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कृतघ्न संताप – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Ungrateful Sorrow’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

कृतघ्न संताप

भोर होते ही वह विदा हो गई
मेरे मस्तिष्क ने मुझे समझाने की कोशिश की –
‘ सभी कुछ माया है’।
मैंने क्रोध में उत्तर दिया:
‘यहाँ मेज पर रखा सिलाई का डिब्बा,
मुंडेर पर रखा वह फूलदान,
बिस्तर पर रखा, यह कढ़ाई किया हुआ हाथ का पंखा- –
सभी कुछ वास्तविक हैं।’

 

मेरे मस्तिष्क ने कहा: ‘फिर भी, एक बार और सोचो.’
मैंने फिर कहा: ‘ बेहतर है कि तुम अपने तर्क बंद करो।
यह कहानियों की पुस्तक देखो,
इसके पन्नों के बीच में हेयर-पिन लगा है,
जो यह बताता है कि बाकी हिस्सा अभी पढ़ना बाकी हौ;
अगर ये सभी ‘माया’ हैं,
तो फिर ‘वह’ ज्यादा अवास्तविक कैसे थी?

 

मेरा मस्तिष्क शांत हो गया।
मेरा एक मित्र आया और बोला:
‘जो कुछ भी अच्छा है, वह वास्तविक है
वह कभी भी अस्तित्वहीन नहीं होता;
पूरी दुनिया उसे हृदय में संभालकर रखती है
नेकलेस में लगे रत्न की तरह।’

 

मैंने क्रोध में उत्तर दिया: ‘तुम्हे कैसे मालूम?
क्या शरीर अच्छा नहीं होता? वह शरीर कहाँ गया? ‘

 

जैसे कोई शिशु क्रोध में अपनी मां को मारता है,
मैं इस दुनिया की हर उस वस्तु को ठोकर मारने लगा
जिसने मुझे आश्रय दिया था।
और मैं क्रोध में चिल्लाया:’ ये दुनिया धोखेबाज है।’

 

अचानक, मैं चौंक गया!
ऐसा लगा कि किसी ने मुझे फटकार लगाई:’ तुम- कृतघ्न! ‘

 

मैंने दूज के चांद को देखा
जो मेरी खिड़की के बाहर, झाऊ के पेड़ के पीछे छिपा था।
जैसे बिछड़ी हुई मेरी प्रिय मुस्कुरा रही है
और मेरे साथ लुका-छिपी का खेल रही है।

 

छितराये हुए तारों से सजी अंधेरे की गहराई के बीच से
एक झिड़की सुनाई दी: ‘जब मैं तुम्हे अपने तक पहुंचने देती हूँ, तुम इसे छलावा कहते हो,
लेकिन जब मैं छिपी रहती हूँ,
तब तुम कैसे इतनी आस्था के साथ, अपना विश्वास बनाए रखते हो?’

 

`
-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Ungrateful Sorrow

A friend arrived and says:
‘That which is good is real
it is never non-existent;
entire world preserves and cherishes it its chest
like a precious jewel in a necklace.’
I replied in anger: ‘How do you know?
Is a body not good? Where did that body go? ‘
Like a small boy in a rage hitting his mother,
I began to strike at everything in this world
that gave me shelter.
And I screamed:’ The world is treacherous.’
Suddenly, I was startled.
It seemed like someone admonished me:’ You- ungrateful! ‘
I looked at the crescent moon
hidden behind the tamarisk tree outside my window.
As if the dear departed one is smiling
and playing hide-and-seek with me.
From the depth of darkness punctuated by scattered stars
came a rebuke: ‘when I let you grasp me you call it an deception,
and yet when I remain concealed,
why do you hold on to your faith in me with such conviction? ‘

 

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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