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18. भूख मिट नहीं सकती, पेट भर नहीं सकता ज़िंदगी के हाथों में, कौन सा निवाला है!

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।

दिल्ली से जाल समेटने से पहले, कुछ और बातें कर लें। वैसे तो रोज़गार की मज़बूरियां हैं वरना कौन दिल्ली की गलियां छोड़कर जाता है। वैसे भी यह तो अतीत की बात है, मैं इसे कैसे बदल सकता हूँ? अगर बदल सकता तो कुछ और बदलता, जो मैं पहले लिख चुका हूँ।

कुछ छिटपुट घटनाएं जो ऐसे में याद आती हैं, उनमें एक है वह कवि गोष्ठी, जिसमें स्व.भवानी प्रसाद मिश्र जी का कविता पाठ था, पहली बार उनको आमने-सामने सुनने का अवसर मिला, उनकी अनेक कविताएं और कविता के बारे में उनके विचार जानने का अवसर मिला। मुझे भी उनके सामने एक रचना के पाठ का अवसर मिला। मेरी कविता सुनकर भवानी दादा ने कहा- ‘आदमी समझदार लगते हो’, मेरे लिए उनके ये बोल ही बहुत बड़ा आशीर्वाद थे।

एक बुज़ुर्ग कवियित्री थीं- श्रीमती इंदुमती कौशिक, बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थीं। मुझे लगता है, उनको वह मान-सम्मान नहीं मिल पाया, जिसकी वह पात्र थीं। पहली बार उनकी रचना- शहीद वंदना, लाल किले के कवि सम्मेलन में सुनी थी, जिसने मेरे मन पर अमिट छाप पड़ी थी। बाद में अनेक बार उनसे मिलने और उनकी रचनाएं सुनने का सौभग्य प्राप्त हुआ।

आम आदमी की स्थिति को व्याकरण के माध्यम से दर्शाने वाली उनकी एक रचना है-

ना तो संज्ञा हैं हम ना विशेषण

बस यही व्याकरण है हमारा।

 

सिर्फ विन्यास की क्या समीक्षा

व्यक्ति हैं, पाठ्यक्रम तो नहीं हैं।

आपकी मान्यताओं से हटकर

कुछ अलग आचरण है हमारा।

एक और बहुत  श्रेष्ठ रचना है उनकी-

टांग दूं अरगनी पर, अनधुली उदासी मैं,

आज अपने आंगन में, धूप है, उजाला है,

एक साथ ओढ़ूंगी, सात रंग सूरज के,

तार-तार पैराहन, ओस में उबाला है।

इसी रचना में आगे पंक्तियां हैं-

भूख मिट नहीं सकती, पेट भर नहीं सकता

ज़िंदगी के हाथों में, कौन सा निवाला है।

एक और रचना की पंक्ति है-

हमने जिस कोमल कोने में अपना कक्ष चिना,

उसने अपनी ईंट-ईंट को, सौ-सौ बार गिना।

अंत में उनका प्रतिनिधि गीत शहीद वंदना, जो उनकी पहचान रहा है और मुझे अत्यंत प्रिय है-

जो अंधेरों में जलते रहे उम्र भर,

आपको दे गए भोर की नवकिरण,

आइए इस महापर्व पर हम करें

उन शहीदों की ज़िंदा लगन को नमन।

 

वो जिए इस तरह, वो मरे इस तरह,

ज़िंदगी-मौत दोनों सुहागिन हुईं,

ज़िंदगी को उढ़ाई धवल चूनरी,

मौत को दे गए रक्त-रंजित कफन।

 

हड्डियां पत्थरों की जगह चिन गईं,

तब कहीं ये इमारत बनी देश की,

आपके हाथ में सौंपकर चल दिए

ये सजग राजपथ, ये सजीला सदन।

 

अब यहाँ स्वार्थ हैं और टकराव हैं,

सिर्फ भटकाव हैं और बिखराव हैं,

आज के दौर में बोलिए तो ज़रा

कौन है जो करे आग का आचमन।  

 

आइए मिलके सोचें ज़रा आज हम

हमको क्या-क्या मिला, हमने क्या खो दिया,

वक्त की हाट में वरना बिक जाएंगे,

रत्नगर्भा धरा के सजीले रतन॥

दिल्ली में पहले प्रवास का यह अंतिम विवरण, स्व. इंदुमती कौशिक जी की स्मृतियों को समर्पित है।

जैसा मैंने पहले बताया उद्योग मंत्रालय के बाद मैं 3 साल तक संसदीय राजभाषा समिति में, तीन मूर्ति मार्ग पर कार्यरत रहा। इस बीच श्री संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, तब मैं भी श्रीमती गांधी के आवास पर देखने चला गया था, वहाँ श्री मनोज कुमार आए थे और मुझे लगभग धकेलते हुए निकल गए थे। बहुत हैंडसम हुआ करते थे उस समय, आज उनकी हालत देखकर समय की शक्ति का एहसास होता है।

इस बीच मेरे निजी जीवन में ऐसा हुआ कि मेरा विवाह हुआ और एक बच्चा, मेरा बड़ा बेटा भी दिल्ली में जन्म ले चुका था। हमने 16 रु. महीने वाला पुराना घर छोड़ दिया था, लालटेन का साथ भी काफी पहले छूट चुका था। अब तो हम जयपुर जाने की तैयारी में थे।

बातें तो चलती ही रहेंगी, अभी इतना ही।                   

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154. रोशनी हो न सकी, दिल भी जलाया मैंने!

