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13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे

एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए।

मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के हिसाब से, काल विभाजन का प्रयास शुरू में किया, लेकिन यह सिर्फ समय के हिसाब से घटनाओं को याद करने के लिए है, बेशक कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं तो सीधे तौर पर नौकरी से भी जुड़ी हैं। लेकिन यह तो ऐसी घटनाओं का इतिहास है, जो बड़े पैमाने पर भीतर घटित होती हैं। दिल्ली में रहते हुए तो अधिकांश महत्वपूर्ण घटनाएं, दफ्तर के दायरे से बाहर ही घटित हुई हैं।

दिल्ली में मेरे लिए दफ्तर के अलावा, तीन महत्वपूर्ण घटना-स्थल रहे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, आकाशवाणी और काव्य गोष्ठियां/ कवि सम्मेलन। एक विशेष उपलब्धि मेरे जीवन में यह रही कि जिन विशिष्ट कवियों को मैंने लाल किले से कविता-पाठ करते हुए सुना, दिल से उनकी सराहना की, बाद में उनमें से अनेक को हिंदुस्तान कॉपर तथा एनटीपीसी में कार्यरत रहते हुए अपने आयोजनों में आमंत्रित करने तथा उनसे अंतरंग बातचीत करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।

खैर अब ऐसा करता हूँ कि नौकरी बदल लेता हूँ। दिल्ली प्रेस में मैंने 3 वर्ष तक नौकरी की, इस बीच मैंने स्टाफ सेलेक्शन की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया, केंद्रीय नौकरियों में अवर श्रेणी क्लर्क के पद हेतु और इसमें मुझे सफलता भी प्राप्त हो गई। अब मैं अकबर इलाहाबादी साहब की इस सीख का पालन कर सकता था-

खा डबल रोटी, किलर्की कर, खुशी से फूल जा

और वास्तव में ऐसा हुआ कि मैं जो कि एक दुबला-पतला इंसान था, धीरे-धीरे फूलता चला गया।

खैर उद्योग भवन के एलिवेटिड ग्राउंड फ्लोर में, स्थापना-3 अनुभाग में मैं स्थापित हो गया। हमारे कमरे के ऊपर ही पहले मंत्री श्री टी.ए.पाई का कमरा था,जो बेसमेंट से ही लिफ्ट द्वारा अपने फ्लोर पर चले जाते थे। बाद में सरकार बदलने पर श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ आए, जो अक्सर लुंगी पहने हुए, सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए दिख जाते थे।

अब कुछ दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा की बात कर लेते हैं। वहाँ जाना प्रारंभ करते समय मेरी उम्र करीब 25 साल थी। एक युवा शायर वहाँ आते थे जो शायद 18-19 वर्ष के थे, कुंवर महिंदर सिंह बेदी सहर के शिष्य थे, नाम था- राना सहरी। उनकी शायरी चमत्कृत करने वाली थी, हम सब लोग उनकी जमकर तारीफ करते थे। बाद में उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हो पाई। जगजीत सिंह ने भी उनकी कुछ गज़लें गाई हैं। जैसे-

मंज़िल न दे चराग न दे, हौसला तो दे

तिनके का ही सही, तू मगर आसरा तो दे।

मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो ज़ुरूर,

लेकिन खमोश क्यों है तू,

कोई फैसला तो दे।

उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर इस तरह हैं –

कोई दोस्त है न रक़ीब है,

तेरा शहर कितना अज़ीब है।

मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल,

यहाँ सबके सर पे सलीब है।

वो जो इश्क था वो ज़ुनून था,

ये जो हिज़्र है ये नसीब है।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के ही एक कवि थे- शैलेंद्र श्रीवास्तव, रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी शादी हुई गाज़ियाबाद में, बारात में हमारे साथ चलने वालों में श्री विष्णु प्रभाकर भी शामिल थे। हमारे लिए उनकी उपस्थिति किसी मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अनुभव तो बहुत अधिक हैं, आगे भी इस बारे में बात होती रहेगी, अंत में एक कवि श्री गोविंद नीराजन के गीत की कुछ पंक्तियां यहाँ प्रस्तुत करना चाहूंगा –

अंधियारे सपनों के संग जिए।

 

मन को रास नहीं आई छाया,

अंगारों से रैन छुवाई है,

हम खुद से सौ योजन दूर हुए,

अपनों बारंबार बधाई है।

शहनाई को तरूण हृदय के

क्रंदन बांट दिए,

बंदनवार शिशिर घर बांध दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

 

परी कथा की राजकुमारी सा

कैदी सीमाओं का मेरा मन,

गीत-अगीत सभी पर पहरे हैं,

तट लहरों का सीधा आमंत्रण,

धुंधलाए जलयान

मुंदी पलकों में ढांप लिए

नाम हथेली पर लिख मिटा दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

बातें तो बहुत हैं, टाइम भी बहुत है, फिर बात करेंगे। अभी के लिए नमस्कार्।

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12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….

दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा।

खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक गतिविधियां समानांतर चलती रहीं, जैसे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, जो कि पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने है वहाँ शनिवारी सभा होती थी ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’, जिसमें साहित्यिक अभिरुचि वाले लोग एकत्रित होते थे और नए रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ करते थे। साहित्य सृजन में प्रोत्साहन की दृष्टि से यह शनिवारी सभा बहुत महत्वपूर्ण थी। बहुत से साहित्यकार किसी ज़माने में इसमें शामिल होते रहे हैं। अब पता नहीं यह सभा होती है या नहीं।

सोमवार को सोशल स्टडी ग्रुप की बैठक होती थी, जिसमें से बहुत से नेता उभरकर आए हैं। मैं सोमवार की सभा में कभी-कभी और शनिवारी सभा में अधिकतर जाता था।

इसके अलावा, नियमित रेल यात्रा में, जैसे भजन मंडली वाले अपने साथी खोज लेते हैं, ताश खेलने वाले भी अपनी मंडली बना लेते हैं, ऐसे ही कुछ कवि लोग थे, जो शाम को नई दिल्ली से शाहदरा लौटते थे। मैंने खुद को उनके नियमित श्रोताओं में शामिल कर लिया था।

वो अपनी कविताएं भी लिखते थे, जो ठीक-ठाक थीं, लेकिन कुछ बड़े कवि- शायरों की कविताएं भी पढ़ते थे, मगन होकर गाते थे। इनमें से एक-दो मुझे आज तक याद हैं-

ज़रूर एक नींद मेरे साथ ए मेहमान-ए-गम ले ले,

सफर दरवेश है, ऐ ज़िंदगी थोड़ा तो दम ले ले।

मैं अपनी ज़िंदगानी बेचता हूँ, उनके बदले में,

खुदा चाहे खुदा ले ले, सनम चाहे सनम ले ले।

ज़माने में सभी को मुझसे दावा-ए-मुहब्बत है,

कोई ऐसा नहीं मिलता जो मुझसे मेरे गम ले ले।

ये मेरी ज़िंदगी की आखिरी तहरीर है क़ैफी,

फिर इसके बाद शायद मौत, हाथों से कलम ले ले।

अब आखिरी शेर से ये मालूम होता है कि ये क़ैफी साहब की रचना है।

एक और रचना जिसका पाठ वो सज्जन करते थे, वह है-

बुझी हुई शमा का धुआं हूँ और अपने मरक़ज़ पे जा रहा हूँ,

इस दिल की दुनिया तो मिट चुकी है

अब अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ।

उधर वो घर से निकल चुके हैं

इधर मेरा दम निकल रहा है,

अज़ब तमाशा है ज़िंदगी का

वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ।   

इसके रचनाकर कौन हैं, मुझे मालूम नहीं है।

एक सज्जन थे राधेश्याम शर्मा जी, जो लायब्रेरी की शनिवारी सभा में आते थे और कभी-कभी ट्रेन में भी टकरा जाते थे, उनको ऑडिएंस की काफी तलाश रहती थी और ट्रेन में तो वह मिल ही जाती है। सो ट्रेन में टकराते ही वो बोलते थे, शर्माजी आप कविता सुनाइए। मैं उनसे कहता, ठीक है आप कविता सुनाना चाहते हैं, सुना दीजिए। और वे शुरु हो जाते। उनकी एक प्रिय कविता थी-

