कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई!

मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई,
गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी|

सुदर्शन फ़ाकिर

शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई!

तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है,
मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई|

बशीर बद्र

हर बार तक़ाज़ा कौन करे!

ख़ाली है मिरा साग़र तो रहे साक़ी को इशारा कौन करे,
ख़ुद्दारी-ए-साइल भी तो है कुछ हर बार तक़ाज़ा कौन करे|

आनंद नारायण मुल्ला

जाम छलकता दिखाई दे!

वो लब कि जैसे साग़र-ए-सहबा दिखाई दे,
जुम्बिश जो हो तो जाम छलकता दिखाई दे|

कृष्ण बिहारी नूर

तंगी में उसको शराब क्या देते!

शराब दिल की तलब थी शरा के पहरे में,
हम इतनी तंगी में उसको शराब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

पिला देनी चाहिए!

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए,
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए|

राहत इंदौरी

तो पैमाने कहाँ जाते!

तुम्हारी बे-रुख़ी ने लाज रख ली बादा-ख़ाने की,
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते|

क़तील शिफ़ाई

वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है!

साक़ी से जो जाम ले न बढ़कर,
वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है|

अली सरदार जाफ़री