आज मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, यह  गीत उन्होंने फिल्म- ‘दिल भी तेरा, हम भी तेरे’ में धर्मेंद्र जी  के लिए गाया है, संगीतकार हैं- कल्याणजी आनंदजी, जो उन संगीतकारों में से एक हैं, जिन्होंने मुकेश जी की अनूठी आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया है। इसके गीतकार हैं- शमीम जयपुरी।

मैं कह नहीं सकता कि इस गीत में क्या कोई अनूठी बात है, लेकिन मुकेश जी की आवाज़ पाकर यह गीत जैसे अमर हो गया है। और जो इसके बोल हैं, उनके अनुरूप, शुरुआत में ऐसा लगता है कि जैसे आवाज़ जंगल में गूंज रही हो, तनहाई जैसे असीम लगती है।

अब ज्यादा कुछ नहीं बोलते हुए, इस गीत के बोल शेयर कर लेता हूँ, मौका लगे तो इस गीत को एक बार फिर मुकेश जी की आवाज़ में सुनकर, यादें ताज़ा कर लीजिए-

मुझको इस रात की तनहाई में, आवाज़ न दो,

जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो।

रोशनी हो न सकी दिल भी जलाया मैंने,

तुमको भूला ही नहीं लाख भुलाया मैंने,

मैं परेशां हूँ, मुझे और परेशां न करो।

आवाज़ न दो॥

इस क़दर जल्द किया मुझसे किनारा तुमने,

कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने,

छुप गए हो तो मुझे याद भी आया न करो।

आवाज़ न दो।।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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17. लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखते बीती!

फिलहाल वही काम कर रहा हूँ, जो सबसे आसान है, अपने पुराने ब्लॉग दोहराना, लीजिए प्रस्तुत है एक और ब्लॉग।

 ऐसा लगता है कि कवियों, साहित्यकारों की बात अगर करते रहेंगे तो दिल्ली छोड़कर आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। लेकिन कुछ लोगों की बात तो करनी ही होगी।

आज पहले एक गोष्ठी की बात कर लेते हैं, जो दिल्ली में हिंदी साहित्य सम्मेलन कार्यालय में हुई थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह कार्यालय उस समय था, कनॉट प्लेस में उस जगह, जहाँ अभी पालिका बाज़ार है। उस जगह पहले इंडियन कॉफी हाउस हुआ करता था, काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला, गोल आकार का था और हमेशा भरा रहता था, शोर वहाँ इतना होता था कि लगता था छत उड़ जाएगी, जो कि कबेलू की बनी थी, दूर से देखें तो बहुत बड़ी झोपड़ी जैसा लगता था यह कॉफी हाउस, जिसमें किसी समय लोहिया जी तथा अन्य बड़े नेता भी आते थे।

कॉफी हाउस के पीछे लंबी सी एक मंज़िला इमारत थी, जिसमें एक कमरे में हिंदी साहित्य सम्मेलन का कार्यालय भी था, कभी गोपाल प्रसाद व्यास जी इसके कर्ता-धर्ता हुआ करते थे। वहाँ नियमित रूप से साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं। इनमें से एक विशेष बैठक की ही मैं बात कर रहा हूँ, इस बैठक की विशेषता थी कि इसमें अज्ञेय जी शामिल थे। जैसा कि सामान्यतः होता है, बैठक में उपस्थित कवियों/साहित्यकारों में शिक्षकों, प्रोफेसरों की भरमार थी।

इस बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए अज्ञेय जी ने कहा कि अध्यापक वर्ग के लोग क्योंकि कविता और साहित्य से संबंधित रहते हैं, इनसे जुड़े हुए सिद्धांतों को पढ़ाते, दोहराते हैं अतः यह तो होता है कि इनमें से अधिकाधिक लोग साहित्य में हाथ आज़माते हैं, लेकिन उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि इनके माध्यम से मौलिक सृजन की संभावना काफी कम रहती है।

अब यह तो बहुत बड़े संकट की बात थी अज्ञेय जी के लिए कि प्रोफेसरों की मंडली में बैठकर उन्होंने कह दिया कि आप लोगों के मौलिक लेखक होने की संभावना बहुत कम है। अब कौन है जो लिखता है और मान लेगा कि मेरा लेखन मौलिक नहीं है। खास तौर पर ऐसे माहौल में जहाँ आप मान रहे हों कि नारे लगाना भी मौलिक लेखन है। इसके बाद जो हुआ होगा इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

अज्ञेय जी का योगदान भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में अप्रतिम है, उनका उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ और नई कविता के क्षेत्र में, प्रतिनिधि कवियों के तीन संकलन ही अपने आप में उनकी बहुत बड़ी देन हैं। यहाँ उनकी केवल एक पंक्ति दे रहा हूँ-

पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ।
उसी के लिए स्वर-तार चुनता हूँ।

अब मैं, काव्य मंचों के एक ऐसे कवि का उल्लेख करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे अत्यंत प्रभावित एवं प्रेरित किया है। ये हैं मेरठ के गीतकार श्री भारत भूषण जी, इस नाम के एक नई कविता के कवि भी रहे हैं, इसलिए मैंने मेरठ का ज़िक्र किया। भारत भूषण जी की कुछ पंक्तियों का उल्लेख यहाँ अवश्य करना चाहूंगा।

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा

क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।

गीतों की जन्म- कुंडली में संभावित थी यह अनहोनी,

मोमिया मूर्ति को पैदल ही मरुथल की दोपहरी ढोनी,

खंडित भी जाना पड़ा वहाँ ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।।  

 

लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखती बीती,

जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सीती-सीती

हर भोर किरण पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई॥   

 

एक और गीत की कुछ पंक्तियां, किस प्रकार इंसान अपने बुरे समय के लिए अपने पूर्व कर्मों को दोष देता है और कवि की निगाह में सबसे बड़े पाप क्या हैं-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा

धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी।

 

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,

चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,

ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,

तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग  फोड़े होंगे,

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।

कविकर्म के संबंध में भी एक मार्मिक गीत है उनका-

आधी उमर करके धुआं

ये तो कहो, किसके हुए,

परिवार के या प्यार के,

या गीत के, या देश के ।

अब अगर कवियों, साहित्यकारों की बात ही करता रहूंगा तो कहानी आगे नहीं बढ़ पाएगी। बस एक ब्लॉग और उसके बाद कहानी को आगे बढ़ाऊंगा।

नमस्कार

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16. घर, शहर, दीवार, सन्नाटा- सबने हमें बांटा

लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग।
जिस प्रकार लगभग सभी के जीवन में भौतिक और आत्मिक स्तर पर घटनाएं होती हैं, जिनको शेयर करना समीचीन होता है। मैं प्रयास करूंगा कि जहाँ तक मेरी क्षमता है, मैं रुचिकर ढंग से इन घटनाओं को आपके सपने रखूं। इस क्रम में अनेक नगर, व्यक्ति और उल्लेखनीय घटनाएं शामिल होंगी, लेकिन मेरा ऐसा इरादा एकदम नहीं है कि मैं इसे निजी जीवन की कहानी बनाऊं।
दिल्ली, शाहदरा जो कि लंबे समय तक मेरी कर्मभूमि और अनुभूतिस्थल थे छूटने वाले हैं, इससे पहले मैं एक-दो ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख ज़रूर करना चाहूंगा जिनसे मैं बड़ी हद तक प्रभावित हुआ हूँ।
एक हैं- श्री रमेश रंजक, नवगीत के एक ऐसे हस्ताक्षर जो सृजन के मामले में बहुत प्रभावी, ईमानदार और वज़नदार थे। उनका रहन-सहन तो शायद आदर्श नहीं कहा जाएगा, लेकिन कविता के प्रति उनकी ईमानदारी बेजोड़ थी। यह भी सही है कि अच्छी कविता यदि वे अपने दुश्मन से भी सुनें तो उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकते थे।
‘गीत विहग उतरा’ और ‘हरापन नहीं टूटेगा’ उनके प्रारंभ के संकलन थे, जिनसे उनकी अमिट छप बन गई थी। बाद में तो उनके अनेक संकलन आए। कविता के प्रति उनकी ईमानदारी इन पंक्तियों में झलकती है-
वक्त तलाशी लेगा, वो भी चढ़े बुढ़ापे में
संभलकर चल।
वो जो आएंगे, छानेंगे कपड़े बदल-बदल
संभलकर चल।
मुझे याद है, मैं घर में बच्चों को उनके गीत सुनाकर बहलाता रहता था, खैर उसमें कांटेंट की नहीं,गायनकीभूमिका होती थे, लेकिन मैं गाता था क्योंकि वे गीत मुझे बहुत प्रिय थे।
जैसे-
घर, शहर, दीवार, सन्नाटा
सबने हमें बांटा।
सख्त हाथों पर धरी आरी,
एक आदमखोर तैयारी,
गर्दन हिली चांटा।
सबने हमें बांटा।।
एक और गीत की कुछ पंक्तियां-
दोपहर में हड्डियों को शाम याद आए
और डूबे दिन हज़ारों काम याद आए।

काम भी ऐसे कि जिनकी आंख में पानी
और जिनके बीच मछली सी परेशानी
क्या बताएं, किस तरह से
राम याद आए।

घुल गई है खून में जाने कहाँ स्याही,
कर्ज़ पर चढ़ती हुई मायूस कोताही,
तीस दिन के एक मुट्ठी
दाम याद आए।
श्रीकृष्ण तिवारी जी के एक गीत की कुछ पंक्तियां हैं-
धूप में जब भी जले हैं पांव
घर की याद आई।
रेत में जब भी थमी है नाव,
घर की याद आई।
इस गीत की संवेदना सभी की समझ में आती है, घर से दूर रहकर घर की जो कमी खटकती है।
अब इसी गीत को पढ़कर, रंजक जी ने एक गीत लिखा-
धूप में जब भी जले हैं पांव
सीना तन गया है,
और आदमकद हमारा
ज़िस्म लोहा बन गया है।
हम पसीने में नहाकर हो गए ताज़े,
खोलने को बघनखों के बंद दरवाजे,
आदमी की आबरू की ओर से सम्मन गया है।

अब यदि दोनों गीतों को साथ रखकर देखें तो तिवारी जी का गीत अधिक सहज है। लेकिन दोनों स्वतंत्र गीत हैंऔर यह कह सकते हैं कि रंजक जी का यह गीत ज्यादा जुझारू है।
खैर मेरा उद्देश्य गीतों पर बहस करना नहीं है। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि रंजक जी के गीतों से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ।
एक बार कवि गोष्ठी में उन्होंने मेरा एक गीत सुना और कहा कि ये मुझे लिखकर दे दो, मैं इसे प्रकाशित कराऊंगा। वो गीत पहले ही छप चुका था अतः मैंने उन्हें दूसरा गीत लिखकर दिया और उन्होंने उसे श्री नचिकेता जी द्वारा संपादित अंतराल-4 में छपवाया, जो प्रतिनिधि नवगीतों का संकलन था। ये वास्तव में रंजक जी का बड़प्पन ही था।
अपना वह नवगीत मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, इसमें शाम के चित्र हैं-
जला हुआ लाल कोयला
राख हुआ सूर्य दिन ढले।

होली सी खेल गया दिन
रीते घट लौटने लगे,
दिन भर के चाव लिए मन
चाहें कुछ बोल रस पगे,
महानगर में उंडेल दूध,
गांवों को दूधिए चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।

ला न सके स्लेट-पेंसिलें
तुतले आकलन के लिए,
सपनीले खिलौने नहीं
प्रियभाषी सुमन के लिए,
कुछ पैसे जेब में बजे
लाखों के आंकड़े चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।
मैं अपने जीवन के रोचक और रोमांचक संस्मरण आपसे शेयर करूंगा, अभी एक-दो ऐसे कवियों,व्यक्तित्वों के बारे में बात कर लूं, जिनसे मैं दिल्ली में बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि दिल्ली छूटने के बाद यह बात नहीं हो पाएगी।
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153. धूप, धुआं, पानी में

आज एक नवगीत याद आ रहा है, नीलम सिंह जी का लिखा हुआ, यह गीत जिस समय मैंने पढ़ा था, बहुत अच्छा लगा था और आज तक याद है।

इस गीत में जो मुख्यतः अभिव्यक्त किया गया है, वह यही है कि जीवन में जो कुछ झेलना पड़ता है, उसके बारे में सोचते रहें, मन को कोसते रहें, इससे बेहतर है कि मन को कहीं और लगाएं और आगे बढ़ें।

बहुत से लोग गीत को पलायन भी कहते हैं, शायद कुछ मायनों में सही भी हो, लेकिन गीत मन को बहुत शक्ति भी देते हैं, जो खालिस तर्कों से नहीं मिल सकती।

खैर आइए नीलम सिंह जी का यह गीत पढ़ते  हैं-

धूप, धुआं, पानी में, ऋतु की मनमानी में, 

सूख गए पौधे तो मन को मत कोसना, 

और काम सोचना। 

अधरस्ते छूट गए, जो प्यारे मित्र, 

प्याले में जब कभी तिरें उनके चित्र, 

दरवाज़ा उढ़काकर, हाते को पार कर, 

नाले में कागज़ की कुछ नावें छोड़ना, 

कुछ हिसाब जोड़ना। 

सिक्का है बंटा और बिखरा है आदमी, 

झूठा भ्रम क्यों पालें, भुनना है लाज़मी, 

जेब क्या, हथेली क्या, 

चुप्पी क्या, बोली क्या, 

विनिमय की दुनिया में, जिसे भी कुबूलना, 

मूल्य भर वसूलना। 

धूप, धुआं, पानी में, ऋतु की मनमानी में, 

सूख गए पौधे तो मन को मत कोसना, 

और काम सोचना। 

नमस्कार।

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15. नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर

लीजिए पुरानी कहानी को और आगे बढ़ाते हैं, प्रस्तुत है अगला पन्ना।

 दिल्ली में उन दिनों तीन-चार ही ठिकाने होते थे मेरे, जिनमें से बेशक उद्योग भवन स्थित मेरा दफ्तर एक है, उसके अलावा शाम के समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी या फिर कनॉट प्लेस, जहाँ अनेक साहित्यिक मित्रों से मुलाक़ात होती थी। इसके अलावा जब बुलावा आ जाए तब आकाशवाणी में युववाणी केंद्र, जिसका कार्य उस समय देखती थीं- श्रीमती कमला शास्त्री, युववाणी में अनेक बार मैंने कवि गोष्ठियों या कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए भाग लिया तथा गीतों भरी कहानी, अपनी पसंद के गीतों आदि की भी प्रस्तुति की।

आकाशवाणी की एक घटना मुझे याद आ रही है। श्रीमती कमला शास्त्री को बच्चन जी का इंटरव्यू लेना था। बच्चन जी से तात्पर्य है- श्रेष्ठ कवि श्री हरिवंश राय बच्चन जी। इस साक्षात्कार के लिए श्रीमती कमला शास्त्री के अनुरोध पर मेरे कवि मित्र डा. सुखबीर सिंह जी तथा मैं बच्चन जी को उनके निवास से अपने साथ लाने के लिए गए। डा. सुखबीर सिंह  दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे तथा दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में शनिवार की साहित्यिक सभा में नियमित रूप से आते थे। बच्चन जी उस समय दिल्ली में श्रीमती गांधी के घर की बगल में रहते थे। हम बच्चन जी को सादर अपने साथ लेकर आए तथा उनके साक्षात्कार के दौरान भी हम स्टूडियो में मौज़ूद थे।

श्रीमती कमला शास्त्री ने बच्चन जी से अनेक प्रश्न पूछे तथा उन्होंने उनके बड़े माकूल उत्तर दिए। एक प्रश्न मुझे अभी तक याद है। श्रीमती शास्त्री ने उनसे पूछा कि आपकी कविताओं के लोकप्रिय होने का कारण क्या यह है कि आपकी भाषा बहुत सरल है? इस पर बच्चन जी ने बड़ा सारगर्भित उत्तर दिया। बच्चन जी ने कहा कि भाषा सरल होना कोई आसान काम नहीं है। अगर आपके व्यक्तित्व में जटिलता है तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं सकती। हमारी भाषा सरल हो इसके हमको निष्कपट होना होगा, हमको बच्चा होना होगा, तभी हमारा मन निर्मल होगा और हमारी भाषा सरल होगी। इसीलिए कहते हैं- ‘लैंग्वेज इज़ द मैन’।

