29. मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा, एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

अब विंध्याचल परियोजना के क्लबों का ज़िक्र कर लेते हैं। दो क्लब थे वहाँ पर, वीवा क्लब (विंध्याचल कर्मचारी कल्याण क्लब) और विंध्य क्लब। वहाँ समय-समय पर होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा, हिंदी अनुभाग की ओर से कभी-कभी कवि गोष्ठियों का आयोजन भी हम वहाँ करते थे। अधिक प्रतिभागिता वाले कार्यक्रम तो रूसी प्रेक्षागृह में किए जाते थे।

मुझे याद है कि एक बार कविताओं पर आधारित अंत्याक्षरी प्रतियोगिता वीवा क्लब में हमने की थी, जिसमें अनेक टीमों ने भाग लिया था, काफी दिन तक यह प्रतियोगिता चली थी और प्रतिभागियों ने आगे बढ़ने के लिए बहुत से काव्य संकलन भी खरीदे थे।

खैर अभी जो मुझे क्लबों की याद आई उसका एक कारण है। हमारे बच्चे लोग क्लबों में खेलने के लिए जाते थे, एक रोज़ शाम को मेरा बड़ा बेटा क्लब से घबराया हुआ घर आया, आते ही उसने अपनी मां से पूछा- ‘मां, पापाजी कहाँ हैं’ और उसको यह जानकर तसल्ली हुई कि मैं घर पर ही था और ठीक-ठाक था।

असल में उसने क्लब में सुना था कि किसी- एस.के.शर्मा ने आत्महत्या कर ली है। यह एक बड़ी दुखद घटना थी, जो वहाँ देखने को मिली। इस घटना की पृष्ठभूमि के संबंध में, बाद में ‘मनोहर कहानियां’ मे “डर्टी कल्चर” नाम से लंबी स्टोरी छपी थी। खैर उसके संबंध में चर्चा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

ये बड़ी  अजीब बात है कि जो वांछनीय नहीं है, वही इन पत्रिकाओं के लिए – ‘मनोहर कहानी’ होता है, ‘मधुर कथा’ या ‘सरस कथा’ होता है। ये पत्रिकाएं अपराधों के संबंध में रस ले-लेकर कहानी सुनाती हैं और मेरा पूरा विश्वास है कि इससे अपराध को बढ़ावा मिलता है। आजकल टीवी पर भी इस प्रकार के कार्यक्रम आते हैं। इनको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

अब कवियों और कवि सम्मेलनों के संबंध में बात कर लेते हैं। विंध्याचल परियोजना में जाने के बाद, शुरु के ही एक आयोजन में ऐसा हुआ था कि हमने नीरज जी को भी आमंत्रित किया था और सुरेंद्र शर्मा को भी बुला रहे थे। उस समय हमारे विभागध्यक्ष थे श्री आर.एन. रामजी। सुरेंद्र शर्मा ने जो राशि मांगी थी वह नीरज जी से तीन गुना थी, यह अनुपात तो शायद आज भी कायम होगा, शायद और बढ़ गया हो, लेकिन श्री रामजी ने कहा, इस कवि को कभी मत बुलाना, मैं इस बात पर हमेशा कायम रहा। अगर हमें भारी रकम देकर चुटकुले ही सुनने हैं, तो कपिल शर्मा जैसे किसी व्यक्ति को बुलाएंगे, कविता के नाम से चुटकुले क्यों सुनेंगे।

एक और आयोजन में हमारे यहाँ श्री सूंड फैज़ाबादी आए थे, वे बोले कि शुरू में लोग हमको मंच पर नहीं चढ़ने देते थे, कहते थे हास्य वाला है। फिर वो बोले कि अब हम फैसला करते हैं कि मंच पर कौन चढ़ेगा। मैंने खैर खयाल रखा कि हमारे आयोजनों में ऐसा न हो पाए। हमने हास्य के ओम प्रकाश आदित्य, प्रदीप चौबे, जैमिनी हरियाणवी, माणिक वर्मा जैसे ख्याति प्राप्त कवियों को बुलाया, लेकिन मंच पर विशेष दर्जा हमेशा साहित्यिक कवियों को दिया।

हमारे आयोजन में श्री शैल चतुर्वेदी एक बार ही आए थे, मुझे याद है उस समय रीवा जिले के युवा एसएसपी- श्री राजेंद्र कुमार भी आए थे और वे शैल जी के साथ काफी फोटो खिंचवाकर गए थे। शैल जी से आयोजन के बाद बहुत देर तक बात होती रही। वे मेरे संचालन से बहुत खुश थे, बोले आप इतना धाराप्रवाह बोलते हो बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बताया कि शंकर दयाल शर्मा जी (उस समय के राष्ट्रपति) हर साल राष्ट्रपति भवन में कवि गोष्ठी करते हैं,जिसमें वह जाते थे और उनका कहना था कि अगले साल वो राष्ट्रपति भवन में मुझे बुलाएंगे और मुझे आना होगा। खैर उसके बाद शैल जी ज्यादा समय जीवित भी नहीं रहे थे।

कुछ कवि सम्मेलन तो ऐसे यादगार रहे कि आनंद के उन पलों को आज भी याद करके बहुत अच्छा लगता है। श्री सोम ठाकुर जी का श्रेष्ठ संचालन और उसमें अन्य अनेक ख्यातिप्राप्त कवियों के साथ-साथ श्री किशन सरोज का गीत पाठ –

छोटी से बड़ी हुई तरुओं की छायाएं,

धुंधलाई सूरज के माथे की रेखाएं,

मत बांधो आंचल में फूल चलो लौट चलें,

वह देखो, कोहरे में चंदन वन डूब गया।

 

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,

सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,

किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,

कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा।

 

सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,

काहे का रोना जो बीती सो बात गई,

मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,

एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

 

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,

हंसने वालों में रहकर मुसकाना होगा,

घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,

रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया। 

मन हो रहा था कि पूरा ही गीत यहाँ उतार दूं, लेकिन स्थान की दिक्कत है, यह एक ऐसा गीत है जैसे कोई डॉक्युमेंट्री फिल्म चल रही हो, ऐसी फिल्म जिसमें मन के भीतर की छवियां बड़ी कुशलता के साथ उकेरी गई हैं। कुछ पंक्तियां किशन सरोज जी के एक और प्रसिद्ध गीत की, इस प्रकार हैं-

धर गए मेहंदी रचे, दो हाथ जल में दीप

जन्म-जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं

रेल छूटी रह गया केवल धुआं,

हम भटकते ही फिरे बेहाल,

हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गए अंतर्कथा,

स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,

ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,

देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

आज के लिए इतना ही।    

नमस्कार।

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28. मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया!