तुम्ही ने ज़िंदगी मुझको,

कि अपनी ज़िंदगी कहकर

नशीली आंख का देकर नशा-

मदहोश कर डाला,

मगर कुछ होश बाकी है,

मेरा भी फैसला सुन लो,

सच्चाई है कि मेरी ज़िंदगी की

ज़िंदगी तुम हो।

वो झूम झूमकर इसे गाते थे और काफी तालियां बजवा लेते थे।

दिल्ली प्रेस में काफी बड़े हॉल में हम लोग बैठते थे, एक सेल्समैन वहाँ थे, उन्होंने मेरा नाम रख दिया था- मास्टरजी!, वहाँ सब लोग मुझे इस नाम से ही बुलाते थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी आवाज़ पूरे हॉल में उस तरह पहुंचती है, जैसे क्लासरूम में शिक्षक की आवाज़ पहुंचती है।

खैर दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान ही एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था-

खंडहर गीत

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,

इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,

युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,

टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।

था कभी जो महल, बन वही अब गया,

बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए। 

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए

उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,

भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम

ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,

अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा

मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी

एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,

देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका

अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,

स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,

ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

आज की कथा यहीं विराम लेती है।

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11. हम शंटिंग ट्रेन हो गए

पीताम्बर बुक डिपो में कुल मिलाकर मैं एक साल तक रहा, उसके बाद मैंने फैसला कर लिया कि अब यहाँ अधिक समय तक नहीं रहूंगा। अब तक इतना आत्मविश्वास आ गया था कि मैं इससे बेहतर काम खोज सकता हूँ। और हुआ भी ऐसा, यह काम छोड़ने के बाद एक महीने के अंदर ही दिल्ली प्रेस, झंडेवालान में मुझे काम मिल गया, वेतन 100 रु. से बढ़कर हुआ 150 रुपये।

दिल्ली प्रेस में काम था सर्कुलेशन विभाग में, लाला विश्वनाथ की इस कंपनी में सरिता, मुक्ता, कैरेवान (अंग्रेजी में), चंपक आदि पत्रिकाएं छपती थीं। हमारा काम था ग्राहकों के ऑर्डर में कमी और वृद्धि का रिकॉर्ड रखना और उसी हिसाब से पत्रिकाएं भिजवाने की व्यवस्था करना।

दिल्ली प्रेस में, मैं लगभग 3 साल रहा और यहाँ पर मेरी प्रगति रु. 150/- प्रतिमाह के वेतन से 240/- प्रतिमाह तक हुई। यहाँ पर मेरा एक भामाशाह भी था, जिसकी मुझे अक्सर ज़रूरत रही है शुरू के दिनों में, राजेंद्र नाम था उसका, दफ्तर में चपरासी था लेकिन घर से उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी अतः मैं समय-समय पर उससे सहायता एवं अनुदान प्राप्त करता रहता था।

दिल्ली प्रेस के सर्कुलेशन विभाग में प्रबंधक थे श्रीमान पी.सी.गुप्ता, जो प्रसन्न कम ही रहते थे, शायद कुछ बीमारी उनको थी, कभी पूछा नहीं उनसे, क्योंकि वहाँ बहुत से कर्मचारी थे, मैं एक कनिष्ठ कर्मचारी था और उनसे कोई घनिष्ठता नहीं थी।

खैर एक-दो दिन गुप्ता जी ऑफिस नहीं आए और फिर खबर मिली कि उनकी मृत्यु हो गई है। उनका घर पहाड़ गंज में था, जो ऑफिस से पास ही था, सो ऑफिस की शोक-मंडली उनके घर गई। मुझे तो आज तक ऐसे में शोक प्रकट करने की कला नहीं आती, मैं चुपचाप बैठने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। खैर हमारी मंडली के पास एक अनुभवी बुज़ुर्ग थे, सो संवाद की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने ले ली थी, उधर गुप्ताजी के पिताजी थे जो अपने बेटे के शोक में आए लोगों से मिल रहे थे।

गुप्ताजी के घर पर हमारी मंडली के बुज़ुर्ग नायक उनके पिता से पूछते जा रहे थे कि क्या हुआ, कैसे हुआ और गुप्ताजी के पिता यंत्रवत ज़वाब देते जा रहे थे। इतने में उनके पड़ौसी आए और उन्होंने पूछा- ‘गुप्ताजी क्या हो गया?’ अब देखा जाए तो यह कोई सवाल था? सब जानते थे कि उनके बेटे की मौत हो गई है और इसी संबंध में पूछताछ वहाँ चल रही थी। लेकिन उस पड़ौसी के पूछे इस छोटे से सवाल में कुछ ऐसा था कि अब तक यंत्रवत ज़वाब देते जा रहे बड़े गुप्ताजी फूट-फूटकर रो पड़े। देखा जाए तो बोले जा रहे शब्दों में ऐसा कुछ नहीं होता, असली संवेदना तो हमारे संबंध में होती है, जिसमें कुछ कहे बिना भी सब कुछ कहा जा सकता है।

खैर हुआ इस तरह कि, दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान शाहदरा से झंडेवालान तक यह यात्रा 3 वर्षों तक चली। सुबह आते समय मैं दिल्ली जं. से झण्डेवालान तक अधिकतर पैदल आता था और शाम को नई दिल्ली से ही ट्रेन पकड़ लेता था। बाद में कई बार सोचा कि सुबह वाली यह नियमित यात्रा काफी लंबी हुआ करती थी।

दिल्ली प्रेस एक ऐसा स्थान है, जहाँ से बहुत से बड़े साहित्यकार निकले, प्रारंभ में, संघर्ष के दिन उन्होंने यहाँ बिताए थे, वैसे मैं तो था ही सर्कुलेशन विभाग में,साहित्य से जुड़ा होने का कोई भ्रम भी मन में नहीं था। दिल्ली प्रेस का वैसे बिक्री के लिए अलग ही एजेंडा है, जहाँ महिलाओं की पत्रिकाएं सिलाई-बुनाई-कढ़ाई पर केंद्रित थीं, वहीं साहित्य से जुड़ी होने का दावा करने वाली पत्रिकाएं हिंदू धर्म के छद्म विरोध को अपना हथियार बनाती थीं। वहाँ इस प्रकार के लेख अक्सर छपते थे- ‘हिंदू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास’।

इस सेवा के दौरान ट्रेन में दैनिक यात्रा के अनुभव भी बहुत रोचक हैं, जिन्हें बाद में शेयर करूंगा।

खैर साम्यवाद में ऐसी अवधारणा है कि मेहनतकश मिलकर शोषण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन मैं देखता हूँ कि ‘दिल्ली प्रेस’ जैसी संस्थाएं तो शोषण के ही महाकेंद्र हैं, महानगरों में ऐसे संस्थानों की भीड़ है, और कर्मचारीगण सुबह से ही बस,ट्रेन और अब मैट्रो भी, की लाइनों में लग जाते हैं, जीवन-यापन की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ने के लिए।

उन दिनों लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था-

 

महानगर का गीत

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,

सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।

छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,

सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,

सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,

लड़ने को व्यक्तिगत समर।

 

व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,

एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,

हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।

कर्ज़ सी चुका रहे उमर।   

 

मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,

उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,

बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,

क्रांति चेतना गई बिखर।    

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10. रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें

 ऐसा हुआ कि आगे पढ़ाई जारी रखने की तो गुंजाइश नहीं बची थी और तुरंत कोई काम तलाशने की भी ज़रूरत थी। उन दिनों हमारे पड़ौस में ही एक सज्जन रहते थे, जो व्यवसायी थे और उनके कुछ संपर्क थे, सो उन्होंने एक संदर्भ दिया और उनकी सलाह पर मैंने चांदनी चौक में जाकर संपर्क किया, और मुझे काम मिल गया, अब उसे रोज़गार कहें या अर्द्ध रोज़गार, कुछ इस प्रकार था-

