‘पालोलिम बीच’, नए साल का जश्न!

वाराणसी, लखनऊ और अयोध्या यात्रा का विवरण मैंने शेयर किया था और इत्तफाक से इस यात्रा से लौटने के दो दिन बाद ही गोवा में ही पालोलिम बीच जाने का प्रोग्राम बन गया| बड़ा बेटा लंदन से आया हुआ है सो उसके लिए कम समय में भारत के अधिक सुंदर और महत्वपूर्ण स्थानों को फिर से देख लेना महत्वपूर्ण है| ‘पालोलिम बीच’ हम पहले भी उसके साथ जा चुके हैं और मैंने उसका अनुभव भी पहले शेयर किया था| इस बार हम वहाँ ‘सिआरन रिज़ॉर्ट’ में रुके थे, पिछली बार किसी और में थे| तीन दिन -दो रात के इस प्रवास में हमने फिर से समुद्र के सौन्दर्य के अंतरंग अनुभव, ‘हनीमून बीच’, ‘बटरफ्लाई बीच’, फेवरेट रेस्टोरेंट्स में भोजन और कुछ खरीदारी का आनंद लिया|


पालोलिम बीच साउथ गोवा की अत्यधिक सुंदर और लोकप्रिय बीच है| वहाँ यात्रा का अनुभव मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ इसलिए अधिक विस्तार से न लिखकर कुछ चित्र शेयर करूंगा|

आज नए वर्ष के बारे में भी एक अनुभव शेयर करूंगा| बच्चे लोगों के साथ हम अक्सर बाहर खाना खाने जाते रहते हैं, विशेष रूप से जब बच्चे बाहर से आते हैं| गोवा के लोकप्रिय रेस्टोरेंट ‘टोमैटोज़’ में हम पहले भी कई बार खाना खाने गए, लेकिन इस बार जब डिनर करने गए, वह कल 30 दिसंबर की रात थी, नए साल के आरंभ से जुड़ी खुमारी जनता पर पूरी तरह छाई थी, रेस्टोरेंट पूरी तरह भरा हुआ था और वहाँ जनता ने जी भरकर डांस किया, जबकि बाहर से बुलाई गई नर्तकियों द्वारा भी कुछ मदहोश करने वाले नृत्य प्रस्तुत किए गए|

अब तक हमारा नववर्ष की पूर्व संध्या का अनुभव ऐसा ही रहा है कि हम घर पर बैठकर टेलीविज़न पर कुछ कार्यक्रम, कवरेज आदि देखते रहे हैं| यह पहली बार था कि गोवा में आने के बाद हमने जनता के बीच शामिल होकर, मस्ती भरा नववर्ष आयोजन देखा| निर्मल वर्मा जी ने कहीं ‘कीर्तन’ की तल्लीनता, उसमें डूबने के संबंध में बहुत सुंदर वर्णन लिखा था, गोवा की मस्त रहने वाली जनता ने उल्लास प्रदर्शन का ऐसा अनुभव कराया, वैसे ऐसा शायद सभी आधुनिक शहरों में होता है, जहां लगता है कि लोगों के पैरों में और शरीर में नृत्य भरा हुआ है, जो तब तक चलता जाएगा, जब थिरकने के लिए संगीत बजता रहेगा|

भोजन तो अपनी जगह है, खाना-पीना सब, वह भी अच्छा था, लेकिन लोगों की सम्मिलित मस्ती का यह आयोजन बहुत सुंदर था| रिटायर होने से पहले एनटीपीसी के क्लबों में भी सीमित भागीदारी के साथ ऐसे आयोजन होते थे, लेकिन लंबे अंतराल के बाद, ऐसी पब्लिक के बीच जो आपस में एक-दूसरे से परिचित नहीं थे, उनके द्वारा इतनी मस्ती से आनंद उत्सव में भाग लिए जाने का यह अनुभव मेरे लिए अनूठा था| एक बुजुर्ग थे जो अपनी थिरकनों से लोगों को विशेष रूप से आकर्षित कर रहे थे|

आप सभी को नववर्ष 2023 की हार्दिक शुभकामनाएं |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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लखनऊ, अयोध्या यात्रा-3

वाराणसी यात्रा का विवरण मैंने शेयर किया था और उसमें लखनऊ पहुँचने और वहाँ एक होटल में रुकने का उल्लेख भी किया था, लखनऊ पहुँचने पर शाम हो गई थी अतः उस दिन अन्य किसी गतिविधि के लिए समय नहीं था| हाँ अगले दिन अयोध्या जाने के लिए टैक्सी की व्यवस्था की और हम सो गए| लंबे समय से हम गोवा में रह रहे हैं और सर्दी को तो भूल ही गए हैं| गोवा में हम अभी भी ज्यादातर एसी चलाते हैं, और लखनऊ में ‘ए सी’ बंद होने पर भी बार बार यह आशंका होती थी कहीं ‘ए सी’ ठंडी हवा तो नहीं दे रहा है, वैसे वहाँ वातानुकूलन की सेंट्रलाइज्ड व्यवस्था थी जो रूम से भी नियंत्रित होती है|