चलिए आगे बढ़ने से पहले नंद बाबा का थोड़ा सम्मान कर लेते हैं। नंद बाबा, मां-बाप ने इनका नाम रखा था –सच्चिदानंद, इन्होंने बाद में अपनाया एस. नंद और जनता ने प्यार से इनको कहा- नंद बाबा।

कारण जो भी रहे हों, विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण करते ही इनकी महाप्रबंधक महोदय से बिगड़ गई। वैसे एक बहुत बड़ा गुनाह जो इनकी निगाह में, इनके आने से पहले हो चुका था, वह था मेरी पदोन्नति होना, क्योंकि उसमें मेरे शुद्ध एच.आर. के एक साथी की पदोन्नति नहीं हो पाई थी। मुझे किसी का बुरा होने पर खुशी हो, ऐसा मैं कोशिश करता हूँ कि कभी न हो, लेकिन यह एक प्रशासनिक निर्णय था, जैसा हुआ मानना चाहिए। मेरी गाड़ी बाद में लगातार रुकती रही, उस पर तो नंद बाबा को कभी अफसोस नहीं हुआ होगा।

वैसे नंद बाबा की सोच में जातिगत फैक्टर भी था, ऐसा मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ। अब नंद बाबा की शत्रुता थी महाप्रबंधक से, और वो यह लड़ाई लड़ना चाहते थे मेरे माध्यम से!

परियोजना में और इसके आसपास बहुत से अच्छे कवि और कलाकार थे। परियोजना स्तर पर जो आयोजन होते थे, उनके मुख्य अतिथि तो महाप्रबंधक होते थे। नंद बाबा हर माह स्थानीय कलाकारों का एक आयोजन कराते, जिसके मुख्य अतिथि वे खुद होते थे। महाप्रबंधक को इसके बारे में बताया भी नहीं जाता था। इसके लिए प्रस्ताव मुझे बनाना होता था और डीजीएम के रूप अपनी आर्थिक शक्तियों के अंतर्गत नंद बाबा इस पर होने वाले खर्च का अनुमोदन करते थे।

इस आयोजन में नंद बाबा अपने प्रिय शिष्यों को सुनते थे। ज्यादातर गाना-बजाना होता था, कविता कभी-कभी होती थी। अब अगर किसी ने कह दिया कि शर्मा जी बहुत अच्छा गाते हैं, तो बाबाजी कहते, वो बाद में गाएंगे, सबके जाने के बाद। कोई इंसान भीतर से इतना छोटा हो और वह सकारात्मक सोच का दावा करे, भगवान ही मालिक है।

इन आयोजनों का प्रस्ताव क्योंकि मुझे बनाना होता था इसलिए अगर महाप्रबंधक का कोप किसी को झेलना पड़ता तो वो मैं ही होता। लेकिन शुक्र है, हमारे महाप्रबंधक इतने छोटे दिल के नहीं थे। उन्हें लॉयंस क्लब के तथा अन्य आयोजनों में भरपूर महत्व मिल जाता था। सो उनको इन आयोजनों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

अब फिलहाल राजनीति की बात काफी हो गई। सांस्कृतिक आयोजनों और कवि सम्मेलनों से तो परियोजना के जीवन में नया उत्साह आता था, मुझे याद है इस सिलसिले में मैंने काफी यात्राएं भी कीं। अलीगढ़ में नीरज जी के घर जाकर उनसे मुलाक़ात, मुम्बई में शरद जोशी जी से मिलना, हालांकि वे हमारे यहाँ आ नहीं पाए थे। नितिन मुकेश जी के बारे में तो अलग से एक ब्लॉग लिखने का प्रयास करूंगा। उदयपुर भी जाने का अवसर मिला था, वहाँ से पंडवानी नृत्य और कठपुतली के कार्यक्रम कराने के लिए। उस ज़माने में दरअसल मोबाइल का इतना प्रचलन नहीं हुआ था।

फिलहाल मैं उस क्षेत्र के एक धुनी व्यक्ति का ज़िक्र करना चाहूंगा। ये सज्जन सिंगरौली और विंध्याचल परियोजनाओं में फोटोग्राफी का काम करते थे, शक्तिनगर में फोटो स्टूडियो भी था इनके बड़े भाई का- नन्हे स्टूडियो। इन्हें हम दाढ़ी वाले पांडे जी के नाम से जानते थे। शायद सत्यनारायण पांडे नाम था, अगर मुझे सही याद है तो। एक बार पांडे जी तब सुर्खियों में आए थे, जब राजीव गांधी शक्तिनगर आए थे। जो नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि वहाँ अगल-बगल दो परियोजनाएं, यानि बिजलीघर हैं और एक की टाउनशिप का नाम शक्तिनगर है। किसी भी परियोजना में आने के लिए वीआईपी शक्तिनगर के हैलीपैड पर आते हैं।

हुआ ऐसे कि राजीव गांधी के आगमन के समय पांडे जी किसी सुरक्षा-पास वाली गाड़ी में बैठकर हैलीपैड पर पहुंच गए। बाद में बनारस के समाचारपत्रों में छपा- ‘एक अदने से फोटोग्राफर ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगाई’।

खैर मैं पांडे जी का ज़िक्र किसी और संदर्भ में कर रहा था। पांडे जी का जन्मदिन शरद पूर्णिमा को पड़ता है। मुझ जैसे लोगों की रुचि जबकि कविता और सुगम/ फिल्मी संगीत में थी, वहीं पांडे जी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि लेते थे और उन्होंने शास्त्रीय संगीत के अनेक श्रेष्ठ कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें- पं. जसराज का गायन,  बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई, पं. शिव कुमार शर्मा, हरि प्रसाद चौरसिया आदि अनेक लोगों के कार्यक्रम आयोजित किए, इन कार्यक्रमों के संचालन का अवसर भी मुझे प्राप्त होता था।

