देखती रही खिड़की खुली हुई!

लट्टू की तरह घूम के चौराहा सो गया,
चुपचाप देखती रही खिड़की खुली हुई|

सूर्यभानु गुप्त

खिड़की से मुस्कराई हो!

कभी तो हो मेरे कमरे में ऐसा मंज़र भी,
बहार देख के खिड़की से मुस्कराई हो|

परवीन शाकिर

राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं!

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं,
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई|

परवीन शाकिर

खुशबू सी आ रही है इधर!

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,
खिडकी खुली है गालिबन उनके मकान की|

गोपालदास ‘नीरज’

खिड़की निकले कहीं मेहराब लगे!

अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म,
कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे|

निदा फ़ाज़ली

दीवारों में दीवारें न देख!

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

दुष्यंत कुमार