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34. टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं

अक्सर मैं ब्लॉग लिखने के बाद, सोचता हूँ कि इसमें कौन सी कविता डालनी है, क्या शीर्षक देना है। आज शुरू में ही कुछ काव्य पंक्तियां याद आ रही हैं और उनमें से ही शीर्षक भी, तो शुरू में ही दे देता हूँ, यहाँ तो अपना ही अनुशासन है ना!

हम सबके माथे पर शर्म,

हम सबकी आत्मा में झूठ,

हम सबके हाथों में टूटी तलवारों की मूठ,

हम हैं सैनिक अपराजेय!

                        ( डा. धर्मवीर भारती)

 

फैली है दूर तक परेशानी,

तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,

तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं।

 

मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को

रोशनी सवेरे की,

देखूंगा कितने दिन चलती है

दुश्मनी अंधेरे की।

मकड़ी के जाले सी पेशानी

साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है

टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं।

                        (श्री रमेश रंजक)

एक कवि थे, गाज़ियाबाद के, रमेश शर्मा जी, मंचों पर सक्रिय नहीं थे परंतु बहुत अच्छे गीत लिखे हैं उन्होंने, दो पंक्तियां तो गांव की दशा का अच्छा खासा बयान करती हैं-

ना वे रथवान रहे, ना वे बूढ़े प्रहरी,

कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी।

(दीवट- दिया रखने के लिए बना छोटा सा आला)

 (और जब वे लंबा आलाप लेकर गाते थे, तब दिव्य माहौल बन जाता था)

उनके एक गीत की कुछ पंक्तियां-

तू न जिया न मरा।

ज्यों कांटे पर मछली, प्राणों में दर्द पिरा।

औषधि जल, तुलसी-दल, सिरहाने बिगलाया,

मां ने ईंधन कर दी, अपनी उत्फुल काया,

धरती पर देह धरम, आजीवन हूक भरा।

 

सहजन की डाल कटी, ताल पर जमी काई,

कथा अब नहीं कहता, मंदिर वाला साईं,

वैष्णव जन ही जाने, वैष्णव जन का दुखड़ा।

 

 

एक और –

कैसे बीते दिवस हमारे

हम जानें या राम।

सुन रे जल, सुन री ओ माटी

सुन रे ओ आकाश।

सुन रे ओ प्राणों के दियना,

सुन रे ओ वातास,

दुख की इस तीरथ यात्रा में

पल न मिला विश्राम।

हम जानें या राम।

कविताएं शेयर करने का काम फिलहाल इतना ही। अपनी राम कहानी में यह कि 12 वर्ष तक विंध्याचल परियोजना में रहने के बाद मैं प्रबंधक बन गया था, कोई चांस नहीं लग रहा था यहाँ से कहीं और जाने का, लेकिन मुंबई कार्यालय, पश्चिम क्षेत्र मुख्यालय में, विशेष रूप से जनसंपर्क का काम देखने के लिए एक अधिकारी की आवश्यकता थी, वैसे भी मुंबई नगरी बहुतों को आकर्षित करती है, मुझे तो हमेशा से करती रही है। पदोन्नति के समय मैंने मुंबई का विकल्प दिया था।

हमारे बॉस रहे श्री अविनाश चंद्र चतुर्वेदी जी मुंबई में मानव संसाधन विभाग के प्रमुख बन गए थे, उनसे अनुरोध किया और उनके प्रयास से मेरा स्थानांतरण भी हो गया मुंबई में, और इस प्रकार नए सपने लेकर मैं उस मायानगरी में पहुंचा।

एक अंग्रेजी फिल्म देखी थी- ‘कांक्वरर्स ऑफ द गोल्डन सिटी’ बड़े शहर में अक्सर लोग ऐसे ही इरादे लेकर जाते हैं, जैसे शायद धीरू भाई अंबानी लेकर गए होंगे। लेकिन अधिकांश के साथ महानगर, इसका कुछ उल्टा ही करता है।

वैसे किस्मत भी अजीब चीज़ होती है। मुझे नीता जी का किस्सा याद आ गया, जो उन्होंने खुद कहीं शेयर किया था। जान-बूझकर मैं अभी पूरा नाम नहीं लिख रहा हूँ। तो नीता जी उन दिनों नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं। एक रोज़ उनके घर फोन आया- ‘मैं धीरूभाई अंबानी बोल रहा हूँ’। उन्होंने कहा मैं क्लिओपेट्रा बोल रही हूँ (शायद कोई और प्रसिद्ध नाम बोला था, मुझे यह याद आ रहा है) और कहकर फोन रख दिया। उनको लग रहा था कि कोई मज़ाक कर रहा है। ऐसा दो-तीन बार हुआ, उसके बाद उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया। बाद में जब फोन बज रहा था तो उनके पिता ने फोन उठाया तब अंबानी जी ने उनको बताया कि उनके बेटे (मुकेश अंबानी) ने नीता जी का प्रोग्राम देखा था, वे उनको बहुत पसंद आईं और वे शादी की बात करने आना चाहते हैं। ऐसे होता है, जब किस्मत जबर्दस्ती पीछे पड़ जाती है। इस प्रकार नीता जी, नीता अंबानी हो गईं।

खैर, मैं भी मुंबई गया क्योंकि कंपनी मुंबई में रहने के लिए क्वार्टर दे रही थी, नौकरी तो करनी ही थी, उसके अलावा मुंबई क्या कुछ नहीं दे सकती, किसी भी फील्ड में, मेरे सपने क्रिएटिव फील्ड से जुड़े थे।

जिस तरह देश पुकारता है, मुझे लगता था कि मुंबई में बने फिल्मी स्टूडिओ, टीवी चैनल, मेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं।

अब आगे की कहानी बाद में कहेंगे,

फिलहाल नीरज जी का एक मुक्तक-

खुशी जिसने खोजी वो धन लेके लौटा

हंसी जिसने खोजी चमन लेके लौटा

मगर प्यार को खोजने जो चला वो,

न तन लेके लौटा, न मन लेके लौटा।

 

 

 नमस्कार।

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33. कैसे मनाऊं पियवा, गुन मेरे एकहू नाहीं।

इस प्रस्ताव को सहमति मिल गई थी कि एनटीपीसी के स्थापना दिवस के अवसर पर, विंध्याचल परियोजना में नितिन मुकेश जी, अथवा दो-तीन फिल्मी गायक और थे, उनमें से किसी एक को चुनकर आमंत्रित किया जाए, इसके लिए तीन सदस्यों की एक समिति को मुंबई भेजा गया, इसमें मेरे अलावा एक कर्मचारी कल्याण परिषद के महासचिव थे और एक वित्त विभाग के प्रतिनिधि थे।

मेरे बाकी दो साथियों के लिए नितिन मुकेश जी भी वैसे ही थे, जैसे बाकी विकल्प थे, इसलिए मुझे इस विकल्प पर ज्यादा जोर लगाना था, खैर परिस्थितियों ने भी साथ दिया और हम नितिन जी के विकल्प पर मुहर लगाने वाले थे।

हम नितिन जी के घर पहुंचे और मुझे श्रीमती मुकेश जी के चरण स्पर्श करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ,जो व्हील चेयर पर थीं। घर में जहाँ पुरस्कारों की विशाल प्रदर्शनी लगी थी वहीं नील नितिन मुकेश के स्कूल की किसी सांस्कृतिक गतिविधि में पुरस्कृत होने का प्रमाण पत्र भी दीवार पर टंगा था। उस समय नील स्कूल में पढ़ रहे थे।

अपनी परंपरा के अनुसार हमने अनुबंध का एक ड्राफ्ट, नितिन जी को हस्ताक्षर करने के लिए दिया, जिसमें एक पंक्ति कुछ इस प्रकार थी- ‘दोनों पक्ष हर स्थिति में अनुबंध के अनुसार यह कार्यक्रम संपन्न करेंगे।‘

इस पर नितिन जी ने कहा- ‘शर्माजी, सब कुछ तो इंसान के हाथ में नहीं होता, कुछ चीज़ें तो ऊपर वाला अपने हाथ में रखता है।‘ इसके बाद उस पंक्ति को इस तरह लिखा गया- ‘दोनो पक्ष अनुपालन का पूर्ण प्रयास करेंगे।’

इसके बाद मुझे एक घटना रीवा की मालूम हुई, जहाँ नितिन जी कार्यक्रम के लिए गए थे, लेकिन जोरदार बारिश के कारण उस दिन कार्यक्रम नहीं हो पाया, नितिन जी अगले दिन रुके, कार्यक्रम के शुरू में बूंदाबांदी हो रही थी, लेकिन नितिन जी ने, अपनी परंपरा के अनुसार- ‘मंगल भवन, अमंगल हारी’ से कार्यक्रम का प्रारंभ किया और जो छाते खुले थे, वे धीरे-धीरे बंद हो गए, और फिर कार्यक्रम पूरा होने के बाद ही जोरदार बारिश हुई।

खैर, जैसा कार्यक्रम तय किया गया था, उसके हिसाब से नितिन जी फ्लाइट लेकर और उनकी टीम के सदस्य ट्रेन द्वारा, वाराणसी पहुंचे। वाराणसी के सिगरा क्षेत्र में उस समय एनटीपीसी का गेस्ट हाउस था जहाँ नितिन जी की टीम के सदस्यों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी और नितिन जी के लिए पास के एक होटल में प्रबंध किया गया था, परंतु नितिन जी ने कहा कि वे टीम के साथ ही रुकेंगे। उनकी टीम में कुछ सदस्य, उनके पिता के समय से हैं, एक हैं जिनको वे मामा कहते थे।