जहाँ तक कंपनी की ओर से किए जाने वाले आयोजनों का प्रश्न है, उनमें जगजीत सिंह, अभिजीत, महेंद्र कपूर आदि अनेक कलाकार आए। नितिन मुकेश जी का आयोजन तो यादगार है, उसके बारे में अलग से बात करूंगा।

यहाँ मैं गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रमों में मेरी भागीदारी के बारे में एक वाकया बताना चाहूंगा। शायद स्वाधीनता दिवस के एक आयोजन के समय की बात है, भोपाल में मेरी बड़ी बहन रहती थीं, जिनकी इस आयोजन से पहले मृत्यु हो गई। उस समय हमारे विभागीय प्रधान थे श्री नागकुमार और महाप्रबंधकथे श्री जी.एस.सरकार। मैंने अपनी बहन के अंतिम संस्कार में जाने के लिए छुट्टी मांगी, इस पर श्री नागकुमार ने कहा-  ‘मि. शर्मा ऑय एम सॉरी बट मैं आपको छुट्टी नहीं दे सकता।’ ऐसा भी होता है, रिश्तेदारी में मुझे कुछ बहाना बनाना पड़ा।

किस्से तो बहुत हैं, आगे और बात करेंगे, फिलहाल सुकवि श्री सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना का कुछ भाग  शेयर करना चाहूंगा-

क्या बतलाएं हमने कैसे शाम-सवेरे देखे हैं,

सूरज के आसन पर बैठे,घोर अंधेरे देखे हैं।

कोई दीवाना जब होठों तक अमृत घट ले आया,

काल-बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया

जब से होरी ने धनिया के नयन बड़ेरे देखे हैं।

                                                                    (सोम ठाकुर)

नमस्कार।

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27. जय गुरूदेव!

विंध्याचल परियोजना में मेरा प्रवास 12 वर्ष का रहा, जो सेवा के दौरान किसी एक स्थान पर सबसे अधिक है, और एनटीपीसी में 22 वर्ष की कुल सेवा भी किसी एक संस्थान में सबसे लंबी सेवा थी। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि मुझ जैसा चंचल चित्त व्यक्ति भी कहीं दीर्घ सेवा सम्मान पा सकता है।

एनटीपीसी ऐसे फील्ड में कार्यरत है, जहाँ घाटा होने की संभावना बहुत कम है, उत्पादन के आधार पर मिलने वाले प्रोत्साहन आकर्षक हैं, अन्यथा देखा जाए तो यहाँ का प्रबंधन किसी भी दृष्टि से कर्मचारी कल्याण का विज़न लिए हुए नहीं है, हालांकि नारे तो यहाँ काफी आकर्षक लगाए जाते हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जो पेंशन मिलती है, यदि उसको ही देख लें तो मालूम हो जाएगा कि यहाँ का प्रबंधन कितना महान है।

खैर मैं फिलहाल विंध्याचल परियोजना में अपने कार्यकाल के अनुभव बता रहा था। यहाँ ये डर भी लगता है कि मैं जो हमेशा यह मानता रहा कि मैं अजातशत्रु हूँ, वहीं मैं यह विवरण देता रहूं कि कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे अपना शत्रु माना हुआ था। यह भी डर रहता है कि कहीं मैं अपने गुणगान में ही न उलझ जाऊं। मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है कि मेरे पाठक की रुचि बनी रहे और उसे यह लगे कि कुछ पढ़ने लायक पढ़ा है।

खैर स्वतंत्र कुमार जी के बाद श्री एस. नंद ने मानव संसाधन विभाग के प्रधान के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। उन्होंने बाद में सकारात्मक सोच पर एक पुस्तक भी लिखी। मुझे यही लगता है कि यदि इन सज्जन की सोच सकारात्मक थी तो फिर नकारात्मक सोच क्या होती है!

मैं वहाँ स्कूल समन्वय का काम भी देखता था सो यह बता दूं कि वहाँ टाउनशिप में तीन स्कूल चलते थे, जिनके संचालन के लिए विभिन्न संस्थाओं के साथ अनुबंध किया गया था। ये स्कूल थे दिल्ली पब्लिक स्कूल, डी पॉल स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर। इनमें से पहले दो स्कूल अंग्रेजी माध्यम के थे और तीसरा हिंदी माध्यम स्कूल था। सरस्वती शिशु मंदिर में फीस भी अपेक्षाकृत कम थी तथा सामान्य कर्मचारियों के बच्चे इस स्कूल में अधिक संख्या में पढ़ते थे।

प्रबंधन द्वारा सोसायटियों के साथ किए गए अनुबंध के अंतर्गत इन स्कूलों को बहुत सी सुविधाएं और सामग्री प्रदान की जाती थीं। मेरा हमेशा यह प्रयास रहा कि सुविधाओं के मामले में किसी स्कूल को कमी न महसूस हो। इसी सिलसिले में एक घटना का उल्लेख कर रहा हूँ।

स्कूलों से हम उनकी सामग्री संबंधी आवश्यकताओं की सूची, विवरण मांगते थे तथा कम सामग्री होने पर तो वे स्वयं खरीदकर दावा प्रस्तुत कर देते थे अधिक सामग्री के मामले में हम खरीद का प्रबंध करते थे। ऐसे ही एक मामले में, सरस्वती शिशु मंदिर की तीनों प्रयोगशालाओं के लिए सामग्री और उपकरणों की खरीद की जानी थी।

खरीद के लिए मानव संसाधन, सामग्री और वित्त विभाग के प्रतिनिधियों की एक समिति बनाई गई और सरस्वती शिशु मंदिर के भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के अध्यापकों को भी साथ ले लिया गया, जिससे वे सामग्री की गुणवत्ता के आधार पर उसका चयन कर सकें।