बहरहाल अगले दिन होटल में सुबह का नाश्ता करने के बाद हमने अयोध्या के लिए निकलने का विचार बनाया था| होटल में भोजन आदि की दरें ऐसी थीं कि वहाँ भोजन करना अपने बूते की बात नहीं थी, लेकिन सुबह का नाश्ता क्योंकि कंप्लीमेंट्री था और बुफ़े सिस्टम के अंतर्गत बहुत से व्यंजनों का विकल्प उपलब्ध था तब भला उसको कैसे छोड़ा जा सकता था|

सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास हम लोग नाश्ता करने के बाद टैक्सी से अयोध्या के लिए रवाना हुए, थोड़ी ठंड तो थी लेकिन मौसम साफ था, दूर तक स्पष्ट दिखाई दे रहा था, परंतु लखनऊ की सीमा से बाहर निकलने के बाद ही कुहरे की परतें चढ़ती चली गईं और लगभग आधा रास्ता जाने के बाद सामने के वाहन आदि दिखना बहुत मुश्किल हो गया था, लगभग अयोध्या के आसपास पहुँचने पर ही वातावरण क्लीयर हुआ|

काशी और अयोध्या में बड़ा अंतर यह रहा कि काशी में भोले बाबा का भव्य मंदिर परिसर जहां बनकर तैयार है, वहीं अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर बनाने का काम तेजी से चल रहा है, इतना ही नहीं इस परिसर को सुंदर बनाने के लिए नगर में काफी तोड़-फोड़ चल रही है, रास्तों को चौड़ा किया जा रहा और ऐसा लगता है कि एक-दो वर्ष बाद जब श्रद्धालु यहाँ जाएंगे तो उनको एक अलग ही अनुभव होगा|

खैर अयोध्या में वर्तमान स्थिति में प्रभु श्रीराम जी के दर्शन करना एक धार्मिक कार्य था, जो हमने श्रद्धापूर्वक संपन्न किया| वहाँ बंदरों की भी मौज है परिसर में हर तरफ से आकर वे प्रसाद पाने के लिए लालायित रहते हैं| मंदिर दर्शन के बाद हमने नगर भ्रमण किया, सरयू नदी के तट पर गए और शाम होने से पहले हम लखनऊ में अपने होटल लौट आए थे| हाँ शाम को वापस आने के बाद हमारे पास इतना समय तो था ही कि हम हजरतगंज के ‘मोती महल’ मिष्ठान्न भंडार पर हो आएं| पहले जब हम लखनऊ में रहते थे तो अनेक बार हमने यहाँ भोजन और मिठाइयों का आस्वादन किया था, इस बार हमारा टारगेट मुख्य रूप से मिठाइयां थीं, हमने कई प्रकार की मिठाइयां मंगाईं, कुछ वहाँ खाईं और कुछ पैक कराकर ले गए, जिनको हमने अगली शाम तक खाया|

लखनऊ में 10 वर्ष तक हमारा घर रहा था, हम तो उसमें से काफी समय तक लखनऊ और ऊंचाहार के बीच आते-जाते रहते थे, लेकिन हमारे लिए लखनऊ देखा-भाला था, इसलिए अगले दिन हमने लखनऊ में कुछ मित्रों और संबंधियों से मिलने का प्लान बनाया, उसके अनुसार काम किया, उस दिन ‘आलम बाग’ की एक और मिठाई की दुकान का मीठा चखने का अवसर मिला| इस प्रकार सोशल भ्रमण, खान-पान आदि में हमने यह दिन बिता दिया! अगले दिन तो हमको लौटना ही था और हम दोपहर बाद 3-30 बजे की फ्लाइट पकड़कर शाम 6 बजे गोवा हवाई अड्डे और 7 बजे अपने घर पहुँच गए|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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वाराणसी, लखनऊ यात्रा-2

मैंने यात्रा से वापस लौटने के बाद एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी वाराणसी, लखनऊ आदि की यात्रा के बारे में, उसका एक भाग लिखने के बाद यहाँ गोवा में ही, पालोलिम बीच तक 2-3 दिन की आउटिंग पर जाने का प्रोग्राम बन गया, इसलिए उस यात्रा का विवरण अधूरा रह गया| अब संक्षेप में उस यात्रा का विवरण लिखूँगा और कुछ फोटो शेयर करूंगा|

वाराणसी प्रवास के दूसरे दिन, भोले बाबा के काशी विश्वनाथ मंदिर जाने का प्रोग्राम था और यह बताया गया था कि इससे पहले भैंरो बाबा के दर्शन करना भी अनिवार्य है, सो इस दिन हमने पहले भैरों बाबा के और उसके बाद बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए| जैसा मैंने पहले भी लिखा है बाबा विश्वनाथ अब पहले के मुकाबले अत्यधिक विशाल भवन में हैं, कई प्रवेश द्वार हैं और भक्तों की भीड़ भी अब और अधिक हो गई है| दर्शन के समय क्योंकि कैमरा आदि ले जाना सख्त मना है अतः इस धार्मिक यात्रा से जुड़ा कोई चित्र शेयर नहीं कर पाऊँगा बस यही कि काशी जाकर यह धार्मिक गतिविधि भी हमने सपरिवार पूरी श्रद्धा के साथ पूरी की|

मंदिरों के दर्शन की बात करें तो संकट मोचन मंदिर के दर्शन हम लोग पहले ही कर चुके थे, कुछ लोग इस बार भी दर्शन करने गए, इसके अलावा भारत माता मंदिर, सारनाथ आदि का भ्रमण भी हम पहले कर चुके थे सो इस बार नहीं किया|