नियोजक- पीताम्बर बुक डिपो, तेजराम पीताम्बर लाल का अंकगणित मशहूर रहा है, सभी स्कूलों में उनकी ही गणित की किताब लगती थी, शायद अभी भी लगती हो। उनके ही बेटों ने स्कूली पुस्तकों का व्यवसाय आगे बढ़ाया। चांदनी चौक में कटरा नील के पास ही कोई अहाता था शायद, पतली सी गली से अंदर जाकर, चौकोर से अहाते में शायद 7-8 दुकानें थीं। इनमें से दो पीताम्बर बुक डिपो के पास थीं। 

मेरा काम था किताबों की खुदरा बिक्री के मामले में बिल आदि बनाना। तनख्वाह थी 100 रु. महीना। ओवरटाइम आदि मिलाकर महीने में करीब 125 हो जाते थे। ओवरटाइम के लिए अक्सर रविवार को लाला के पूसा रोड स्थित मकान पर जाना होता था।

उस समय शाहदरा से दिल्ली आने के लिए 6 रुपये में रेल यात्रा का मासिक पास बनता था। इस प्रकार ये पहला रोज़गार या अर्द्ध रोज़गार प्रारंभ हुआ।

उसी अहाते में, हमारे एकदम बगल में कपड़े की दुकान थी, जहाँ काफी गतिविधि रहती थी। उनके एजेंट बाहर सड़क से ग्राहकों को तैयार करके लाते थे और फिर बड़े शिष्टतापूर्ण अंदाज़ में उन्हें बताया जाता था कि अभी-अभी ताज़ा माल आया है और ये कि हम तो एक्स्पोर्ट करते हैं,बहुत बढ़िया क्वालिटी का कपड़ा है, कहीं और नहीं मिलेगा। खैर अगर ग्राहक कपड़ा ले गया और वह लोकल है, तो यह निश्चित होता था कि वो दुबारा शिकायत लेकर आएगा, और उस समय ये सुसभ्य और शिष्ट विक्रेता बंधु दूसरी भूमिका में तैयार रहते थे, और सीधे यह बोल देते थे कि आप हमारे यहाँ से कपड़ा नहीं लेकर गए हैं।

खैर शाहदरा के सीमित दायरे से बाहर निकलकर आए, तो जीवन के बहुत से रंग देखने को मिले। पीताम्बर बुक डिपो की ही बात करें तो उनका अधिकतम व्यवसाय, एक प्रकाशक के रूप में थोक बिक्री का था। इसके लिए उन्होंने कुछ सेल्स रिप्रेजेंटेटिव रखे हुए थे, जो दौरा करते रहते थे और वहाँ दूसरे शहर में जाकर, उन्होंने क्या किया उसकी दैनिक रिपोर्ट डाक से भेजते थे।

एक बार ऐसा हुआ कि एक विक्रय प्रतिनिधि की सात दैनिक रिपोर्टें एक साथ आ गईं। उनमें से 3 रिपोर्टें तो उन दिनों की थी जो बीत चुके थे, एक रिपोर्ट जो दिन चल रहा था उसकी थी और तीन रिपोर्टें आने वाले दिनों की थीं। असल में उन महोदय ने किसी को आने वाले सात दिनों की वे रिपोर्टें लिखकर दीं और उससे कहा था कि नंबर से हर रोज़, एक-एक रिपोर्ट डाक में डालते जाना, लेकिन वह मूर्ख, उनकी क्रिएटिविटी को नहीं समझ पाया और उसने सभी रिपोर्टें एक साथ डाक में डाल दीं।

एक और घटना याद आ रही है। सरकारी स्कूलों में वैसे तो सभी किताबें सरकार द्वारा निर्धारित होती हैं, बस कुछ मामलों में शिक्षकों को छूट होती है। एक ऐसा ही मामला था। स्कूल में आठवीं कक्षा में व्याकरण की पुस्तक शिक्षक अपनी इच्छा से चुन सकते थे। एक स्कूल था जिसमें आठवीं कक्षा के चार सेक्शन थे, प्रत्येक सेक्शन में 50 बच्चे। एक शिक्षक ने हमारे यहाँ बताया कि वे हमारी व्याकरण की पुस्तक अपने यहाँ लगवा देंगे। 200 बच्चों के लिए किताब लगवाने पर, 25% कमीशन के रूप में 50 पुस्तकों का मूल्य वे एडवांस में हमसे ले गए। लेकिन स्कूल की आठवीं कक्षा के चार सेक्शंस में चार शिक्षक थे। एक-एक शिक्षक ने अलग-अलग प्रकाशक को चारों सेक्शंस में पुस्तक लगवाने की बात कहकर 50 पुस्तकों की कीमत कमीशन के रूप में प्राप्त कर ली। इसके बाद प्रत्येक सेक्शन में अलग-अलग प्रकाशक की पुस्तक लग गई, प्रत्येक शिक्षक ने 50 पुस्तकों का मूल्य कमीशन के रूप में प्राप्त कर लिया और उन चारों प्रकाशकों ने मुफ्त में अपनी 50-50 पुस्तकें स्कूल में प्रदान कर दीं। इस तरह मालूम होता है कि हमारे यहाँ शिक्षक भी कितने महान हैं। अगर सभी पुस्तकें चुनने के अधिकार उन्हें मिल जाए तो फिर भगवान ही मालिक है।

अब कमीशनखोरी के इस प्रसंग के बाद आज आगे कुछ नहीं कहूंगा।

खैर अपने इस अर्द्ध रोज़गार की अवधि में लिखी गई एक कविता शेयर कर रहा हूँ-

(हीन ग्रंथि- इंफीरिओरिटी कॉम्प्लेक्स)

 

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की

ताक पर धरें,

आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की

फाइलें भरें।

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,

सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,

बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।

रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

 

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,

फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।

खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।

रोज़गार दफ्तर की

फाइलें भरें।

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9. झूमती चली हवा

लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं।

मैं यह भी बता दूं कि यहाँ अपनी निजी ज़िंदगी का विवरण देना मेरा उद्देश्य नहीं है। पात्र यदि कहीं आए हैं तो वे या तो पृष्ठभूमि के तौर पर आए हैं, या ऐसे पात्र आए हैं जो अब मेरे जीवन में नहीं हैं। कहानी की नायक परिस्थितियां ही हैं।

आज अपने मुहल्ले से आगे बढ़कर, अपने क्षेत्र- शाहदरा की कुछ बात कर लेते हैं। इस शहर में क्या प्रमुख तौर पर  था? एक तो मेरे दोनों स्कूल ही थे- गौशाला वाली सनातन धर्म प्राथमिक पाठशाला और बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जो उस समय तक तो ‘आदर्श’ था जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की।

हायर सैकेंडरी परीक्षा पास करने तक, शाहदरा की सीमाओं तक ही मेरी गतिविधियां सीमित थीं, उसके बाद दो वर्ष तक गाज़ियाबाद आना-जाना भी शामिल हो गया था और उसके बाद आया दिल्ली, मतलब यमुना के इस पार नियमित यात्रा का सिलसिला।

शाहदरा या कहें कि यमुना पार का इलाका अनेक मामलों में उस समय तक बहुत पिछड़ा हुआ था, अब भी शायद काफी हद तक हो। उस समय तक यमुना पर एक ही पुराना पुल था, जो रेल और सड़क यातायात दोनों के काम आता था।

विकास को भी पहुंचने के लिए प्रभावी संपर्क/यातायात साधनों की ज़रूरत होती है। मुझे याद है कि पुराने यमुना ब्रिज होकर बस से दिल्ली ( मेरे लिए या सभी यमुना पार वासियों के लिए, यमुना के इस पार का इलाका ही दिल्ली है) पहुंचने के लिए अक्सर ब्रिज पार करने में ही एक घंटा लग जाता था। अब सड़क के कई रास्ते खुल चुके हैं, मैट्रो भी जीवन में काफी गति ला चुकी है, लेकिन आज भी जब ट्रेन से शाहदरा और दिल्ली के बीच यात्रा करें, तो कितना समय ब्रिज पर लगेगा, कह नहीं सकते।  