विंध्याचल परियोजना से जबलपुर पास पड़ने वाला ऐसा शहर था, जहाँ ये सभी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती थीं। कमेटी के सदस्यों ने, क्रय-प्रक्रिया के अनुसार, वहाँ के स्थानीय बाज़ार में घूमकर सामग्रियों का विवरण एवं दरें एकत्रित कीं, उनका तुलनात्मक विवरण तैयार किया, अब संबंधित दुकानों पर चलकर उन सामग्रियों की गुणवत्ता देखनी थी, जो दर के आधार पर खरीदने योग्य पाई गई थीं। यह कार्य उस स्कूल के अध्यापकों को करना था, जहाँ चारित्रिक विकास को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन ये महान अध्यापक इस बीच वहाँ के बाज़ार में किसी पार्टी से मिल लिए थे, जिसने उनको समुचित लालच दे दिया था।

जब उन महान शिक्षकों से कहा गया कि चलकर सामग्री और उसकी गुणवत्ता की जांच कर लीजिए, तो वे बोले कि नहीं जी, हमको तो अमुक दुकान से खरीदना है। अब एक गलती हमसे ये हो गई थी कि हम उनको भी अपने  बराबर की संख्या में ले गए थे। जब वे किसी तरह अपनी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुए, तब मैंने अपने ऑफिस में स्थिति बताई और कहा कि हम खरीद किए बिना वापस आ रहे हैं और हमने बाद में क्रय आदेश भेजकर खरीद की।

इस प्रकार हमको सबक मिला और बाद में हम खरीद के लिए कंपनी के रसायन विभाग का एक प्रतिनिधि ले जाते थे। यह भी समझ में आ गया कि जहाँ पर स्कूलों का प्रबंध इन महान लोगों के हाथ में है, वहाँ इतनी दुर्दशा क्यों है।

अब मैं अपने विभाग की तो बात भूल ही गया, नंद बाबा को उचित सम्मान बाद में देंगे, आज का किस्सा तो अलग ही हो गया।

एक कविता की कुछ पंक्तियां, शायद सूंड फैज़ाबादी की है, यहाँ दे रहा हूँ-

निर्माण कार्य चालू है,

पुल बांध रहे बंदर और भालू हैं,

शायद राम पार उतर जाएं

क्योंकि एक बोरी सीमेंट में

आठ बोरी बालू है।

 नमस्कार।

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26. इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं!

विंध्याचल परियोजना में शुरू के 3-4 साल बड़े सुकून और आनंद के साथ बीते, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, स्कूलों की प्रगति के लिए पुस्तकों और सामग्रियों का प्रबंध, खेलकूद, कवि सम्मेलन आदि। सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी मेरी ऐसी भूमिका बन गई कि एकाध बार ऐसा कोई आयोजन हुआ और मैं बाहर रहा तो बाद में लोगों ने शिकायत की।

विंध्यनगर का स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स खुले आकाश के नीचे होने वाली गतिविधियों के लिए और रूसी प्रेक्षागृह, हॉल में होने वाले कार्यक्रमों के लिए निरंतर प्रयोग में आते रहते थे।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग (बाद में इसका नाम बदलकर मानव संसाधन विभाग किया गया) के प्रधान के रूप में श्री आर.एन.रामजी के बाद श्रीमान स्वतंत्र कुमार आए। श्री कुमार में एक विशेषता तो यह थी कि वे सबका पूरा नाम याद रखते थे और पूरे नाम से ही बुलाते थे। काम काफी तेज़ी से करते थे, इसलिए उनको राजधानी एक्सप्रेस भी कहा जाता था। लेकिन एक और नकारात्मक किस्म की विशेषता उनकी यह थी कि वे गालियों का प्रयोग बड़ी उदारता से करते थे।

एकाध बार यूनियन के नेताओं अथवा सीआईएसएफ के अधिकारियों के साथ बातचीत में, उनकी ज़ुबान से उदारतापूर्वक निकली गालियों के कारण औद्योगिक वातावरण बिगड़ने की नौबत आ गई थी।

यह भी बता दूं कि हमारे महाप्रबंधक श्री एस.एस.दुआ जहाँ बहुत अच्छे इंसान थे, वहीं उनके साथ एक सबसे बड़ी कमज़ोरी थी उनकी पत्नी श्रीमती दुआ, जो परंपरा के अनुसार लेडीज़ क्लब की अध्यक्ष थीं और वह हर व्यक्ति और विभाग के कार्यकलापों पर टिप्पणी करना अपना अधिकार समझती थीं।

श्रीमती दुआ के कारण, महाप्रबंधक महोदय के बहुत से विभागाध्यक्षों से संबंध खराब रहते थे, जिनमें मानव संसाधन विभाग लगभग हमेशा शामिल रहा।

इत्तफाक से मेरी श्रीमती जी पहले लेडीज़ क्लब द्वारा चलाए जाने वाले टायनी टॉट्स स्कूल में प्रिंसिपल बनी और फिर लेडीज़ क्लब की पदाधिकारी भी बनीं। इस कारण विपक्षी पार्टियों द्वारा मुझे महाप्रबंधक का आदमी या शुद्ध भाषा में कहा जाए तो चमचा मान लिया गया।

एक यह भी हुआ कि मुझे मेरी पहली पदोन्नति सही समय पर मिल गई, जबकि एनटीपीसी के पूरे कार्यकाल में यही एकमात्र पदोन्नति है जो मुझे समय पर मिली।

हिंदी अधिकारी को यहाँ कार्मिक विभाग में कितनी भी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है, सांस्कृतिक गतिविधियों में उसका निष्पादन भले ही सबके द्वारा सराहा जाए, लेकिन यह निश्चित रूप से माना जाता है कि पदोन्नति पर उसकी दावेदारी सबसे अंत में आती है।

यह भी स्पष्ट है कि मेरे विभाग की तरफ से पदोन्नति हेतु जो प्राथमिकता दर्शायी गई थी उसमें मेरा नाम बाद में रखा गया था, लेकिन महाप्रबंधक महोदय ने उस प्राथमिकता को न मानते हुए मुझे पदोन्नति की मंज़ूरी दी तथा शुद्ध रूप से मानव संसाधन के मेरे एक साथी को पदोन्नति नहीं मिल पाई, परियोजनाओं हिंदी अधिकारी को मानव संसाधन का अशुद्ध सदस्य माना जाता है, उसकी ज़िम्मेदारियां हो सकती हैं,अधिकार नहीं।

