तितली को गिरा कर देखो!

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो,
आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा|

कैफ़ भोपाली

किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए!

खुली हवाओं में उड़ना तो उसकी फ़ितरत है,
परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए|

वसीम बरेलवी

आईनों की तरह जड़े हैं पेड़!

अपना चेहरा निहार लें ऋतुएँ,
आईनों की तरह जड़े हैं पेड़|

सूर्यभानु गुप्त

कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़!

जिस जगह हैं न टस से मस होंगे,
कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़|

सूर्यभानु गुप्त

आँसुओं की तरह झडे हैं पेड़!

कौन आया था किससे बात हुई,
आँसुओं की तरह झडे हैं पेड़|

सूर्यभानु गुप्त

रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़!

उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़,
रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़|

सूर्यभानु गुप्त

अब शजर अच्छा नहीं लगता!

बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती,
ये वो शाख़ें हैं जिनको अब शजर अच्छा नहीं लगता|

जावेद अख़्तर

खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं!

हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार,
अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं|

निदा फ़ाज़ली

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले!

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले,
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

कहीं नहीं बचे!

आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनकी रचनाओं और अनूठे व्यक्तित्व के बारे में भी बातें की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया है कि किस प्रकार हमारी दुनिया प्राकृतिक संपदा और उससे जुड़े उपादानों के मामले में गरीब होती जा रही है –


कहीं नहीं बचे
हरे वृक्ष
न ठीक सागर बचे हैं
न ठीक नदियाँ
पहाड़ उदास हैं
और झरने लगभग चुप
आँखों में
घिरता है अँधेरा घुप
दिन दहाड़े यों
जैसे बदल गई हो
तलघर में
दुनिया
कहीं नहीं बचे
ठीक हरे वृक्ष
कहीं नहीं बचा
ठीक चमकता सूरज
चांदनी उछालता
चांद

स्निग्धता बखेरते
तारे
काहे के सहारे खड़े
कभी की
उत्साहवन्त सदियाँ
इसीलिए चली
जा रही हैं वे
सिर झुकाये
हरेपन से हीन
सूखेपन की ओर
पंछियों के
आसमान में
चक्कर काटते दल
नजर नहीं आते
क्योंकि
बनाते थे
वे जिन पर घोंसले
वे वृक्ष

कट चुके हैं
क्या जाने
अधूरे और बंजर हम
अब और
किस बात के लिए रुके हैं
ऊबते क्यों नहीं हैं
इस तरंगहीनता
और सूखेपन से
उठते क्यों नहीं हैं यों
कि भर दें फिर से
धरती को
ठीक निर्झरों
नदियों पहाड़ों
वन से!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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