मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं!

जो आधे में छूटी हम,
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं।

बिछे पाँव में क़िस्मत है,
टुकड़े तो मखमल के हैं।


बालस्वरूप राही