फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं!

दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं,
ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं|

जावेद अख़्तर

आज फिर कोई भूल की जाए!

अगले वक़्तों के ज़ख़्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाए|

राहत इन्दौरी

अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का!

उसका जो हाल है वही जाने,
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का|

जावेद अख़्त

मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं!

देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं,
मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया|

अहमद फ़राज़

अब के बरस भी यहीं से निकलेगा!

गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना,
जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

ज़ख़्म जो दिए हैं भरा नहीं करते!

ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते,
जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते|

अमजद इस्लाम अमजद

ज़ख़्म सी के देखते हैं!

धूप इतनी कराहती क्यूँ है,
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं|

राहत इन्दौरी

चोटें तो पी गये लेकिन!

लोग चोटें तो पी गये लेकिन,
दर्द करते हुये रक़म– टूटे|

सूर्यभानु गुप्त

अब चाके-दिले-इन्सानियत को!

जब नाखूने-वहशत चलते थे, रोके से किसी के रुक न सके,
अब चाके-दिले-इन्सानियत को सीते हैं तो सीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

माज़ी फिर कुरेदा आपने!

मेरा माज़ी फिर कुरेदा आपने।
कर दिया हर ज़ख़्म ताज़ा आपने।

नक़्श लायलपुरी