एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता!

किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूँ,
सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता|

वसीम बरेलवी

दीवारों में दीवारें न देख!

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

दुष्यंत कुमार