खैर कुछ इलाके जो शाहदरा के नाम से याद आते हैं, वे हैं- छोटा बाज़ार, बड़ा बाज़ार, फर्श बाज़ार, राधू सिनेमा, कृष्णा नगर आदि।

उस समय वहाँ कच्चे मैदान काफी होते थे, सड़क के दोनों तरफ भी काफी दूर तक कच्ची ज़मीन होती थी, जब आंधी आती थी, तब धूल-मिट्टी सप्लाई करने में इन कच्चे मैदानों का भरपूर योगदान होता था। धीरे-धीरे निर्माण होते गए, नगर निगम के माध्यम सड़क किनारे पक्की पटरियों का निर्माण होता गया और हाँ इस बहाने पार्षद भी  कुछ अमीर होते गए। लेकिन धूल-मिट्टी का संकट अब पहले जैसा नहीं रह गया।

शाहदरा को जब याद करता हूँ, तब वहाँ की एक गतिविधि जो काफी याद आती है, वह है रामलीला। वहाँ पर दो रामलीला होती थीं, छोटी और बड़ी रामलीला। छोटी रामलीला हमारे घर से पास पड़ती थी। वहाँ बड़े बाजार में कुछ कपड़े का व्यवसाय करने वाले सेठ थे, जो इन दोनों रामलीलाओं के कर्ता-धर्ता होते थे। लीला तो खैर 10-11 दिन तक दोनों मैदानों में होती ही थीं, सबसे बड़ा आकर्षण होती थीं आखिर के दिनों में निकलने वाली झांकियां, जिनमें प्रशंसा बटोरने के लिए दोनों रामलीला कमेटियां जी-जान लगा देती थीं। पूरी रात झांकियां निकलती थीं, वैसे भी जिस कमेटी का नंबर पहले आ जाए, वह अपनी झंकियों को आगे बढ़ाते ही नहीं थे, ताकि दूसरी कमेटी का नंबर जल्दी न आए।

झांकियों में प्रसंग पुराने ज़माने के होते थे और गाने आधुनिक बजते रहते थे, जिनसे मिलकर कई बार अजीब प्रभाव पड़ता था। एक रामलीला के मुख्य संचालक थे चुन्नीलाल जी। दूसरी रामलीला वालों ने चीर-हरण की एक झांकी बनाई और उसका नाम रखा-‘चुन्नी चोर’।  

अब अपनी प्रिय एक बात।  राज कपूर और मुकेश मेरी यात्रा में हर कदम मेरे साथ हैं। मुझे मुकेश जी का गया यह गीत भी बहुत पसंद है-

झूमती चली हवा, याद आ गया कोई

खो गई हैं मंज़िलें, मिट गए हैं रास्ते,

गर्दिशें ही गर्दिशें अब हैं मेरे वास्ते

और गर्दिशों में आज फिर बुला गया कोई।  

मेरे एक कवि मित्र को भी मुकेश बहुत पसंद हैं। उन्होंने ऊपर उल्लिखित गीत के बारे में अपना संस्मरण सुनाया, कि वे बचपन में घर के बाहर चारपाई पर लेटे थे, जब म्युंसिपैलिटी वाले गली के उनके प्रिय कुत्ते को उठाकर ले गए, और उस समय रेडियो पर गीत की ये पंक्तियां आ रही थीं-

चुप हैं चांद-चांदनी, चुप ये आसमान है,

मीठी-मीठी नींद में सो रहा जहान है,

और ऐसे में मुझे फिर रुला गया कोई।

अब यहीं समाप्त करते हैं, हमेशा सीरियस होना ही ज़रूरी तो नहीं है।

अगली बार से नौकरी शुरु करेंगे।

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8. कालेज के दिन

 

जैसी बात हुई थी, अब बारी है कालेज के दिनों के बारे में बात करने की। बाबूराम स्कूल में 6 साल रहा और अच्छा खासा जुड़ाव रहा स्कूल से, इसलिए स्कूल के बारे में, वहाँ के शिक्षकों के बारे में भी मैंने कुछ बात की। यहाँ स्पष्ट कह दूं कि कालेज से मेरा कोई जुड़ाव नहीं हो पाया और वहाँ से मैंने कुछ हासिल भी नहीं किया, इसलिए कालेज की नहीं, कालेज के दिनों की बात करूंगा।

जैसा मैंने बताया था, हायर सैकेंडरी परीक्षा मैंने जैसे-तैसे सैकिंड डिवीज़न में पास की थी, शायद यही कारण था कि 12 वीं कक्षा के लिए मैंने गाजियाबाद के महानंद मिशन इंटर कालेज में प्रवेश लिया और वहाँ से इंटर परीक्षा जैसे-तैसे पास की। (उस समय दिल्ली बोर्ड की हायर सैकेंडरी 11 वीं कक्षा तक होती थी अतः यूपी से बीएससी करने के लिए पहले इंटर पास करना ज़रूरी था, क्योंकि वहाँ बीए कोर्स 2 वर्ष का था जबकि दिल्ली में 3 वर्ष का था)।

यहाँ एक विशेष कारण, जो इससे पहले की एक-दो कक्षाओं में भी पूरी तरह लागू था, वह बताना उचित होगा। मेरी आंखें काफी कमज़ोर हो गई थीं और मैं आदतन अंतिम सीट पर बैठता था, वैसे आगे की सीट पर बैठकर भी मैं बोर्ड पर जो कुछ लिखा जा रहा था, वह नहीं पढ़ पाता था, इस प्रकार कक्षा में मुझे सिर्फ ऑडियो ही मिल पाता था, जो पढ़ाई में बराबर चलने के लिए काफी नहीं था। और मैंने घर पर कभी इस बारे में बताया भी नहीं।

इंटर की पढ़ाई की दौरान मुझे टॉयफाइड बुखार हुआ, मैं 2-3 दिन अस्पताल में रहा और वहाँ पर ही नेत्र परीक्षण करके मुझे चश्मा लगाने की सलाह दी गई, और इसके बाद, कई वर्षों के अंतराल के बाद, मैं कक्षा में पूरी तरह उपस्थित रहता था।

खैर इंटर कालेज अलग था, जहाँ से मैंने जैसे-तैसे इंटर परीक्षा पास की और अब मुख्य कालेज में आ गया था, दो वर्ष का बीएससी कोर्स करने के लिए।

लेकिन यह भी बता दूं कि पिताश्री, जिनके कानों में बहुत समय से समस्या थी, अब उनको बहुत कम सुनाई देने लगा था। अब सेल्स के काम में यह तो एकदम नहीं चल सकता कि आप बोलते जाओ और दूसरे की बात ही न सुनो। सो कमाई एकदम बंद हो गई थी, और घर में क्योंकि मैं ही उनके सबसे नज़दीक था, अतः मुझसे कहा जाता था कि ‘अपने बाप से पैसे मांग’!

कभी यह भरोसा नहीं होता था कि मेरी अगले महीने की फीस जमा होगी या नहीं। एक घटना सुना दूं, जो भुलाए नहीं भूलती। मेरे पिता ने बहुत से बड़े व्यापारियों के साथ काम किया था, उनमें से किसी से उन्होंने मेरी फीस के बारे में बात की, उसने कहा कि वह खुद आकर मेरी फीस जमा करेगा। मेरे पिताश्री ने कालेज में इंतज़ार करने के लिए कहा और वो उस व्यापारी को साथ लेकर आ रहे थे। बहुत देर हो गई उनको गाज़ियबाद आने में, कालेज की छुट्टी हो गई और मैं घर वापस आ गया। वह पहला अवसर था जब घर लौटकर मेरे पिता ने मुझे बुरी तरह डांटा था।

खैर मेरे पिता ने हिम्मत नहीं हारी और वे मुझे पहाड़ गंज में किसी व्यापारी के घर ले गए। वह भी कीमत वसूलने में एक्सपर्ट था, उसकी दो बेटियां शायद दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं। उसने उस दिन उनको पढ़ाने के लिए कहा और मेरे पिता को फीस के पैसे दे दिए। जब मैं शरमाता हुआ उन लड़कियों को पढ़ा रहा था, तब वे दोनों मेज़ के नीचे मेरे पैर पर पैर मार रही थीं।

उस व्यापारी ने पैसा देते हुए यह शर्त रखी थी कि मैं हर रोज़ पढ़ाने के लिए आऊंगा। मैं यह सोच रहा था कि हर रोज़, शाहदरा से पहाड़ गंज पढ़ाने के लिए कैसे आऊंगा। घर पहुंचकर पिताश्री ने कहा कि ‘कोई ज़रूरत नहीं है वहाँ जाने की, मैं बहुत बिज़नस उसको दे चुका हूँ। अब इस मामले में मैं तो खैर मज़बूर था, इससे पहले कभी मैं अकेला पहाड़गंज गया भी नहीं था।

अब एक वाकया और याद आ गया। इससे पहले पिताश्री ने मुझे शाहदरा में ही, सर्कुलर रोड पर ट्यूशन दिलवाई थी, दो लड़कों को मैं वहाँ पढ़ाता थ, शायद 7-8 कक्षा के थे। ट्यूशन दिलाते समय पिताश्री ने मुझसे कहा था कि मैं उन बच्चों के पिता से ठीक से बात करूं, वकील है वह, कभी काम आ सकता है। खैर इस ट्यूशन के दौरान ही उन सज्जन ने मुझसे कहा- मास्टर जी, कभी हमको भी पढ़ा दीजिए। मैंने कहा क्या बात करते हैं, आप तो वकील हैं! वो बोले आपको गलतफहमी हो गई है जी, मेरा नाम वकील है, मैं तो अंगूठा छाप हूँ। यह गलतफहमी भी पिताश्री को कम सुनाई देने के कारण ही हुई थी।

खैर दो वर्षीय बीएससी पाठ्यक्रम का पहला वर्ष मैंने पूरा कर लिया, काम जैसा भी चल रहा हो, पिताश्री दौरे पर जाते ही रहते थे और यह निश्चित नहीं रहता था कि कब लौटकर आएंगे।

वैसे वो यह भी बताते थे कि वो जैन मुनियों के गुरु बन सकते हैं, इसकी पूरी शिक्षा उन्हें प्राप्त हैं और लोग उनको बुलाते भी रहते हैं।

इस बार जब पिताश्री दौरे पर गए, तो फिर इंतज़ार का समय समाप्त ही नहीं हुआ और धीरे-धीरे उनके लौटने की आशा भी समाप्त हो गई। मुझे विश्वास है कि इसके बाद की उनकी जीवन अवधि अपेक्षाकृत सुखपूर्ण रही होगी।

मैंने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा पास की थी और पिताश्री के जाने के बाद आगे पढ़ना संभव नहीं था। मैंने नौकरी शुरू की और फिर बाद में 8 वर्षों के अंतराल के बाद निजी परीक्षार्थी के रूप में बी.ए. और फिर एम.ए. परीक्षाएं पास कीं।   

एक मामले में सामने वाले, मुल्तानी बाबा की ज्योतिष विद्या भी फेल हो गई, उनका कहना था कि मेरे पिता  मुझसे एक बार अवश्य मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आलेख कुछ लंबा हो गया न! खैर इसके बाद भी मैं अपनी एक कविता अवश्य शेयर करूंगा-

 

पिता के नाम

हे पिता

यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको

बस यही, जो जिस तरह था

उस तरह ही है।

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल

हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,

और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,

मैं न मानूं किंतु प्रचलन

इस तरह ही है।

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,

गो कि अदना क्लर्क–  

कल का महद आकांक्षी,

ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी

हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का

जी रहा है, और जीवन

उस तरह ही है।

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-

वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,

और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,

बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं

और यह ध्यानस्थ दुनिया-

                                                                      उस तरह ही है‌।                                                                                                                             -श्रीकृष्णशर्मा

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7. बाबूराम स्कूल

अब स्कूल के बारे में बात कर लें। कक्षा 1 से 5 तक गौशाला वाले सनातन धर्म स्कूल के बारे में तो बताने को कुछ नहीं है। बाबूराम स्कूल के बारे में ही बात करूंगा जहाँ मेंने कक्षा 6 से 11 तक की पढ़ाई की थी।

कुछ चित्र जो मस्तिष्क में आते हैं, वे धीरे-धीरे शेयर करना चाहूंगा।

काफी लंबे-चौड़े क्षेत्र में फैला था हमारा स्कूल, उस समय तक सिंगल स्टोरी ही था, काफी बाद में देखा कि दो-तीन मंजिला भवन बन गया है। कक्षाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले क्षेत्र के पीछे, उससे 2-3 गुना बड़ा मैदान था, जहाँ खेलकूद के अलावा सुबह की प्रार्थना आदि होती थीं। कक्षाओं के पीछे एक छोटा सा मंच था, जहाँ से मैदान में होने वाली सुबह की प्रार्थना सभा और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन भी होता था।

मुझे कभी उस स्कूल के प्रिंसिपल का नाम याद नहीं रहा, लेकिन हिंदी के एक अध्यापक थे- मनोहर लाल जी, कुर्ता-पैजामा और नेहरू जैकेट पहनते थे, टोपी लगा लें तो काफी हद तक नेहरू जी जैसे ही लगें। गुलाब का फूल भी वो अक्सर लगा लेते थे। स्कूल का वह मंच, उनके बिना अधूरा लगता था।

स्कूल में राष्ट्रीय दिवसों आदि के अवसर पर मनोहर लाल जी की विशेष भूमिका होती थी और देशभक्ति के जिस प्रकार के गीत वहाँ बजते थे, वे अलग वातावरण तैयार करते थे। मुझे याद है चीन से हुए युद्ध के बाद मैं उस स्कूल में रहते हुए एकमात्र बार मंच पर चढ़ा था और मैंने यह कविता मंच से पढ़ी थी, जो उस समय अखबार में छपी थी, मुझे नहीं मालूम कि किसकी लिखी हुई थी-

घबरा जाना नहीं दोस्तों, छोटी-मोटी हारों से

राष्ट्र हमारा जूझ रहा है, तलवारों की धारों से।

टिड्डी दल ने कहो आज तक, कभी सूर्य को ढांपा है, 

तिनके पर बैठे चींटे ने, क्या समुद्र को मापा है।

दाल गलेगी नहीं तुम्हारी, कह दो यह गद्दारों से

राष्ट्र हमारा ………

बस सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि मैं यह छोटी सी कविता, जोश के साथ पूरी पढ़कर, सही-सलामत मंच से नीचे उतर आया था।

स्कूल की शुरु की कक्षाओं के समय की ही एक घटना है, मैं स्कूल में बिना जूते पहने, नंगे पैर ही चला जाता था। इसमें कुछ हद तक घर की आर्थिक स्थिति का भी हाथ था और जो भी कारण रहे हों, मेरी शायद आदत भी बन गई थी। मेरे एक शिक्षक ने जब कक्षा के छात्रों से कहा कि वे मेरे लिए पुराने जूते लेकर आएं तब मेरा स्वाभिमान जाग गया और मैंने यह मैनेज कर लिया कि आगे से जूते पहनकर ही स्कूल जाऊं।

एक ड्राइंग के शिक्षक थे गुप्ता जी, उन्हें यह मालूम हो गया कि मैं मुकेश जी के गाने गाता हूँ और ठीक-ठाक गा लेता हूँ। वो अक्सर जब भी मौका मिलता मुझे कक्षा के सामने गाने के लिए बोलते थे। वैसे मेरी कमज़ोरी और दुबले-पतले शरीर के कारण कुछ लड़के मुझे विनोबा भावे कहकर चिढ़ाते भी थे।