कुछ समय हमने वाराणसी के बाजारों में भ्रमण करने और कुछ प्रसिद्ध मिठाइयां, पकवान यहाँ तक कि कहीं की प्रसिद्ध चाय आदि का भी आस्वादन करने में बिताया|

इसके बाद अगले दिन हम ट्रेन द्वारा लखनऊ के लिए रवाना हुए| बहुत लंबे समय के बाद हमने ट्रेन द्वारा यात्रा की, वाराणसी से लखनऊ पहुँचने की निर्धारित अवधि 6 घंटे से कम है लेकिन उसमें 2 घंटे ज्यादा लग गए, ट्रेन चलने में होने वाली देरी का यह अनुभव लंबे समय के बाद हुआ, जिससे काफी खीझ भी हो रही थे, लेकिन बाद में अखबार में पढ़ा कि बहुत सी ट्रेन कोहरे के कारण रद्द हो गईं, तब हमें संतोष हुआ कि हमारे साथ ऐसा तो नहीं हुआ| हम क्योंकि अब गोवा में रहते हैं इसलिए सर्दी और

उस रात हम लखनऊ में हजरतगंज के पास ‘सरोवर पोर्टिको’ होटल, में जाकर रुक गए, जहां से अगले दिन हमें अगले पड़ावों पर जाना था|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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वाराणसी, लखनऊ यात्रा !

लंबे समय के बाद उत्तर प्रदेश और लखनऊ में फिर से जाना हुआ, जहां 10 वर्ष तक मेरा आवास था| यात्रा से जुड़ी ब्लॉग पोस्ट भी लंबे समय के बाद लिख रहा हूँ|

मेरा बड़ा बेटा और बहू लंदन से आए, उन्होंने ही अग्रिम रूप से, सबकी एक साथ काशी यात्रा की योजना बनाई हुई थी, जिसमें मैं, मेरी पत्नी, बेटा-बहू और बेटे के सास-ससुर भी शामिल थे, और वाराणसी के बाद मेरे और मेरी पत्नी के 3 दिन लखनऊ प्रवास की भी व्यवस्था थी, जिसमें से एक दिन हमने अयोध्या भ्रमण का भी रख लिया था|

पहले जब एनटीपीसी विंध्यनगर में था तब कई बार वाराणसी जाना होता था और विश्वनाथ मंदिर के दर्शन भी पहली बार, वहाँ रहते हुए श्री नितिन मुकेश जी के साथ किए थे, जिनको मैं एक कार्यक्रम के लिए वाराणसी एयरपोर्ट से लेने गया था| तब मंदिर जाने का रास्ता बड़ी संकरी गली से होकर था, अब तो प्रभु के पास महल जैसा आवास है, जिसमें कई प्रवेश द्वार हैं| और भक्तों की लाइन भी सड़क पर बहुत दूर तक लगी थी, पता नहीं कि यदि हम ‘सुगम दर्शन’ संबंधी भुगतान करके इस सुविधा का लाभ नहीं उठाते तो कितना टाइम हमें दर्शन में लग जाता| इस सुविधा का लाभ उठाने वालों की भी अच्छी खासी भीड़ थी|

पहले दिन हम बहुत सुबह गोवा से चलकर मुंबई होकर जाने वाली फ्लाइट से वाराणसी हवाई अड्डे और वहाँ से दोपहर में, वाराणसी कैंट स्थित क्लार्क होटल पहुंचे और कुछ समय आराम करने के बाद शाम को घूमने निकले| शाम को ‘नमो घाट’ से हमने अपने भ्रमण का प्रारंभ किया जो काफी सुंदर घाट है, वहाँ की ‘लैमन टी’ भी एक विशेष आकर्षण है, चाय का वह स्वाद बहुत अलग और अच्छा है| नमो घाट से नौका करके विभिन्न घाटों से होते हुए हमारा दशाश्वमेघ घाट के बगल मे ‘राजेन्द्र प्रसाद घाट’ जाने का प्रोग्राम था, जहां पहुँचने पर शाम की ‘गंगा आरती’ में शामिल होना था|

यहाँ एक घटना ऐसी हुई जिसमें मेरी साँसे अटक गईं थीं| दशाश्वमेघ घाट पहुँचने के बाद नौका चालक ने नाव किनारे पर लगाई, नाव का अगला हिस्सा काफी उठा हुआ था, जिस पर उसने एक पटरा लगा दिया और सबसे उस पर होकर उतरने के लिए कहा| मुझे ‘हाई एंगजाइटी’ है अर्थात ऊंचाई पर मुझे डर लगता है| वहाँ बगल में एक नाव थी जिसका अगला किनारा ऐसी ऊंचाई वाला था, जिस पर से मैं जंप लगाकर नीचे उतर सकता था| मैंने कहा कि इस नाव से आप अपनी नाव सटा दो, मैं उस पर होकर उतर जाऊंगा| फिर जैसे ही मैंने नाव की ऊंची मुंडेर पर लेटकर दूसरी नाव की मुंडेर पर अपना पैर रखा, वह नाव अचानक दूर होने लगी और मेरे पैर जितने फैल सकते थे फैल गए, बस मेरा नीचे गिरना ही बाकी था| उसके बाद सभी के सम्मिलित प्रयास से और सबसे अधिक ईश्वर कृपा से उस नाव को पास लाया जा सका, और मैं उस दूसरी नाव से होकर, उसके किनारे से जंप लगाकर सुरक्षित गंगा तट पर आ गया|