नितिन जी के एक साथी ने बताया कि मुकेश जी जहाँ अपना हारमोनियम बजाते हुए, डूबकर गाना गाते रहते थे, वहीं नितिन जी पूरा धमाल मचाते हैं।

अपनी परंपरा के अनुसार नितिन जी वाराणसी के मंदिरों में गए, उन्होंने बताया कि इधर आने में उनको एक लाभ यह भी लगा कि वे मंदिरों के दर्शन कर लेंगे। दर्शन के समय मैं उनके साथ था। उन्होंने गौदोलिया चौक पर पुलिस वाले को अपना कार्ड दिखाया, उसके बाद एक पुलिस वाला हमारे साथ रहा और सभी जगह हमने वीआईपी दर्शन किए।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर हर दुकानदार उनसे कहता रहा कि आपके पिता जी हमारे यहाँ से ही सामग्री खरीदते थे, आप भी हमसे ही सामान लीजिए।

गंगा घाट पर तीन तरह के लोग मिले, एक जो नितिन जी को पहचानते थे, दूसरे जो उनको शम्मी कपूर समझ रहे थे और तीसरे वे जो उनको अंग्रेज समझ रहे थे।

वाराणसी से हम विंध्यनगर आए, शाम को मुक्ताकाश प्रेक्षागृह में उनका कार्यक्रम था। उन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ के साथ अपना कार्यक्रम प्रारंभ किया और उसके बाद, मुकेश जी के 15-20 अमर गीत एक के बाद एक,  सुना दिए, फर्माइशें पूरा करने से पहले, क्योंकि उनका कहना था कि एक बार फास्ट गानों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, तब शायद इन गीतों के लिए माहौल नहीं रह पाएगा।

अब अगर गीतों का ज़िक्र करूं तो किनका करूं? सैंकड़ों फर्माइशी पर्चियां तो ऐसी हैं, जिनका नंबर आ ही नहीं पाया। संगीत के प्रोग्राम तो पहले भी बहुत हुए थे, लेकिन श्रोताओं में इतना उत्साह कभी नहीं देखा गया। महफिलें जमाने वाले तो हज़ारों गीत हैं, किस-किसका ज़िक्र करूं?

लेकिन कुछ गीतों का ज़िक्र इसलिए कर दे रहा हूँ, क्योंकि संभव है, नई पीढ़ी के कुछ लोगों को उनके नाम से ये गीत न याद हों- ‘होठों पे सच्चाई रहती है, कहीं दूर जब दिन ढ़ल जाए, तौबा ये मतवाली चाल, रुक जा ओ जाने वाली रुक जा, सारंगा तेरी याद में, सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, झूमती चली हवा, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, मैं पल दो पल का शायर हूँ, देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी, मंज़िल ए मक़सूद  आदि  …  सैंकड़ों गीत मैं लिख सकता हूँ, जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

  मुकेश जी का स्मरण करते हुए, मैं उनके गाए कुछ ऐसे गीतों की पंक्तियां यहाँ दे रहा हूँ, जो शब्दों और प्रस्तुति, दोनों के लिहाज़ से, अलग तरह के हैं-

कैसे मनाऊं पियवा, गुन मेरे एकहू नाहीं।

आई मिलन की बेला, घबराऊं मन माही।

 

साजन मेरे आए, धड़कन बढ़ती जाए,

नैना झुकते जाएं, घूंघट ढलका जाए,

तुझसे क्यों शर्माये, आज तेरी परछाई।

 

मैं अनजान पराई, द्वार तिहारे आई,

तुमने मुझे अपनाया, प्रीत की रीत सिखाई,

हाय रे मन की कलियां, फिर भी खिल ना पाईं।

एक और गीत की कुछ पंक्तियां –

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो,

मुझे इससे अपनी खबर मिल रही है।

कई बार यूं भी हुआ है सफर में,

अचानक से दो अजनबी मिल गए हों,

जिन्हें रूह पहचानती हो अज़ल से,

भटकते-भटकते वही मिल गए हों।

कुंवारे लबों की कसम तोड़ दो तुम,

ज़रा मुस्कुराकर बहारें संवारो।

 

खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी

कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें,

तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जाकर,

मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें।

बड़ी सर चढ़ी हैं ये ज़ुल्फें तुम्हारी,

ये ज़ुल्फें मेरी बाज़ुओं में उतारो।  

 

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो,

मुझे इस से अपनी खबर मिल रही है।।

और इसके बाद आखिर में-

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं, कुछ और भी है।

ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं, कुछ और भी है।

भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में,

इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं कुछ और भी है।

तुम अगर नाज़ उठाओ, तो ये हक़ है तुमको,

मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

इन शब्दों के साथ, नितिन जी के कार्यक्रम के बहाने मैं अपने प्रिय गायक, मुकेश जी की स्मृतियों को विनम्र श्रद्धांजलि देता हूँ और कामना करता हूँ कि नितिन जी लंबे समय तक, मुकेश जी के गीतों का अमृत पान श्रोताओं को कराते रहें।

अंत में मन हो रहा है कि मैं अपना एक गीत शेयर करूं। यह गीत मैंने दिल्ली में, सर्दी की एक रात में, ट्रेन से शाहदरा लौटते हुए लिखा था, जब मैं मुकेश जी का गीत ( मैं ढ़ूंढ़ता हूँ उनको) गुनगुना रहा था। ये पैरोडी नहीं है, सिर्फ मुखड़े की पंक्तियों को ध्यान में रख सकते हैं-

रात शीत की  

रजनी गुज़र रही है, सुनसान रास्तों से

गोलाइयों में नभ की, जुगनू टंके हुए हैं।

 

हर चीज़ पर धुएं की,एक पर्त चढ़ गई है,

कम हो गए पथिक पर, पदचाप बढ़ गई है,

यह मोड़ कौन सा है, किस ओर जा रहा मैं,

यूं प्रश्न-चिह्न धुंधले, पथ पर लगे हुए हैं।

 

अब प्रश्न-चिह्न कल के, संदर्भ हो गए हैं,

कुछ तन ठिठुर- ठिठुरकर, निष्कंप सो गए हैं,

कितने बंटे हैं कंबल, अंकित है फाइलों में,

फुटपाथ के कफन पर, किसके गिने हुए हैं।

 

अब सो चुकी है जल में, परछाइयों की बस्ती,

चंदा ही खे रहा है, बस चांदनी की कश्ती,

चिथड़ों में गूंजती हैं, अब कर्ज़दार सांसें,

पर ब्याज के रजिस्टर, अब भी खुले हुए हैं।

                                                                      (श्रीकृष्ण शर्मा)

आज कुछ ज्यादा समय ले लिया आपका, नमस्कार।

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32. मैं बोला मैं प्रेम दिवाना इतनी बातें क्या जानूं।

विंध्याचल परियोजना में 12 वर्ष का प्रवास, बहुत घटनापूर्ण था और निराशा भी बहुत बार हुई इस दौरान। एक पदोन्नति समय पर मिल गई, जिससे भद्रजनों की भृकुटियां तन गईं, हिंदी अधिकारी और समय पर पदोन्नति, इसके बाद उन्होंने भरपूर कोशिश की कि कोई पदोन्नति समय पर न मिल पाए। कुछ बौने सीढ़ियों पर काफी ऊपर चढ़ चुके थे इस बीच, स्वतंत्र कुमार जैसे।

खैर, एक महत्वपूर्ण घटना जो छूटी जा रही थी, अभी बता दूं, मेरी मां जो अधिकतम समय दिल्ली में ही रहीं, उनका अंतिम समय आ गया था। उस समय मोबाइल फोन तो नहीं थे हमारे पास, शायद प्रचलन में भी नहीं थे। विंध्यनगर, मध्य प्रदेश के सीधी जिले में, टेलीफोन की स्थिति भी ऐसी थी उस समय कि बड़ी मुश्किल से घंटी बजती थी। मेरे संबंधी, जिनके नज़दीक मेरी मां रहती थीं, उन्होंने टेलीग्राम भेजा ‘मदर सीरियस, कम सून’। यह टेलीग्राम पाकर मैं तुरंत दिल्ली गया। मालूम हुआ कि मां की मृत्यु हुए एक सप्ताह बीत चुका था। वहाँ किसी को यह विश्वास दिलाना मुश्किल था कि टेलीग्राम मुझे एक सप्ताह के बाद मिला है, और जो उन्होंने मृत्यु होने पर भेजा था, वह मेरे वहाँ से चलने तक नहीं मिला था।

दरअसल, टेलीग्राम जो बाहर से आते थे, वे हमारे तहसील नगर ‘वैढ़न’ में आते थे और वहाँ से वे लोग कब, उसको चिट्ठी की तरह आगे भेजेंगे, यह पूरी तरह उनकी कृपा पर निर्भर होता था। अब तो खैर ‘टेलीग्राम’ नाम की यह बला पूरी तरह समाप्त ही हो चुकी है।

मेरी मां को बहुत भरोसा था कि मैं उनके अंतिम समय में तो उनके पास रहूंगा। मेरी भाभी (वकील साहब की पत्नी) ने मेरी मां से कहा, ‘बुआ किशन तो नहीं आया!’, तब शायद अपने विश्वास से लड़ते हुए मां ने कहा, ‘क्या करूं नहीं आया तो?’

अब अगली बात पर चलते हैं। एक बार फिर कह दूं कि मैं राज कपूर जी का और मुकेश जी का परम भक्त हूँ। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुकेश जी शास्त्रीय संगीत में पारंगत नहीं थे। वैसे इसका सही उत्तर कल्याण जी ने किसी व्यक्ति को दिया था, जो मुकेश जी को देखकर उनसे बोला था कि देखो ये इतनी महंगी गाड़ी में घूमते हैं और मैं जो शास्त्रीय संगीत में निपुण हूँ, मेरी कोई पहचान नहीं है।

कल्याण जी ने उससे कहा कि आप ‘चंदन सा बदन’ उनके जैसा गाकर दिखा दो, मैं अगला गीत आपको दे दूंगा। जाहिर है उन सज्जन के लिए ऐसा करना संभव नहीं था।

खैयाम साहब ने मुकेश जी के लिए एक प्रोग्राम में कहा था- ‘तू पुकारे तो चमक उठती हैं, आंखें सबकी, तेरी सूरत भी है शामिल, तेरी आवाज़ में यार’।

जिस समय मुकेश जी जीवित थे और कार्यक्रमों में गाते थे, उस समय तो मैं ऐसी स्थिति में नहीं रहा कि उनका कार्यक्रम करा सकूं, लेकिन एनटीपीसी में आने के बाद, जब मुझको कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़ने का मौका मिला, तब से जब भी ऐसा हुआ कि कोई बड़े स्तर का संगीत का कार्यक्रम आयोजित करने की बात हुई, तब हमेशा मेरे मन में जो पहला नाम आता था, वह होता था- नितिन मुकेश जी का।

नितिन जी ने खुद भी कुछ बहुत अच्छे गीत गाए हैं फिल्मों में, जैसे एक गीत जो मुझे बहुत प्रिय है, वह है- ‘सो गया ये जहाँ, सो गया आस्मां, सो गई हैं सारी मंज़िलें, सो गया है रस्ता’। और भी अनेक गीत हैं, लेकिन जो स्थान मुकेश जी का है, फिल्म-संगीत प्रेमियों के दिल में, उसको छूना तो किसी और के लिए बहुत मुश्किल है।

नितिन जी की बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने कार्यक्रमों के माध्यम से मुकेश जी के उस युग को फिर से जीवंत कर देते हैं। एक बार जब वे मुकेश जी के गीत गाना प्रारंभ करते हैं, तब पता ही नहीं चलता कि कब रात के प्रहर बदलते चले जाते हैं।

जैसा मैंने कहा, जब भी संगीत के बड़े कार्यक्रम की बात चलती, मेरे मुह से नितिन मुकेश जी का नाम निकलता था, कई बार मेरा ये स्वर ‌बड़ी आवाज़ों के बीच दब गया, लेकिन आखिर वह समय आ ही गया जब यह आयोजन एक हक़ीकत का रूप ले सका।

मुकेश जी से जो लोग मिले हैं, उन्होंने अपने संस्मरणों में कहा है कि वैसा सरल हृदय और उदार व्यक्ति उन्होंने दूसरा नहीं देखा, और जो महसूस कर सकते हैं, वे कहते हैं कि यह सज्जनता उनकी आवाज़ में झलकती है, जो सीधे दिल से निकलती है और दिल में उतर जाती है।

यह भी सच्चाई है कि जब तक मुकेश जी जीवित थे, तब तक किसी पुरुष गायक को इतने फिल्मफेयर एवार्ड नहीं मिले थे, जितने मुकेश जी को मिले थे। हालांकि मुकेश जी ने हीरो बनने की धुन में बहुत समय तक फिल्मों में गाने नहीं गाए थे। उनके गाए गीतों की संख्या रफी साहब और किशोर कुमार जी से बहुत कम है, लेकिन जब अमर गीतों की बात आती है, तब कहानी कुछ और ही होती है।

अंततः नितिन मुकेश जी का कार्यक्रम हमने आयोजित किया, उसका पूरा विवरण अगले ब्लॉग में दूंगा, फिलहाल मुकेश जी की स्मृति में उनका गाया एक भजन यहाँ दे रहा हूँ-

सुर की गति मैं क्या जानूं

एक भजन करना जानूं।

अर्थ भजन का भी अति गहरा

उसको भी मैं क्या जानूं,

प्रभु,प्रभु,प्रभु जपना जानूं मैं,

अंखियन जल भरना जानूं।

 

गुण गाए प्रभु न्याय न छोड़ें

फिर क्यों तुम गुण गाते हो,

मैं बोला मैं प्रेम दिवाना

इतनी बातें क्या जानूं।  

नमस्कार।

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31. नींद भी खुली न थी, कि हाय धूप ढल गई, पांव जब तलक उठे, कि ज़िंदगी फिसल गई,

 विंध्याचल परियोजना में प्रवास का ब्यौरा और ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, अब इसको जल्दी ही समाप्त करना  होगा। कवि सम्मेलनों जो कुछ अपनी उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ उसका ज़िक्र कर लेता हूँ। यह मेरा सौभाग्य ही था कि उस समय जहाँ नीरज जी जैसे महान गीतकार से निकट परिचय हो गया था, वहीं सोम ठाकुर जी, डॉ. कुंवर बेचैन जी, किशन सरोज जी, कैलाश गौतम जी, पं. चंद्र शेखर मिश्र जी, पटना के श्रेष्ठ कवि एवं संचालक श्री सत्यनारायण जी, ओम प्रकाश आदित्य जी आदि अनेक कवि थे जिनसे व्यक्तिगत मित्रता हो गई थी। डॉ. बेचैन तो पहले से मेरे गुरुतुल्य थे।

लेकिन कुछ कवि ऐसे भी थे, जिनको बुलाना मुझको नहीं जंचा, कारण जो भी हों। इनका ज़िक्र कर लेता हूँ। इनमें से एक तो कोई त्रिपाठी जी थे, लखनऊ में केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाते थे। हुआ यूं कि मैं आकाशवाणी लखनऊ में गया, वहाँ जो कार्यक्रम निष्पादक थे, उनसे मिलकर यह जानने कि वहाँ के कुछ श्रेष्ठ कवि कौन से हैं, जिनको बुलाया जा सकता है।

दुर्भाग्य से कार्यक्रम निष्पादक नहीं मिले और उनके कमरे में यह सज्जन मिल गए। (अब मुझे लगता है कि शायद  इन सज्जन से बचने के लिए ही कार्यक्रम निष्पादक अपने कमरे से दूर चले गए हों।) खैर त्रिपाठी जी ने अपनी इतनी तारीफ की, कि मुझे लगा कि जो कुछ मैं खोज रहा था, वही मुझे मिल गया। त्रिपाठी जी ने यह भी बताया कि किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी जी ने लखनऊ के बहुत से कवियों को सुनने के बाद जब उनको सुना तो वे बोले कि इनको अब तक कहाँ छिपा रखा था! खैर इंसान हूँ यार, धोखा तो हो जाता है न! कवि सम्मेलन में त्रिपाठी जी को सुनने के बाद मालूम हुआ कि ये तो वह मैटीरियल है, जिसे माइक के सामने से हटाना पड़ता है।

एक और कवि-व्यंग्यकार हैं, फिल्म के लिए भी उन्होंने लिखा है। जब उन्होंने अपनी रचनाएं हमारे यहाँ पढीं, उसके बाद मेरा बेटा बोला- पापा इनको फिर कभी मत बुलाना। कारण- उन्होंने भारतीय क्रिकेट और अमिताभ बच्चन के विरुद्ध अपने आलेख पढे थे, वैसे भी वे कविताएं नहीं हैं। आप खेल को खेल की तरह न देख पाएं और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार का उसके किसी गाने के कारण मज़ाक़ उड़ाएं! मेरा स्पष्ट मत है इस तरह के आलेख आप खूब लिख सकते हैं, अगर आपके मन की मूल भावना ईर्ष्या की हो।

मैं यह भी बताना चाहूंगा कि जब के.पी.सक्सेना जी हमारे यहाँ पहुंचे, जी हाँ मैं इनकी ही बात कर रहा था, तब मैं अपनी परंपरा के अनुसार उनका स्वागत करने के लिए पहुंचा। मेरे पहुंचते ही वो बोलने लगे ‘गीज़र काम नहीं कर रहा है, चाय अच्छी नहीं मिली।’  मैंने  बताया कि मैं तो आपके स्वागत के लिए आया था, मैं अभी इन समस्याओं को देख लेता हूँ।

श्री सक्सेना जी अपने आलेखों में अंग्रेजी के उपयोग का मज़ाक उड़ाते थे, परंतु जब उन्होंने यह पता कर लिया कि मेरे बॉस कौन हैं, श्री दुबे जी थे उस समय, उन्होंने जाने के बाद भ्रष्ट अंग्रेजी में दुबे जी को एक पत्र लिखकर कहा कि भविष्य में आपको कवि सम्मेलन कराना हो, तब मुझे (सक्सेना जी को) बताना, मैं बढ़िया टीम दिला दूंगा।

एक और कवि का ज़िक्र करना चाहूंगा- श्री सांड बनारसी। एक बार ये फैसला किया गया कि कवियों की एक टीम बुलाकार, एनटीपीसी की आसपास स्थित तीनों परियोजनाओं में कवि सम्मेलन कराया जाए। इस कार्यक्रम के संचालन के लिए मैं वाराणसी में श्रेष्ठ कवि श्रीयुत श्रीकृष्ण तिवारी जी से मिला। तिवारी जी ने मुझे बताया कि सांड बनारसी जी को इस आयोजन का पता चल गया है और वे उनसे अनुरोध कर रहे हैं कि उनको भी ले चलें। वैसे सांड बनारसी जी मेरी प्राथमिकता में बिल्कुल नहीं थे लेकिन उनके कहने पर मैंने इनको टीम में शामिल कर लिया। लेकिन सांड बनारसी जी को यह मालूम हो गया था कि मैं उनको नहीं बुलाना चाह रहा था। यह भी सही है कि प्रशंसक तो उनके भी बहुत हैं, शायद श्रीकृष्ण तिवारी जी से ज्यादा हैं। ये तो मेरा पागलपन है कि मैं इनको नहीं बुलाना चाहता। तो बाद में सांड बनारसी जी ने बगल की परियोजना में अपने प्रशंसक अधिकारी को धन्यवाद देते हुए पत्र लिखा और कहा कि हमारे यहाँ उनको काफी तकलीफ हुई थी।