इसके बाद से स्वतंत्र कुमार जी और उनके बाद आने वाले एक-दो सज्जन, जैसे नंद बाबा आदि, अघोषित अथवा घोषित रूप से मेरे शत्रु हो गए। इसमें जाहिर है कि लेडीज़ क्लब का भी योगदान था, क्योंकि एकाध विभागाध्यक्ष, जिन्हें मैं संत मानता था, उनके बारे में बहुत बाद में मालूम हुआ कि वे मुझसे शत्रुता पाले हुए थे।

स्वतंत्र कुमार जी जब हमारे विभागाध्यक्ष थे, तभी की एक घटना है, हमारी परियोजना का एक विज्ञापन छपा था जिसमें अंग्रेजी आशुलिपिक की भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इस पर केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की ओर से एक पत्र आया कि ये गलत है, भर्ती केवल हिंदी अथवा द्विभाषी आशुलिपिकों के लिए की जानी चाहिए।

इस पर स्वतंत्र कुमार जी ने कहा- हम जवाब ही नहीं देंगे, साले हमारा क्या कर लेंगे!

यही स्वतंत्र कुमार जी बाद में पूरी कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे और सबको इस संबंध में उपदेश देते घूमते थे।

श्री मुकुट बिहारी ‘सरोज’ जी की दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

प्रभुता के घर जन्मे समारोह ने पाले हैं
इनके ग्रह मुँह में चाँदी के चम्मच वाले हैं
उद्घाटन में दिन काटे, रातें अख़बारों में,
ये शुमार होकर ही मानेंगे अवतारों में

ये तो बड़ी कृपा है जो ये दिखते भर इन्सान हैं।
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं।

 अपनी एक और छोटी सी कविता इस बहाने पेल देता हूँ-

बहेलिए

धागे तो कच्चे हैं, मनमोहक नारों के,

लेकिन जब जाल बुने जाते हैं यारों के,

और ये शिकारी, डालते हैं दाना,

हर रोज़ नए वादों का,

भाग्य बदल देने के

जादुई इरादों का,

फंसती है भोले कबूतर सी जनता तब,

जाल समेट, राजनैतिक बहेलिए

बांधते हैं, जन-गण की उड़ाने स्वच्छंद

और बनते हैं भाग्यविधाता-

अभिशप्त ज़माने के।

(श्रीकृष्ण शर्मा)

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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25. अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!

जैसा कि मैंने बताया, अब बारी थी मेरे सेवाकाल के अंतिम नियोजक, एनटीपीसी लिमिटेड के साथ जुड़ने की, जहाँ मेरी सेवा भी सबसे लंबी रही। 21 मार्च, 1988 को मैंने एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण किया, यहाँ मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन और संचालन का भरपूर अवसर मिला, प्रेम करने वाले ढ़ेर सारे लोग मिले लेकिन कुछ नफरत करने वाले ऊंचे पदों पर बैठे छोटे लोग भी मिले, जिनमें कुछ तो दुश्मनी करते-करते ऊपर भी पहुंच चुके हैं। यहाँ की कहानी सुनाने में कुछ धर्मसंकट भी है, कोशिश करूंगा उसका सामना करने की।

खैर, जैसा होता है रिक्ति सूचना प्रकाशित हुई थी एनटीपीसी की, मैंने आवेदन दिया, उस समय नेहरू प्लेस कार्यालय में लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार में कुछ विद्वान लोग एवं उच्च अधिकारी थे, जैसा मुझे स्मरण है कि श्री मैनेजर पांडेय भी उसमें थे, उन्होंने पूछा कि यहाँ आने पर क्या विशेष आपको लगता है कि होगा? मैंने कहा था कि यहाँ मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलेगा। इस पर एक धोती, कुर्ता एवं नेहरू जैकेट धारी सज्जन ने कहा था कि स्वतंत्र तो कोई नहीं है, प्रधान मंत्री के ऊपर भी राष्ट्र्पति होते हैं।

ये सज्जन थे – केंद्रीय कार्यालय में तैनात हिंदी प्रभारी- डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, इस संक्षिप्त दर्शन एवं संवाद से इतनी झलक मिल गई थी कि ये सज्जन ढोंगी हैं और हीन भावना से ग्रस्त हैं, इन्हें यह डर बना रहता है कि कहीं इनके वर्चस्व में कमी न आ जाए। बाद में इनके बारे में और बातें होंगी। शुरू में इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि राजभाषा संबंधी रिपोर्टों में थोड़ा बहुत झूठ तो सब जगह बोला जाता है, यहाँ मालूम हुआ कि इनके नेतृत्व में शुद्ध रूप से झूठ बोलना ही चलता है।

विंध्याचल में पहला ठिकाना था हमारा- फील्ड हॉस्टल, जिसका नाम था यमुना भवन और इस प्रकार एनटीपीसी से मेरे 22 वर्ष के घटनापूर्ण साथ का शुभारंभ हुआ, जिसमें से 12 वर्ष तो मैंने विंध्याचल परियोजना में ही बिताए थे। यहाँ मैं बताना चाहूंगा कि तीन-चार लोगों ने एक ही समय में वहाँ कार्यग्रहण किया था, एक से किसी ने पूछा कि कैसा है वहाँ पर तो उसने बताया कि दिल्ली के वसंत विहार जैसा समझ लीजिए, चौड़ी और साफ सड़कें और रात में भी रोशनी इतनी कि सड़क पर पड़ा हुआ पिन उठा सकते हैं।

जब मैंने कार्यग्रहण किया उस समय महाप्रबंधक थे श्री वेंकटरमण, जो मेरे कार्यग्रहण के बाद कुछ समय ही रहे, बहुत प्रभावी और रौबीले अधिकारी थे। उसके बाद श्री एस.एस.एस.दुआ ने महाप्रबंधक के रूप में पदभार ग्रहण किया, बहुत अच्छे अधिकारी थे, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे तथा सभी प्रकार की गतिविधियों में उनकी सक्रिय रुचि थी। उनके समय में मैंने बहुत अच्छे कवि सम्मेलनों का आयोजन किया तथा ‘विंध्य वीणा’ नाम से हिंदी अनुभाग की वार्षिक पत्रिका का भी प्रकाशन प्रारंभ किया।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग में हमारे मुख्य कार्मिक प्रबंधक थे श्री आर.एन.रामजी, जो बहुत सिद्धांतवादी व्यक्ति थे, पहले केंद्रीय कार्यालय में रह चुके थे और कंपनी के नियमों के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। सिद्धांतवादी होने का यह परिणाम भी हुआ कि उन्होंने सी.बी.आई. से आए हुए सतर्कता अधिकारी को उसकी पात्रता से ऊंचा आवास नहीं दिया और बाद में सी.बी.आई. की जांच का सामना उनको करना पड़ा।