काफी समय इसके बाद मुझे अपनी साँसों को संयत करने में लगा, इसके बाद इत्तफाक से हमें ‘गंगा आरती स्थल’ पर एक चबूतरे पर बैठने का मौका मिल गया और हमने वाराणसी के इस दिव्य आकर्षण ‘गंगा आरती’ में श्रद्धा पूर्वक भाग लिया|

गंगा आरती के बाद उस घाट से बाहर निकलकर हमने वहाँ के बाजार में चाट की एक प्रसिद्ध दुकान से चाट का आनंद लिया, फिर भोजन किया और रात्रि विश्राम के लिए वापस होटल पहुँच गए|

आगे का प्रसंग बाद में|

नमस्कार|
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कल रात की तौबा!

एक पुरानी घटना याद आ गई और उसके साथ ही ये खयाल आया कि दुनिया कितनी बदल गई है| कला की सारी सौगातें, गीत-संगीत तो सब वही हैं लेकिन टेक्नोलॉजी और उसका आम आदमी द्वारा उपयोग कितना बदल गया है, बस यही खयाल आया इस घटना को याद करके|



मैं एनटीपीसी में राजभाषा के क्षेत्र में काम करता था| वैसे तो सरकारी संस्थानों में राजभाषा का क्षेत्र ऐसा है कि यहाँ कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता, आंकड़ों में दिखाने की महारत हो तो रिपोर्ट आप, अपनी झूठ बोलने की क्षमता के अनुसार तैयार कर सकते हैं, क्योंकि यहाँ आपके हाथ में कुछ भी नहीं है, आप सिर्फ निवेदन कर सकते हैं और ये उम्मीद आपसे की जाती है कि आप रिपोर्ट में बढ़िया स्थिति दर्शाएं|

अब याद आ गई है उस जमाने की तो यह संतोष होता है कि मैं पत्रिका आदि प्रकाशित करके, कवि सम्मेलनों का आयोजन करके अपनी पसंद के कुछ काम कर सकता था और यह दर्द भी झलकता है कि अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले मानो मुंबई की ‘फास्ट लोकल’ थे जो तेजी से आगे निकल जाते थे और आप हर जगह रुकते हुए ‘स्लो लोकल’ की तरह ही आगे बढ़ते थे|

एक बात और कि अन्य क्षेत्र में काम करने वालों के लिए प्रशिक्षण आदि के नाम पर विदेश दौरे भी उपलब्ध थे, वहीं राजभाषा अधिकारियों के लिए कंपनी की ही विभिन्न परियोजनाओं में आयोजित होने वाले राजभाषा सम्मेलन ही विभिन्न परियोजनाओं में जाने का साधन थे जो सामान्यतः बड़े शहरों से दूर होते हैं और हाँ कुछ निजी संस्थानों द्वारा कुछ पर्यटन स्थलों पर राजभाषा सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें अगर राजभाषा अधिकारियों को भाग लेने की अनुमति मिल जाए तो वह एक दुर्लभ अवसर होता था| ऐसे कुछ अवसरों का लाभ मैंने भी उठाया था और आज एक ऐसे ही अवसर के बहाने से बात कर रहा हूँ, जो अचानक याद आ गया|

हाँ तो प्रसंग कुछ ऐसा है कि पांडिचेरी में एक राजभाषा सम्मेलन का आयोजन था जिसमें भाग लेने के लिए मेरी परियोजना की ओर से मैंने अपना नामांकन करा लिया था| ऐसे आयोजनों का उद्देश्य भी वैसे राजभाषा के बहाने पैसा कमाना ही होता है, जिसे एक बड़े उद्देश्य के साथ जोड़कर प्रचारित किया जाता है| हाँ तो मैं शायद दिल्ली से चेन्नई की ट्रेन में बैठा था, एसी टू टियर में सोता हुआ जा रहा था तभी भोपाल से एक सज्जन बगल की बर्थ पर आए दाढ़ी काफी बढ़ी हुई थी जिसके कारण शुरू में यह पहचानना मुश्किल था कि वह मेरे साथ एनटीपीसी में काम कर चुके अखिलेश जैन थे, जो अब भोपाल की एक कंपनी में कार्य कर रहे थे और अपनी कंपनी में अन्य कामों के साथ वो राजभाषा का काम भी देख रहे थे और उनकी मंजिल भी वह राजभाषा सम्मेलन ही था, जिसमें मैं जा रहा था|

मैं यहाँ इस राजभाषा सम्मेलन के बारे में कुछ बताने नहीं जा रहा, छोटी सी बात जो याद आई थी बस अब वही बताकर बात पूरी करूंगा| चेन्नई से हमको पांडिचेरी जाना था, वहाँ जिस होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था आयोजकों द्वारा की गई थी, दोनों ने वहाँ जाने के लिए टैक्सी भाड़े पर ली, अखिलेश जानते थे कि मुझे मुकेश जी के फिल्मी गीत गाने का शौक था तो रास्ते में मैंने कई गीत गए, उनमें से ही एक गीत जो मुझे अत्यंत प्रिय है वह था ‘याद आई आधी रात को कल रात की तौबा, दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा’| बहुत प्यारा गीत है ये जिसमें ये दिखाया गया है कि कैसे कोई शराबी रोज न पीने की कसम खाता है और रोज भूल जाता है|