एक ठिकाना और था उन दिनों मेरा। कवि श्री धनंजय सिंह का घर। अपने घर जाने से भी ज्यादा आज़ादी के साथ, उनके घर किसी भी समय जा सकते थे। उनके माध्यम से ही बहुत से कवियों को निकट से जानना अधिक आसान हुआ। ऐसे ही एक कवि थे- श्री कुबेर दत्त, जो उन दिनों संघर्ष कर रहे थे। बाद में वे दूरदर्शन में नियुक्त हुए।  एक बार श्री कुबेर दत्त ने एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र में, मेरे सहित कुछ युवा लोगों के विचारों को शामिल करते हुए एक परिचर्चा प्रकाशित की ‘ज़िंदगी है क़ैद पिंजरों में’। श्री कुबेर दत्त उन दिनों बहुत अच्छे गीत लिखा करते थे। उनका एक गीत जो मुझे बहुत प्रिय है, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

ऐसी है अगवानी चितकबरे मौसम की

सुबह शाम करते हैं, झूठ को हजम,

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।

 

नक्काशी करते हैं, नंगे जज़्बातों पर

लिखते हैं गीत हम नकली बारातों पर,

बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में,

करते हैं विज्ञापित कदम दर कदम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

 

पत्रों पर आंक रहे, अनजाने पते नाम,

जेबों में हाथ दिये, ढूंढ रहे काम धाम,

सांसों पर व्यापारी आंतों का कब्ज़ा,

पेट पकड़ छिकने का तारीखी क्रम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

संघर्ष के दिनों में कुबेर दत्त मेरे हीरो हुआ करते थे। संघर्ष के दिनों में उनके एक और मित्र होते थे- सोमेश्वर। जो शायद कमलेश्वर को अपना आदर्श मानते थे। उनकी एक लंबी कहानी छपी थी सारिका में, जिसका नाम भी काफी लंबा था- ‘चीजें कितनी तेज़ी से बदल जाती हैं’। खैर मैं बता रहा था संघर्ष के दिनों की बात। श्री सोमेश्वर ने बताया कि कुबेर दत्त के साथ बीड़ी पीने के लिए वे कई किलोमीटर साइकिल चलाकर जाते थे। ये भी कि पहले आधी बीड़ी पीकर फेंकते जाते थे, फिर जब खत्म हो जाती थीं तब उनके टुकड़े ढूंढकर पीते थे।

खैर श्री कुबेर दत्त दूरदर्शन में नियुक्त हो गए, ऐसा स्थान जिसके लिए वे सर्वथा उपयुक्त थे, वहाँ वे निदेशक स्तर तक पहुंचे और कुछ बहुत अच्छे कार्यक्रम उन्होंने तैयार किए। लेकिन दूरदर्शन में जाने के बाद कुबेर जी का गीत लिखना छूट गया बल्कि वे कहने लगे कि गीत तो पलायन है।

हाँ दूरदर्शन में जाने के कुछ समय बाद ही उन्होंने एक गीत लिखा था-

उस पुराने चाव का, प्रीति के बहलाव का

दफ्तरों की फाइलें, अनुवाद कर पाती नहीं।  

कुछ और कवि मित्र हैं दिल्ली के, जिनका ज़िक्र आगे करेंगे।

अंत में अपनी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर

ठहरा, झुका, सलाम किया,

वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,

इधर हूँ मैं कि ये जीवन

नदी के पार जिया।

नमस्कार।

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14. इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है!

लीजिए पुरानी कहानी का एक पन्ना और खोल रहा हूँ।

जीवन में कोई कालखंड ऐसा होता है, कि उसमें से किस घटना को पहले संजो लें, समझ में नहीं आता है। अब उस समय को याद कर लेते हैं जब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और नाइंसाफी के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण जी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन चलाया हुआ था। इस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सभी विपक्षी पार्टियां जेपी के पीछे लामबंद हो गई थीं। जयप्रकाश जी के कुछ भाषण सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। वे इस प्रकार संबोधित करते थे, जैसे घर का कोई बुज़ुर्ग परिवार को समझाता है। जेपी जनता से यही बोलते थे कि कहीं भी कुछ गलत होता देखते हो तो उसका विरोध करो, और कुछ न कर पाओ तो टोको ज़रूर।

उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी की लोकप्रियता उतार पर थी और वो किसी भी तरह सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखना चाहती थीं। पार्टी के बड़े से बड़े नेता को एक ही तरह की बातें कहने का अधिकार था- ‘इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’।

स्थितियां हाथ से निकलते हुए देखकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया था, प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था और सामान्य नागरिक अधिकारों को नियंत्रित कर दिया था।

पूरे देश में उस समय एक ही नारा गूंज रहा था-

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

मैं उन दिनों सारिका पत्रिका नियमित रूप से पढ़ता था, वैसे तो यह कहानियों की पत्रिका थी और बहुत श्रेष्ठ पत्रिका थी। जेपी आंदोलन का प्रभाव सारिका में, कमलेश्वर जी द्वारा लिखित संपादकीय लेखों में भी देखा जा सकता था। सारिका में उन दिनों दुष्यंत कुमार जी की आंदोलनधर्मी गज़लें भी नियमित रूप से छपती थीं। इन्हीं में से एक थी-