उस समय हमारे विभागाध्यक्ष थे, सकारात्मक सोच वाले नंद बाबा, उनको तो मानो ब्रह्मास्त्र मिल गया उस पत्र से।

इससे पहले कि विंध्यनगर छोड़ने की घोषणा करूं, कोशिश करता हूँ कुछ मीठी यादों को वहाँ की, ताज़ा करने की। हालांकि मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गीत है-

भूली हुई यादों, मुझे इतना ना सताओ,

अब चैन से रहने दो, मेरे पास न आओ।

बेशक अगले ब्लॉग में नितिन मुकेश जी के प्रोग्राम का विवरण  दूंगा।

कुछ बातें याद आती हैं, आकाशवाणी रीवा से समय-समय पर कविताओं का प्रसारण, नियमित रूप से होता था। वहाँ से ‘ए’ ग्रेड के कवि हेतु अपग्रेड करने का प्रस्ताव भी बढ़ाया गया, लेकिन बाद में कुछ अलग प्रकार का स्टॉफ वहाँ आ गया और अचानक यह आना-जाना बंद हो गया।

कार्यक्रमों का संचालन तो नियमित रूप से करता ही था। एक बार ऐसा हुआ कि 500 से अधिक कर्मचारियों को दीर्घ-सेवा पुरस्कार दिए जाने थे। शुरू में लग रहा था कि कैसे निपटेगा यह कार्यक्रम। शुरू में कर्मचारी काफी कम संख्या में पहुंचे थे। इस पर मैंने टिप्पणी की थी कि पुरस्कार पाने वाले साथियों की संख्या लगभग उतनी है जितनी हमारे एक सदन के माननीय सांसदों की है और उपस्थिति भी लगभग वैसी ही है, जैसी वहाँ होती है।

प्रशंसा और प्यार लोगों से बहुत मिला, लेकिन कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला, कोई अफसोस नहीं, बस ऐसे ही ज़िक्र कर दिया। बड़ों की प्रशंसा में डिप्लोमैसी भी होती है बहुत बार। एक बार जब मैं मंच से उतरा तो एक कर्मचारी  साथी अपने 3-4 साल के बच्चे को साथ लेकर आए, बोले कि कह रहा था, उन अंकल से मिलवा दो। मेरे लिए यह सबसे बड़ा पुरस्कार था।

एक बात का खयाल आ रहा है कि अनेक कवियों की रचनाओं का मैंने यहाँ उल्लेख ‌किया लेकिन गीतों के राजकुंवर नीरज जी को छोड़ दिया। लीजिए नीरज जी की कुछ रचनाएं और उनकी विख्यात रचना ‘कारवां के कुछ अंश –

 

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला,
मेरे स्वागत को हर एक जेब से खंजर निकला ।

तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला,
प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला ।

डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर,
एक आँसू का वो कतरा तो समुंदर निकला ।

मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबाँ पे ग़ाली,
जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला ।

ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा,
मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला ।

वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया लेकिन,
नींद टूटी तेरी जब हाथ से अवसर निकला ।

रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने खाई,
वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला ।

क्या अजब है इंसान का दिल भी ‘नीरज’
मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला ।

******************

आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।

मान-पत्र मैं नहीं लिख सका
राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक रहा जनम से
सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये
केवल इस गलती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।

खिलने को तैयार नहीं थीं
तुलसी भी जिनके आँगन में
मैंने भर-भर दिए सितारें
उनके मटमैले दामन में
पीड़ा के संग रास रचाया
आँख भरी तो झूमके गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से क्या इस तरह जिया जाएगा

काजल और कटाक्षों पर तो
रीझ रही थी दुनिया सारी
मैंने किंतु बरसने वाली
आँखों की आरती उतारी
रंग उड़ गए सब सतरंगी
तार-तार हर साँस हो गई
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो ज्यादा नहीं सिया जाएगा

जब भी कोई सपना टूटा
मेरी आँख वहाँ बरसी है
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई
मछली पानी को तरसी है,
गीत दर्द का पहला बेटा
दुख है उसका खेल खिलौना
कविता तब मीरा होगी जब हँसकर जहर पिया जाएगा।

और अंत में ‘कारवां’ की कुछ पंक्तियां-

 

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

लुट गए सिंगार सभी, बाग के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

 नींद भी खुली न थी, कि हाय धूप ढल गई,

पांव जब तलक उठे, कि ज़िंदगी फिसल गई,

पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

 

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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30. कभी फुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता-आहिस्ता।

एनटीपीसी की सभी परियोजनाओं की तरह, विंध्याचल परियोजना में भी स्थापना दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष 7 नवंबर को बड़ा आयोजन किया जाता है। जैसा मैंने बताया इन आयोजनों में अभिजीत, अनूप जलोटा तथा जगजीत सिंह जैसे बड़े कलाकार आ चुके थे। जगजीत सिंह के कार्यक्रम के समय तो अलग ही माहौल था। विशाल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में यह आयोजन किया गया था, श्रमिक यूनियन हड़ताल पर थीं। इस प्रकार स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के भीतर सीमित संख्या में श्रोता बैठे थे और बाहर सड़क पर बड़ी संख्या में कर्मचारी बंधु बैठकर उस कार्यक्रम का आनंद ले रहे थे।

उसके अगले दिन पड़ौसी परियोजना की शक्तिनगर टाउनशिप में यह कार्यक्रम रखा गया था, वहाँ भीड़ ज्यादा थी, कुछ गज़लें जगजीत सिंह जी ने सुनाईं, उसके बाद एक पंजाबी गीत सुनाया और उसके बाद लगातार पंजाबी गीत की डिमांड आने लगी। अंत में जगजीत जी को कहना पड़ा कि अगली बार आप गुरदास मान जी को बुलाइएगा।

एक बात जो मेरे उस समय के सहयोगी श्री अरुण कुमार मिश्रा जी ने, आज ही याद दिलाई, एक बार स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में कवि सम्मेलन चल रहा था, आधी रात के समय बारिश आ गई, तुरंत कार्यक्रम को रूसी प्रेक्षागृह में शिफ्ट किया गया। परियोजना में विभिन्न विभागों की हमारी टीम शानदार थी और सभी इन कार्यक्रमों में रुचि लेते थे। इस प्रकार कार्यक्रम में साहित्य के आस्वादन के अलावा रोमांच की भी हिस्सेदारी हो गई।

एकाध बार हमने देखा कि खुले में चल रहे कार्यक्रम के दौरान कोई सज्जन उठकर जाने लगे तो बगल वाले को बताया कि कंबल लेने जा रहे हैं।

रूसी प्रेक्षागृह के संबंध में बता दूं कि विंध्याचल परियोजना रूसी सहयोग से स्थापित की गई थी और उस समय तक वहाँ रूसी विशेषज्ञ ‘रशियन कॉम्प्लेक्स’ में रहते थे, उसमें ही यह हॉल भी था, जिसे ‘रशियन ऑडिटोरियम’ या रूसी प्रेक्षागृह कहते थे।

एक बात और जो मिश्रा जी ने याद दिलाई, वैसे शायद मैं बाद में इसका ज़िक्र करता, हिंदी पखवाड़े के दौरान हम हिंदी के किसी साहित्यकार को विशेष व्याख्यायन के लिए आमंत्रित करते थे। इनमें दो प्रमुख नाम, जो अभी याद आ रहे हैं, वे थे- डॉ. विद्या निवास मिश्र जी और प. विष्णुकांत शास्त्री जी। यह सोचकर संतोष होता है कि मुझे इन महान व्यक्तियों को निकट से जानने और इनके चरण स्पर्श करने का अवसर प्राप्त हुआ।

वैसे हमारी विंध्यनगर टाउनशिप भी एकदम प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, पं. विष्णुकांत शास्त्री जी का कहना था कि वे इस वातावरण में कुछ दिन रहकर लेखन कार्य करना चाहेंगे। खैर बाद में तो वे राज्यपाल बन गए थे और ऐसा सोचना भी उनके लिए संभव नहीं रहा होगा। जिस समय वे आए थे उस समय वे कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे थे।

स्थापना दिवस के आयोजनों में कई तरह के प्रयोग किए गए। जैसे पहले मुंबई से किसी फिल्मी कलाकार को बुलाया गया, काफी बड़े बजट के साथ। कई बार ऐसा भी किया गया कि तीन दिन तक अलग-अलग कार्यक्रम किए गए। ऐसा ही एक अनुभव बता रहा हूँ।

कई बार हमने लखनऊ से कुछ ऐसे गायक कलाकारों को बुलाया जो मुंबई की चौखट तक जाकर लौट आए थे। इनमें से ही एक महिला गायिका थीं, नाम याद नहीं आ रहा है, उनका कहना था कि वे मुंबई से जान बचाकर वापस आई थीं,क्योंकि उस समय लता बाई की दादागिरी चलती थी। मैं इस पर अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा। इक़बाल सिद्दीक़ी जी ने भी बहुत संघर्ष किया था। एक गीत इन्होंने गाया हुआ था, वो इनको नहीं दिया गया क्योंकि ये गायक एसोसिएशन के सदस्य नहीं थे, वह गीत श्री महेंद्र कपूर से गवाया गया था। अभी याद नहीं आ रहा कि वह गीत कौन सा था।

खैर एक अवसर पर हमने इन दोनों की टीमों को बुलाकर कार्यक्रम रखा था, जो बहुत सफल रहा था। मेरे मन में यह था कि एक बार इक़बाल सिद्दीक़ी साहब का अकेले का कार्यक्रम रखा जाए। कुछ वर्षों के अंतराल से जब हमने तीन दिन के कार्यक्रम रखे, तब पहले दिन का कार्यक्रम सिद्दीक़ी जी का रखा।

मैं जिस कारण से इसका उल्लेख कर रहा हूँ, वह है कि कई फैक्टर होते हैं, किसी कार्यक्रम के सफल होने के लिए ज़िम्मेदार। गज़ल के या किसी भी कार्यक्रम की सफलता के लिए एक वातावरण निर्मित होना ज़रूरी होता है। अब यह आयोजन था स्थापना दिवस के अवसर पर, रूसी प्रेक्षागृह में, पहली बात जो मैंने नोटिस की कि बहुत से साथी अपने बच्चों को लेकर आए हुए थे, जो वहाँ भागदौड़ कर रहे थे। संभव है साउंड सिस्टम उतना प्रभावी न हो। यह भी संभव है कि उम्र ने सिद्दीक़ी जी की आवाज़ में वह ताक़त न छोड़ी हो।

कारण जो भी, उस दिन वह कार्यक्रम जमा नहीं। नतीज़ा? मैं और मेरे बॉस – श्री एस.के.आचार्य 24 घंटे तक बहुत टेंशन में रहे। अगले दिन भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ के द्वारा नाटक मंचित किया गया- वल्लभपुर की रूपकथा। पूरा नाटक दर्शकों ने डूबकर देखा और इसके पूरा होने पर 5 मिनट तक लगातार तालियां बजती रहीं। उन तालियों की ध्वनि में हमारी टेंशन हवा हो गई। इसके बाद अंतिम आयोजन- कवि सम्मेलन तो आनंद से भरपूर होना ही था।

ये उल्लेख इसलिए किया कि आयोजन करने में केवल आनंद ही नहीं आता, बहुत क्रिएटिव टेंशन भी झेलनी पड़ती है। इसके अलावा ऐसा भी हुआ कि सभी ओर से जब सफल आयोजन के लिए मुझे बधाई मिली तो हमारे साथी, जो आयोजन के लिए फिज़िकल अरेंजमेंट करते थे, वे बोले कि पूरी मेहनत हम करते हैं और क्रेडिट एक इंसान को मिल जाता है। इस पर एक बार बॉस ने कहा- ‘सब बहुत खुश थे, बैठने की व्यवस्था बहुत अच्छी थी, खाने-पीने का प्रबंध भी बहुत अच्छा किया गया था। मानो लोग घर से, कार्यक्रम में इसलिए आते हैं, कि घर पर बैठने की व्यवस्था अच्छी नहीं होती, खाने को अच्छा नहीं मिलता!

बहुत डर लगता है मुझको कि कहीं ज्यादा बोर न कर दूं। अब किस्सा यहीं खत्म करता हूँ।

अब अपनी एक कविता शेयर कर लेता हूँ, कभी-कभी ये काम भी करना चाहिए न?

                                                              जड़ता के बावज़ूद

चौराहे पर झगड़ रहे थे

कुछ बदनाम चेहरे,

आंखों में पुते वैमनस्य के बावज़ूद

भयानक नहीं थे वे।

भीड़ जुड़ी

और करने लगी प्रतीक्षा-

किसी मनोरंजक घटना की।

कुछ नहीं हुआ,

मुंह लटकाए भीड़

धाराओं में बंटी और लुप्त हो गई।

अगले चौराहे पर,

अब भी जुटी है भीड़

जारी है भाषण-

एक फटे कुर्ते-पाजामे का,

हर वाक्य

किसी जानी-पहचानी-

नेता या अभिनेता मुद्रा में,

भीड़ संतुष्ट है यह जान

कि एक और व्यक्ति हो गया है पागल,

जिसके मनोरंजक प्रलाप

बहुतों को नहीं खोने देंगे

मानसिक संतुलन-

 जड़ता के बावज़ूद।

                                            (श्रीकृष्ण शर्मा)

अंत में जगजीत सिंह जी को याद करते हुए, समाप्त करूंगा –

शब-ए-फुरक़त का जागा हूँ, फरिश्तों अब तो सोने दो

कभी फुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता-आहिस्ता।

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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29. मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा, एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

अब विंध्याचल परियोजना के क्लबों का ज़िक्र कर लेते हैं। दो क्लब थे वहाँ पर, वीवा क्लब (विंध्याचल कर्मचारी कल्याण क्लब) और विंध्य क्लब। वहाँ समय-समय पर होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा, हिंदी अनुभाग की ओर से कभी-कभी कवि गोष्ठियों का आयोजन भी हम वहाँ करते थे। अधिक प्रतिभागिता वाले कार्यक्रम तो रूसी प्रेक्षागृह में किए जाते थे।

मुझे याद है कि एक बार कविताओं पर आधारित अंत्याक्षरी प्रतियोगिता वीवा क्लब में हमने की थी, जिसमें अनेक टीमों ने भाग लिया था, काफी दिन तक यह प्रतियोगिता चली थी और प्रतिभागियों ने आगे बढ़ने के लिए बहुत से काव्य संकलन भी खरीदे थे।

खैर अभी जो मुझे क्लबों की याद आई उसका एक कारण है। हमारे बच्चे लोग क्लबों में खेलने के लिए जाते थे, एक रोज़ शाम को मेरा बड़ा बेटा क्लब से घबराया हुआ घर आया, आते ही उसने अपनी मां से पूछा- ‘मां, पापाजी कहाँ हैं’ और उसको यह जानकर तसल्ली हुई कि मैं घर पर ही था और ठीक-ठाक था।

असल में उसने क्लब में सुना था कि किसी- एस.के.शर्मा ने आत्महत्या कर ली है। यह एक बड़ी दुखद घटना थी, जो वहाँ देखने को मिली। इस घटना की पृष्ठभूमि के संबंध में, बाद में ‘मनोहर कहानियां’ मे “डर्टी कल्चर” नाम से लंबी स्टोरी छपी थी। खैर उसके संबंध में चर्चा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

ये बड़ी  अजीब बात है कि जो वांछनीय नहीं है, वही इन पत्रिकाओं के लिए – ‘मनोहर कहानी’ होता है, ‘मधुर कथा’ या ‘सरस कथा’ होता है। ये पत्रिकाएं अपराधों के संबंध में रस ले-लेकर कहानी सुनाती हैं और मेरा पूरा विश्वास है कि इससे अपराध को बढ़ावा मिलता है। आजकल टीवी पर भी इस प्रकार के कार्यक्रम आते हैं। इनको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

अब कवियों और कवि सम्मेलनों के संबंध में बात कर लेते हैं। विंध्याचल परियोजना में जाने के बाद, शुरु के ही एक आयोजन में ऐसा हुआ था कि हमने नीरज जी को भी आमंत्रित किया था और सुरेंद्र शर्मा को भी बुला रहे थे। उस समय हमारे विभागध्यक्ष थे श्री आर.एन. रामजी। सुरेंद्र शर्मा ने जो राशि मांगी थी वह नीरज जी से तीन गुना थी, यह अनुपात तो शायद आज भी कायम होगा, शायद और बढ़ गया हो, लेकिन श्री रामजी ने कहा, इस कवि को कभी मत बुलाना, मैं इस बात पर हमेशा कायम रहा। अगर हमें भारी रकम देकर चुटकुले ही सुनने हैं, तो कपिल शर्मा जैसे किसी व्यक्ति को बुलाएंगे, कविता के नाम से चुटकुले क्यों सुनेंगे।

एक और आयोजन में हमारे यहाँ श्री सूंड फैज़ाबादी आए थे, वे बोले कि शुरू में लोग हमको मंच पर नहीं चढ़ने देते थे, कहते थे हास्य वाला है। फिर वो बोले कि अब हम फैसला करते हैं कि मंच पर कौन चढ़ेगा। मैंने खैर खयाल रखा कि हमारे आयोजनों में ऐसा न हो पाए। हमने हास्य के ओम प्रकाश आदित्य, प्रदीप चौबे, जैमिनी हरियाणवी, माणिक वर्मा जैसे ख्याति प्राप्त कवियों को बुलाया, लेकिन मंच पर विशेष दर्जा हमेशा साहित्यिक कवियों को दिया।

हमारे आयोजन में श्री शैल चतुर्वेदी एक बार ही आए थे, मुझे याद है उस समय रीवा जिले के युवा एसएसपी- श्री राजेंद्र कुमार भी आए थे और वे शैल जी के साथ काफी फोटो खिंचवाकर गए थे। शैल जी से आयोजन के बाद बहुत देर तक बात होती रही। वे मेरे संचालन से बहुत खुश थे, बोले आप इतना धाराप्रवाह बोलते हो बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बताया कि शंकर दयाल शर्मा जी (उस समय के राष्ट्रपति) हर साल राष्ट्रपति भवन में कवि गोष्ठी करते हैं,जिसमें वह जाते थे और उनका कहना था कि अगले साल वो राष्ट्रपति भवन में मुझे बुलाएंगे और मुझे आना होगा। खैर उसके बाद शैल जी ज्यादा समय जीवित भी नहीं रहे थे।

कुछ कवि सम्मेलन तो ऐसे यादगार रहे कि आनंद के उन पलों को आज भी याद करके बहुत अच्छा लगता है। श्री सोम ठाकुर जी का श्रेष्ठ संचालन और उसमें अन्य अनेक ख्यातिप्राप्त कवियों के साथ-साथ श्री किशन सरोज का गीत पाठ –

छोटी से बड़ी हुई तरुओं की छायाएं,

धुंधलाई सूरज के माथे की रेखाएं,

मत बांधो आंचल में फूल चलो लौट चलें,

वह देखो, कोहरे में चंदन वन डूब गया।

 

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,

सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,

किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,

कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा।

 

सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,

काहे का रोना जो बीती सो बात गई,

मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,

एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

 

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,

हंसने वालों में रहकर मुसकाना होगा,

घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,

रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया। 

मन हो रहा था कि पूरा ही गीत यहाँ उतार दूं, लेकिन स्थान की दिक्कत है, यह एक ऐसा गीत है जैसे कोई डॉक्युमेंट्री फिल्म चल रही हो, ऐसी फिल्म जिसमें मन के भीतर की छवियां बड़ी कुशलता के साथ उकेरी गई हैं। कुछ पंक्तियां किशन सरोज जी के एक और प्रसिद्ध गीत की, इस प्रकार हैं-

धर गए मेहंदी रचे, दो हाथ जल में दीप

जन्म-जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं

रेल छूटी रह गया केवल धुआं,

हम भटकते ही फिरे बेहाल,

हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गए अंतर्कथा,

स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,

ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,

देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

आज के लिए इतना ही।    

नमस्कार।

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28. मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया!

चलिए आगे बढ़ने से पहले नंद बाबा का थोड़ा सम्मान कर लेते हैं। नंद बाबा, मां-बाप ने इनका नाम रखा था –सच्चिदानंद, इन्होंने बाद में अपनाया एस. नंद और जनता ने प्यार से इनको कहा- नंद बाबा।

कारण जो भी रहे हों, विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण करते ही इनकी महाप्रबंधक महोदय से बिगड़ गई। वैसे एक बहुत बड़ा गुनाह जो इनकी निगाह में, इनके आने से पहले हो चुका था, वह था मेरी पदोन्नति होना, क्योंकि उसमें मेरे शुद्ध एच.आर. के एक साथी की पदोन्नति नहीं हो पाई थी। मुझे किसी का बुरा होने पर खुशी हो, ऐसा मैं कोशिश करता हूँ कि कभी न हो, लेकिन यह एक प्रशासनिक निर्णय था, जैसा हुआ मानना चाहिए। मेरी गाड़ी बाद में लगातार रुकती रही, उस पर तो नंद बाबा को कभी अफसोस नहीं हुआ होगा।

वैसे नंद बाबा की सोच में जातिगत फैक्टर भी था, ऐसा मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ। अब नंद बाबा की शत्रुता थी महाप्रबंधक से, और वो यह लड़ाई लड़ना चाहते थे मेरे माध्यम से!

परियोजना में और इसके आसपास बहुत से अच्छे कवि और कलाकार थे। परियोजना स्तर पर जो आयोजन होते थे, उनके मुख्य अतिथि तो महाप्रबंधक होते थे। नंद बाबा हर माह स्थानीय कलाकारों का एक आयोजन कराते, जिसके मुख्य अतिथि वे खुद होते थे। महाप्रबंधक को इसके बारे में बताया भी नहीं जाता था। इसके लिए प्रस्ताव मुझे बनाना होता था और डीजीएम के रूप अपनी आर्थिक शक्तियों के अंतर्गत नंद बाबा इस पर होने वाले खर्च का अनुमोदन करते थे।

इस आयोजन में नंद बाबा अपने प्रिय शिष्यों को सुनते थे। ज्यादातर गाना-बजाना होता था, कविता कभी-कभी होती थी। अब अगर किसी ने कह दिया कि शर्मा जी बहुत अच्छा गाते हैं, तो बाबाजी कहते, वो बाद में गाएंगे, सबके जाने के बाद। कोई इंसान भीतर से इतना छोटा हो और वह सकारात्मक सोच का दावा करे, भगवान ही मालिक है।

इन आयोजनों का प्रस्ताव क्योंकि मुझे बनाना होता था इसलिए अगर महाप्रबंधक का कोप किसी को झेलना पड़ता तो वो मैं ही होता। लेकिन शुक्र है, हमारे महाप्रबंधक इतने छोटे दिल के नहीं थे। उन्हें लॉयंस क्लब के तथा अन्य आयोजनों में भरपूर महत्व मिल जाता था। सो उनको इन आयोजनों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

अब फिलहाल राजनीति की बात काफी हो गई। सांस्कृतिक आयोजनों और कवि सम्मेलनों से तो परियोजना के जीवन में नया उत्साह आता था, मुझे याद है इस सिलसिले में मैंने काफी यात्राएं भी कीं। अलीगढ़ में नीरज जी के घर जाकर उनसे मुलाक़ात, मुम्बई में शरद जोशी जी से मिलना, हालांकि वे हमारे यहाँ आ नहीं पाए थे। नितिन मुकेश जी के बारे में तो अलग से एक ब्लॉग लिखने का प्रयास करूंगा। उदयपुर भी जाने का अवसर मिला था, वहाँ से पंडवानी नृत्य और कठपुतली के कार्यक्रम कराने के लिए। उस ज़माने में दरअसल मोबाइल का इतना प्रचलन नहीं हुआ था।

फिलहाल मैं उस क्षेत्र के एक धुनी व्यक्ति का ज़िक्र करना चाहूंगा। ये सज्जन सिंगरौली और विंध्याचल परियोजनाओं में फोटोग्राफी का काम करते थे, शक्तिनगर में फोटो स्टूडियो भी था इनके बड़े भाई का- नन्हे स्टूडियो। इन्हें हम दाढ़ी वाले पांडे जी के नाम से जानते थे। शायद सत्यनारायण पांडे नाम था, अगर मुझे सही याद है तो। एक बार पांडे जी तब सुर्खियों में आए थे, जब राजीव गांधी शक्तिनगर आए थे। जो नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि वहाँ अगल-बगल दो परियोजनाएं, यानि बिजलीघर हैं और एक की टाउनशिप का नाम शक्तिनगर है। किसी भी परियोजना में आने के लिए वीआईपी शक्तिनगर के हैलीपैड पर आते हैं।

हुआ ऐसे कि राजीव गांधी के आगमन के समय पांडे जी किसी सुरक्षा-पास वाली गाड़ी में बैठकर हैलीपैड पर पहुंच गए। बाद में बनारस के समाचारपत्रों में छपा- ‘एक अदने से फोटोग्राफर ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगाई’।

खैर मैं पांडे जी का ज़िक्र किसी और संदर्भ में कर रहा था। पांडे जी का जन्मदिन शरद पूर्णिमा को पड़ता है। मुझ जैसे लोगों की रुचि जबकि कविता और सुगम/ फिल्मी संगीत में थी, वहीं पांडे जी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि लेते थे और उन्होंने शास्त्रीय संगीत के अनेक श्रेष्ठ कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें- पं. जसराज का गायन,  बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई, पं. शिव कुमार शर्मा, हरि प्रसाद चौरसिया आदि अनेक लोगों के कार्यक्रम आयोजित किए, इन कार्यक्रमों के संचालन का अवसर भी मुझे प्राप्त होता था।

जहाँ तक कंपनी की ओर से किए जाने वाले आयोजनों का प्रश्न है, उनमें जगजीत सिंह, अभिजीत, महेंद्र कपूर आदि अनेक कलाकार आए। नितिन मुकेश जी का आयोजन तो यादगार है, उसके बारे में अलग से बात करूंगा।

यहाँ मैं गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रमों में मेरी भागीदारी के बारे में एक वाकया बताना चाहूंगा। शायद स्वाधीनता दिवस के एक आयोजन के समय की बात है, भोपाल में मेरी बड़ी बहन रहती थीं, जिनकी इस आयोजन से पहले मृत्यु हो गई। उस समय हमारे विभागीय प्रधान थे श्री नागकुमार और महाप्रबंधकथे श्री जी.एस.सरकार। मैंने अपनी बहन के अंतिम संस्कार में जाने के लिए छुट्टी मांगी, इस पर श्री नागकुमार ने कहा-  ‘मि. शर्मा ऑय एम सॉरी बट मैं आपको छुट्टी नहीं दे सकता।’ ऐसा भी होता है, रिश्तेदारी में मुझे कुछ बहाना बनाना पड़ा।

किस्से तो बहुत हैं, आगे और बात करेंगे, फिलहाल सुकवि श्री सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना का कुछ भाग  शेयर करना चाहूंगा-

क्या बतलाएं हमने कैसे शाम-सवेरे देखे हैं,

सूरज के आसन पर बैठे,घोर अंधेरे देखे हैं।

कोई दीवाना जब होठों तक अमृत घट ले आया,

काल-बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया

जब से होरी ने धनिया के नयन बड़ेरे देखे हैं।

                                                                    (सोम ठाकुर)

नमस्कार।

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27. जय गुरूदेव!

विंध्याचल परियोजना में मेरा प्रवास 12 वर्ष का रहा, जो सेवा के दौरान किसी एक स्थान पर सबसे अधिक है, और एनटीपीसी में 22 वर्ष की कुल सेवा भी किसी एक संस्थान में सबसे लंबी सेवा थी। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि मुझ जैसा चंचल चित्त व्यक्ति भी कहीं दीर्घ सेवा सम्मान पा सकता है।

एनटीपीसी ऐसे फील्ड में कार्यरत है, जहाँ घाटा होने की संभावना बहुत कम है, उत्पादन के आधार पर मिलने वाले प्रोत्साहन आकर्षक हैं, अन्यथा देखा जाए तो यहाँ का प्रबंधन किसी भी दृष्टि से कर्मचारी कल्याण का विज़न लिए हुए नहीं है, हालांकि नारे तो यहाँ काफी आकर्षक लगाए जाते हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जो पेंशन मिलती है, यदि उसको ही देख लें तो मालूम हो जाएगा कि यहाँ का प्रबंधन कितना महान है।

खैर मैं फिलहाल विंध्याचल परियोजना में अपने कार्यकाल के अनुभव बता रहा था। यहाँ ये डर भी लगता है कि मैं जो हमेशा यह मानता रहा कि मैं अजातशत्रु हूँ, वहीं मैं यह विवरण देता रहूं कि कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे अपना शत्रु माना हुआ था। यह भी डर रहता है कि कहीं मैं अपने गुणगान में ही न उलझ जाऊं। मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है कि मेरे पाठक की रुचि बनी रहे और उसे यह लगे कि कुछ पढ़ने लायक पढ़ा है।

खैर स्वतंत्र कुमार जी के बाद श्री एस. नंद ने मानव संसाधन विभाग के प्रधान के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। उन्होंने बाद में सकारात्मक सोच पर एक पुस्तक भी लिखी। मुझे यही लगता है कि यदि इन सज्जन की सोच सकारात्मक थी तो फिर नकारात्मक सोच क्या होती है!