खैर प्रसंग मात्र इतना सा है कि अखिलेश बोले कि यह गीत फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का है, मैंने यह फिल्म देखी है और मुझे पूरा भरोसा था कि यह इस फिल्म का गीत नहीं था, लेकिन किस फिल्म का था ये मुझे याद नहीं था| अखिलेश शर्त लगाने को तैयार थे कि यह गीत उसी फिल्म का है और मुझे पूरा विश्वास था कि उस फिल्म के देहाती नायक के साथ इस गीत का कोई तालमेल ही नहीं है, लेकिन उस समय इसका कोई फैसला हम नहीं कर पाए|

मैं कहना क्या चाह रहा था इस आलेख में! मुझे याद नहीं आ रहा कि उस समय हम लोग मोबाइल फोन रखते थे या नहीं, ये वर्ष 2000 से पहले की बात है, हम फोन रखते भी हों तो शायद सिर्फ बात करने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते होंगे| आज इस गीत का जिक्र आया तो तुरंत गूगल पर देखकर मैं बता सकता हूँ कि ये गीत फिल्म- ‘कन्हैया’ का गीत है| यही नहीं दुनिया की लगभग हर जानकारी आज के बच्चे आज गूगल पर तुरंत प्राप्त कर सकते हैं, हम भले ही आज भी इस मामले में कुछ पिछड़े रह जाएं!

ऐसे ही याद आया कि साहित्य, कला, संगीत आदि में शायद हम यह गर्व कर सकते हैं कि पूर्व में बहुत महान उपलब्धियां हुई हैं लेकिन टेक्नोलॉजी तो आज की ही चीज़ है और इस क्षेत्र में नित्य नई उपलबधियां हो रही हैं|

ऐसे ही आज इस प्रसंग के बहाने कुछ बात कहने का मन हुआ जी और वह बात अब पूरी हो गई है|

नमस्कार|
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हरिद्वार हरि का द्वार!

फिलहाल हरिद्वार में हूँ| कई बार सोचा है कि हरिद्वार में आकर कुछ समय रहूँ, इस धर्मनगरी, मोक्ष प्रदायिनी माँ गंगा, हर की पैड़ी, जहां लाखों तीर्थयात्री आते हैं और मरने के बाद तो अधिकांश हिन्दू, राख के रूप में प्रवाहित होने आते हैं, जिनके बच्चे उनके लिए ऐसा करते हैं|

लेकिन धर्म नगरी भी कुछ लोगों के लिए तो कमाई की नगरी ही है, जैसे मैं यहाँ गंगा दशहरा के दिन पहुंचा, ऐसे में सभी होटलों के किराये कम से कम दो गुने हो गए थे| छोटे-छोटे कमरों का किराया ढाई-तीन-चार हजार रुपए प्रतिदिन, जिसका शहर के मानक, प्रदान की गई सुविधाओं से कोई तालमेल नहीं है|

खैर हरिद्वार के बारे में जब मैं सोचता हूँ तब अन्य विषयों के अलावा यह भी विचार आता है कि पतंजलि योगपीठ तथा बाबा रामदेव द्वारा वहाँ विकसित की गई योग एवं चिकित्सा संबंधी सुविधाओं के बारे में लिखा जाए|

देश में योग सिखाने वाले तो लंबे समय से रहे हैं लेकिन बाबा रामदेव ऐसे पहले व्यक्ति या संत हैं जिन्होंने योग के परिणामों को जांच और अनुसंधान के माध्यम से एक प्रामाणिक स्वरूप प्रदान किया, इसे विश्व भर में लोकप्रिय बनाया और फिर ऐसे अनेक उत्पाद तैयार किए जो स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडस को जोरदार टक्कर दे रहे हैं ऐसे में अपने ही देश के कुछ बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं कि एक संत व्यवसायी कैसे बन गया, लेकिन मैं समझता हूँ कि बाबा रामदेव द्वारा इन सभी क्षेत्रों में किया गया कार्य अत्यंत श्रेष्ठ और देशहित में बहुत उपयोगी है|

मेरे मन में कई बार विचार आता है कि बाबा रामदेव द्वारा हरिद्वार में विकसित की गई सुविधाओं का अवलोकन करके उनके बारे में लिखूँ| यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति कैसे धीरे-धीरे बाबा रांमदेव के रूप में विकसित हुआ, इस बारे में, एक भक्त के रूप में नहीं, एक सजग और निष्पक्ष प्रेक्षक की दृष्टि से विचार करते हुए एक पुस्तक लिख सकता हूँ|
हरिद्वार में वैसे तो बहुत से संत महात्मा होंगे जिनके पास ज्ञान का अक्षय भंडार होगा, लेकिन एक व्यक्ति स्वामी अवधेशानंद जी ऐसे हैं जिनके उपदेशों को, उनके व्याख्यानों को सुनकर मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है| कई बार ऐसा भी मन होता है कि उनको निकट से जानकर उनके बारे में पुस्तक लिखी जाए|

लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि मैं अब गोवा में रहता हूँ और ये सब कार्य करने के लिए यहाँ लंबे समय तक रहने की आवश्यकता होगी| ऐसे में यही विचार आता है कि यदि यहाँ रहने की सुविधा मिल जाए तो इस प्रकार का कोई उल्लेखनीय और सार्थक कार्य शायद हो पाए|
फिलहाल तो लगता है कि इस प्रकार का विचार मन में रखते हुए एक बार फिर से वापस लौटना होगा, हाँ कुछ समय तो यहाँ संभावनाओं के बारे में विचार करूंगा|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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मेरी दिल्ली!

