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न तुम हारे, न हम हारे!

लीजिए आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और अमर गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत भी 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से ही है- यह गीत लिखा है शैलेंद्र जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|


पिछले गीत की तरह इस गीत में भी, सीधे-सादे सरल हृदय लेकिन प्रेम से भरपूर देहाती व्यक्ति के मनोभावों को बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है|


एक बात और, आजकल मैनेजमेंट गुरू लोगों को ‘विन-विन’ का पाठ बड़े ग्राफिक्स के साथ और लंबी-चौड़ी व्याख्या करते हुए समझाते हैं, इस गीत में इस सिद्धान्त को बड़ी सरल भाषा में व्यक्त कर दिया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय
न तुम हारे, न हम हारे|
सफ़र साथ जितना था, हो ही गया तय
न तुम हारे, न हम हारे|

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|


याद के फूल को हम तो अपने, दिल से रहेंगे लगाए,
और तुम भी हँस लेना जब ये, दीवाना याद आए,
मिलेंगे जो फिर से मिला दें सितारे|
न तुम हारे, न हम हारे|
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|


वक़्त कहाँ रुकता है तो फिर, तुम कैसे रुक जाते
चाँद छुआ है आख़िर किसने, हम ही क्यूँ हाथ बढ़ाते
जो उस पार हो तुम, तो हम इस किनारे,
न तुम हारे, न हम हारे|
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय|

था तो बहुत कहने को लेकिन, अब तो चुप बेहतर है,
ये दुनिया है एक सराय, जीवन एक सफ़र है,
रुका भी है कोई किसीके पुकारे|
न तुम हारे, न हम हारे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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