आज गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,

एक शायर ये तमाशा देखकर हैरान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।

एक बूढ़ा आदमी है देश में या यूं कहें,

इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर हैं-

कहाँ तो तय था चरांगा, हरेक घर के लिए

कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलें यहाँ से कहीं और उम्र भर के लिए।

बाद में दुश्यंत जी की ये गज़लें, ‘साये में धूप’ नाम से संकलन के रूप में प्रकाशित हुईं।

प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की अनेक बैठकों में मैंने भाग लिया था, सामान्यतः ये बैठकें दिल्ली विश्वविद्यालय में कहीं होती थीं और इनमें काफी बहादुरी भरी बातें होती थीं। आपातकाल में ऐसी ही बैठक दिल्ली में मंडी हाउस के पास स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में हुई और मैंने देखा कि इस बैठक में सभी बहादुरों ने किसी न किसी बहाने से आपातकाल का समर्थन किया।

इस बैठक के अनुभव से प्रभावित होकर मैंने ये कविता लिखी थी-

सन्नाटा शहर में

 

बेहद ठंडा है शहरी मरुथल

लो अब हम इसको गरमाएंगे,

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

दड़बे में कुछ सुधार होना है,

हमको ही सूत्रधार होना है,

ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,

अपनी सरकार का बिछौना है।

चिंतन सन्नाटा गहराता है,

शब्द वमन से उसको ढाएंगे।

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

परख राजपुत्रों की थाती है,

कविता उस से छनकर आती है,

ऊंची हैं अब जो भी आवाज़ें,

सारी की सारी बाराती हैं,

अपनी प्रतिभा के चकमक टुकड़े

नगर कोतवाल को दिखाएंगे।

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 खैर वो अंधकार की घोर निशा भी समाप्त हुई और समय इतना बदला कि भ्रष्टाचार विरोध के उस आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव, आज भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल बन चुके हैं।

आज के लिए इतना ही, आगे भी तो बात करनी है।

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13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे

पुरानी कहानी के पन्ने इतने रोचक हैं, कि उनको दोहराते चले जाने का मन करता है। लीजिए एक पन्ना और खोल रहा हूँ।
एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए।
मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के हिसाब से, काल विभाजन का प्रयास शुरू में किया, लेकिन यह सिर्फ समय के हिसाब से घटनाओं को याद करने के लिए है, बेशक कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं तो सीधे तौर पर नौकरी से भी जुड़ी हैं। लेकिन यह तो ऐसी घटनाओं का इतिहास है, जो बड़े पैमाने पर भीतर घटित होती हैं। दिल्ली में रहते हुए तो अधिकांश महत्वपूर्ण घटनाएं, दफ्तर के दायरे से बाहर ही घटित हुई हैं।
दिल्ली में मेरे लिए दफ्तर के अलावा, तीन महत्वपूर्ण घटना-स्थल रहे– दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, आकाशवाणी और काव्य गोष्ठियां/ कवि सम्मेलन। एक विशेष उपलब्धि मेरे जीवन में यह रही कि जिन विशिष्ट कवियों को मैंने लाल किले से कविता-पाठ करते हुए सुना, दिल से उनकी सराहना की,बाद में उनमें से अनेक को हिंदुस्तान कॉपर तथा एनटीपीसी में कार्यरत रहते हुए अपने आयोजनों में आमंत्रित करने तथा उनसे अंतरंग बातचीत करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।
खैर अब ऐसा करता हूँ कि नौकरी बदल लेता हूँ। दिल्ली प्रेस में मैंने 3 वर्ष तक नौकरी की, इस बीच मैंने स्टाफ सेलेक्शन की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया, केंद्रीय नौकरियों में अवर श्रेणी क्लर्क के पद हेतु और इसमें मुझे सफलता भी प्राप्त हो गई। अब मैं अकबर इलाहाबादी साहब की इस सीख का पालन कर सकता था-
खा डबल रोटी, किलर्की कर, खुशी से फूल जा
और वास्तव में ऐसा हुआ कि मैं जो कि एक दुबला-पतला इंसान था, धीरे-धीरे फूलता चला गया।
खैर उद्योग भवन के एलिवेटिड ग्राउंड फ्लोर में, स्थापना-3 अनुभाग में मैं स्थापित हो गया। हमारे कमरे के ऊपर ही पहले मंत्री श्री टी.ए.पाई का कमरा था,जो बेसमेंट से ही लिफ्ट द्वारा अपने फ्लोर पर चले जाते थे। बाद में सरकार बदलने पर श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ आए, जो अक्सर लुंगी पहने हुए, सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए दिख जाते थे।
अब कुछ दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा की बात कर लेते हैं। वहाँ जाना प्रारंभ करते समय मेरी उम्र करीब 25 साल थी। एक युवा शायर वहाँ आते थे जो शायद 18-19 वर्ष के थे, कुंवर महिंदर सिंह बेदी ‘सहर’ के शिष्य थे, नाम था- राना सहरी। उनकी शायरी चमत्कृत करने वाली थी,हम सब लोग उनकी जमकर तारीफ करते थे। बाद में उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हो पाई। जगजीत सिंह ने भी उनकी कुछ गज़लें गाई हैं। जैसे-
मंज़िल न दे चराग न दे, हौसला तो दे
तिनके का ही सही, तू मगर आसरा तो दे।
मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो ज़ुरूर,
लेकिन खमोश क्यों है तू,
कोई फैसला तो दे।
उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर इस तरह हैं –
कोई दोस्त है न रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अज़ीब है।
मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल,
यहाँ सबके सर पे सलीब है।
वो जो इश्क था वो ज़ुनून था,
ये जो हिज़्र है ये नसीब है।
दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के ही एक कवि थे- शैलेंद्र श्रीवास्तव, रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी शादी हुई गाज़ियाबाद में, बारात में हमारे साथ चलने वालों में श्री विष्णु प्रभाकर भी शामिल थे। हमारे लिए उनकी उपस्थिति किसी मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अनुभव तो बहुत अधिक हैं, आगे भी इस बारे में बात होती रहेगी, अंत में एक कवि श्री गोविंद नीराजन के गीत की कुछ पंक्तियां यहाँ प्रस्तुत करना चाहूंगा –
अंधियारे सपनों के संग जिए।

मन को रास नहीं आई छाया,
अंगारों से रैन छुवाई है,
हम खुद से सौ योजन दूर हुए,
अपनों बारंबार बधाई है।
शहनाई को तरूण हृदय के
क्रंदन बांट दिए,
बंदनवार शिशिर घर बांध दिए।
अंधियारे सपनों के संग जिए।।

परी कथा की राजकुमारी सा
कैदी सीमाओं का मेरा मन,
गीत-अगीत सभी पर पहरे हैं,
तट लहरों का सीधा आमंत्रण,
धुंधलाए जलयान
मुंदी पलकों में ढांप लिए
नाम हथेली पर लिख मिटा दिए।
अंधियारे सपनों के संग जिए।।
बातें तो बहुत हैं, टाइम भी बहुत है, फिर बात करेंगे। अभी के लिए नमस्कार।
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12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….

जीवन गाथा के शुरुआती पन्नों में से आज एक पन्ना और दोहरा रहा हूँ।

दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा।

खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक गतिविधियां समानांतर चलती रहीं, जैसे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, जो कि पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने है वहाँ शनिवारी सभा होती थी ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’, जिसमें साहित्यिक अभिरुचि वाले लोग एकत्रित होते थे और नए रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ करते थे। साहित्य सृजन में प्रोत्साहन की दृष्टि से यह शनिवारी सभा बहुत महत्वपूर्ण थी। बहुत से साहित्यकार किसी ज़माने में इसमें शामिल होते रहे हैं। अब पता नहीं यह सभा होती है या नहीं।

सोमवार को सोशल स्टडी ग्रुप की बैठक होती थी, जिसमें से बहुत से नेता उभरकर आए हैं। मैं सोमवार की सभा में कभी-कभी और शनिवारी सभा में अधिकतर जाता था।

इसके अलावा, नियमित रेल यात्रा में, जैसे भजन मंडली वाले अपने साथी खोज लेते हैं, ताश खेलने वाले भी अपनी मंडली बना लेते हैं, ऐसे ही कुछ कवि लोग थे, जो शाम को नई दिल्ली से शाहदरा लौटते थे। मैंने खुद को उनके नियमित श्रोताओं में शामिल कर लिया था।

वो अपनी कविताएं भी लिखते थे, जो ठीक-ठाक थीं, लेकिन कुछ बड़े कवि- शायरों की कविताएं भी पढ़ते थे, मगन होकर गाते थे। इनमें से एक-दो मुझे आज तक याद हैं-

ज़रूर एक नींद मेरे साथ ए मेहमान-ए-गम ले ले,

सफर दरवेश है, ऐ ज़िंदगी थोड़ा तो दम ले ले।

मैं अपनी ज़िंदगानी बेचता हूँ, उनके बदले में,

खुदा चाहे खुदा ले ले, सनम चाहे सनम ले ले।

ज़माने में सभी को मुझसे दावा-ए-मुहब्बत है,

कोई ऐसा नहीं मिलता जो मुझसे मेरे गम ले ले।

ये मेरी ज़िंदगी की आखिरी तहरीर है क़ैफी,

फिर इसके बाद शायद मौत, हाथों से कलम ले ले।

अब आखिरी शेर से ये मालूम होता है कि ये क़ैफी साहब की रचना है।

एक और रचना जिसका पाठ वो सज्जन करते थे, वह है-

बुझी हुई शमा का धुआं हूँ और अपने मरक़ज़ पे जा रहा हूँ,

इस दिल की दुनिया तो मिट चुकी है

अब अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ।

उधर वो घर से निकल चुके हैं

इधर मेरा दम निकल रहा है,

अज़ब तमाशा है ज़िंदगी का

वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ।   

इसके रचनाकर कौन हैं, मुझे मालूम नहीं है।

एक सज्जन थे राधेश्याम शर्मा जी, जो लायब्रेरी की शनिवारी सभा में आते थे और कभी-कभी ट्रेन में भी टकरा जाते थे, उनको ऑडिएंस की काफी तलाश रहती थी और ट्रेन में तो वह मिल ही जाती है। सो ट्रेन में टकराते ही वो बोलते थे, शर्माजी आप कविता सुनाइए। मैं उनसे कहता, ठीक है आप कविता सुनाना चाहते हैं, सुना दीजिए। और वे शुरु हो जाते। उनकी एक प्रिय कविता थी-

