वहाँ भी!

कल मैंने हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर की एक कविता शेयर की थी तो सोचता हूँ कि आज आधुनिक हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर लूँ| वाजपेयी जी एक प्रमुख कवि होने के अलावा एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और भोपाल का ‘भारत भवन’ उनकी ही अमूल्य देन है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता–

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे|

अपनी आखिरी उड़ान भरने से पहले,
नीम की डाली पर बैठी चिड़िया के पास,
आकाशगंगा में आवारागर्दी करते किसी नक्षत्र के साथ,
अज्ञात बोली में उचारे गये मंत्र की छाया में
हम जायेंगे
स्वयं नहीं
तो इन्हीं शब्दों से-

हमें दुखी करेगा किसी प्राचीन विलाप का भटक रहा अंश,
हम आराधना करेंगे
मंदिर से निकाले गये
किसी अज्ञातकुलशील देवता की-

हम थककर बैठ जायेंगे
दूसरों के लिए की गयी
शुभकामनाओं और मनौतियों की छाँह में-


हम बिखर जायेंगे
पंखों की तरह
पंखुरियों की तरह
पंत्तियों और शब्दों की तरह-

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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