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Poetry

याद केवल आदेश!

आज फिर से मैं अपने बहुत प्रिय गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे अनेक बार उनका स्नेह और सानिध्य प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ था|

आज के गीत में उन्होंने बताया है कि जब व्यक्ति दफ्तर के रूटीन के हवाले हो जाता है, तब वह जीवन में आनंद की बहुत सी स्थितियों से दूर हो जाता है|
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

झुके फाइलों पर अब, घुंघराले केश
बिसरे संदेश, याद केवल आदेश।

भोर ही निकलते हम
कांधे पर सूर्य लिए
दफ्तर से घर तक हम ढोते हैं शाम
अंधियारी गलियों में
दरवाजे पर अंकित
पढ़ा नहीं जाता फिर अपना ही नाम
मन नहीं भटकता अब परियों के देश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


तारे अब लगते हैं
चावल के दानों से
अनचाहे आस-पास बढ़ रहा है उधार
पहली तिथि, पन्द्रह दिन
पहले आ जाये तो
पन्द्रह दिन आयु घटाने को तैयार
फबता है साबुन से उजलाया वेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।

इन्द्रधनुष को देखे
कितने ही बरस हुए
अर्थ नहीं रखता कुछ प्रात का समीर
जाने कितने पीछे
छूट गया वंशीवट
खो गया कुहासे में यमुना का तीर
हम न किसी राधा के द्वरिका-नरेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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