आज फिर से लंबे समय बाद दिल्ली-गुड़गांव क्षेत्र में आया हूँ| कुछ लिख पाऊँगा तो लिखूँगा, फिलहाल दिल्ली की एक पुरानी यात्रा से जुड़ा आलेख शेयर कर रहा हूँ|

काफी लंबे समय के बाद दिल्ली आना हुआ, उस दिल्ली में जो लगभग डेढ़ वर्ष पहले तक मेरी थी, उसी तरह जैसे और भी लाखों, करोडों लोग इस या किसी भी महानगर को अपना मानते हैं। एक फिल्म जिसका मैंने पहले भी अपने ब्लॉग में ज़िक्र किया है- ‘कांकरर्स ऑफ दा गोल्डन सिटी’, इस फिल्म में एक आदमी आता है महानगर और कहता है कि एक दिन मैं इस शहर का मालिक बन जाऊंगा, लेकिन फिल्म के अंत में वह लुट-पिटकर वापस लौटता है।

हर कोई मुकेश अंबानी तो नहीं हो सकता, वैसे मुकेश अंबानी भी किसी महानगर का मालिक होने का दावा नहीं कर सकता। हद से हद उसका अपना परिवार बहुत सी मंज़िलों वाले घर में रह लेगा, जिसमें सोचना पड़े कि आज किस ‘फ्लोर’ को धन्य किया जाए! मुझे लगता है कि पुराने जमाने के महलों में भी इस तरह की दुविधा रहा करती होगी!

फिर दिल्ली में तो जहाँ आज के बहुत सारे नव धनाढ्य रहते हैं, वहीं बहुत से महल और किले भी हैं, जिनमें से कुछ तो खंडहर भी बन चुके हैं।

इस बार जब फिर से दिल्ली आया, किसी हद तक एक टूरिस्ट की हैसियत से तो यही खयाल आया कि वह कौन सी प्रमुख बात है जो दिल्ली को दिल्ली बनाती है!

राजा-महाराजाओं के किले तो हैं ही, जिनमें मुगल काल और यहाँ तक कि महाभारत काल तक की यादें समेटी गई हैं। इसके बाद ब्रिटिश शासकों ने भी- आज का राष्ट्रपति भवन (जो शायद वायसराय हाउस था), संसद भवन, सचिवालय, बोट क्लब और ढ़ेर सारी इमारतें बनवाई थीं, जो स्थापत्य कला की बेजोड़ धरोहर हैं।

महल और सरकारी इमारतें तैयार कराने में जहाँ शासकों का हाथ होता है, वहीं कुछ मंदिर-मस्ज़िद भी शासक बनवाते हैं, इस काम में कुछ श्रद्धालु पूंजीपतियों का भी योगदान होता है, जैसे बहुत से स्थानों पर बने लक्ष्मी नारायण मंदिर आज ‘बिड़ला मंदिर’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्होंने उनको बनवाया है। इसमें भी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। बिड़ला जी का अधिक जोर मंदिर बनवाने पर है तो टाटा जी का अस्पताल अथवा रोग-अनुसंधान संबंधी संस्थान बनाने पर ज्यादा ध्यान रहा है।

हाँ एक बात और कि बेशक कुछ पहल करने वाले तो रहते ही हैं, लेकिन आज के समय में भी बहुत सारे नए-नए मंदिर श्रद्धालु जनता के पैसे से बनते जाते हैं। इसमें भी यह देखना पड़ता है कि आजकल कौन से भगवान ज्यादा चल रहे हैं। आप स्वयं भी देखें तो मालूम हो जाएगा कुछ भगवान तो पिछले दस-बीस सालों में ही ज्यादा पॉपुलर हुए हैं! वैसे पिछले कुछ समय में ही दिल्ली में लोटस टेंपल और मयूर विहार के पास बना अक्षर धाम मंदिर आधुनिक समय की बड़ी उपलब्धि हैं।

खैर मैं भटकता हुआ कहाँ से कहाँ आ गया, मैं बात इस विषय पर करना चाह रहा था कि आखिर वह क्या है जो दिल्ली को दिल्ली बनाता है! दिल्ली देश की राजधानी तो है ही, देश भर के लोग यहाँ के लगभग सभी इलाकों में इस तरह रहते हैं कि इस महानगर की अपनी अलग कोई पहचान है ही नहीं। दिन-दहाड़े यहाँ कोई किसी को मारकर चला जाए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता!

