अब चाके-दिले-इन्सानियत को!

जब नाखूने-वहशत चलते थे, रोके से किसी के रुक न सके,
अब चाके-दिले-इन्सानियत को सीते हैं तो सीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

माज़ी फिर कुरेदा आपने!

मेरा माज़ी फिर कुरेदा आपने।
कर दिया हर ज़ख़्म ताज़ा आपने।

नक़्श लायलपुरी

बीमारी पुरानी और है!

चारागर रोते हैं ताज़ा ज़ख्म को,
दिल की बीमारी पुरानी और है|

अहमद फ़राज़

आंखों से लहू टपका !

आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है,
पहलू में मगर मेरे जख्मों का गुलिस्तां,
आंखों से लहू टपका दामन में बहार आई|

अली सरदार जाफ़री

रख-रखाव ऐसा था!

तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था,
कोई न जान सका, रख-रखाव ऐसा था|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

जो ज़ख्म मेरे दिल को!

मिलते रहे दुनिया से जो ज़ख्म मेरे दिल को,
उनको भी समझकर मैं सौग़ात, बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी

मगर जाने दे!

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको,
सोचता हूँ कि कहू तुझसे, मगर जाने दे।

नज़ीर बाक़री

कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे!

ऐ नये दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना,
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे|

नज़ीर बाक़री

नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला!

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,
हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो|

शहरयार