अंग्रेजी के एक शिक्षक थे ओ.पी.शर्मा, वो कहते थे कि देवानंद उनके भतीजे हैं। काफी मोटे थे वो, कहते थे ‘इफ आई गिव यू माई पैंट, इट वुड सर्व यू एज़ ए टेंट’। एक बार ओ.पी.शर्मा जी हमारी क्लास में, अरेंजमेंट क्लास में आए थे, क्योंकि संबंधित शिक्षक उपलब्ध नहीं थे। उस क्लास में शर्मा जी ने हमसे कहा कि सब ‘इफ आई वर ए माली’ विषय पर निबंध लिखें। सबके लिखे निबंधों को उन्होंने सुना,और मेरी बहुत तारीफ की, कहा ‘यू आर ए फ्रीलांसर’। अगले दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि वो जो निबंध आपने लिखा था वो कहाँ है, तो मैंने बताया कि वो तो मैंने रफ कॉपी में लिखा था फाड़कर फेंक दिया।

बाद में अंग्रेजी के एक शिक्षक आए जो सरदार जी थे, अच्छे शिक्षक थे, परंतु शुरू में कुछ अलग सा लगा क्योंकि उस समय तक मैंने इस प्रोफेशन में और वो भी अंग्रेजी शिक्षक के रूप में, किसी सरदार जी को नहीं देखा था। फिर एक अंग्रेजी शिक्षक आए हरिश्चंद्र गोस्वामी जी, जिनके बारे में बाद में मालूम हुआ था कि एक नकल वीर ने, नकल से रोकने पर उनकी हत्या कर दी थी।   

फिज़िक्स के एक शिक्षक थे कन्हैया लाल जी, वे दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली फिज़िक्स कक्षाओं में भी आते थे और हमारी स्कूल की क्लास में भी। आते ही सीधे विषय पर बोलना शुरु कर देते थे, बहुत सी बार लगता था हम टीवी पर ही उनकी क्लास देख रहे हैं।    

परीक्षाओं में मैंने कभी कोई महान उपलब्धि प्राप्त नहीं की, ले-देकर सैकिंड डिवीज़न में बोर्ड परीक्षा पास की थी, लेकिन इतना था कि स्कूल के बाद भी कुछ शिक्षक जब मिलते थे तो गले से लगा लेते थे।    

अंत में निदा फाज़ली साहब की ये पंक्तियां दोहरा लेते हैं-

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।

किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थककर बैठेंगे तब औरों को समझाएंगे।

अगली बार बात करेंगे कॉलेज की।

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6. परला घर

अपने मोहल्ले में कुछ समय तो और बिताना होगा। आज अपने वकील भाई साहब के बारे में बात कर लेते हैं, जिनके पास हम जाकर बसे थे इस मोहल्ले- भोलानाथनगर, शाहदरा में। वकील साहब मेरे मामा के बेटे होने के नाते मेरे बड़े भाई लगते थे, लेकिन असल में उनके बेटे मेरे हमउम्र, मुझसे एक-दो वर्ष छोटे थे। यहाँ यह भी बता दूं कि मेरे पिताश्री ने अपनी घोर आर्थिक तंगी के दिनों में वकील साहब से कुछ उधार लिया था, यह रकम थी 700 रुपये। इस उधारी का उलाहना मेरे पिता अंत तक झेलते रहे, क्योंकि वो यह रकम नहीं चुका पाए थे। मैंने सुना था कि किसी समय मेरे पिता ने पालम हवाई अड्डे के आसपास कुछ जमीन भी खरीदी थी, लेकिन वो कब और कैसे हाथ से निकल गई, पता ही नहीं चला।

यहाँ अपनी निजी कहानी से अलग एक बात और बता दूं कि शाहदरा या यमुना पार का इलाका अधिकांशतः ऐसा था जहाँ जंगल थे, जमीनों पर लोग कब्ज़ा करते गए और अपनी हिम्मत और बेशर्मी के दम पर धीरे-धीरे खाकपति से करोडपति बनते गए। बस ये करना था कि बीच-बीच में जब चुनाव आएं तब प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के झण्डे लगा लें। ऐसे में ईमानदार और कानून का पालन करने वाले लोग वहीं के वहीं रह गए और बे‌ईमान लोग करोड़पति बन गए।

खैर फिर से वकील साहब की बात पर आने से पहले एक प्रसंग बताऊं, मेरे मामाजी, याने वकील साहब के पिता, जो गांव में रहते थे वहाँ आए हुए थे, तभी नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर पहुंचे। ये खबर उनको बताने की कोशिश की गई, लेकिन अपनी सहज-बुद्धि से वो इसे मानने को तैयार नहीं हुए। उनका यही कहना था कि वहाँ कोई जाएगा, तो गिर नहीं जाएगा क्या?

वकील साहब राजनीति में भी काफी हद तक सक्रिय थे और कविता भी लिखा करते थे। एक बात और कि पूजा होने पर वे बहुत से भजन भी गाते थे, कुछ भजन मैंने भी उनसे सुनकर याद किए थे।

हम क्योंकि उनके कर्ज़दार थे, इसलिए जब मैं उनके घर जाता था तो भाभी को कोई काम याद आ जाता था, अक्सर भाभी बोलती थीं, किशन भागकर एक किलो चीनी, या चाय या कुछ और लेकर आ जा। वैसे भी हमारा हर रास्ता उनके यहाँ होकर जाता था, परला घर कहते थे हम उनके घर को। हाँ कभी-कभी यह भी होता था, जब हमसे कहा जाता था कि कहीं भी चले जाओ, परले घर मत जाना।

मोहल्ले के एक दो कैरेक्टर रह गए, एक मेरी आयु का मित्र था- विनोद कपूर, हम साथ मिलकर पढ़ाई भी करते थे। उसके पास जासूसी उपन्यासों का खज़ाना रहता था। जैसे एक लेखक थे- इब्ने सफी और उपन्यास होते थे,  चीखती लाशें…  आदि। हम दोनों में एक और प्रतियोगिता थी, ये निर्णय करना मुश्किल था कि दोनों में से कौन ज्यादा कमज़ोर है। दोनो जिसे बोलते हैं सूखी हड्डी। एक बार ऐसा हुआ कि उसके बगल में रहने वाला एक बंगाली लड़का मुझे काटकर चला गया। उस लड़के पर तो मेरा बस नहीं चला, मैंने विनोद से बोलचाल बंद कर दी। इसके बाद जासूसी उपन्यासों की सप्लाई बंद। जब कभी हम आमने-सामने आते, लगता कि मैं बोल पड़ूंगा या वो बोल देगा, लेकिन कई साल तक हम उसी मोहल्ले में रहे, विनोद पिछली गली में था, लेकिन ये चुप्पी नहीं टूटी।

विनोद के पिता कपूर साहब काफी धार्मिक व्यक्ति थे। अक्सर संते की डेयरी में वो दूध लेने आते थे तब उनको देखता था। वो गुनगुनाते रहते थे- ‘दीनदयाल विरिदु संभारी – संते मेरा नंबर है, हरहु नाथ मम संकट भारी – मुझे दूध कब दोगे भाई — ।’ कभी लगता कि उनका संकट यही है कि उनको दूध जल्दी नहीं मिल रहा!

एक और परिवार था पिछली गली में, वे सुनार का काम करते थे, उसमें एक लड़का आनंद याने अन्नू, जब किसी से झगड़ा होता और उसका अक्सर हो जाता था, तब वह बोलता था- ‘अन्नू लाला रूठेगा, बड़े-बड़ों का सिर फूटेगा।’  खैर एक घटना याद आ रही है। उस समय स्वच्छ भारत जैसा कोई अभियान तो था नहीं। शहर का काफी बड़ा हिस्सा जंगल था और वहीं लोग दिशा-मैदान के लिए जाते थे। और यह भी बता दूं जिधर लोग इस शुभ-कर्म के लिए जाते थे, उधर ही एक टेम्प्रेरी सिनेमा बना हुआ था, टीन-टपारे वाला सिनेमा हाल। एक बार अन्नू लाला ने बड़े भाई की जेब से पैसे निकालकर सिनेमा देखने का मन बनाया। जैसे ही वो घर से बाहर निकला, उसको बड़े भाई लोटा लेकर लौटते हुए मिले। पूछा तो दिशा-मैदान का बहाना बना दिया। इस पर भाई ने हाथ में लोटा पकड़ा दिया। अब अन्नू लाला इस धर्म संकट में कि लोटा लेकर सिनेमा देखने कैसे जाएं।

