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50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह

आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है।

ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं।

मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय के साथ-साथ सहिष्णुता लगातार कम होती गई है और इसका किसी एक राजनैतिक दल से सीधा संबंध नहीं है, हाँ एक प्रकार की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी एक राजनैतिक दल के निकट हो सकतेे हैैं  और दूसरी तरह की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी दूसरे दल के निकट हो सकते हैैं।

जैसे मेरे मन में अक्सर ये खयाल आता है कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद यदि आज जिंदा होते, जिन्होंने उनके उपन्यासों और  कहानियों को पढ़ा है, वे विचार करके देख लें, मेरा मानना है कि यदि वे आज लिखे गए होते तो शायद प्रेमचंद जी न जाने कितने मुकदमों का सामना कर रहे होते और फिर उनका समय लेखन में नहीं, अदालतों के चक्कर काटने में बीतता। इनमें से ज्यादातर मुकदमे बहन मायावती जी की विचारधारा वाले लोगों की तरफ से हो सकते थे, कुछ अपने को उच्च वर्गीय और कुलीन मानने वालों की तरफ से भी हो सकते थे।

वैसे असहिष्णुता का यह वातावरण बनाने में कुछ ख्याति पाने की चाहत रखने वालों की भी काफी बड़ी भूमिका है। मुझे लगता है कि कुछ वकील जिनका धंधा ठीक से नहीं चलता, या वे किसी भी कीमत पर प्रसिद्धि पाना चाहते हैं, वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि किसी नई फिल्म में कुछ तो ऐसा मिल जाए जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जा सके। कोई नाम हो- व्यक्ति का या स्थान का या कुछ भी उनके शैतानी दिमाग में ऐसा कारण बन सकता हो, जिसको लेकर मुकदमा ठोका जा सके, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए तो खयाल आता है कि बेचारे प्रेमचंद जी अथवा अन्य पुराने लेखक इन हालात का सामना कैसे करते।

अभी ‘सामना’ शब्द आ गया पिछली पंक्ति में, तो मुझे खयाल आया कि ‘सामना’ वाले, शिव सैनिक तो मौके के अनुसार कभी भारतीय संस्कृति और कभी क्षेत्रीयता की नफरत भरी भावना के अलंबरदार बन जाते हैं। मुझे अचंभा होता है कि  एक ही व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति और संकीर्ण क्षेत्रीयता की भावना, दोनों का प्रतिनिधित्व कैसे किया जा सकता है। हमारे ये महान सड़क छाप सैनिक, फिल्मों के बारे में भी अपनी राय रखते हैं, कि कौन सी फिल्म चलने दी जानी है और कौन सी नहीं। आश्चर्य इस बात का है कि स्वयं को प्रगतिशील मानने वाली पार्टियां ऐसी पार्टी को क्यों बर्दाश्त करती हैं और न्यायालय द्वारा इनको समुचित दंड क्यों नहीं दिया जाता जिससे पुनः ऐसी संस्थागत गुंडागर्दी न की जा सके।

पिछले दिनों एक निर्माणाधीन ऐतिहासिक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब राजस्थान में गुंडागर्दी की गई, ‘करणी सेना’ नाम दिया गया था इस गुंडों की सेना को, इसका मुखिया टी.वी. पर इंटरव्यू देते भी देखा गया, ऐसा लग रहा था अभी ब्यूटी पार्लर होकर आया है, शुद्ध ढोंगी दिख रहा था, और उसकी मनोकामना भी पूरी हो रही थी क्योंकि टीवी पर लोग उसका इंटरव्यू ले रहे थे। गुंडागर्दी करने के पीछे उसकी जो मनोकामना थी, वह पूरी हो रही थी।

असहिष्णुता का साम्राज्य बहुत लंबा है, निःसंदेह इसमें आरएसएस से जुड़े कुछ संगठन, बजरंग दल, गौ रक्षा दल और न जाने किस-किस नाम से हैं, इनके द्वारा भी आजकल जमकर गुंडागर्दी की जा रही है। मोदी जी समय-समय पर इनके विरुद्ध बोलते हैं, लेकिन इतना काफी नहीं है। इनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि दोबारा ये सिर न उठा सकें।

मुझे सचमुच बार-बार ये खयाल आता है कि आज अगर महात्मा गांधी होते तो वे क्या कर पाते और अगर प्रेमचंद होते तो वे क्या लिख पाते।

अंत में, कल ही मेरे मित्र अरुण कुमार मिश्रा जी ने मेरे एक गीत की याद दिलाई, कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, सो आज ही, छोटा सा वह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

बनवासी राम की तरह 

पांवों से धूल झाड़कर,

पिछले अनुबंध फाड़कर

रोज जिए हम-

बनवासी राम की तरह। 

छूने का सुख न दे सके- 

रिश्तों के धुंधले एहसास, 

पंछी को मिले नहीं पर- 

उड़ने को सारा आकाश। 

सच की किरचें उखाड़कर, 

सपनों की चीरफाड़ कर, 

टांक लिए भ्रम,

गीतों के दाम की तरह। 

आज इतना ही सहन कर लीजिए, नमस्कार।

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49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें

कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और  एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,

और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें। 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं, 

उन हक़ीमों से मशविरा कर लें। 

आह के शेर, दर्द की नज़्में, 

इक मुसलसल मुशायरा कर लें। 

अब ये बात तो राजनैतिक मौसम की थी, हालांकि मुझे इस पर आपत्ति है कि ‘राजनैतिक’  में ‘नैतिक’ क्यों आता है।

खैर मेरा मन इस समय चल रहे बरसात के मौसम पर बात करने का है, जो देश भर में बहुत से प्राण ले चुका है। वैसे तो  ये सच्चाई है कि भारत में हर मौसम कुछ जानें लेकर ही जाता है।

यह भी सही है कि  कुदरत की मार जब पड़ती है, तब बड़े से बड़े सूरमा राष्ट्र भी कमज़ोर साबित हो जाते हैं, लेकिन शायद  भारत जैसे देशों में ये मार कुछ ज्यादा घातक होती है।