यहाँ मैं राजभाषा के अलावा जनसंपर्क, स्कूल समन्वय,कल्याण आदि कार्य भी देख रहा था, अक्सर ऐसा होता था कि मैं कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम संचालित करता था और उसके बाद अपने घर चला जाता था, अगले दिन सुबह महाप्रबंधक कार्यालय से हमारे यहाँ फोन आता था, मुझे ढ़ूंढ़कर भेजा जाता, मैं घबराता कि क्या हो गया, तब  मालूम होता कि महाप्रबंधक महोदय ने मुझे पिछले दिन के आयोजन के सफल संचालन हेतु बधाई देने के लिए बुलाया है।

श्री दुआ ने अपने कार्यकाल में वहाँ लायंस क्लब की गतिविधियों को भी भरपूर बढ़ावा दिया और इस बहाने काफी दूर-दूर से लोग यहाँ आते थे और क्लब के कार्यक्रमों के संचालन से भी मुझे लोगों का काफी प्रेम मिला।

नौकरी के दौरान, प्रोजेक्ट लाइफ में क्या हुआ, यह बात तो करते रहेंगे, अभी एक घटना दिल्ली की बता दूं, दिल्ली-शाहदरा, जहाँ मेरी मां अभी तक रहती थीं, पहले हम सभी एक बड़ा सा कमरा और रसोई लेकर 16 रुपया महीना पर रहते थे, अभी मेरी मां एक छोटी सी कोठरी में रहती थीं,जिसमें मुश्किल से एक छोटा सा खटोला आता था, इसका किराया था 100 रुपया। समय काफी बदल चुका था।

खैर मैं वहाँ गया, मां ने बड़े चाव से खाना बनाकर खिलाया, चलते समय मैंने मां को चार नोट दिए, मां बोली बेटा एक और दे देता तो ठीक रहता, दो महीने का किराया 200/- देना है, सौदे के 100/- बाकी हैं,100/- का अभी आ जाएगा, 100/- आगे के लिए बच जाते तो ठीक रहता।

यह सब बताने का उद्देश्य मात्र इतना है कि मैंने जो 500/- के नोट दिए थे उनको मेरी मां 100 के नोट समझ रही थे, और उसकी अपेक्षाएं कितनी कम थीं। सही बात बताने पर मां ने भरपूर आशीर्वाद दिए।

खैर यह अफसोस तो सदा रहा कि मां हमारे साथ रहकर अधिक सुख न भोग सकी।

अपनी लिखी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

मंदिर के पापों ने कर दिया,

नगरी का आचरण सियाह,

होता है रोज आत्मदाह।

मौलिक प्रतिभाओं पर फतवों का

बोझ लादती अकादमी,

अखबारों में सेमीनारों में

जीता है आम आदमी,

सेहरों से होड़ करें कविताएं

कवि का ईमान वाह-वाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

 

जीने की गूंगी लाचारी ने,

आह-अहा कुछ नहीं कहा,

निरानंद जीवन के नाम पर,

एक दीर्घ श्वास भर लिया,

और प्रतिष्ठान ने दिखा दिया

पंथ ताकि हो सके निबाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

हर अनिष्टसूचक सपना मां का,

बेटे की सुधि से जुड़ जाता है,

और वो कहीं पसरा बेखबर

सुविधा के एल्बम सजाता है।

ये युग कैसा जीवन जीता है,

उबल रहा तेल का कड़ाह।

होता है रोज आत्मदाह।।

                                (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार।

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24. और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे!

अब बारी थी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की ही एक इकाई, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में कुछ समय प्रवास की, जयपुर के बाद एक बार फिर से राजस्थान में रहने का अवसर मिला था। राजस्थान के लोग बहुत प्रेम करने वाले हैं। लेकिन यह इकाई क्योंकि दिल्ली और जयपुर, दोनों के बहुत नज़दीक है इसलिए यहाँ राजनीति बहुत जमकर होती है, कम से कम उस समय तो ऐसा ही था। सात-आठ श्रमिक यूनियन थीं उस समय वहाँ, सबके बीच वर्चस्व की लड़ाई, एक बार तो सभी अधिकारियों को पूरी रात ऑफिस में बंद रखा था उन्होंने, अब मुद्दों का क्या है, वे तो मिल ही जाते हैं।

वैसे यूनियनों का एक अलग पक्ष है, वे भी सक्रिय थीं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से भी यह क्षेत्र काफी सक्रिय था। यहाँ हिंदी के प्रभारी, जो बाद में पूरी तरह जन संपर्क विभाग को अपना समय देने लगे थे- श्री इंद्रजीत चोपड़ा, उन्होंने मुझे काफी प्रोत्साहन दिया और अपने हिसाब से नई पहल करने की प्रेरणा प्रदान की। यहाँ कई रचनाकार भी थे और एक सज्जन साहित्यिक पत्रिका भी निकालते थे, वैसे वे अस्पताल में डेंटिस्ट थे। यहाँ कई बड़े आयोजन होते थे और मुझे कई आयोजन समितियों में सक्रिय रूप से काम करने का अवसर मिला।

कुल डेढ़ वर्ष के खेतड़ी प्रवास के दौरान मुझे दो तरह के हॉस्टलों में रहने का अवसर मिला, जिनमें से एक था- फ्रेंच हॉस्टल, शायद प्रारंभ में वहाँ फ्रांसीसी एक्सपर्ट रहे होंगे। जब तक रैगुलर आवास में रहने का अवसर आता, तब तक मैंने उस स्थान को भी छोड़ दिया।

खैर मैं आपको खेतड़ी रियासत के ऐतिहासिक महत्व की भी जानकारी दे दूं। मुझे खेतड़ी के राजा का महल देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ। मैं यह बता दूं कि वे खेतड़ी के राजा ही थे, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के अमरीका जाने का खर्च वहन किया था। वहाँ महल में एक घटना का विवरण लिखा गया है।

यह घटना ऐसे हुई कि स्वामी विवेकानंद एक बार जब खेतड़ी के महाराजा से मिलने आए, उस समय वहाँ एक गणिका नृत्य कर रही थी। स्वामी जी उसकी आवाज़ सुनकर बाहर ही रुक गए, गणिका स्वामी जी के संकोच को समझ गई और उसने नाचते-नाचते यह भजन गाना प्रारंभ कर दिया-

प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो।

एक लोहा पूजा में राखत, एक घर वधिक परो,

यह दुविधा पारस नहीं माने, कंचन करत खरो॥

स्वामी जी ने ये पंक्तियां सुनीं तो वे भीतर जाकर उस गणिका के चरणों गिर पड़े और बोले- “ मां, मुझे क्षमा करना, मुझे यह भेद नहीं करना चाहिए था।“

खेतड़ी में लगभग डेढ़ वर्ष के प्रवास के दौरान कई श्रेष्ठ आयोजनों को करने, उनमें भागीदारी का अवसर मिला। इनमें से एक था- श्री राजेंद्र यादव का विशेष व्याख्यान। हिंदी दिवस के अवसर आयोजित इस व्याख्यान में जहाँ श्री यादव ने काफी अच्छी बातें की वहीं शायद अपने तब तक विकसित हो चुके स्वभाव के कारण कुछ विवादास्पद टिप्पणियां भी कर दीं।

जैसे कि श्री यादव ने कहा कि “गीता में श्रीकृष्ण के उपदेशों को मैं एक चालाक वकील के तर्कों से अधिक कुछ नहीं मानता।”

जैसा कि मैंने कहा वहाँ यूनियनों की निरंतर प्रतियोगिता के कारण औद्योगिक  वातावरण कोई बहुत अच्छा नहीं था। जैसे कि हमारे हिंदी अनुभाग में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, जो शायद फौज में काम कर चुके थे, सब उसको फौजी कहते थे। उसकी अधिकारियों के बारे में राय यही थी कि वे सर्प होते हैं, छोटा हो या बड़ा, सबमें विष समान होता है। खैर यही फौजी महोदय थे, जो मेरे कंपनी छोड़ने पर मुझे अपने गांव ले गए और बैंड-बाजे के साथ मेरी विदाई की थी।

कुल डेढ़ वर्ष के प्रवास में ही वहाँ के लोगों से बहुत घनिष्ठ संबंध हो गया था, लेकिन क्या करें एक और नौकरी मिल गई थी, जो ज्यादा आकर्षक थी, सो यहाँ से भी बिस्तर बांधना पड़ गया।

ज़िंदगी की इस भागदौड़ में हर बात का अर्थ बदल जाता है। डॉ. कुंवर बेचैन की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है

और जीने के लिए हैं, दिन बहुत सारे।

इस समय की मेज पर रखी हुई

ज़िंदगी है पिन-कुशन जैसी,

दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है,

और चुभने के लिए हैं, पिन बहुत सारे।

एक मध्यम वर्ग के परिवार की

अल्प मासिक आय सी है ज़िंदगी,

वेतनों का अर्थ चुकना हो गया है,

और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे।

                         -डॉ. कुंवर बेचैन

अब इसके बाद आएगा, नौकरी में मेरा अंतिम पड़ाव- एनटीपीसी।  

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23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!

मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते थे और खदान में काम करते थे। एक मिश्रा जी थे, उड़ीसा के थे। मिश्रा जी बड़े सॉफिस्टिकेटिड थे। अपने स्कूटर को बहुत संभालकर रखते थे। अगर कोई उनको बता दे कि स्कूटर की आवाज़ कुछ अलग सी आ रही है तो वे तुरंत स्कूटर को 10-12 कि.मी. दूर सर्विसिंग के लिए ले जाने को तैयार हो जाते थे,क्योंकि आसपास तो कोई सर्विस सेंटर था ही नहीं।

मिश्रा जी का नाम मुझे एक विशेष कारण से याद आ रहा है, एक बार उन्होंने मेरे बारे में एक रोचक टिप्पणी की थी। यह तो मैंने बताया ही है कि वहाँ नेपाली काफी संख्या में थे। मिश्रा जी ने किसी से मेरे बारे में कहा कि उनका खयाल था कि मैं क्योंकि हिंदी अधिकारी हूँ, मुझे विद्वान और कल्चर्ड होना चाहिए लेकिन उन्होंने पाया कि ‘आय एम नो बेटर देन ए नेपाली’। ‘कैसे’?  पूछने पर उन्होंने कहा कि देखो कैसे हा-हा करके हंसता है। तब से उनके सॉफिस्टिकेशन के प्रति मेरा ‘सम्मान’ और अधिक बढ़ गया।

खदान में कई बार दुर्घटना भी हो जाती थी, एक बार दाढ़ी वाले पांडे जी ( हम ऐसे ही याद रखते थे उनको)  खदान में फंस गए थे और उनकी मृत्यु की खबर भी फैल गई थी लेकिन भगवान की दया से वे सुरक्षित निकल आए थे। खदान में दुर्घटना का खतरा तो कई बार पैदा हो जाता था, कभी-कभी ऐसा टार्गेट से आगे बढ़कर निष्पादन करने के अति उत्साह में भी होता था। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि एक खनिक को घायल अवस्था में खदान से निकाला गया, वह अस्पताल में था तभी छत का कुछ हिस्सा गिर गया, उसने किसी तरह बिस्तर से लुढ़क कर अपनी जान बचाई।

मुसाबनी माइन्स में रहते हुए ही मैंने पहली बार ‘हिंदी शिक्षण योजना’ के अंतर्गत कर्मचारियों को प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ परीक्षाओं के लिए प्रशिक्षित करना प्रारंभ किया। जैसा मैंने बताया, वहाँ सभी इलाकों के लोग थे परंतु बंगाल और उड़ीसा के अधिक ही थे। इस योजना का लाभ बड़े स्तर के अधिकारी भी उठाना चाहते थे, बड़ी संख्या में वहाँ से परीक्षाओं में भाग लेते थे और मैं जो कि एक कनिष्ठतम स्तर का अधिकारी था, उन सभी उच्च अधिकारियों का गुरुजी बन गया था।

