वो फिर दर दर नहीं जाता!

वसीम’ उससे कहो दुनिया बहुत महदूद है मेरी,
किसी दर का जो हो जाए वो फिर दर दर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

मसअला बाहर नहीं जाता!

मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो,
शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

लौट के फिर घर नहीं जाता!

खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही,
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

अपने बाप के ऊपर नहीं जाता!

घरों की तर्बियत क्या आ गई टी-वी के हाथों में,
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता!

बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं,
किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

तअ’ल्लुक़ मर नहीं जाता!

वो मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता,
मगर इन एहतियातों से तअ’ल्लुक़ मर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

अकेला होने लगता है!

ये दिल बचकर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन,
जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है|

वसीम बरेलवी

अपनों में झगड़ा होने लगता है!

समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत,
पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है|

वसीम बरेलवी

और ‘कबीरा’ रोने लगता है!

मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की,
यही सब देखता है और ‘कबीरा’ रोने लगता है|

वसीम बरेलवी

बच्चा बिलखकर रोने लगता है!

किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर,
मिरे अंदर कोई बच्चा बिलखकर रोने लगता है|

वसीम बरेलवी