मैं तो अब गोआ में हूँ, वैसे भी यहाँ के ऊंचे इलाके में हूँ, बहुत बारिश पड़ रही है, यहाँ समुद्र है और ऊंचे-नीचे इलाके हैं। मैंने अभी तक यहाँ, अपने इलाके में, सड़कों पर पानी जमा होते नहीं देखा है। वैसे मैंने पूरा इलाका नहीं देखा है, जितना देखा, उसके आधार पर कह रहा हूँ।

मुझे लगता है, कुदरती तौर पर शहरों में जो ऊंचे-नीचे इलाके होते हैं, बल्कि शहरों की जगह  मैं कहूंगा कि जहाँ शहर बसाए जाते हैं, उन इलाकों में जो चढ़ाइयां और ढलान होते हैं, पानी इकट्ठा होने का जो प्राकृतिक रूट होता है, यदि उसमें अधिक छेड़छाड़ न की जाए, शहरों के किनारे जल संग्रहण के लिए कुछ बड़े-बड़े तालाब- झील आदि बना दिए जाएं, तब कुदरत की यह मार शायद काफी हद तक कम की जा सकती है। इस लिहाज़ से टाउन प्लैनर्स की विशेष भूमिका हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि बाढ़ की, सूखे की जो समस्याएं आती हैं, उनका स्थान आधारित अध्ययन किया जाना चाहिए, ऐसा कोई विभाग यदि है, तो उसमें गंभीर और प्रतिभाशाली लोगों को इस भविष्यमूलक योजना की तैयारी में लगाया जाए, जिससे इन आपदाओं का प्रभाव जहाँ ये कम है वहाँ समाप्त हो और जहाँ अधिक हैं वहाँ कम से कम हो सके और जहाँ तक हो सके, इन आपदाओं के कारण किसी के प्राण न जाएं।

डॉ. राही मासूम रज़ा की कुछ पंक्तियां, इस गंभीर माहौल में शेयर करने का मन हो रहा है, जो शायद उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज़’ में थीं-

कौन आया दिल-ए-नाशाद, नहीं कोई नहीं

राहरौ होगा, कहीं और चला जाएगा, 

गुल करो शमा, बुझा दो, म-औ-मीना-औ-अयाग,

अपनी आंखों के किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो, 

अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आएगा। 

आज मौसम की मार पर यह चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

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कोई तो आसपास हो, होश-ओ-हवास में

जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो यह विचार किया था कि इसमें दलगत राजनीति के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। वैसी कोई बात लिखनी हो तो कहीं और लिख सकता हूँ।

लेकिन जैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, उसी तरह उसके विमर्श का भी कोई स्थाई तरीका या ठिकाना ज़रूरी नहीं है।

कुछ कैरेक्टर लगातार प्रेरित करते हैं कि राजनीति या इसके चरित्रों के बारे में टिप्पणी की जाए। जैसे जब मैं राज्यसभा की कार्यवाही देखता हूँ तो पाता हूँ कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं श्री गुलाम नबी आज़ाद एवं श्री आनंद शर्मा के ठीक पीछे एक बुज़ुर्ग सज्जन बैठते हैं, उनके बुज़ुर्ग स्वरूप को देखते हुए कुछ आदर का भाव भी आता है, लेकिन शायद उनको कोई गंभीर मैडिकल प्रॉब्लम है, वो ज्यादा देर तक कुर्सी पर नहीं बैठ पाते। अचानक हम देखते हैं कि वे कुर्सी छोड़कर सदन के ‘वेल’ में, उपसभापति महोदय के आसन के सामने पहुंच गए हैं और नारे लगाने लगे हैं। और भी लोग होते हैं उनके साथ लेकिन वे क्योंकि अपनी आयु के लिहाज़ से आदरणीय जैसे लगते हैं, इसलिए उनका ज़िक्र किया। ऐसे लोग वैसे जनता के बीच जाकर कोई चुनाव तो नहीं जीत सकते, क्योंकि ऐसा करेंगे तो जनता उनको, उनकी सही जगह, कुंए में पहुंचा देगी।

अब  जबकि परम आदरणीय श्री लालू प्रसाद यादव जी के परिवार  का हर लायक-नालायक सदस्य करोड़पति हो गया है, अगर यह देखते हुए कोई कहे कि लालू जी आप चोर हैंं, तो इसमेंं तो कोई दलगत राजनीति नहीं होगी। इसी शृंंखला मेें अगर आदरणीया बहन मायावती जी का नाम भी ले लिया जाए तो! वैसे और भी बहुत से लोग होंगे, जिनसे कहा जा सकता हैै कि राजनीति आपकी अपनी जगह है, लेकिन भ्रष्टाचार नहीं चलेगा।

हमने देखा है कि श्री बालकवि बैरागी जी लंबे समय से राजनीति में रहे हैं, संसदीय राजभाषा समिति में भी रहे, उनको हमने  कोई छोटी हरकत करते नहीं देखा, राजनीति की शुचिता को उन्होंने बनाये रखा है। ऐसे बहुत से निर्वाचित और मनोनीत साहित्यकार राजनीति से जुड़े रहे हैं, जिन्होंने राजनीति को शुचिता का एक पैमाना दिया है।

श्री बालकवि बैरागी ने अपनी एक कविता में लिखा भी है-

एक और आशीष दो मुझको, मांगी या अनमांगी,

राजनीति के राजरोग से मरे नहीं बैरागी। 

एक कवि हैं श्री संपत सरल, कवि क्या गद्य में व्यंग्य पढ़ते हैं वे, मैंने भी  उनको बुलाया है एक बार अपने आयोजन में, अभी जैसा उभरकर आ रहा है, वे भी अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य लगते हैं। व्यंग्य का एक मुहावरा है जिसको अगर आपने साध लिया है तो आप काफी समय तक तालियां बजवा सकते हैं, लेकिन अंततः ईमानदारी  ही काम आती है। मुझे लगता है कि श्री संपत सरल को कविता की ईमानदारी के बारे में सोचना चाहिए,  मुझे श्री रमेश रंजक जी की पंक्तियां फिर से याद आ रही हैं-