हाँ पहचान बनाने वाले तत्वों में एक तो देश की राजनैतिक सत्ता यहाँ पर है, ये देश की राजनैतिक राजधानी है, सांस्कृतिक राजधानी कहने में तो संकोच होता है, हालांकि कुछ ऐसे संस्थान यहाँ पर हैं, जैसे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, और भी बहुत हैं, जिनका योगदान इस बेदिल नगर को सांस्कृतिक केंद्र बनाने में है।

और बहुत सारी संस्थाएं आदि हैं, जैसे देश का सर्वोच्च न्यायालय यहाँ है, जो समय-समय पर देश में हलचल पैदा करता रहता है। बहुत बड़ी भूमिका इस संस्थान की है, लोकतंत्र को मजबूत बनाने में!

एक और स्थान है दिल्ली में जहाँ प्राचीनता की मिसाल- पुराना किला है और उसके बगल में ही प्रदर्शनी मैदान है, जहाँ आधुनिकतम विकास की मिसाल बहुत सी प्रदर्शनियों से मिलती है। यहाँ लगने वाले ‘पुस्तक मेले’ भी साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

बस ऐसे ही कुछ स्थानों, संस्थानों, गतिविधियों के बारे में बात करने का मन था, जो इस बेदिल शहर को अच्छी पहचान दिलाते हैं। वैसे बुरी पहचान दिलाने वाले तत्व तो बड़े शहरों में होते ही हैं।

आगे अगर टाइम मिला और मूड भी हुआ तो इन स्थानों, संस्थानों और गतिविधियों के बारे में बात करूंगा, जो राजधानी दिल्ली की पहचान हैं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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पेलोलिम- गोवा की एक खूबसूरत ‘बीच’!

गोवा में रहते हुए कई वर्ष बीत चले, जब लोग यहाँ बाहर से घूमने के लिए आते हैं, तब उनका लक्ष्य होता है कि सीमित समय में जितना हो सकता है, उतना गोवा देख लें| मुख्य आकर्षण तो यहाँ के समुद्र-तट, यहाँ की खूबसूरत ‘बीच’ ही हैं, कुछ पुराने चर्च, फोर्ट आदि हैं, जहां फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, मेरे घर के सामने ही ‘मीरामार बीच’ का इलाका है, बॉल्कनी से ही ‘बीच’ दिखाई देती है और वहाँ जाने के लिए बस सड़क पार करनी होती है, बाईं तरफ बढ़ जाओ तो ‘दोना पावला व्यू पाइंट’, जिसे ‘लवर्स पाइंट’ भी बोलते हैं और दाहिनी तरफ जाने पर ‘मीरामार बीच’| मेरी शाम की सैर ‘बीच’ के साथ-साथ ही होती है| बहुत अच्छा लगता है जब लोगों को अपनी फोटो में शाम के डूबते सूरज को ‘ट्रिक’ से अपनी मुट्ठी में कैद करने अथवा हथेली पर रखने का उपक्रम करते देखता हूँ, और फोन पर उत्साह से यह बताते हुए सुनता हूँ, ‘मैं अभी मीरामार बीच पर हूँ’|

खैर क्योंकि अब गोवा में ही हूँ, इसलिए कोई जल्दी नहीं रहती सभी जगहों को देखने का टार्गेट पूरा करने की| क्योंकि पणजी में ही हूँ, तो यहाँ का चर्च, बाज़ार, कला अकादमी आदि तो देखते ही रहते हैं| आधा गोवा तो हमने परिवार के साथ बाहर ‘डिनर’ करने के क्रम में देख लिया है| बच्चों को इस बात की जानकारी रहती है कि आजकल कहाँ अच्छा खाना और सर्विस मिलती है|

अब मैं आज के इस आलेख के मुख्य विषय पर आता हूँ| जैसे मीरामर, केलेंगुट, वाघा आदि बहुत सी बीच तो हम गाड़ी में घूमते हुए पहले ही देख आए हैं| पिछले माह हम उत्तरी गोवा में ‘आरंबोल’ बीच गए थे, जो बहुत खूबसूरत बीच मानी जाती है, वहाँ हमने दो दिन का प्रवास किया था और वह बहुत अच्छा अनुभव रहा था|

इस बार हमारा प्रोग्राम बना दक्षिणी गोवा में ‘पेलोलिम’ बीच जाने का, जिसके बारे में मेरे बेटे ने बताया कि यह गोवा की सबसे खूबसूरत ‘बीच’ है| मैं यह भी बता दूँ कि हम गोवा में पिछले 3-4 वर्ष से हैं लेकिन मेरे बेटे यहाँ आने से पहले ही गोवा को खंगाल चुके थे|

हाँ तो, ‘पेलोलिम’ बीच के बगल में ही रुकने के लिए ‘आर्ट रिज़ॉर्ट’ है जिसमें बहुत खूबसूरत तरीके से समुद्र के किनारे ही ‘कॉटेज’ बनाए गए हैं और पेंटिंग्स का डिस्प्ले आदि, सभी कुछ अत्यंत सुरुचिपूर्ण है|

