चिरागों को हवाओं से बचाया जाए!

जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं,
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए|

निदा फ़ाज़ली

बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ!

ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगी,
बदलियाँ, बरखा रूतें, पुरवाइयाँ|

कैफ़ भोपाली

क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे!

इन चिराग़ों में तेल ही कम था,
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे|

जावेद अख़्तर

कश्ती बादबानी दे गया!

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया|

जावेद अख़्तर

फिर-फिर वही सन्नाटा है!

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है|

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना