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कल मेरी नींदों में छुपकर ,जाग रहा था जाने कौन!

आज मैं फिर से निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब मेरे प्रिय शायर रहे हैं, जहां उन्होने शायरी में अनेक प्रयोग किए हैं, वहीं कभी-कभी वे फकीर जैसे लगते हैं| कुछ पंक्तियाँ उनकी तो दिल में बसी रहती हैं, जैसे- ‘मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार, दिल ने दिल से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’,  ‘दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है’,  ‘गरज-बरस प्यासी धरती पर, फिर पानी दे मौला’ आदि-आदि|

 

आज की यह गजल भी अपने आप में अनूठी है| लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।

 

सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन।

 

जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन।

 

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन।

 

किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो !

आज मैं फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक स्व. निदा फाज़ली जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। निदा साहब बड़ी सादगी से बहुत बड़ी बात कह देते थे। यह गज़ल को भी उनकी इस अनूठी प्रतिभा का परिचय देती है।

इसमें बताया गया है कि ज़िंदगी में चुनौतियां तो आती ही रहेंगी, लेकिन साहस के साथ हम हर चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं।
लीजिए प्रस्तुत है यह बेहतरीन गज़ल-

 

 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो।

 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो ।

 

कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा,
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो।

 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।

ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।

अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।

होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।

अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।
सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।

आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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वो सांवली सी एक लड़की!

आज फिर से मैं अपने एक प्रिय शायर स्व. निदा फाज़ली जी की रचना शेयर कर रहा हूँ। उनकी रचनाओं में, गज़लों में, दोहों में एक अलग तरह की रवानी, सादगी, ताज़गी और मिट्टी का सौंधापन देखने को मिलता है।

कल मैने ‘मां’ के बारे में उनकी एक रचना शेयर की थी, बाद में याद आया कि यह रचना मैं पहले भी शेयर कर चुका था।
आज जो रचना शेयर कर रहा हूँ, वो इस बात की बानगी है कि एक सच्चा रचनाकार अपने परिवेश से इस क़दर जुड़ा होता है, कि मानो आस-पास जो कुछ है, वो उसके व्यक्तित्व का ही एक हिस्सा है। लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह रचना-

 

 

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की,
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है।
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है।

 

बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है।
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ,
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे,
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे।

 

मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ,
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं,
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं,
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे,
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे।

निदा फ़ाज़ली

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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फटे पुराने इक एलबम, में चंचल लड़की जैसी माँ!

आज एक बार फिर मुझे अपने एक प्रिय शायर स्व. निदा फाज़ली जी याद आ रहे हैं। उनकी रचनाओं में, गज़लों में, दोहों में एक अलग तरह की रवानी, सादगी, ताज़गी और मिट्टी का सौंधापन देखने को मिलता है।

आज मैं उनकी जो रचना शेयर कर रहा हूँ, वह ‘मां’ के बारे में है और मां के बारे में इस तरह की बातें निदा फाज़ली साहब ही कह सकते थे। लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह रचना-

 

 

बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ,
याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी माँ।

 

बांस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे,
आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।

 

चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा – मोहन  अली- अली,
मुर्गी की आवाज़ से खुलती, घर की कुण्डी जैसी माँ।

 

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन, थोड़ी थोड़ी सी सब में,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ।

 

बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें, जाने कहाँ गयी,
फटे पुराने इक एलबम, में चंचल लड़की जैसी माँ।

-निदा फ़ाज़ली

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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