हम दरिया का बहता पानी!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी को मैंने पहली बार आकाशवाणी, जयपुर में रिकॉर्ड की जा रहे एक कवि सम्मेलन में सुना था| उनकी यह पंक्तियाँ मुझे हमेशा याद रहती हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया|’

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत जिसमें कवि ने स्वाभिमान के भाव को बहुत सुंदर अभिव्यक्ति दी है–

हम दरिया का बहता पानी
जहाँ जहाँ से गुज़र गए हम
नहीं वहाँ वापस लौटेंगे ।

कई बार देखा
ललचाई नज़रों से
तट के फूलों ने
बहुत झुलाया
तन्वंगी पुरवा की
बाँहों के झूलों ने

हमसे मोह बड़ी नादानी
जिन आँखों से बिखर गए हम
नहीं वहाँ वापस लौटेंगे।

चाहो तो रखना
हमको अपनी घाटी से
गहरे मन में
साँझ ढले हम ही
महकेंगे नीलकमल बनकर
चिन्तन में

हम ज़िद्दी हैं, हम अभिमानी
जिन अधरों से उतर गए हम
नहीं वहाँ वापस लौटेगे


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कुछ हैं ज़माने के लिए!

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए,
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने-हँसाने के लिए|

निदा फ़ाज़ली

हम अपनी पर अड़े हुए हैं!

दुनिया की अपनी इक ज़िद है,
हम अपनी पर अड़े हुए हैं|

राजेश रेड्डी