अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है!

सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं,
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है|


मिर्ज़ा ग़ालिब

कुछ था तिरा ख़याल भी!

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी,
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी|

परवीन शाकिर

पलकों की हवा का होता!

साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती,
कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता|

गुलज़ार

मौसम को उस्ताद किया!

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही,
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया|

निदा फ़ाज़ली

पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया!

मंज़िल है उस महक की कहाँ किस चमन में है,
उसका पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया|

मुनीर नियाज़ी

ज़रा सी हवा के चलते ही!

खुल गए शहर-ए-ग़म के दरवाज़े,
इक ज़रा सी हवा के चलते ही|

मुनीर नियाज़ी

क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे!

उन चराग़ों में तेल ही कम था,
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे|

जावेद अख़्तर

मैदान साफ़ है, जानी!

हवा खुद अब के हवा के खिलाफ है, जानी,
दिए जलाओ के मैदान साफ़ है, जानी|

राहत इन्दौरी

हवाओं के पर कतरता है!

खुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते,
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।

वसीम बरेलवी