वक्त तलाशी लेगा, वो भी चढ़े बुढ़ापे में,

संभलकर चल, 

वो जो आयेंगे, छानेंगे, कपड़े बदल-बदल

संभलकर चल, 

वैसे अब क्या कहा जाए, पाकिस्तान में भी ‘शरीफ’ का ज़माना नहीं रहा।

राजनीतिज्ञ अपनी ही अलग दुनिया में रहते हैं, चमचों की जयकार के बीच उनको यह एहसास ही नहीं रहता कि उनके पैरों के नीचे ज़मीन है भी या नहीं।

अंत में मुझे अपनी लिखी हुई पंक्तियां याद आ रही हैं-

वे खुद बने हैं रोशनी, लिपटे कपास में, 

कैसे अजीब भ्रम पले दिन के उजास में।

कुछ अपनी बदहवासियां उनको पता चलें, 

कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में। 

नमस्कार।

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47. छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन 

हाल में हुई एक घटना पर टिप्पणी करने का मन हो रहा है।

इस घटना के पात्र हैं सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और आज के लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास ।

घटना के बारे में चर्चा करने से पहले, इन दोनों पात्रों के बारे में कुछ बात कर लेते हैं।

श्री अमिताभ बच्चन जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आज वे पूरी दुनिया में भारत का नाम रौशन कर रहे हैं। एक बात और उनके बारे में मानी जाती है कि जब कोई उनसे बात करता है तो ऐसा लगता है कि अमिताभ बच्चन आप नहीं बल्कि दूसरा व्यक्ति है। इतनी अधिक विनम्रता और दूसरे को सम्मान देने का भाव, यह माना जा सकता है कि आपको, आपके पिताश्री डॉ. हरिवंश राय बच्चन से मिला है, जो हिंदी के एक विख्यात कवि थे, श्रेष्ठतम कवियों में उनकी गिनती होती थी और अपनी रचना – ‘मधुशाला’ के माध्यम से वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे, क्योंकि सामान्य श्रोता समुदाय गंभीर साहित्यिक रचनाओं से अधिक नहीं जुड़ पाता यह भी सच्चाई है, गंभीर रचनाओं को सुनने-पढ़ने वाले अपेक्षाकृत बहुत कम होते हैं।

हाँ तो इस घटना के दूसरे पात्र हैं- डॉ. कुमार विश्वास, जो आज के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। डॉ. कुमार विश्वास से मेरी कई बार मुलाकात हुई है, मैंने उनको एनटीपीसी के कुछ आयोजनों में भी आमंत्रित किया और मुझे यह  कहने में कोई संकोच नहीं कि उनके कारण हमारे ये आयोजन अत्यंत सफल रहे थे। बाद में जब वे राजनीति  से जुड़ गए, उसके बाद उनका फोन उनके स्थान पर उनका पी.ए. उठाने लगा और हमारा संपर्क टूट गया।

यह एक सच्चाई है कि डॉ. कुमार विश्वास भी आज पूरी  दुनिया में लोकप्रिय हैं और देश के सबसे महंगे गीत कवि हैं। साहित्यिक श्रेष्ठता की बहस अपनी जगह है लेकिन शायद हाल के वर्षों में किसी गीत कवि के प्रति श्रोताओं में इतनी दीवानगी नहीं देखी गई है।

एक बात और याद आ रही है जो मैंने उन दिनों पढ़ी थी जब बड़े बच्चन जी, मतलब डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी जीवित थे। घटना जैसी मैंने पढ़ी थी, इस प्रकार थी कि श्री अमिताभ बच्चन शुरू की कुछ फिल्में कर चुके तब उनके पिता- डॉ. बच्चन अपनी जीवन भर की कमाई से कुछ राशि उनके भाई अजिताभ को व्यवसाय में लगाने के लिए देने लगे, तब अमिताभ जी ने कहा कि आप  रख लीजिए, इनसे कुछ नहीं होगा और उससे काफी बड़ी राशि का चेक काटकर अपने भाई को दे दिया।

इस घटना से जैसा बताया गया कि डॉ. बच्चन को काफी सदमा लगा था कि मेरी जीवन भर की कमाई किसी काम की नहीं है। उस रिपोर्ट में ऐसा बताया गया था कि डॉ. बच्चन ने उसके बाद अपनी कुछ रचनाएं भी जला दी थीं।

यह एक  स्टोरी थी जो  कहीं पढ़ी थी, मेरा कोई दावा नहीं है कि यह सही होगी, लेकिन इसमें साहित्य और फिल्मों की कमाई, विशेष रूप से सुपर स्टार की कमाई की जो तुलना दर्शाई गई है, वह तो सही है।

एक बात यह भी मैं कहना चाहता हूँ कि श्री अमिताभ बच्चन जी, डॉ. बच्चन के जैविक पुत्र तो हैं ही और इस नाते उनकी रचनाओं पर व्यवसाय करने का अधिकार तो उनको ही है,  लेकिन डॉ. बच्चन के मानस पुत्र, उनकी परंपरा के वाहक तो हमारे कवि बंधु ही हैं, और उनमें डॉ. कुमार विश्वास भी शामिल हैं।

अब घटना जैसा आप सभी जानते होंगे यह थी कि डॉ. कुमार विश्वास ने बच्चन जी की एक कविता – ‘निशा निमंत्रण’ कहीं, उनका स्मरण करते हुए, अपनी आवाज़ में गाई थी और इस पर अमिताभ जी ने लाखों का दावा कर दिया था।

सचमुच मुझे अमिताभ जी की यह कार्रवाई उनके विनम्र स्वभाव के अनुकूल नहीं लगी, और मुझे यह भी लगा कि कविता के कॉपीराइट को शायद उन्होंने फिल्म जैसा समझ लिया।

सच्चाई यह है कि सामान्य श्रोता समुदाय में अधिकांश लोग ऐसे होंगे जिन्होंने इस गीत को डॉ. कुमार विश्वास ने गाया, इसलिए सुन लिया हो, वरना गंभीर रचनाओं का कोई श्रोता समुदाय नहीं है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच्चाई है।

आज डॉ. गिरिजाकुमार माथुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ-

 

छाया मत छूना मन
होता है दुख दूना मन 

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।

भूली-सी एक छुअन 
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन 

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।

जो है यथार्थ कठिन 
उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन 

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे 
कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

