Categories
Poetry

अपने शहर का रास्ता!

आज फिर से अपने एक पुराने कवि-मित्र को याद कर रहा हूँ| उनके बारे में एक बात यह भी कि मैथिली शरण गुप्त जी शायद उनके नाना थे, या शायद दादा रहे हों, यह ठीक से याद नहीं, वैसे यह रिश्ता महत्वपूर्ण भी नहीं है, ऐसे ही याद आ गया|

हाँ तो मेरे यह मित्र थे स्वर्गीय नवीन सागर जी, कविताओं के अलावा बहुत अच्छी कहानियाँ भी लिखते थे और उनकी कहानियाँ उस समय धर्मयुग, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं|


नवीन जी से शुरू की मुलाकातें तो अन्य मित्रों की तरह दिल्ली में ही हुईं, जब वे संघर्ष कर रहे थे, एक दो छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने दिल्ली में काम किया, बाद में वे मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी में अच्छे पद पर तैनात हो गए| मेरे कुछ संबंधी भी उस समय भोपाल में थे और उसके बाद मेरा यह प्रयास रहता था कि जब भी भोपाल जाता था, उनसे अवश्य मिलता था|

नवीन सागर जी का बहुत पहले, वर्ष 2000 में लगभग 52 वर्ष की आयु में ही दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, उस समय बहुत झटका लगा था| आज जब एक-एक करके कई वरिष्ठ साथी विदा हो रहे हैं, अचानक नवीन जी का खयाल आया|

अब और कुछ न कहते हुए, नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो शहर की संवेदनहीनता को रेखांकित करती है-

आधी रात के वक़्त अपने शहर का रास्‍ता
पराए शहर में भूला|


बड़ा भारी शहर और भारी सन्‍नाटा
कोई वहाँ परिचित नहीं,
परिचित सिर्फ़ आसमान
जिसमें तारे नहीं ज़रा-सा चॉंद,
परिचित सिर्फ़ पेड़
चिड़ियों की नींद में ऊँघते हुए,
परिचित सिर्फ़ हवा
रुकी हुई दीवारों के बीच उदासीन|


परिचित सिर्फ़ भिखारी
आसमान से गिरे हुए चीथड़ों से,
जहाँ-तहाँ पड़े हुए
परिचित सिर्फ़ अस्‍पताल क़त्‍लगाह हमारे,
परिचित सिर्फ़ स्‍टेशन
आती-जाती गाड़ियों के मेले में अकेला
छूटा हुआ रोशन|


परिचित सिर्फ़ परछाइयाँ:
चीज़ों के अँधेरे का रंग,
परिचित सिर्फ़ दरवाज़े बंद और मज़बूत।


इनमें से किसी से पूछता रास्‍ता
कि अकस्‍मात एक चीख़
बहुत परिचित जहाँ जिस तरफ़ से
उस तरफ़ को दिखा रास्‍ता|


कि तभी
मज़बूत टायरों वाला ट्रक मिला
जो रास्‍ते पर था,
ट्रक ड्राइवर गाता हुआ चला रहा था
मैं ऊँघता हुआ अपने शहर पहुँचा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
________________________________________

Categories
Uncategorized

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।


यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।


लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।



===================

Categories
Uncategorized

मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला!

आज गुलाम अली साहब का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे 1990 में रिलीज़ हुई फिल्म- आवारगी में फिल्माया गया था, गीत को लिखा है- आनंद बक्षी जी ने और संगीत अनु मलिक जी का है। कुल मिलाकर यह गीत गुलाम अली जी ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है और बहुत सुंदर बन पड़ा है।

गीत में जो कहा गया है वह तो स्पष्ट है ही कि किसी मनुष्य का पूरा जीवन, उसके सभी गुण कभी-कभी उसकी आवारगी की भेंट चढ़ जाते हैं। लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।

 

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं,
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं,
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ,
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ,
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है,
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है,
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था,
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था,
मुझे तक़दीर ने, तक़दीर का मारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****