ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है!

दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है,
ऐ जान-ए-जाँ ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सृजन का शब्द !

लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है श्रेष्ठ कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंध एवं संस्मरण लेखक और धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता| भारती जी ने इन सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता–

आरम्भ में केवल शब्द था
किन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने में
कि वह किसी से कहा जाय
मौन को टूटना अनिवार्य था
शब्द का कहा जाना था
ताकि प्रलय का अराजक तिमिर
व्यवस्थित उजियाले में
रूपान्तरित हो

ताकि रेगिस्तान
गुलाबों की क्यारी बन जाय
शब्द का कहा जाना अनिवार्य था।
आदम की पसलियों के घाव से
इवा के मुक्त अस्तित्व की प्रतिष्ठा के लिए
शब्द को कहा जाना था


चूँकि सत्य सदा सत्य है
आज भी अनिवार्य है
अतः आज के लिए भी शब्द है
और उसे कहा जाना अनिवार्य है।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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