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46. हर-एक कदम पे तलाशा किया रक़ीब नए,  मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं। 

काफी लंबा अंतराल हो गया इस बार।

इस बीच 3 जुलाई को हम गुड़गांव छोड़कर गोआ में आ बसे। यह हमारा नया ठिकाना है और मुझे अभी तक भ्रम रहता है कि ‘गोआ’  लिखूं या ‘गोवा’।

खैर, यह बता दूं कि गुड़गांव छोड़ने से पहले मेरे लैपटॉप ने हल्का सा स्नान कर लिया था, चुल्लू भर पानी चला गया था उसके अंदर, समय नहीं था वहाँ पर, वरना मेरा बेटा नेहरू प्लेस से ठीक करा लाता। वहाँ अच्छे-अच्छे बिगड़े हुए ठीक हो जाते हैं (लैपटॉप), उस जगह का नाम, नेहरू जी के साथ ऐसे ही नहीं जुड़ गया है। यहाँ गोआ का नेहरू प्लेस कहाँ है, है भी या नहीं, ये धीरे-धीरे पता चलेगा। एक ने कुछ दिन अपने पास रखा, फिर वापस कर दिया, कहा कि पार्ट नहीं मिल रहा है और अब जीएसटी के कारण मिलेगा भी नहीं। ये वह बात है जो उन सज्जन ने बताई, जो लैपटॉप ठीक नहीं कर पाए।

इस बीच मेरे लिए नए लैपटॉप का प्रबंध कर दिया गया, अब मैं तो कुछ करता नहीं हूँ। जो गपशप करनी आती है, ज्ञान बांटने का शौक है, वही पूरा कर रहा हूँ।

मैं ब्लॉग पहले ‘वर्ड फाइल’ में लिखता हूँ और उसके बाद यहाँ पेस्ट करता हूँ, नए लैपी में अभी एमएस वर्ड लोड नहीं है, सो पहली बार डायरेक्ट यहाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

पहले लगातार इतने दिनों तक ब्लॉग लिखे कि पढ़ने वाले भी थक गए होंगे, अभी जब इतना लंबा अंतराल आया तब यह देखकर अच्छा लगा कि काफी दिनों के बाद भी कुछ नए लोग मेरे ब्लॉग्स को फॉलो करना शुरू कर रहे हैं। ऐसे में और ज़रूरी लगने लगता है कि कुछ न कुछ तो शेयर किया जाए।

इससे पहले गोआ में कभी टूरिस्ट के रूप में नहीं आया और अब देखना कि टूरिस्ट यहाँ पर क्या देखते हैं! इस बीच दो-तीन ‘बीच’  देखीं, एक तो एरियल डिस्टेंस की दृष्टि से घर के बहुत पास है, लेकिन उतार और चढ़ाई इतनी अधिक है कि अपने स्वभाव के अनुसार एक बार पैदल चला गया और फिर वापस भगवान के किसी दूत को ही अपनी गाड़ी में लाना पड़ा, क्योंकि बारिश भी आ गई थी, जो आजकल कब आ जाए पता नहीं चलता।

खैर आज लंबी बात नहीं करूंगा। यह आश्वासन या धमकी नहीं दूंगा कि अब से रोज़ लिखूंगा, लेकिन शायद इतना लंबा अंतराल भी नहीं आने दूंगा।

पता नहीं क्यों, सूर्यभानु गुप्त जी की दो-तीन गज़लें कुछ दिन से ज़ुबान पर आ रही हैं, कुछ शेर जो याद हैं,  आज शेयर कर रहा हूँ-

 

जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं, 

नदी में बांध के पत्थर उतर गया हूँ मै। 

मेरे लहू में किसी बुत-तराश का घर है, 

जिधर बनी हैं चट्टानें, उधर गया हूँ मैं। 

हर-एक कदम पे तलाशा किया रक़ीब नए, 

मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं। 

तेरा बदन जो उठा ज़ेहन में हवा होकर, 

रुई की तरह हवा में बिखर गया हूँ मैं। 

एक अच्छा शेर कह के मुझको ये महसूस हुआ, 

बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं। 

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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45. हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ

हाँ तो कहाँ जाना है- गोआ!

जो एक पर्यटक के रूप में वहाँ गए हैं, उनके मन में एक छवि होगी गोआ की, लेकिन वहाँ रहने वाले के लिए तो गोआ कुल मिलाकर, वही नहीं होता, जो किसी पर्यटक के लिए होता है!

हालांकि जब मैं एक वर्ष तक मुंबई रहा, उस दौरान मेरे लिए समुद्र किनारे का आकर्षण वैसा ही बना रहा था, जैसा किसी पर्यटक के लिए होता है। बाद में जब फिर से 3 महीने मुंबई रहा, तब घुमक्कड़ी की वह प्रवृत्ति काफी कम हो गई थी।

आज की तारीख में मेरी अपनी उम्र और अवस्था को देखते हुए, पता नहीं क्यों गोआ के नाम पर मुझे बॉबी के प्रेम नाथ याद आते हैं, मछुआरों के सरदार।

खे खेखे खेखे ओ रे साहिबा, प्यार में सौदा नहीं

या फिर- तेरा लड़का कहीं मुंसीपॉलिटी के गटर में पड़ा होगा!

दूर से किसी शहर के बारे में पढ़कर, लोगों से सुनकर जो धारणा हम बनाते हैं, वह कितनी सच उतरती है, जब हम वहाँ पहुंचते हैं, घूमने के लिए नहीं, रहने के लिए!

मुंबई में, जैसा मैंने पहले बताया, दो बार रहा मैं, पहली बार तो कंपनी का क्वार्टर था, पवई में प्राइम लोकेशन पर, टॉप 14 वां फ्लोर, कहीं कोई दिक्कत नहीं, बस यही है कि रहने का मन था, लेकिन राजनीति का शिकार होकर लौट आया,एक वर्ष से कम समय में!