खैर किस्से तो बहुत से हैं, फिर से आते रहेंगे।

जैसा मैंने बताया कि मेरे पिता, वकील साहब के कर्ज़दार थे, जीवन में एक असफल इंसान थे। ईश्वर में आस्था इतनी गहरी थी कि वो उसी से लड़ते रहते थे। नहाते समय हनुमान चालीसा पूरी गाते थे और यदा-कदा भगवान को गालियां देकर अपनी शिकायत भी दर्ज कराते रहते थे।

उन पर कर्ज़ था 700 रुपये, और जो मुसीबतें थीं जीवन में, कई बार मेरे मन में आता है, कि आज की तारीख में मेरे लिए एक-दो लाख रुपये कोई बड़ी बात नहीं है। मैं सोचता हूँ कि अगर टाइम-मशीन जैसी कोई चीज़ होती तो मैं एक-दो लाख लेकर उस कालखंड में चला जाता और पूरे हालात ही बदल जाते।

मैंने कई बार सोचा कि इस विषय पर उपन्यास लिखा जाए कि पैसा लेकर भूतकाल में जाएं और अतीत को बदलकर रख दें। इसमें दो रास्ते हैं, सोना लेकर जाएं हालांकि उसकी कीमत भूतकाल में उतनी नहीं थी। अगर मुद्रा लेकर जाएं तो आज की तारीख के नोटों को समय-समय पर चल रही मुद्राओं के अनुसार बदलना होगा, जिस गवर्नर के हस्ताक्षर उस समय चलते थे उसके अनुसार। तो बीच में स्टेशनों पर रुकते हुए यात्रा करनी होगी।

खैर यह बड़ी सुंदर कल्पना है, लेकिन प्रक्रिया बहुत जटिल है, कल्पनाओं का क्रियान्वयन भी तो सरल होना चाहिए।

दिल भी ये ज़िद पे अड़ा है, किसी बच्चे की तरह,

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए, या कुछ भी नहीं।

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मोहल्ला मेरा

अब थोड़ा समय उस मोहल्ले को भी दे दें, जो लगभग 25 वर्ष तक मेरा ठिकाना था। जैसा मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था, दरियागंज छोड़कर हम भोलानाथ नगर, शाहदरा में जाकर बसे और वहाँ पर पहली कक्षा से मेरी पढ़ाई शुरू हुई। भोलानाथ नगर आने का एक कारण यह भी था कि मेरे मामा के बेटे वहाँ रहते थे, वकील साहब! इस प्रकार मेरी मां यहाँ आकर अपने मायके के निकट आ गई थी।

जैसे हम अपनी भाषा को मातृभाषा कहते हैं, क्योंकि मां से सीखते हैं, उसी तरह आस-पड़ौस की पहचान भी हमें मां के द्वारा दी गई शब्दावली में ही होती है। तो हमारे मोहल्ले में हमारे बगल का मकान डाकखाने वालों का था, उसके बाद था वकील साहब का मकान, मेरी मां जिनकी और उनके बहाने पूरे मोहल्ले की बुआ थीं। उसके बाद एक प्लॉट खाली था उस समय, उसके बाद वाले मकान में पंजाब के एक सज्जन थे, जो मां की भाषा में पंजाबी नाम से ही पहचाने जाते थे। हमारे सामने एक बुज़ुर्ग रहते थे, वे मुल्तान से थे। हम उनको मुल्तानी बाबाजी के नाम से जानते थे। उनका ज्योतिष आदि में भी दखल था। उनके परिवार में उनकी पत्नी और आधुनिक बेटियां भी थीं। हर मकान के सामने का भाग एक गली में आता था और पिछला भाग दूसरी गली में। ये मुल्तानी बाबाजी हमारी तरफ घर से निकलते थे और उनका परिवार दूसरी गली से ही घर में आता-जाता था।

उससे अगले घर में एक चबूतरा भी था और उस घर की मालकिन को हमारी मां ने नाम दिया था, चौंतरे (चबूतरे) वाली। चौंतरे वाली का बेटा इंजीयरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह जवान था, देवानंद जैसे बाल रखता था और उसके पास पटरियों पर दौड़ने वाली ट्रेन थी, वैसी मैंने बाद में नहीं देखी, वैसे तो बच्चों के खिलौनों में वह आती ही है। उनके घर में समृद्धि की अच्छी खासी झलक मिलती थी।

एक बात और याद आ रही है, हमारे ही एक रिश्तेदार हैं, जो सिविल इंजीनियर थे, काफी बड़ा बंगला था उनका, एक बड़े से ड्राइंग रूम में बड़ी सी डाइनिंग टेबल और उस पर एक बड़ी सी टोकरी में ढ़ेर सारे फल, वह दृश्य काफी समय तक मन में अटका रहता था। क्योंकि उस समय तक मेरे लिए यह दृश्य सामान्य नहीं था।

अपने घर के बारे में बता दूं। शायद 20’X10’ का एक कमरा और एक छोटी सी रसोई थी, किराया था 16 रुपया प्रतिमाह। इस घर में माता-पिता और हम चार लोग, दो बहन, दो भाई रहते थे। बिजली सभी घरों में थी, लेकिन हमने नहीं ली थी। एक लालटेन थी हमारे घर में, जो या तो रसोई में इस्तेमाल होती थी या कमरे में, कमरे के थोड़े से हिस्से में ही लालटेन से रोशनी हो पाती थी। इस लालटेन की रोशनी में ही मैंने कक्षा 1 से 12वीं तक की पढ़ाई की थी।  

मेरे पिता जब घर में होते थे, तब शाम के बाद एक ही पहचान होती थी कि घर के उस कोने से उनकी सुलगती बीड़ी चमकती रहती थी। घर पर रहते हुए उनकी कोशिश रहती थी कि मैं उनके साथ ही खाना खाऊं। उनके दांत निकल चुके थे, रोटी को कुचलकर खाते थे। होता यह था कि सब्जी में कुचली हुई रोटी का कुछ भाग रह जाता था, मुझे खाने में थोड़ा खराब लगता था। ऐसे ही एक बार हम खा रहे थे, वो बोले कि अचार दे दो। अचार का मर्तबान खिड़की के ऊपर बने एक आले में रखा था, मैं खिड़की पर चढ़ा और वहीं चढ़ा रह गया, वो समझ गए, बोले तुमको मेरे साथ नहीं खाना चाहते तो नहीं खाओ, मुझे अचार तो दे दो। मुझे बड़ा खराब लगा कि मैं उनके प्रेम को पचा नहीं पा रहा था।

मकान मालकिन थीं प्रेम, एक विधवा महिला, उनकी छत पर जाकर सड़क का दृश्य दिखाई देता था। जब कोई ज़ुलूस निकलता या होली के दिन हुड़दंगियों की टोलियों का नज़ारा भी हम वहाँ से देखते थे। एक बार का दृश्य आज तक नहीं भूल पाया हूँ, वहाँ कुछ गैंग भी स्थानीय रूप से चलते थे, एक बार दो गैंग्स के बीच भिडंत हो गई, मुख्य सड़क पर चल रही इस भिड़ंत का नज़ारा भी हमने छत से देखा, लोग कोका कोला की बोतलों को हिलाकर इस प्रकार फेंकते थे कि विपक्षी के सिर में टकराकर वह फट जाए, उस दिन उन लोगों को लहूलुहान देखकर लगा कि उनमें से कुछ तो निपट ही जाएंगे, लेकिन वो बाद में फिर घूमते-फिरते नज़र आए, लगा कि यही तो इनके दीर्घ-जीवन का राज़ है।