इन स्थानों की प्राकृतिक सुंदरता तो देखने और अनुभव करने के लिए ही होती हैं, मैं इनका वर्णन क्या कर पाऊँगा, लोगों ने यहाँ समुद्र में बैठक करने का खूब आनंद लिया और बोटिंग के लिए आसपास के कुछ स्थलों को भी देखा, जिनमें ‘बटरफ्लाई बीच’, ‘हनीमून बीच’ आदि शामिल हैं| एक अनुभव जो अब तक नहीं हो पाया था, वह है बोटिंग के दौरान ‘डॉल्फ़िंस’ को देखने का, इससे पहले कई स्थानों पर हम गए थे, परंतु नहीं देख पाए थे, यहाँ उनको भी देख लिया, यद्यपि उनके शरीर का कुछ भाग ही पानी से बाहर निकलते हुए देखा, परंतु अनेक बार देखा| ऐसा लगता है कि ‘डॉल्फ़िंस’ के कुछ परिवार उस क्षेत्र में थे|



कुल मिलाकर ‘पेलोलिम’ बीच पर दो दिन का यह प्रवास बहुत अच्छा अनुभव रहा और गोवा ‘विजिट’ पर आने वाले साथी इसको भी अपने गंतव्य स्थलों में शामिल कर सकते हैं और चाहें तो कुछ दिन यहाँ बिता सकते हैं|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पंजिम, मांडवी नदी और मीरामार!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


पिछले दिनों मैंने देश-विदेश के कुछ स्थानों के भ्रमण पर आधारित ब्लॉग लिखे, जिनका प्रारंभ मैंने लंदन से किया था और इस बात को भी रेखांकित किया था कि लंदन के जीवन में थेम्स नदी की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है!


मैं पिछले कई वर्षों से गोआ के, पंजिम में रह रहा हूँ और अभी तक यहाँ से संबंधित कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी है। इसका कारण यह भी है कि गोआ वैसे ही ट्रैवेल ब्लॉगर्स का हॉट फेवरिट है, बहुत ब्लॉग लिखे जाते हैं, यहाँ के बारे में। मेरा भी जब मन होगा, जब एक टूरिस्ट की तरह गोआ घूमूंगा तब शायद यहाँ के स्थानों के बारे में ट्रैवल ब्लॉग लिखूंगा। आज पंजिम, मीरामार और मांडवी नदी के बारे में बात कर लेता हूँ, जहाँ मुझे एक टूरिस्ट के रूप में नहीं बल्कि सामान्यतः कुछ कामों के लिए जाना पड़ता है।

जैसे नदी अथवा समुद्र वाले टूरिस्ट स्पॉट्स में सामान्यतः होता है, नाव अथवा शिप में यात्रा करना वहाँ की एक प्रमुख गतिविधि होती है, वह गोआ में, पंजिम में भी है। इसके अलावा यहाँ एक तरह से कई द्वीप हैं और कुछ स्थानों पर जाने के लिए सड़क मार्ग के मुकाबले जलमार्ग से जल्दी पहुंचा जा सकता है। गोआ में शिप में और अन्यत्र चलने वाले कैसिनो भी काफी लोकप्रिय हैं। वैसे यहीं के निवासी होने के नाते हम किसी विशेष अवसर पर अक्सर, सी-बीच पर स्थित किसी रेस्टोरेंट में भोजन के लिए चले जाते हैं।


अपने क्षेत्र पंजिम, गोआ के बारे में आज बात करते हुए आइए हम, पंजिम बस स्टैंड से मांडवी नदी के साथ-साथ मीरामार बीच की तरफ आगे बढ़ते हैं, मांडवी नदी का काफी चौड़ा पाट, समुद्र जैसा ही स्वरूप दिखाता है, नदी का नजारा वास्तव में देखने लायक है, इसमें अनेक आकर्षक नौकाएं और शिप दिखाई देते हैं, जिनमें चलने वाले कैसिनो भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर, कंपाल में गोआ वन विभाग द्वारा विकसित किया गया विशाल पार्क है, जहाँ टूरिस्ट लोग विश्राम कर सकते हैं और प्राकृतिक छटाओं को निहार सकते हैं। इसके बाद नदी के किनारे पर ही ‘कला अकादमी’ का विशाल भवन है, जो एक बड़ा आकर्षण का केंद्र है, यहाँ सांस्कृतिक गतिविधियां चलती रहती हैं। जिनमें जहाँ हल्के-फुल्के नाटक होते हैं, वहीं गंभीर प्रस्तुतियां भी होती हैं। इस संस्थान के बारे में मौका मिलेगा तो बाद में विस्तार से लिखूंगा।


यहाँ से कुछ दूर आगे चलने पर हम मीरामार बीच पर पहुंच जाते हैं, जो काफी टूरिस्टों को आकर्षित करती है, विशेष रूप से इस बीच के बाहर चौपाटी है, जैसे मुंबई में है, शायद सभी जगह समुद्र के पास टूरिस्टों को खाने-पीने का आकर्षण प्रदान करने के लिए होती हो, यहाँ विशेष रूप से रात में बहुत भीड़ होती है, जब टूरिस्ट लोग दिन भर की भागदौड़ के बाद चटपटे व्यंजनों तथा आइस-क्रीम और कुल्फी का आनंद लेते हैं। (वैसे फिलहाल चौपाटी की गतिविधियां बंद हैं, शायद बाद में कुछ नया निर्माण होने के बाद यह फिर से चालू होगी|)इससे कुछ दूर जाने पर दोना-पाओला का व्यू पाइंट भी एक आकर्षण का केंद्र है।
पंजिम, मांडवी नदी और मीरमार बीच के बारे में, आज इतना ही।


नमस्कार।
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