दूसरी बार मेरे रिटायर होने के बाद, जब बेटे ने जॉइन किया था एक प्रायवेट कंपनी में, तब अंधेरी पश्चिम में एक सोसायटी में रहे थे, कुल मिलाकर 3 महीने तक। इस बार कारण यह था कि बेटे को काम पसंद नहीं आया और हमने 3 महीने बाद ही वापस लौटने का फैसला किया।

तो इस बार हम एक सोसायटी में रहे थे, ग्राउंड फ्लोर पर। सोसायटी जिसके कर्णधारों को शायद अपने मराठी मानुस होने का काफी घमंड था और उसमें हमारी मकान मालकिन थी, एक पढ़ी-लिखी क्रिश्चियन महिला। इस महिला के पढ़ी-लिखी होने के उल्लेख, का विशेष उद्देश्य शायद यह भी है, कि सोसायटी के कर्णधारों के लिए उनकी असभ्यता ही उनकी पहचान थी, लेकिन ये महिला उनसे जमकर टक्कर ले रही थी।

इस प्रकार कई बार स्थानीय मूल्यों का परिचय काफी असभ्य तरीके से भी होता है, उसी के बीच पता चलता है कि मूल्य क्या हैं और लोगों की अपने बारे में गलतफहमी क्या हैं। हम तो खैर वहाँ कम समय ही रहे, लेकिन इस बीच भी हमारी मकान-मालकिन सोसायटी के सैक्रेटरी को थाने से घुड़की दिलवा चुकी थी।

यह भी बड़े अफसोस की बात है कि मुंबई में, जगह-जगह लहराते शिव सेना के झंडे, सामान्यतः यही संदेश देते हैं, कि यहाँ सदा असभ्यता का, दादागिरी का ही पर्चम लहराता रहेगा। मेरे विचार में पढ़े लिखे और बड़ी सोच वाले स्थानीय लोगों को इसे दूर करना चाहिए, कुछ हद तक हुआ भी है शायद, लेकिन ठाकरे परिवार के कागज़ी शेर अब कुछ ज्यादा उत्तेजित हैं, ऐसा लगता है।

ये इधर-उधर की बातें करने के बाद, आज अहमद फराज़ साहब की एक लंबी गज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, इसके कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं और मैं भी शौक से गुनगुनाता रहा हूँ-

 

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझको दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ।


यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्साँ जानाँ।

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ।

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ।

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ।

मुद्दतों से ये ही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ।


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ।

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जानाँ।

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ।

                                          -ज़नाब अहमद फराज़

 

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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44. बंद दरवाजे ज़रा से खोलिये रोशनी के साथ हंसिए बोलिये

संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी है। ऐसे में भी मौका मिलने पर बात तो की जा सकती है। समय है गुड़गांव से गोआ शिफ्ट होने का, गुड़गांव के साथ 7 वर्ष तक पहचान जुड़ी रही, अब गोआ अपना ठिकाना होगा।

आज मन हो रहा है कि एक बार फिर से निगाह डाल लें, उस ठिकाने पर जहाँ कभी एकदम शुरू में मेरा बसेरा रहा। भोला नाथ नगर, जहाँ रहकर शिक्षा प्रारंभ होने से लेकर दो प्रायवेट नौकरियां और उद्योग भवन में सरकारी नौकरी भी की और वहाँ से प्रतिनियुक्ति पर संसदीय राजभाषा समिति में भी रहा।

अपने मोहल्ले में मैंने एक मुल्तानी बाबाजी का ज़िक्र किया था, जो घर के सामने ही रहते थे, ज्योतिषी भी थे, अपने कमरे में सुई धागे से लेकर सब कुछ रखते थे, बोलते थे कि वे किसी पर निर्भर नहीं हैं, उनका परिवार पीछे की तरफ रहता था, लेकिन उनकी बात अपने परिवार वालों के मुकाबले, बाहर वालों से ज्यादा होती थी। हाँ उनका नाम मुझे उस समय याद नहीं आया था, उनका नाम था- श्री ठाकुर दास जी।

दिल्ली की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं में, डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी को आकाशवाणी में इंटरव्यू के लिए, अगवानी करके लाना और इंटरव्यू के समय आकाशवाणी के स्टूडियो में उनके साथ रहना, संजय गांधी की मृत्यु पर श्रीमती इंदिरा गांधी के बंगले पर जाना, क्योंकि वह संसदीय राजभाषा समिति के हमारे कार्यालय के पास ही था, और यह कि वहाँ मनोज कुमार आए और मुझको लगभग धकेलते हुए अंदर चले गए।

एक घटना और याद आ रही है, आपात्काल के संघर्ष के बाद, जब मोरारजी भाई के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनने वाली थी और जॉर्ज फर्नांडीज़ सरकार में शामिल होने से इंकार कर रहे थे। उस समय एक शाम की घटना है, जब दिल्ली में कांस्टीट्यूशन क्लब के निकट, सड़क पर ही भारी भीड़ ने उनको घेर लिया था, ‘जॉर्ज आपको मंत्री बनना ही होगा’ लगातार यह आग्रह करते हुए और आखिर में जॉर्ज फर्नांडीज़ को इसके लिए मना ही लिया था कि वे मंत्री बनेंगे। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था।

बाद में तो मंत्री बनने के बाद जॉर्ज का कार्यालय उद्योग भवन के उसी कमरे के ऊपर था, जिसमें स्थापना-3 अनुभाग में, मैं तैनात था।

जयप्रकाश जी का आंदोलन एक पवित्र आंदोलन था लेकिन कितनी अज़ीब बात है कि लालू प्रसाद यादव भी इसी आंदोलन की उपज थे। शायद यही कारण है कि इस आंदोलन के परिणाम उतने क्रांतिकारी नहीं रहे, जैसे होने चाहिए थे। हर जगह अपने कैरियर की प्लानिंग के साथ चलने वाले लोग भी शामिल होते हैं, जैसे कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन में भी थे, बल्कि अन्ना को तो राष्ट्रीय मंच पर ही ऐसे लोग लेकर आए थे, जिनके मन में प्रारंभ से ही अपने कैरियर का रोड-मैप तैयार था, भले ही वे दिखा यही रहे हों कि वे भी अन्ना की तरह, निःस्वार्थ भाव से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं।

खैर, यह दिल्ली की महानगरी भी अजीब है जिसमें, जिसके आसपास पहले 30 वर्ष और फिर से 7 वर्ष रहने का अवसर मिला, अब फिर से अपने सपनों की उस माया-नगरी के अपेक्षाकृत नज़दीक़ रहने का अवसर मिल रहा है, जहाँ पहले एक वर्ष और फिर एक बार 3 महीने रहा था, याने मुंबई के पास, गोआ में।

संभव है फिर से कभी इधर आना हो, आस तो नहीं खोनी चाहिए या फिर वहाँ ऐसा लगे कि इधर आने का मन ही न हो, ज़िंदगी के स्पेस की भी तो लिमिट है न!

