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दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं!

आज श्री राजेश रेड्डी जी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, राजेश जी एक विख्यात शायर हैं और अनेक ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी ग़ज़लें गयी हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत श्री राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल-

दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं,
हम गुर्बत में बड़े हुए हैं|

मेरी मुस्कानों के नीचे,
ग़म के खज़ाने गड़े हुए हैं|

जीवन वो ज़ेवर है, जिसमें,
अश्क के मोती जड़े हुए हैं|


जा पहुँचा मंज़िल पे ज़माना,
हम सोचों में पड़े हुए हैं|

दुनिया की अपनी इक ज़िद है,
हम अपनी पर अड़े हुए हैं|

कुछ दुख हम लेकर आए थे,
कुछ अपने ही गढ़े हुए हैं|


जो ख़त वो लिखने वाला है,
वो ख़त मेरे पढ़े हुए हैं |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तेरे घर में आईना भी है!

आज मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ग़ज़ल की खूबसूरती इसमें होती है कि कम शब्दों में सादगी के साथ बड़ी बात कह दी जाती है और राहत इन्दौरी साहब इस काम में पूरी तरह माहिर थे|

लीजिए प्रस्तुत है ज़नाब राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल-

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है,
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है|

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ,
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है|

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|


जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन,
सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है?

ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन,
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दूसरा बनवास !

कैफ़ी आज़मी साहब हमारे देश के ऐसे मशहूर शायरों में शामिल थे, जिनका नाम शायरी की दुनिया में बहुत आदर के साथ लिया जाता है| आज उनकी जो नज़्म मैं शेयर कर रहा हूँ उसमें उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी यदि बाबरी मस्जिद का गिराया जाना देखते तो उनको कैसा महसूस होता|


लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह भावपूर्ण नज़्म-


राम बन-बास से जब लौट के घर में आए,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए|

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छः दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए|

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए|


धर्म क्या उनका था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए|

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर
तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए|


पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे
छः दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं!

शहरयार जी भारतवर्ष के एक नामी शायर रहे हैं, जिनके गीतों ने फिल्मों में भी स्थान पाया और प्रसिद्ध गजल गायकों ने भी उनकी ग़ज़लों को गाया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है शहरयार जी की यह ग़ज़ल-


ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं,
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं|

जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को,
तेरा दामन तर करने अब आते हैं|

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना,
हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं|

जागती आँखों से भी देखो दुनिया को,
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं|

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया,
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बड़ी दूर तक रात ही रात होगी!

डॉ बशीर बद्र जी आज की उर्दू शायरी की पहचान बनाने वाले प्रमुख शायरों में से एक हैं। उनके कुछ शेर तो जैसे मुहावरा बन गए हैं| जैसे आज की ग़ज़ल का एक शेर भी अक्सर दोहराया जाता है- ‘मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी’|

डॉ बशीर बद्र जी उर्दू शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए भी जाने जाते हैं| लीजिए आज इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी ,
नए लोग होंगे नई बात होगी |

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा,
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी |

चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी |

परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी,
चलो मय-कदे में वहीं बात होगी|

चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक,
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी |

जहाँ वादियों में नए फूल आए,
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी |

सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ,
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी |

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।


ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।


अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-


वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।


होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।


अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।

सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।


आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए!

आधुनिक उर्दू शायरी के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| डॉ बद्र शायरी में नया मुहावरा गढ़ने और  प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं|

इस ग़ज़ल की विशेष बात ये है कि इसका अंतिम शेर जैसे एक मुहावरा बन गया, लोग अक्सर इसका प्रयोग करते हैं, ये जाने बिना कि यह किस ग़ज़ल से है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए,
चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए|

मैं ख़ुद भी एहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूँ,
कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए|

अजब हालात थे, यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मुहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए|

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको,
हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए

मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा,
परिंदा आस्माँ छूने में जब नाकाम हो जाए|


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए|

आज के लिए इतना ही

नमस्कार|   

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कभी घर में सूरज उगा देर से – निदा फ़ाज़ली

एक बार फिर मैं अपने एक अति प्रिय शायर स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब बड़ी शिद्दत से भावों को महसूस करते थे और बड़ी कारीगरी से उन भावों को शेरों के माध्यम से व्यक्त करते थे|


लीजिए आज स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली इस रचना का आनंद लीजिए-


कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं,
मिला मुझको घर का पता देर से|
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे,
मगर जो दिया वो दिया देर से|

हुआ न कोई काम मामूल से,
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह|
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर,
कभी घर में सूरज उगा देर से|


कभी रुक गये राह में बेसबब,
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब|
हुए बंद दरवाज़े खुल-खुल के सब,
जहाँ भी गया मैं, गया देर से|

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है,
यही है जुदाई, यही मेल है|
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक,
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से |


सजा दिन भी रौशन, हुई रात भी,
भरे जाम लगराई बरसात भी|
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी,
जो होना था जल्दी हुआ देर से|

भटकती रही यूँ ही हर बंदगी,
मिली न कहीं से कोई रौशनी|
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी,
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत!

आज कैफ़ी आज़मी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| कैफ़ी साहब एक क्रांतिकारी शायर थे, वे मुशायरों की शान हुआ करते थे और फिल्मों के लिए भी उन्होंने अनेक यादगार गीत लिखे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह रचना –

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ|

रोज़ बसते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती में समा जाते हैं,
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं|


जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब,
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब|

नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है
दिल का मामूल है घबराना भी,
रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा
एक आदत है जिए जाना भी
|

क़ौस इक रंग की होती है तुलू
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की|

कोई कहता था समुन्दर हूँ मैं
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं
|

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ
कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह,
चन्द रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह|

राम कब लौटेंगे मालूम नहीं,
काश रावण ही कोई आ जाता
|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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इन दिलों में कौन सा दिल है !

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| लफ्जों की कारीगरी जो कविता/ग़ज़ल में होती है वह इसमें बाकायदा मौजूद है|
प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-


कहाँ ले जाऊँ दिल, दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मज़मा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम, मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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