बिखरता रहा हूँ मैं!

मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त,
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं|

निदा फ़ाज़ली

कोई पेड़ प्यास से मर रहा है!

कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ ।

बशीर बद्र

केसरया आँचल भेजो न!

मोल्सरी की शाख़ों पर भी दिये जलें,
शाख़ों का केसरया आँचल भेजो न|

राहत इन्दौरी