हिंदी कवियों में एक तो भवानी दादा थे, जो बातचीत के अंदाज़ में कविता पाठ करते थे, एक और थे- डॉ. बाल स्वरूप राही, वे हमेशा मुस्कुराते रहते थे और बात करने के अंदाज़ में कविता पाठ करते थे, उनका एक गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ- ‌

 

इस तरह तो दर्द घट सकता नहीं
इस तरह तो वक्त कट सकता नहीं
आस्तीनों से न आंसू पोंछिये
और ही तदबीर कोई सोचिये।

यह अकेलापन, अंधेरा, यह उदासी, यह घुटन
द्वार तो है बंद, भीतर किस तरह झांके किरण।

बंद दरवाजे ज़रा से खोलिये
रोशनी के साथ हंसिए बोलिये
मौन पीले–पात सा झर जाएगा
तो हृदय का घाव खुद भर जाएगा।

एक सीढ़ी हृदय में भी, महज़ घर में ही नही
सर्जना के दूत आते हैं सभी हो कर वहीं।

यह अहम की श्रृंखलाएं तोड़िये
और कुछ नाता गली से जोड़िये
जब सड़क का शोर भीतर आएगा
तब अकेलापन स्वयं मर जायगा।

आइये कुछ रोज कोलाहल भरा जीवन जियें
अँजुरी भर दूसरों के दर्द का अमृत पियें।

आइये बातून अफवाहें सुनें
फिर अनागत के नये सपने बुनें
यह सलेटी कोहरा छंट जाएगा
तो हृदय का दुख खुद घट जाएगा।

                                                   -डॉ. बालस्वरूप राही

 फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना

मैंने पिछले 42 दिनों में, अपने बचपन से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था-

बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ।

मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार हमारे अंग्रेजी शिक्षक ने स्पेयर पीरियड में हमसे एक निबंध लिखने को कहा था-‘इफ आइ वर ए माली’, मैंने रफ कॉपी में वह निबंध लिखा था और सब छात्रों की तरह उनको सुना दिया था। बाद में उन शिक्षक ने मुझसे वो निबंध मांगा था, क्योंकि उनको लगा होगा कि उसमें कुछ ऐसे पॉइंट्स थे जो वे शिक्षण हेतु अपने ड्राफ्ट में शामिल कर सकते थे। लेकिन मैं उनको वह नहीं दे पाया था, क्योंकि मैंने उसे रफ कॉपी में लिखा था और फाड़ दिया था।

मेरे ये ब्लॉग, आज की तारीख में लिखे गए नए ड्राफ्ट हैं, लेकिन ये रफ कॉपी में नहीं लिखे गए हैं। संभव है कि भविष्य मेरे कोई गुरू इनकी मांग करें तो मैं संजोकर इनको दे सकता हूँ अथवा संभव है कि किसी प्रकार पुस्तक रूप में प्रकाशन की सनक भी चढ़ जाए तो इनका सदुपयोग किया जा सकता है। मेरी कुछ कविताएं भी इस बहाने सुरक्षित हो जाएंगी। इसलिए इसका ज्यादा महत्व नहीं है कि कितने लोग इसको पढ़ते हैं।

अतीत में झांकना इंसान को अच्छा लगता है, क्योंकि जो घटनाएं अपने समय पर अत्यंत पीड़ादायक रही हों, वे भी आज की तारीख में सुरक्षित अनुभव और मार्गदर्शक बन जाती हैं।

लेकिन फिर भी, कब तक अतीत में रहा जाए, जंप लगाकर वर्तमान में आना अच्छा रहेगा?

चलिए ऐसा ही करते हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद 1 मई, 2010 से कुछ महीने तक हम लखनऊ के अपने घर में रहे, जिसे बड़ी मेहनत से अर्जित और विकसित किया था, लेकिन जल्दी ही एहसास हुआ कि हमें दिल्ली, ग़ुड़गांव आना होगा बच्चों के पास। मकान को अर्जित करने के लिए पत्नी और बच्चों ने अधिक मेहनत की थी, निपटाने के लिए मैंने ज्यादा की, क्योंकि उसके लिए दिल्ली/गुड़गांव से कई बार लखनऊ आना पड़ा।

कुछ समय दिल्ली में मालवीय नगर के पास और उसके बाद गुड़गांव में 2-3 जगहों पर 5-6 साल तक रहे और अभी 6 महीने पहले ही एक हाई राइज़ टॉवर्स वाली सोसायटी में शिफ्ट हुए, बड़ी खूबसूरत सोसायटी है, पत्नी और बेटों ने लगभग 6 महीने तक भटककर यह आवास चुना, 9वें फ्लोर पर रहते हैं, मैं एकदम वर्तमान में आ गया हूँ।

सोसायटी में जैसा आप जानते हैं, प्रवेश करने पर आगंतुकों को जिसके यहाँ जा रहे हैं उससे संपर्क करना होता है, तब प्रवेश मिलता है। बाहर निकलते समय यदि आप कार में हैं, तो कोई तलाशी नहीं होती, आप यहाँ से कुछ लेकर भी जा सकते हैं। अगर आप पैदल बाहर जा रहे हैं और पूरे फॉर्मल कपड़े पहने हैं तो गेट पर आपकी पूरी तलाशी होगी।

अगर आप बंडी और निक्कर में हैं, तो गार्ड समझ जाएगा कि बंदा यहीं रहता है और सोसायटी में फ्लैट खरीदने या किराये पर लेने में, बेचारा लुट-पिट चुका है, इसकी क्या तलाशी लेनी, और वह आपको ऐसे ही जाने देगा।