मैं वहाँ स्कूल समन्वय का काम भी देखता था सो यह बता दूं कि वहाँ टाउनशिप में तीन स्कूल चलते थे, जिनके संचालन के लिए विभिन्न संस्थाओं के साथ अनुबंध किया गया था। ये स्कूल थे दिल्ली पब्लिक स्कूल, डी पॉल स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर। इनमें से पहले दो स्कूल अंग्रेजी माध्यम के थे और तीसरा हिंदी माध्यम स्कूल था। सरस्वती शिशु मंदिर में फीस भी अपेक्षाकृत कम थी तथा सामान्य कर्मचारियों के बच्चे इस स्कूल में अधिक संख्या में पढ़ते थे।

प्रबंधन द्वारा सोसायटियों के साथ किए गए अनुबंध के अंतर्गत इन स्कूलों को बहुत सी सुविधाएं और सामग्री प्रदान की जाती थीं। मेरा हमेशा यह प्रयास रहा कि सुविधाओं के मामले में किसी स्कूल को कमी न महसूस हो। इसी सिलसिले में एक घटना का उल्लेख कर रहा हूँ।

स्कूलों से हम उनकी सामग्री संबंधी आवश्यकताओं की सूची, विवरण मांगते थे तथा कम सामग्री होने पर तो वे स्वयं खरीदकर दावा प्रस्तुत कर देते थे अधिक सामग्री के मामले में हम खरीद का प्रबंध करते थे। ऐसे ही एक मामले में, सरस्वती शिशु मंदिर की तीनों प्रयोगशालाओं के लिए सामग्री और उपकरणों की खरीद की जानी थी।

खरीद के लिए मानव संसाधन, सामग्री और वित्त विभाग के प्रतिनिधियों की एक समिति बनाई गई और सरस्वती शिशु मंदिर के भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के अध्यापकों को भी साथ ले लिया गया, जिससे वे सामग्री की गुणवत्ता के आधार पर उसका चयन कर सकें।

विंध्याचल परियोजना से जबलपुर पास पड़ने वाला ऐसा शहर था, जहाँ ये सभी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती थीं। कमेटी के सदस्यों ने, क्रय-प्रक्रिया के अनुसार, वहाँ के स्थानीय बाज़ार में घूमकर सामग्रियों का विवरण एवं दरें एकत्रित कीं, उनका तुलनात्मक विवरण तैयार किया, अब संबंधित दुकानों पर चलकर उन सामग्रियों की गुणवत्ता देखनी थी, जो दर के आधार पर खरीदने योग्य पाई गई थीं। यह कार्य उस स्कूल के अध्यापकों को करना था, जहाँ चारित्रिक विकास को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन ये महान अध्यापक इस बीच वहाँ के बाज़ार में किसी पार्टी से मिल लिए थे, जिसने उनको समुचित लालच दे दिया था।

जब उन महान शिक्षकों से कहा गया कि चलकर सामग्री और उसकी गुणवत्ता की जांच कर लीजिए, तो वे बोले कि नहीं जी, हमको तो अमुक दुकान से खरीदना है। अब एक गलती हमसे ये हो गई थी कि हम उनको भी अपने  बराबर की संख्या में ले गए थे। जब वे किसी तरह अपनी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुए, तब मैंने अपने ऑफिस में स्थिति बताई और कहा कि हम खरीद किए बिना वापस आ रहे हैं और हमने बाद में क्रय आदेश भेजकर खरीद की।

इस प्रकार हमको सबक मिला और बाद में हम खरीद के लिए कंपनी के रसायन विभाग का एक प्रतिनिधि ले जाते थे। यह भी समझ में आ गया कि जहाँ पर स्कूलों का प्रबंध इन महान लोगों के हाथ में है, वहाँ इतनी दुर्दशा क्यों है।

अब मैं अपने विभाग की तो बात भूल ही गया, नंद बाबा को उचित सम्मान बाद में देंगे, आज का किस्सा तो अलग ही हो गया।

एक कविता की कुछ पंक्तियां, शायद सूंड फैज़ाबादी की है, यहाँ दे रहा हूँ-

निर्माण कार्य चालू है,

पुल बांध रहे बंदर और भालू हैं,

शायद राम पार उतर जाएं

क्योंकि एक बोरी सीमेंट में

आठ बोरी बालू है।

 नमस्कार।

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26. इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं!

विंध्याचल परियोजना में शुरू के 3-4 साल बड़े सुकून और आनंद के साथ बीते, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, स्कूलों की प्रगति के लिए पुस्तकों और सामग्रियों का प्रबंध, खेलकूद, कवि सम्मेलन आदि। सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी मेरी ऐसी भूमिका बन गई कि एकाध बार ऐसा कोई आयोजन हुआ और मैं बाहर रहा तो बाद में लोगों ने शिकायत की।

विंध्यनगर का स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स खुले आकाश के नीचे होने वाली गतिविधियों के लिए और रूसी प्रेक्षागृह, हॉल में होने वाले कार्यक्रमों के लिए निरंतर प्रयोग में आते रहते थे।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग (बाद में इसका नाम बदलकर मानव संसाधन विभाग किया गया) के प्रधान के रूप में श्री आर.एन.रामजी के बाद श्रीमान स्वतंत्र कुमार आए। श्री कुमार में एक विशेषता तो यह थी कि वे सबका पूरा नाम याद रखते थे और पूरे नाम से ही बुलाते थे। काम काफी तेज़ी से करते थे, इसलिए उनको राजधानी एक्सप्रेस भी कहा जाता था। लेकिन एक और नकारात्मक किस्म की विशेषता उनकी यह थी कि वे गालियों का प्रयोग बड़ी उदारता से करते थे।

एकाध बार यूनियन के नेताओं अथवा सीआईएसएफ के अधिकारियों के साथ बातचीत में, उनकी ज़ुबान से उदारतापूर्वक निकली गालियों के कारण औद्योगिक वातावरण बिगड़ने की नौबत आ गई थी।

यह भी बता दूं कि हमारे महाप्रबंधक श्री एस.एस.दुआ जहाँ बहुत अच्छे इंसान थे, वहीं उनके साथ एक सबसे बड़ी कमज़ोरी थी उनकी पत्नी श्रीमती दुआ, जो परंपरा के अनुसार लेडीज़ क्लब की अध्यक्ष थीं और वह हर व्यक्ति और विभाग के कार्यकलापों पर टिप्पणी करना अपना अधिकार समझती थीं।

श्रीमती दुआ के कारण, महाप्रबंधक महोदय के बहुत से विभागाध्यक्षों से संबंध खराब रहते थे, जिनमें मानव संसाधन विभाग लगभग हमेशा शामिल रहा।

इत्तफाक से मेरी श्रीमती जी पहले लेडीज़ क्लब द्वारा चलाए जाने वाले टायनी टॉट्स स्कूल में प्रिंसिपल बनी और फिर लेडीज़ क्लब की पदाधिकारी भी बनीं। इस कारण विपक्षी पार्टियों द्वारा मुझे महाप्रबंधक का आदमी या शुद्ध भाषा में कहा जाए तो चमचा मान लिया गया।

एक यह भी हुआ कि मुझे मेरी पहली पदोन्नति सही समय पर मिल गई, जबकि एनटीपीसी के पूरे कार्यकाल में यही एकमात्र पदोन्नति है जो मुझे समय पर मिली।

हिंदी अधिकारी को यहाँ कार्मिक विभाग में कितनी भी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है, सांस्कृतिक गतिविधियों में उसका निष्पादन भले ही सबके द्वारा सराहा जाए, लेकिन यह निश्चित रूप से माना जाता है कि पदोन्नति पर उसकी दावेदारी सबसे अंत में आती है।

यह भी स्पष्ट है कि मेरे विभाग की तरफ से पदोन्नति हेतु जो प्राथमिकता दर्शायी गई थी उसमें मेरा नाम बाद में रखा गया था, लेकिन महाप्रबंधक महोदय ने उस प्राथमिकता को न मानते हुए मुझे पदोन्नति की मंज़ूरी दी तथा शुद्ध रूप से मानव संसाधन के मेरे एक साथी को पदोन्नति नहीं मिल पाई, परियोजनाओं हिंदी अधिकारी को मानव संसाधन का अशुद्ध सदस्य माना जाता है, उसकी ज़िम्मेदारियां हो सकती हैं,अधिकार नहीं।

इसके बाद से स्वतंत्र कुमार जी और उनके बाद आने वाले एक-दो सज्जन, जैसे नंद बाबा आदि, अघोषित अथवा घोषित रूप से मेरे शत्रु हो गए। इसमें जाहिर है कि लेडीज़ क्लब का भी योगदान था, क्योंकि एकाध विभागाध्यक्ष, जिन्हें मैं संत मानता था, उनके बारे में बहुत बाद में मालूम हुआ कि वे मुझसे शत्रुता पाले हुए थे।

स्वतंत्र कुमार जी जब हमारे विभागाध्यक्ष थे, तभी की एक घटना है, हमारी परियोजना का एक विज्ञापन छपा था जिसमें अंग्रेजी आशुलिपिक की भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इस पर केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की ओर से एक पत्र आया कि ये गलत है, भर्ती केवल हिंदी अथवा द्विभाषी आशुलिपिकों के लिए की जानी चाहिए।

इस पर स्वतंत्र कुमार जी ने कहा- हम जवाब ही नहीं देंगे, साले हमारा क्या कर लेंगे!