तुम्ही ने ज़िंदगी मुझको,

कि अपनी ज़िंदगी कहकर

नशीली आंख का देकर नशा-

मदहोश कर डाला,

मगर कुछ होश बाकी है,

मेरा भी फैसला सुन लो,

सच्चाई है कि मेरी ज़िंदगी की

ज़िंदगी तुम हो।

वो झूम झूमकर इसे गाते थे और काफी तालियां बजवा लेते थे।

दिल्ली प्रेस में काफी बड़े हॉल में हम लोग बैठते थे, एक सेल्समैन वहाँ थे, उन्होंने मेरा नाम रख दिया था- मास्टरजी!, वहाँ सब लोग मुझे इस नाम से ही बुलाते थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी आवाज़ पूरे हॉल में उस तरह पहुंचती है, जैसे क्लासरूम में शिक्षक की आवाज़ पहुंचती है।

खैर दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान ही एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था-

खंडहर गीत

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,

इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,

युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,

टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।

था कभी जो महल, बन वही अब गया,

बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए। 

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए

उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,

भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम

ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,

अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा

मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी

एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,

देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका

अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,

स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,

ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

आज की कथा यहीं विराम लेती है।

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152. ओरांगउटांग

आज मुक्तिबोध जी की एक श्रेष्ठ रचना याद आ रही है, जिसमें विचारधाराओं के युद्ध को लेकर बड़ा सुंदर वर्णन किया गया है, वह कविता या साहित्य के क्षेत्र में हो, राजनीति में हो या किसी अन्य क्षेत्र में हो।

कई बार बाद में ऐसा लगता है कि विचारधारा कहीं पीछे रह गई है और बहस की, दूसरे पक्ष को पराजित करने की उतावली में हमारे नुकीले दांत और पैने नाखून ही बाकी रह गए हैं।

(ओरांगउटांग =वनमानुष)

स्वप्न के भीतर स्वप्न,
विचारधारा के भीतर और
एक अन्य
सघन विचारधारा प्रच्छन!!
कथ्य के भीतर एक अनुरोधी
विरुद्ध विपरीत,
नेपथ्य संगीत!!
मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क
उसके भी अन्दर एक और कक्ष
कक्ष के भीतर
एक गुप्त प्रकोष्ठ और

कोठे के साँवले गुहान्धकार में
मजबूत…सन्दूक़
दृढ़, भारी-भरकम
और उस सन्दूक़ भीतर कोई बन्द है
यक्ष
या कि ओरांगउटांग हाय
अरे! डर यह है…
न ओरांग…उटांग कहीं छूट जाय,
कहीं प्रत्यक्ष न यक्ष हो।
क़रीने से सजे हुए संस्कृत…प्रभामय
अध्ययन-गृह में
बहस उठ खड़ी जब होती है–
विवाद में हिस्सा लेता हुआ मैं
सुनता हूँ ध्यान से
अपने ही शब्दों का नाद, प्रवाह और
पाता हूँ अक्समात्
स्वयं के स्वर में
ओरांगउटांग की बौखलाती हुंकृति ध्वनियाँ
एकाएक भयभीत
पाता हूँ पसीने से सिंचित
अपना यह नग्न मन!
हाय-हाय औऱ न जान ले
कि नग्न और विद्रूप
असत्य शक्ति का प्रतिरूप
प्राकृत औरांग…उटांग यह
मुझमें छिपा हुआ है।

स्वयं की ग्रीवा पर
फेरता हूँ हाथ कि
करता हूँ महसूस
एकाएक गरदन पर उगी हुई
सघन अयाल और
शब्दों पर उगे हुए बाल तथा
वाक्यों में ओरांग…उटांग के
बढ़े हुए नाख़ून!!

दीखती है सहसा
अपनी ही गुच्छेदार मूँछ
जो कि बनती है कविता

अपने ही बड़े-बड़े दाँत
जो कि बनते है तर्क और
दीखता है प्रत्यक्ष
बौना यह भाल और
झुका हुआ माथा

जाता हूँ चौंक मैं निज से
अपनी ही बालदार सज से
कपाल की धज से।

और, मैं विद्रूप वेदना से ग्रस्त हो
करता हूँ धड़ से बन्द
वह सन्दूक़
करता हूँ महसूस
हाथ में पिस्तौल बन्दूक़!!
अगर कहीं पेटी वह खुल जाए,
ओरांगउटांग यदि उसमें से उठ पड़े,
धाँय धाँय गोली दागी जाएगी।
रक्ताल…फैला हुआ सब ओर
ओरांगउटांग का लाल-लाल
ख़ून, तत्काल…
ताला लगा देता हूँ मैं पेटी का
बन्द है सन्दूक़!!
अब इस प्रकोष्ठ के बाहर आ
अनेक कमरों को पार करता हुआ
संस्कृत प्रभामय अध्ययन-गृह में
अदृश्य रूप से प्रवेश कर
चली हुई बहस में भाग ले रहा हूँ!!
सोचता हूँ–विवाद में ग्रस्त कईं लोग
कई तल

सत्य के बहाने
स्वयं को चाहते है प्रस्थापित करना।
अहं को, तथ्य के बहाने।
मेरी जीभ एकाएक ताल से चिपकती
अक्ल क्षारयुक्त-सी होती है
और मेरी आँखें उन बहस करनेवालों के
कपड़ों में छिपी हुई
सघन रहस्यमय लम्बी पूँछ देखती!!
और मैं सोचता हूँ…
कैसे सत्य हैं–
ढाँक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े
नाख़ून!!

किसके लिए हैं वे बाघनख!!
कौन अभागा वह!!

                                                                                   (गजानन माधव मुक्तिबोध) 

आज के लिए मुझे लगता है यह श्रेष्ठ कविता ही बहुत है।

नमस्कार।

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