खैर,ये तो मज़ाक था, मैं आपको एकदम वर्तमान में ले आया और अब भविष्य की बता दूं। मैंने शुरू में भी काल देवता और स्थान देवता की बात की थी।

बताना यह है कि अब स्थान देवता बदलने वाले हैं। यह संक्रमण काल है, पैकिंग चल रही है। 8-10 दिन में ही अपना शहर गुड़गांव से बदलकर गोआ होने वाला है। बच्चे तो कई बार गोआ घूमकर आए हैं, लेकिन हम पति-पत्नी पहली बार जाएंगे, और अब वहीं रहेंगे।

इसलिए सूचना यह है कि अब शायद अगले ब्लॉग गोआ से ही लिखे जाएंगे, जहाँ तक पूर्वानुमान है वे वर्तमान को लेकर ही होंगे और उनके केंद्र में, मैं स्वयं नहीं रहूंगा। वैसे अतीत का एरिया तो अपनी ही प्रॉपर्टी है, जब कभी मन हो, वहाँ जा सकते हैं।

चलिए अब श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई
दूर कहीं दो आँखें भर-भर आईं सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना
यहाँ तुम्हारा क्या, कोई भी नहीं किसी का अपना
समझ अकेला मौत मुझे ललचाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे
जाते-जाते चाँद कह गया मुझसे बड़े सकारे
एक कली मुरझाने को मुसकाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

जल्दी ही फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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42. इस धरती से उस अम्बर तक,दो ही चीज़ गज़ब की हैं, एक तो तेरा भोलापन है,एक मेरा दीवानापन।

मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे लगा कि जो कुछ वहाँ हुआ, वह पहले भी हो चुका था। राजनीति की कोई कितनी बात करेगा!

ऊंचाहार में भी मुझे भरपूर प्यार मिला, कवि सम्मेलनों के आयोजन, पहले की तरह नियमित रूप से होते रहे। जैसा मैंने पहले भी अनेक बार उल्लेख किया है, कवि सम्मेलन में शिष्ट हास्य भी मैंने समुचित मात्रा में रखने की हमेशा कोशिश की है, लेकिन मेरे प्रिय रहे हैं गीत कवि, जैसे- नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज आदि, भारत भूषण जी का मंचों पर आना तो उस समय तक लगभग बंद हो गया था।

एक बात मैंने ऊंचाहार में रहते हुए नोट की, कि नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज जैसे महान गीतकारों को लोग सुन भर लेते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई उत्साह नहीं, जैसे हास्य कविता को सुनकर होता है। मुझे इससे पीड़ा होती थी। शायद वहाँ का श्रोता समुदाय अधिक युवा था। जो भी कारण हो, मुझे यह ठीक नहीं लगता था।

ऐसे में, मैं मानता हूँ कि यह अन्याय होगा कि मैं डॉ. कुमार विश्वास का ज़िक्र न करूं। मुझे कुछ ऐसा लगा कि जिस प्रकार राज कपूर ने, मेरा नाम जोकर के अपेक्षित सफलता प्राप्त न करने पर, बॉबी बनाकर यह चुनौती दी थी कि इसको फेल करके दिखाओ, उसी प्रकार हमने डॉ. कुमार विश्वास को अपने कवि सम्मेलनों का हिस्सा बनाकर, श्रोताओं को यह चुनौती दे डाली और हम इसमें पूरी तरह सफल हुए थे।

मैं यह मानता हूँ कि गीतों के प्रति डॉ. कुमार विश्वास के समर्पण में कोई कमी नहीं है। उन्होंने भी बहुत संघर्ष किया है। शुरू में जब वे सीधे गीत पढ़ने के लिए मंच पर जाते थे, तब कुछ स्थापित गीतकारों ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया।

बाद में डॉ. कुमार विश्वास ने मंच संचालन में अपनी वाक-पटुता और जो कुछ भी मसाला संचालन के लिए आवश्यक हो उसका प्रयोग करके, अपनी ऐसी जगह बनाई कि मंच पर उनका होना, आयोजन की सफलता की गारंटी बन गया।

डॉ. कुमार विश्वास हमारे आयोजनों में तीन बार ऊंचाहार आए और उनके सहयोग से हमने ऐसे अनेक कवि-शायरों को भी सुनने का अवसर प्राप्त किया, जिनसे मेरा संपर्क नहीं था और यह भी बात है कि भरपूर हास-परिहास के बाद वो ऐसा वातावरण बनाते हैं, इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कवियों को, कि लोग मधुर गीतों, रचनाओं को भी पूरे मन से सुनते हैं।

एक और बात कि हमने तीन बार उनको बुलाया, पहली बार उन्होंने कुछ मानदेय लिया, अगली बार उसका दो-गुना, और तीसरी बार तीन गुना। आज जितनी राशि वो लेते हैं, उसको देखते हुए, परियोजनाओं में उनको बुलाना बहुत कठिन है। मुझे खुशी है इस बात की, कि कोई गीत कवि सुरेंद्र शर्मा जैसे लोगों को टक्कर दे रहा है, जो कवि न होते हुए भी बहुत मोटी रकम लेते हैं।

डॉ. कुमार विश्वास के संचालन में जहाँ हमने ज़नाब मुनव्वर राना जी को दो-तीन बार सुना, ओम प्रकाश आदित्य जी भी उनके द्वारा संचालित आयोजन में आए थे, वहीं कुछ ऐसे प्रतिभावान कवि-शायर भी उनके माध्यम से हमारे आयोजनों में आए, जिनसे हमारा कोई संपर्क नहीं था। मेरे खयाल में, कम से कम ऊंचाहार में तो डॉ. कुमार विश्वास द्वारा संचालित ये तीन कवि सम्मेलन सर्वश्रेष्ठ थे।

डॉ. कुमार विश्वास आज देश-विदेश के श्रोताओं के दिलों पर राज करते हैं, उनकी कुछ रचनाओं की बानगी प्रस्तुत है, इनमें मैंने जान-बूझकर उनके सर्वाधिक लोकप्रिय मुक्तक शामिल नहीं किए हैं।

 

वो जिसका तीर चुपके से, जिगर के पार होता है,

वो कोई गैर क्या, अपना ही रिश्तेदार होता है,

किसी से अपने दिल की बात न कहना तू भूले से,

यहाँ तो खत भी थोड़ी देर में अखबार होता है।

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कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ,

किसी के इक तरन्नुम में, तराने भूल आया हूँ,

मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आस्मां वालों,

मैं इक चिड़िया की आंखों में उड़ानें भूल आया हूँ।

********************

जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उम्र मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ।

***************

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की हैं,
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन।

*******************

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह नहीं पाया।

आज का ब्लॉग डॉ. कुमार विश्वास को समर्पित है।

नमस्कार।

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41. मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!

