सुब्ह की तन्हाई-ए-सफ़र सोचो!

वसीम’ सुब्ह की तन्हाई-ए-सफ़र सोचो,
मुशाएरा तो चलो रात भर का हो जाए|

वसीम बरेल
वी

किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए!

खुली हवाओं में उड़ना तो उसकी फ़ितरत है,
परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए|

वसीम बरेलवी

और उधर का हो जाए!

उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में,
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए|

वसीम बरेलवी

जो किसी रहगुज़र का हो जाए!

हमारा अज़्म-ए-सफ़र कब किधर का हो जाए,
ये वो नहीं जो किसी रहगुज़र का हो जाए|

वसीम बरेलवी

उन्हीं की रौशनी जिनके चराग़!

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी जिनके चराग़,
मैं भी कुछ होता तो मेरा भी दिया होता कहीं|

वसीम बरेलवी

अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों!

अपनों को अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों,
और जब ऐसा किया मैं ने तो शरमाया नहीं|

वसीम बरेलवी

मिरा घर तो है दरवाज़ा नहीं!

कोई भी दस्तक करे आहट हो या आवाज़ दे,
मेरे हाथों में मिरा घर तो है दरवाज़ा नहीं|

वसीम बरेलवी

मैं तो मगर प्यासा नहीं!

जा दिखा दुनिया को मुझ को क्या दिखाता है ग़ुरूर,
तू समुंदर है तो है मैं तो मगर प्यासा नहीं|

वसीम बरेलवी  

प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं!

वो समझता था उसे पाकर ही मैं रह जाऊँगा,
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं|

वसीम बरेलवी

मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं!

खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं,
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं|

वसीम बरेलवी