मुझसे इक नज़्म का वादा है!

आज गुलज़ार साहब की एक लोकप्रिय नज़्म शेयर कर रहा हूँ, शायद आपने पहले भी सुनी होगी| गुलज़ार साहब का परिचय देने की तो शायद जरूरत ही नहीं है| लीजिए प्रस्तुत है यह नज़्म-

मुझसे इक नज़्म का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला हो,
यह न रात, न दिन

ज़िस्म जब ख़त्म हो
और रूह को जब सांस आए

मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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चल मेरे साथ ही चल!

हिन्दी फिल्मों के एक प्रमुख गीतकार और प्रसिद्ध शायर जनाब हसरत जयपुरी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| मुझे ध्यान आता है कि मेरे प्रिय नायक, निर्माता और निर्देशक- राज कपूर साहब की फिल्मों में जहां संगीतकार शुरू की बहुत सारी फिल्मों में शंकर – जयकिशन की जोड़ी होती थी, पुरुष गायक मुकेश जी और मन्ना डे जी होते थे, वहीं गीतकारों की भी एक जोड़ी थी, शैलेन्द्र जी और हसरत जयपुरी जी| शैलेन्द्र जी के बहुत से गीत मैंने शेयर किए हैं, शायद हसरत जयपुरी जी के कुछ कम गीत शेयर किए हैं, आज उनकी एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ|

हसरत जयपुरी जी की जो नज़्म मैं आज शेयर कर रहा हूँ, उसे जयपुर के गायकों ज़नाब अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की प्रसिद्ध जोड़ी ने गाया था| ऐसे ही याद आ रहा है कि आकाशवाणी जयपुर में रहते हुए मैंने वर्ष 1980 से 1983 के बीच बहुत बार इन गायक कलाकारों के साथ चाय पी थी, तब वे प्रोग्राम के सिलसिले में मेरे सहकर्मी रामप्रताप बैरवा जी के पास आते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है जनाब हसरत जयपुरी की लिखी और ज़नाब अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन द्वारा गायी गई यह प्रसिद्ध नज़्म –

चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
इन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल, चल

हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगें
दिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगें
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, चल

प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
तू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरों से निकल, चल

अपने मिलने पे जहाँ कोई भी उँगली न उठे
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे
छेड़ दे प्यार से तू साज़-ए-मोहब्बत पे ग़ज़ल, चल

पीछे मत देख न शामिल हो गुनाहगारों में
सामने देख कि मंज़िल है तेरी तारों में
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल, चल|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कभी पहले जैसे, मिला न हो!

डॉक्टर बशीर बद्र, आज की उर्दू शायरी में एक जाना-पहचाना नाम है| उनको विशेष रूप से शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाना जाता है| अनेक शेर उनके लोगों के ज़ेहन में छाए रहते हैं, जैसे ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो’, ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो’, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुमको डर नहीं लगता, बस्तियां जलाने में‘ आदि |

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र की यह ग़ज़ल –


कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो|

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो|

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं,
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो|

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से,
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो|

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे,
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो|

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे,

मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आख़िरी सांस तक बेक़रार आदमी!

Hitchhiking Astronaut

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र,
आख़िरी सांस तक बेक़रार आदमी|

निदा फ़ाज़ली

बिखर जाएगा, फिर रात का रंग!

तुम नहीं आओगे जब, फिर भी तो तुम आओगे,
ज़ुल्‍फ़ दर ज़ुल्‍फ़ बिखर जाएगा, फिर रात का रंग,
शब–ए–तन्‍हाई में भी लुत्‍फ़–ए–मुलाक़ात का रंग|

अली सरदार जाफरी

चारागर भी पुराना चाहिए था!

अपनी ग़ज़लों में एक खास तरह का ‘पंच’ लेकर आने वाले स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अक्सर अपने श्रोताओं को चौंका देते थे, ऐसी कोई बात अपनी शायरी में लेकर आते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की यह ग़ज़ल-



वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था,
आना न आना मेरी है मर्ज़ी, मगर तुमको बुलाना चाहिए था|

हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था,
मेरी आँखें कहाँ जी नम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था|

जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था,
हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चारागर भी पुराना चाहिए था|

मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था,
चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था|

तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था,
कि किसको किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था|

ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था,
तू मेरे साथ रहकर तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था|

क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था,
मेरी बर्बादी पे वो यह चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था|

बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था,
हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इससे कमाना चाहिए था|

अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चाहिए था,
उसी को याद रखा उम्र भर कि, जिसको भूल जाना चाहिए था|

मुझे बातें भी करनी थी उससे, गले से भी लगाना चाहिए था,
उसने प्यार से जब था बुलाया, हमें मर के भी जाना चाहिए था|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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वो भी हर किसी की तरह!

कभी न सोचा था हमने क़तील उसके लिए,
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह।

क़तील शिफाई

अजनबी की तरह!

किया है प्यार जिसे हमने ज़िंदगी की तरह,
वो आशना भी मिला हमको अजनबी की तरह।

क़तील शिफाई