मैंने कितनी नौकरियों और अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के बहाने से अपनी राम-कहानी कही है, याद नहीं। लेकिन आज दो नौकरियों की याद आ रही है, जिनका ज़िक्र नहीं हुआ। जाहिर है ये काम मैंने शुरू के समय में, बेरोज़गार रहते हुए, शाहदरा में निवास के समय ही किए थे।

एक नौकरी थी फिल्म देखने की, और इस नौकरी के दौरान मैंने एक सप्ताह तक फिल्म देखी, फिल्म थी ‘हमराज़’,   हर रोज़ फिल्म के चारों शो! मैं तैनात था फिल्म वितरक की तरफ से, डिस्ट्रीब्यूटर के नाम से ज्यादा जानते हैं शायद उसको, और मेरा काम था कि हर शो शुरू होने के बाद, प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली बची थीं यह देखना और यह विवरण मैंने दे दिया संबंधित व्यक्ति को, उसके बाद मैं चाहूं तो फिल्म देखता रहूं या बाहर टहलकर अगला शो शुरू होने का इंतज़ार करूं।

मैं रहता था शाहदरा में, और यह ड्यूटी मेरी गांधी नगर के किसी सिनेमा हॉल में लगी थी, इस प्रकार शो के बीच में घर जाकर वापस आने की तो गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक-दो बार तो फिल्म लगभग पूरी देखी, उसके बाद अक्सर मैं गाने सुनने के लिए हॉल में आ जाता था, जबकि सामान्यतः लोग इसका उल्टा करते हैं। शायद पहली बार महेंद्र कपूर के कई गाने इस फिल्म में आए थे और वे बहुत लोकप्रिय भी हुए थे। ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो’ आदि।

अगर मुझे सही याद है तो इसी फिल्म के लिए महेंद्र कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था और जैसा मैंने पढ़ा है, उस समय के किसी स्थापित गायक ने उनको बधाई तक नहीं दी थी। लेकिन इस घटना के अगले दिन, उदार हृदय वाले अमर गायक मुकेश जी महेंद्र कपूर जी के घर बधाई देने चले गए थे। इस घटना का महेंद्र कपूर जी ने बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है।

खैर, मैं अपनी ड्यूटी की बात कर रहा था, फिल्म के नायक राजकुमार तो अपनी अदाओं के लिए जाने ही जाते हैं, फिल्म में एक नई हीरोइन भी आई थी, जो बाद में पता नहीं कहाँ चली गई। फिल्म की कहानी तो बिल्कुल याद नहीं है (वैसे मेरा कहानी सुनाने का इरादा बिल्कुल नहीं है) हाँ राजकुमार के सफेद जूते ध्यान में आते हैं, शायद उनकी कहानी के सस्पेंस में, विशेष भूमिका थी।

यह किस्सा मैंने सुनाया एक सप्ताह की नौकरी का, उसका पैसा कितना मिला था याद नहीं और शायद बाद में वितरक को मेरी ज़रूरत नहीं पड़ी।

अब दूसरी नौकरी की कहानी सुना देता हूँ, ये नौकरी चली सिर्फ एक दिन। कोई टायर री-ट्रेडिंग कंपनी थी, उसकी तरफ से अन्य लोगों की तरह मुझे भी तैनात कर दिया गया था, एक पैट्रोल पंप पर। शायद झंडेवालान के पास था पेट्रोल पंप, सही याद नहीं।

तो हमको वहाँ पेट्रोल पंप पर रहना था, ऐसा दिखाना था कि हम पेट्रोल पंप के ही लोग हैं। जो लोग पेट्रोल भरवाने आते हैं, उनसे ठीक से बात करनी थी, कोई सहायता संभव हो तो करनी थी और निगाह टिकाये रखनी थी उनकी गाड़ी के टायरों पर, अगर कोई टायर घिसा हुआ मिल गया, तब हमारा काम था कि उनके शुभचिंतक बनकर उनको बताएं कि आपको टायर रीट्रेड कराने की ज़रूरत है, और हम आपकी सहायता के लिए मौज़ूद हैं, हम यहीं घिसा हुआ टायर निकालकर, उसके स्थान पर एक काम-चलाऊ टायर लगा देंगे और अगले दिन आप अपना री-ट्रेड किया हुआ टायर ले जा सकते हैं।

कुल मिलाकर किस्सा इतना कि दिन भर के प्रयास के बाद मुझे एक ग्राहक मिल गया। मुझसे काफी देर तक मालिक ने पूछा कि आपने उसको कैसे तैयार किया।

मैं इस सफलता से काफी उत्साहित था, लेकिन शाम के समय कुछ ऐसा हुआ कि मैं फिर से काम पर नहीं गया। कंपनी के मालिक शायद सरदार जी थे, उन्होंने मुझसे कहा- “मि. शर्मा, यू मे नॉट बी वेल ड्रेस्ड, बट यू मस्ट बी वेल प्रेस्ड”।

अब फक़ीरी का स्वभाव है, नौकरी रहे न रहे, लेकिन मेरा अपना स्वभाव रहा है और उसको बदलना आसान नहीं है।

मैंने कभी लिखा भी था-

‘क्रीज़ बनाए रखने की कोशिश में,

बिता देते हैं पूरा दिन-

इस्तरी किए हुए लोग

ऐसा लगता है कई बार कि इस्तरी बंदे के कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी पर हुई है। इस प्रकार, एक दिन की उस नौकरी का समापन हुआ।

आज हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

मैं जीवन में कुछ न कर सका!

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्‍वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्‍याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्‍या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

 

नमस्कार।

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