दो-तीन गलियों का मोहल्ला था हमारा, मैंने कुछ ही घरों के बारे में बताया यहाँ, एक घर का ज़िक्र और कर दूं, जैसे मेरी मां मुहल्ले की बुआ थीं, वैसे ही पिछ्ली गली के आखिरी सिरे पर जो बुज़ुर्ग महिला रहती थीं वे मोटी बुआ कहलाती थीं। वे हमारी दूर की रिश्तेदार थीं। उनके एक भतीजे मुंबई में इतिहास पर आधारित फिल्में बनाते थे। पृथ्वीराज चौहान, हमीर हठ आदि, कुछ फिल्में चलीं बाद में कुछ नहीं चलीं उनकी हालत खराब थी, तब बनाई फिल्म- जय संतोषी मां, और वे फिर से मालामाल हो गए। एक बार उनकी ही किसी फिल्म की शूटिंग के लिए कलाकार आए हुए थे, तब अपने बचपन के दिनों में ही मैंने भगवान दादा से हाथ मिलाया था।  

हमारे सामने वाले मुल्तानी बाबाजी, गर्मियों में बाहर गली में ही चारपाई बिछाकर सो जाते थे, हम ऊपर छत पर सोते थे, जब तक कि सुबह के समय वानर सेना वहाँ न आ जाए।

एक रोज़ सामने वाले बाबाजी गली में सोये थे, तभी गली के एक शराबी कैरेक्टर वहाँ आए, सब जगह ऐसे लोग होते हैं जिनका पीना जग-जाहिर होता है। उन्होंने बाबाजी को नमस्ते किया, बाबाजी ने उनके नमस्ते का जवाब दिया, वो बाबाजी के पास बैठ गए और तेज़ आवाज़ में मोहल्ले के कुछ लोगों की बुराई करने लगे, वो ऐसा है, उसने ऐसा किया। बाबाजी उनको समझाते रहे कि ऐसी बातें मुझसे मत करो, वो बोले क्यों नहीं करूं, मैं आपको जानता हूँ, आप मुझे जानते हैं, मैंने आपको नमस्ते किया आपने जवाब दिया, मैं तो बोलूंगा और वो  बोलते चले गए, मैं जानता हूँ कि मेरे बोलने की भी सीमाएं होनी चाहिएं। इसलिए आज की बात यहीं समाप्त करुंगा, बातें तो बहुत करनी हैं आगे भी।

नमस्कार।

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इब्तदा कुछ इस तरह

 

किसी ने फिर न सुना, दर्द के फसाने को

मेरे न होने से राहत हुई ज़माने को। 

खैर दर्द का फसाना सुनाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। ज़िंदगी के साथ, इस राह में मिले कुछ विशेष पात्रों, विशेष परिस्थितियों के साथ हुए ऐसे अंतर्संवाद, जिनमें मुझे ऐसा लगता है कि अन्य लोगों की रुचि हो सकती है, उनको ही यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा।

अब तक जो कुछ कहा, उसको ऐसा समझ लीजिए कि जैसे मदारी गली में आकर, डुगडुगी या बांसुरी बजाकर लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करता है, वैसा ही है। आजकल जिसे ‘कर्टेन रेज़र’ भी कहा जाता है, हालांकि वे मेरी इस कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मैं चाहूँगा कि मेरे मित्र उनको भी अवश्य पढ़ लें। वे ऐसे प्रसंग थे, जो लाइन तोड़कर पहले ही उपस्थित हो गए। अब जिन प्रसंगों को शेयर करने जा रहा हूँ, उनमें बड़ी दुविधा है कि क्या कहूं और क्या न कहूं।  

कोई कथा या धार्मिक आयोजन होता है तो प्रारंभ में देवता स्थापित किए जाते हैं। एक होते हैं, स्थान देवता- यह बताने का मेरा कर्तव्य है कि मैं कहाँ स्थापित या विस्थापित था उस समय, जब ये घटनाएं हुईं।

संक्षेप में बता दूं कि मेरा जन्म दरियागंज में हुआ था, वर्ष 1950 में, दरियागंज थाने के सामने, कोई कटरा है, वहाँ। मैं शायद 5 वर्ष का था जब यहाँ से हम शाहदरा चले गए थे। दरियागंज की कोई याद बताने लायक नहीं है।

एक याद है कि नेहरू जी सामने से निकले, खुली जीप में हाथ हिलाते हुए, नहीं मालूम कि अवसर कौन सा था। एक छवि मन में है कि पुतला साइकिल चला रहा था, जो बिजली की सजावट में, बाद में बहुत समय बाद देखा, पहली बार बचपन में जो देखा शायद वह प्रदर्शनी मैदान में रहा होगा।

शाहदरा में जहाँ हम जाकर बसे, वह स्थान है भोलानाथ नगर, सनातन धर्म पाठशाला और गौशाला के पीछे, एक मुख्यमार्ग जो राधू सिनेमा से बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तक जाता है, उसी की बगल में था हमारा घर, संते की डेयरी के पीछे। उस डेयरी में उस समय 15-20 भैंसे और कुछ गाय भी थीं। इस समय उसके स्थान पर मदर डेयरी है, जिसमें लोहे की एक भैंस है, जो शायद उन सभी भैंसों से ज्यादा दूध देती है।

पिताश्री सेल्स रिप्रेज़ेंटेटिव का काम करते थे, जब तक दरियागंज में थे, तब तक अच्छा काम चल रहा था, शाहदरा जाने के बाद, जिस कंपनी में वो काम करते थे वह छोड़ दी और उसके बाद, जब तक मैंने उन्हें देखा, वे नौकरियां बदलते रहे। अक्सर वो बाहर रहते थे। जब जाते थे तब किसी और फर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे होते थे और लौटते थे किसी और फर्म के प्रतिनिधि के रूप में। एक लाल रंग का अंगोछा हमेशा उनके पास रहता था। जब वो लौटकर आते थे, उनके अंगोछे में से दो चीज़ों की मिली-जुली गंध आती थी, एक तो कलाकंद जो वो हमेशा लेकर आते थे और एक भांग, जो वो हमेशा खाते थे।

जिन फर्मों के लिए वो काम करते थे उनके ऑफिस सामान्यतः चांदनी चौक, दिल्ली में या उसके आस-पास होते थे। मुझे याद है कि एक बार उनके साथ चांदनी-चौक गया, मिठाई की दुकान पर वे मुझे क्या-क्या खिलाने की कोशिश करते रहे। धंधे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उस समय शाहदरा से पुरानी दिल्ली का रेल या बस का किराया बहुत अधिक नहीं रहा होगा, लेकिन एक-दो बार मैंने यह भी देखा कि भांग की एक गोली निगलकर वो पैदल ही दिल्ली के लिए निकल लिए। मैंने काफी समय बाद कोशिश की पैदल शाहदरा से चांदनी चौक आने की, 6 किलोमीटर से ज्यादा ही पड़ता है, आसान नहीं है।

मैं आंतरिक रूप से जैसा बना, उसमें शायद सबसे अधिक मेरे पिता के संघर्ष का ही हाथ है, आगे भी उसके बारे में बात करूंगा, फिलहाल कुछ और बात कर लेते हैं।

कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई मैंने सनातन धर्म पाठशाला में की, जिसे गौशाला वाला स्कूल कहते थे, क्योंकि स्कूल के बगल में ही गौशाला थी और अहाते में ही एक मंदिर भी था। उसके बाद कक्षा 6 से 12 तक की पढ़ाई बाबूराम स्कूल में की, जिसके पूरे नाम में उस समय ‘आदर्श’ भी शामिल था और जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की शामिल रहा। बाद में मालूम हुआ कि किसी नकल-वीर ने, नकल से रोकने पर, एक शिक्षक की हत्या कर दी और स्कूल ‘आदर्श’ का अतिरिक्त बोझ ढ़ोने के लायक नहीं रह गया। बहुत अच्छे अंग्रेजी शिक्षक थे वो, हरीश चंद्र गोस्वामी, आज भी उनकी छवि याद है।

बाबूराम स्कूल, कक्षा 6 से 12 की पढ़ाई की अवधि, इसमें तो ऐसी कुछ बातें अवश्य होंगी जो सुधीजनों के साथ शेयर की जा सकें। ये बातें अगले ब्लॉग में करेंगे। 

बीमार बाग जैसी, है ये हमारी दुनिया,

इस प्राणवान तरु की, मृतप्राय हम टहनियां,

एक कांपती उदासी, हर शाख पर लदी है।

                                                    ये बीसवीं सदी है।                                      (डा. कुंवर बेचैन)

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