अब ध्यान उधर भी नहीं जाता!

वो राहत-ए-जाँ है मगर इस दर-बदरी में,
ऐसा है कि अब ध्यान उधर भी नहीं जाता |

अहमद फ़राज़

घर-बार होना चाहिए!

ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें,
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए|

मुनव्वर राना

अजब तिश्नगी है और मैं हूं!

किसी मक़ाम पे रुकने को जी नहीं करता,
अजीब प्यास, अजब तिश्नगी है और मैं हूं|

कृष्ण बिहारी ‘नू
र’

नहीं मालूम कि जाना है कहाँ!

मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ,
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं|

राहत इन्दौरी

निगाह-ए-यार की तरह!

वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास,
फिरती है कोई शै निगाह-ए-यार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी

उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो!

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो|

बशीर बद्र

अब घर अच्छा लगता है!

नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है,
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है।

निदा फ़ाज़ली

हमेशा तेरी डगर में रहा!

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

गोपालदास “नीरज”

मुझे समझाये भी घबराये भी!

कौन बिछड़कर फिर लौटेगा, क्यों आवारा फिरते हो,
रातों को एक चांद मुझे समझाये भी घबराये भी|

मोहसिन नक़वी