Categories
Uncategorized

हाँफने लगा बूढ़ा आसमान लादे टूटे अणु की धूल- सोम ठाकुर

आज फिर से एक बार मैं अपने प्रिय कवियों मे से एक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत का विषय क्षेत्र काफी व्यापक है, आज की दुनिया जिसमें नफरत हावी है, एटम बम एक हथियार बन गया जिससे देश एक-दूसरे को डराते रहते हैं और पता नहीं कब किसी तानाशाह अथवा किसी भी राष्ट्राध्यक्ष का दिमाग फिर जाए और यह दुनिया विनाश के कगार पर पहुंच जाए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

चांदनी उछालता गुलाब

 

नज़रों में उग आए हैं बबूल
चेहरों पर धुएँ के नकाब,
मावस छूकर हमने याद किया
चाँदनी उछालता गुलाब।

 

ठहर गया है लंगड़ा आदमी
बारूदी वृक्ष के तले,
लहराई अंगारों की फसल
प्रेम-पत्र जेब में जले,
हाँफने लगा बूढ़ा आसमान
लादे टूटे अणु की धूल।

 

धार-धार खून उगलते चेहरे
दौड़ते सलीबों की ओर,
दौड़ती हुई खामोशी फाड़कर
उठा शोक -गीतों का शोर,
मृत्युवती सृष्टि ओढ़ने लगी
गर्दीले मौसम की झूल।

 

फिर वसंत -पीढ़ियाँ निगल कर
रेंगने लगा बहरा काल, 
हँसी -जड़े खिड़की दरवाज़ो पर
मकड़ी ने पूर दिए जाल, 
करता है तम दिन का आचमन
शांति -मंत्र हो चले फ़िज़ूल।

 

दैत्य -क्षण गुज़र गया बगल से
अंधापन बाँटता हुआ, 
कोई पैना आरा गिर गया
स्वप्न -देह काटता हुआ,
जाने किस घृणावंश में जन्मे
विष -बुझे दिमाग़ों की भूल।

– सोम ठाकुर

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****