इतना तो दिया हो नहीं सकता!

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें,
रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

ख़ज़ाने निकल आए!

माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता,
मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए|

मुनव्वर राना

प्रतीक्षा- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट|
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ।

लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Waiting’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

प्रतीक्षा

जो गीत गाने के लिए मैं यहाँ आया था
वह आज तक नहीं गाया गया है।
मैंने अपने सभी दिन बिता दिए हैं
अपने वाद्य यंत्र पर तार चढ़ाने और उतारने में।
सही समय नहीं आया है,
और न शब्द ठीक से सजाए गए हैं;
केवल मेरे हृदय में व्यथा बनी रही है
कामनाएं करने की…
मैंने उसका चेहरा नहीं देखा है,
न उसकी आवाज को सुना है;
केवल मैंने उसकी सधी हुई पदचाप सुनी है
मेरे घर के सामने वाले मार्ग से
परंतु अभी दीप भी नहीं जलाया गया है
और मैं उसे अपने घर के भीतर नहीं बुला सकता;
उससे मिलने की आस में जीवित हूँ मैं;
परंतु यह मिलन अभी नहीं हुआ है।
-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Waiting

The song I came to sing
remains unsung to this day.
I have spent my days in stringing
and in unstringing my instrument.
The time has not come true,
the words have not been rightly set.
only there is the agony
of wishing in my heart
I have not seen his face,
nor have I listened to his voice.
only I have heard his gentle footsteps
from the road before my house
But the lamp has not been lit
and I cannot ask him into my house.
I live in the hope of meeting with him.
but this meeting is not yet.

-Rabindranath Tagore


नमस्कार
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यहाँ कौन है आने वाला!

मुंतज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं,
कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला|

अहमद फ़राज़

हुस्न मज़बूरे-इंतज़ार नहीं!

इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं,
हुस्न मज़बूरे-इंतज़ार नहीं|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लाज़िम उन्हें आना है!

मुझको इसी धुन में है हर लहज़ा बसर करना,
अब आए वो अब आए, लाज़िम उन्हें आना है|

जिगर मुरादाबादी

जीवन-भर अकुलाए!

ज्ञान ध्यान कुछ काम न आए,
हम तो जीवन-भर अकुलाए ।

पथ निहारते दृग पथराए,
हर आहट पर मन भरमाए ।

बालस्वरूप राही

उम्रभर हमने रास्ता देखा!

कौन था इन्तिज़ार किसका था,
उम्रभर हमने रास्ता देखा।

नक़्श लायलपुरी

आहटें, घबराहटें, परछाइयां !

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार,
आहटें, घबराहटें, परछाइयाँ|

कैफ़ भोपाली