कहीं जाँ से भी न जाओ!

इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जां से भी न जाओ,
वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूं दिखाओ|

अहमद फ़राज़

और भी ज़ख़्मों की जगह है!

इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह है,
अबरू की कटारी को दो, आब और जियादा|

ज़िंदगी के सताए हुए हैं!

इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाए हुए हैं,
मौत ने हमको बख्शा है लेकिन, ज़िंदगी के सताए हुए हैं|

जब चली सर्द हवा!

आज दिल की चोटों, दिल टूटने आदि को लेकर कुछ शेर, गीत पंक्तियाँ शेयर करूंगा, शुरुआत जोश मलीहाबादी जी के एक शेर से-



दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया|

कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे!

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे।

क़तील शिफाई