यही स्वतंत्र कुमार जी बाद में पूरी कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे और सबको इस संबंध में उपदेश देते घूमते थे।

श्री मुकुट बिहारी ‘सरोज’ जी की दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

प्रभुता के घर जन्मे समारोह ने पाले हैं
इनके ग्रह मुँह में चाँदी के चम्मच वाले हैं
उद्घाटन में दिन काटे, रातें अख़बारों में,
ये शुमार होकर ही मानेंगे अवतारों में

ये तो बड़ी कृपा है जो ये दिखते भर इन्सान हैं।
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं।

 अपनी एक और छोटी सी कविता इस बहाने पेल देता हूँ-

बहेलिए

धागे तो कच्चे हैं, मनमोहक नारों के,

लेकिन जब जाल बुने जाते हैं यारों के,

और ये शिकारी, डालते हैं दाना,

हर रोज़ नए वादों का,

भाग्य बदल देने के

जादुई इरादों का,

फंसती है भोले कबूतर सी जनता तब,

जाल समेट, राजनैतिक बहेलिए

बांधते हैं, जन-गण की उड़ाने स्वच्छंद

और बनते हैं भाग्यविधाता-

अभिशप्त ज़माने के।

(श्रीकृष्ण शर्मा)

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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25. अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!

जैसा कि मैंने बताया, अब बारी थी मेरे सेवाकाल के अंतिम नियोजक, एनटीपीसी लिमिटेड के साथ जुड़ने की, जहाँ मेरी सेवा भी सबसे लंबी रही। 21 मार्च, 1988 को मैंने एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण किया, यहाँ मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन और संचालन का भरपूर अवसर मिला, प्रेम करने वाले ढ़ेर सारे लोग मिले लेकिन कुछ नफरत करने वाले ऊंचे पदों पर बैठे छोटे लोग भी मिले, जिनमें कुछ तो दुश्मनी करते-करते ऊपर भी पहुंच चुके हैं। यहाँ की कहानी सुनाने में कुछ धर्मसंकट भी है, कोशिश करूंगा उसका सामना करने की।

खैर, जैसा होता है रिक्ति सूचना प्रकाशित हुई थी एनटीपीसी की, मैंने आवेदन दिया, उस समय नेहरू प्लेस कार्यालय में लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार में कुछ विद्वान लोग एवं उच्च अधिकारी थे, जैसा मुझे स्मरण है कि श्री मैनेजर पांडेय भी उसमें थे, उन्होंने पूछा कि यहाँ आने पर क्या विशेष आपको लगता है कि होगा? मैंने कहा था कि यहाँ मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलेगा। इस पर एक धोती, कुर्ता एवं नेहरू जैकेट धारी सज्जन ने कहा था कि स्वतंत्र तो कोई नहीं है, प्रधान मंत्री के ऊपर भी राष्ट्र्पति होते हैं।

ये सज्जन थे – केंद्रीय कार्यालय में तैनात हिंदी प्रभारी- डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, इस संक्षिप्त दर्शन एवं संवाद से इतनी झलक मिल गई थी कि ये सज्जन ढोंगी हैं और हीन भावना से ग्रस्त हैं, इन्हें यह डर बना रहता है कि कहीं इनके वर्चस्व में कमी न आ जाए। बाद में इनके बारे में और बातें होंगी। शुरू में इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि राजभाषा संबंधी रिपोर्टों में थोड़ा बहुत झूठ तो सब जगह बोला जाता है, यहाँ मालूम हुआ कि इनके नेतृत्व में शुद्ध रूप से झूठ बोलना ही चलता है।

विंध्याचल में पहला ठिकाना था हमारा- फील्ड हॉस्टल, जिसका नाम था यमुना भवन और इस प्रकार एनटीपीसी से मेरे 22 वर्ष के घटनापूर्ण साथ का शुभारंभ हुआ, जिसमें से 12 वर्ष तो मैंने विंध्याचल परियोजना में ही बिताए थे। यहाँ मैं बताना चाहूंगा कि तीन-चार लोगों ने एक ही समय में वहाँ कार्यग्रहण किया था, एक से किसी ने पूछा कि कैसा है वहाँ पर तो उसने बताया कि दिल्ली के वसंत विहार जैसा समझ लीजिए, चौड़ी और साफ सड़कें और रात में भी रोशनी इतनी कि सड़क पर पड़ा हुआ पिन उठा सकते हैं।

जब मैंने कार्यग्रहण किया उस समय महाप्रबंधक थे श्री वेंकटरमण, जो मेरे कार्यग्रहण के बाद कुछ समय ही रहे, बहुत प्रभावी और रौबीले अधिकारी थे। उसके बाद श्री एस.एस.एस.दुआ ने महाप्रबंधक के रूप में पदभार ग्रहण किया, बहुत अच्छे अधिकारी थे, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे तथा सभी प्रकार की गतिविधियों में उनकी सक्रिय रुचि थी। उनके समय में मैंने बहुत अच्छे कवि सम्मेलनों का आयोजन किया तथा ‘विंध्य वीणा’ नाम से हिंदी अनुभाग की वार्षिक पत्रिका का भी प्रकाशन प्रारंभ किया।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग में हमारे मुख्य कार्मिक प्रबंधक थे श्री आर.एन.रामजी, जो बहुत सिद्धांतवादी व्यक्ति थे, पहले केंद्रीय कार्यालय में रह चुके थे और कंपनी के नियमों के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। सिद्धांतवादी होने का यह परिणाम भी हुआ कि उन्होंने सी.बी.आई. से आए हुए सतर्कता अधिकारी को उसकी पात्रता से ऊंचा आवास नहीं दिया और बाद में सी.बी.आई. की जांच का सामना उनको करना पड़ा।

यहाँ मैं राजभाषा के अलावा जनसंपर्क, स्कूल समन्वय,कल्याण आदि कार्य भी देख रहा था, अक्सर ऐसा होता था कि मैं कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम संचालित करता था और उसके बाद अपने घर चला जाता था, अगले दिन सुबह महाप्रबंधक कार्यालय से हमारे यहाँ फोन आता था, मुझे ढ़ूंढ़कर भेजा जाता, मैं घबराता कि क्या हो गया, तब  मालूम होता कि महाप्रबंधक महोदय ने मुझे पिछले दिन के आयोजन के सफल संचालन हेतु बधाई देने के लिए बुलाया है।

श्री दुआ ने अपने कार्यकाल में वहाँ लायंस क्लब की गतिविधियों को भी भरपूर बढ़ावा दिया और इस बहाने काफी दूर-दूर से लोग यहाँ आते थे और क्लब के कार्यक्रमों के संचालन से भी मुझे लोगों का काफी प्रेम मिला।

नौकरी के दौरान, प्रोजेक्ट लाइफ में क्या हुआ, यह बात तो करते रहेंगे, अभी एक घटना दिल्ली की बता दूं, दिल्ली-शाहदरा, जहाँ मेरी मां अभी तक रहती थीं, पहले हम सभी एक बड़ा सा कमरा और रसोई लेकर 16 रुपया महीना पर रहते थे, अभी मेरी मां एक छोटी सी कोठरी में रहती थीं,जिसमें मुश्किल से एक छोटा सा खटोला आता था, इसका किराया था 100 रुपया। समय काफी बदल चुका था।

खैर मैं वहाँ गया, मां ने बड़े चाव से खाना बनाकर खिलाया, चलते समय मैंने मां को चार नोट दिए, मां बोली बेटा एक और दे देता तो ठीक रहता, दो महीने का किराया 200/- देना है, सौदे के 100/- बाकी हैं,100/- का अभी आ जाएगा, 100/- आगे के लिए बच जाते तो ठीक रहता।

यह सब बताने का उद्देश्य मात्र इतना है कि मैंने जो 500/- के नोट दिए थे उनको मेरी मां 100 के नोट समझ रही थे, और उसकी अपेक्षाएं कितनी कम थीं। सही बात बताने पर मां ने भरपूर आशीर्वाद दिए।

खैर यह अफसोस तो सदा रहा कि मां हमारे साथ रहकर अधिक सुख न भोग सकी।

अपनी लिखी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

मंदिर के पापों ने कर दिया,

नगरी का आचरण सियाह,

होता है रोज आत्मदाह।

मौलिक प्रतिभाओं पर फतवों का

बोझ लादती अकादमी,

अखबारों में सेमीनारों में

जीता है आम आदमी,

सेहरों से होड़ करें कविताएं

कवि का ईमान वाह-वाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

 

जीने की गूंगी लाचारी ने,

आह-अहा कुछ नहीं कहा,

निरानंद जीवन के नाम पर,

एक दीर्घ श्वास भर लिया,

और प्रतिष्ठान ने दिखा दिया

पंथ ताकि हो सके निबाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

हर अनिष्टसूचक सपना मां का,

बेटे की सुधि से जुड़ जाता है,

और वो कहीं पसरा बेखबर

सुविधा के एल्बम सजाता है।

ये युग कैसा जीवन जीता है,

उबल रहा तेल का कड़ाह।

होता है रोज आत्मदाह।।

                                (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार।

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