुत आकर्षक थी। मेरा बेटा बता रहा था कि काफी दिन से उसका यहाँ आने का विचार था, जो आज क्रियान्वित हो गया। जैसा मैंने बताया सुनिधि चौहान का भी आज वहाँ प्रोग्राम था।

खाने के बाद हम खरीदारी के लिए ऊपर गए और इस मार्केट-प्लेस का यह हिस्सा इस वर्ष ही चालू किया गया है, मार्केट को स्टूडियो की तरह सजाया गया है और यहाँ सफाई तो रहती ही है।

वापसी में ओ-2 मार्केट के बाहर ही ‘ऑटम फेस्टिवल’ के अंतर्गत स्टॉल लगे थे, उनको देखा। यहाँ की गर्मी तो हमारे लिए हल्की सर्दी जैसी होती है, ऑटम उससे कुछ ज्यादा और फिर सर्दी तो आखिर सर्दी ही है!


वैसे तो मैं ओ-2 मार्केट प्लेस में कई बार गया हूँ लेकिन आज का यहाँ का खाना और खरीदारी कुछ ज्यादा ही मजेदार थीं। जैसा इसका नाम है ‘ओ-2’ यह वास्तव जीवन में ऑक्सीजन की तरह है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ये ऑक्सफोर्ड है जी!

जैसा आप जानते हैं, इन दिनों मैं अगस्त-सितंबर 2019 में किए गए हमारे दूसरे लंदन प्रवास के अनुभव शेयर कर रहा हूँ| प्रस्तुत है यह प्रसंग|

लंदन प्रवास के दौरान कल हम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी देखने गए थे। जैसे विद्यालयों, विश्वविद्यालयों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है, तो यह भी कहा जा सकता है कि यह दुनिया का शायद दूसरा सबसे पुराना शिक्षा का महामंदिर है, जो आज भी चल रहा है।

तो हम लंदन से सुबह रवाना हुए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए। लंदन के पैटिंगटन रेलवे स्टेशन से ऑक्सफोर्ड के लिए जीडब्लूआर (ग्रेट वेस्टर्न रेलवे) की ट्रेन चलती है। जैसे हम ‘मेरा भारत महान’ कहते हैं, ब्रिटेन, यानि ‘ग्रेट ब्रिटेन’ में तो शायद पहले से ही सब चीजों को ‘ग्रेट’ कहने की परंपरा है।

खैर पैटिंगटन स्टेशन से ट्रेन द्वारा ऑक्सफोर्ड पहुंचने में एक घंटा लगता है, बहुत आकर्षक और सुविधाजनक फास्ट ट्रेन उपलब्ध हैं, रास्ते में दो स्टेशनों पर यह ट्रेन रुकती हैं- स्लॉ (Slough) और रेडिंग (Reading), इन दोनों स्थानों भी काफी बड़ी संख्या में भारतीय और एशियाई लोग रहते हैं।

ऑक्सफोर्ड घूमने का अनुभव अपने आप में अद्वितीय है, जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय विशालता में कहीं भी इसके आस-पास नहीं है और उसको भी कई कैम्पस में बांट दिया गया, यहाँ हॉप ऑन-हॉप ऑफ बस द्वारा पूरा परिसर घूमने में एक घंटा लग जाता है। कौन सा पैमाना है जिसके हिसाब से यह अद्वितीय नहीं है। वह इसके निर्माण की शिल्पकला हो, हर क्षेत्र के लिए उपलब्ध पाठ्यक्रम हों, इस विश्वविद्यालय के प्रकाशन हों, आदि-आदि। इसका पुस्तकालय अनेक मंज़िलों में फैला है और इसके छात्र तो दुनिया भर में फैले ही हैं।


ब्रिटेन पर शासन करने वाले अनेक राजनीतिज्ञ, अमेरिका के अनेक राजनेता, जिनमें बिल-क्लिंटन भी शामिल हैं, यहाँ के छात्र रहे हैं, एक स्थान है जिसके बारे में बताया गया कि वहाँ क्लिंटन नशा करते हुए पकड़े गए थे, खैर उन्होंने शायद इससे इंकार किया था। भारत और पाकिस्तान के भी अनेक नेता यहाँ के छात्र रहे हैं। भारत की पूर्व प्रधान मंत्री- श्रीमती इंदिरा गांधी जी, पाकिस्तान के नेताओं में भी इमरान खान और बेनज़ीर भुट्टो, उनके पिता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो आदि भी रहे हैं।


अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार यहाँ के छात्र रहे हैं, जिनमें – टी.एस. इलियट भी शामिल थे। इस प्रकार इस विश्वविद्यालय से अनेक ऐसी प्रतिभाएं दुनिया को मिली हैं जिन्होंने राजनीति, साहित्य और फिल्मों में अपना अमूल्य योगदान दिया है। ब्रिटेन के तो अनेक प्रधानमंत्री इस विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के कुछ स्थानों और भवनों को देखते ही बच्चों की प्रसिद्ध फिल्म- हैरी पॉटर याद आ जाती है। बच्चों के लिए लिखी गई प्रसिद्ध कहानियों- ‘एलिस इन वंडरलैंड’ के लेखक भी यहाँ के प्रोफेसर थे, जिन्होंने अपनी बेटी के किसी अनुभव से प्रेरित होकर यह लोकप्रिय कहानी लिखी थी, जो दुनिया भर में लोकप्रिय हुई थी।


कहानियां तो बहुत हैं इस बहुत पुराने विश्वविद्यालय से जुड़ी हुई, मैं केवल इससे जुड़े कुछ चित्र शेयर कर रहा हूँ, बाकी कभी इधर आएं तो बस में घूमकर देखें कमेंट्री सुनें जो अनेक भाषाओं में उपलब्ध है, जिनमें हिंदी भी शामिल है, कुछ हिस्सा यहाँ वॉकिंग टूर में घुमाकर दिखाया जाता है और गाइड अंग्रेजी में काफी रोचक अंदाज़ में उनके बारे में बताता है।

घटनाएं बहुत हैं इससे जुड़ी जैसा मैंने कहा, और यहाँ के लोग भी काफी जागरूक हैं, अभी यूके की संसद भंग होने वाली है, इसके विरोध में ब्रिटेन में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तो विश्वविद्यालय कैसे अछूता रहेगा। लोग कहीं भी इकट्ठा होकर अपना जंतर-मंतर बना लेते हैं, प्रदर्शन भी चलता रहता है और अन्य गतिविधियां भी होती रहती हैं। कहीं ऐसा नहीं होता कि पुलिस बेरीकेड लगाए और लोग उस पर चढ़कर अपनी मर्दानगी दिखाएं।

एक बात और, कुछ दिन पहले बाथ नगर के बारे में लिखा था, वहाँ रहने वाले सेलिब्रिटीज़ में अंग्रेजी हास्य फिल्मों के कलाकार मि. बीन भी शामिल हैं और हाँ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रों में भी वे शामिल हैं, वैसे एक प्रश्न शायद ये भी हो सकता है कि ग्रेट ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्रियों में कौन है, जिसने ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई नहीं की हैं, कोई तो होंगे शायद!

यहाँ कुछ चित्र शेयर किए हैं, वे भी तो कुछ बताएंगे, बाकी कभी मौका लगे तो यहाँ घूम लीजियेगा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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