एक बात और, मेरे तीन पुत्र हैं, पहला दिल्ली में हुआ था, दूसरा जयपुर में और तीसरे के जन्म-राज्य का मामला विवादास्पद है, क्योंकि उस समय यह बिहार था और अब झारखंड है।

खैर यह भी बता दूं कि धोखाधड़ी करने वाले हर काल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे हैं। इसका एक उदाहरण याद आ रहा है। हम एक बार वहाँ से टाटानगर गए, वहाँ हम एक दुकान में घुसे तो एक नवयुवक ने हमारा स्वागत किया और अगवानी करके दुकान के अंदर ले गया। हम वस्तुएं पसंद करते गए और वह अन्य लोगों से वह सामान निकालकर देने के लिए कहता रहा। शायद हमने 4-5 हजार का सामान खरीदा था, अंत मे उसने बिल लाकर हमसे पैसे मांगे, जो हमने उसको दे दिए। इसके बाद जब हम सामान के साथ दरवाजे से बाहर निकलने लगे, तब बगल में काउंटर पर बैठे दुकान मालिक ने कहा कि पैसे तो दीजिए।

तब मालूम हुआ कि उस युवक को हम दुकानदार का आदमी मान रहे थे और वे लोग मान रहे थे कि वह हमारे साथ है तथा वह पैसा लेकर गायब हो चुका। अब आगे जो भी हुआ हो, किस्सा तो मजेदार है न, कम से कम आज की तारीख में तो है, उस समय जैसा भी रहा हो।

उड़ीसा में समुद्रतट का इलाका है दीघा, वहाँ से पास पड़ता था और वहाँ जाना एक अनूठा अनुभव था। वहाँ क्योंकि मुंबई जैसी भीड़ नहीं रहती। रात में काफी देर तक हम समुद्र तट पर रहे, बनारस वाले पांडे जी का और हमारा परिवार साथ था। संभव है कि पूर्णिमा का समय रहा हो, लेकिन पानी की जैसी ऊंची दिव्य दीवार मैंने वहाँ बनते देखी, वैसी फिर कभी देखने को नहीं मिली।

अब मेरा क्या है, मैं तो सुनाता जाऊंगा, पढ़ने का कष्ट तो दूसरों को करना है ना!

खैर मैंने शुरू में गुप्ता जी की तारीफ की थे, वास्तव अगर वे न अड़े होते तो वह मिनिस्टर का कैंडिडेट चुन लिया गया होता। लेकिन अब ऐसा हुआ कि मेरे कारण गुप्ताजी को डांट खानी पड़ गई।

असल में कंपनी के खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में हिंदी अधिकारी की रिक्ति हुई और क्योंकि मेरी मां दिल्ली में थीं और खेतड़ी राजस्थान में, दिल्ली से काफी पास है, अतः मैंने वहाँ जाने के लिए आवेदन किया। जगाती जी ने मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया और यह उप महाप्रबंधक के पास होते हुए, गुप्ताजी के पास, उनकी टिप्पणी के लिए गया। गुप्ताजी भी दिल्ली के पास, शायद आगरा के रहने वाले थे और इधर आने का मन उनका भी था, इसलिए वे मेरे आवेदन को दबाकर बैठ गए।

श्री जगाती को जब यह पता चला तो उन्होंने गुप्ताजी को फोन पर डांटते हुए कहा कि अगर आप शर्मा को अभी नहीं जाने दोगे तो मैं गारंटी देता हूँ कि मैं ज़िंदगी भर आपको यहाँ से नहीं जाने दूंगा। घबराकर गुप्ताजी ने तुरंत मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया। इस प्रकार मेरे खेतड़ी, राजस्थान जाने की तैयारी हुई।

अब ऐसे ही राहत इंदौरी जी का एक शेर याद आ रहा है-

रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,

चांद पागल है, अंधेरे में निकल पड़ता है।

नमस्कार ।

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22. बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी यह हमसे कब हुआ!

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता का अर्थ कुछ गलत होता है। उनके अलावा एक हिंदी अधिकारी भी थे- श्री हरिनंदन प्रसाद ‘प्रभात’।  वे हिंदी अधिकारी के अलावा वैद्य भी थे।

मेरी पोस्टिंग मुसाबनी माइन्स में हुई थी, जो कारखाने से 8 कि.मी. दूर थी। यहाँ पर मेरे बॉस थे- मुख्य कार्मिक प्रबंधक- श्री किरण कुमार जगाती, इनका इलाहाबाद में ‘जगाती होटल’ भी था किसी समय। श्री जगाती उत्तराखंड से थे, उस समय तक पता नहीं उत्तराखंड बना था या नहीं, परंतु जब भी श्री के.सी.पंत या श्री नारायण दत्त तिवारी कोई पद ग्रहण करते तब वे उनको बधाई संदेश अवश्य भेजते थे, मुझे मालूम है क्योंकि पत्र का मसौदा मैं ही तैयार करता था। बहुत अच्छे इंसान थे जगाती जी लेकिन अक्सर टेंशन में रहते थे। दफ्तर में आते समय यदि सफाई कर्मी अपने डब्बे के साथ सामने पड़ गया तो उसकी खैर नहीं होती थी।

अब थोड़ी बात स्थान की कर लें। मऊभंडार घाटशिला स्टेशन से लगभग 2 कि.मी. दूर था। घाटशिला बंगला के ख्यातिप्राप्त रचनाकार- श्री विभूति भूषण बंद्योपाध्याय की कर्मस्थली है, जो रांची से कोलकाता की यात्रा में मध्य बिंदु है। विभूति दा के किसी भी उपन्यास में भूमिका के बाद, नीचे लिखा मिलेगा- घाटशिला और तारीख। विभूति दा के उपन्यासों पर सत्यजीत राय ने पथेर पांचाली तथा अन्य अनेक फिल्में बनाई हैं। हिंदी फिल्म ‘सत्यकाम’ भी उनके उपन्यास पर आधारित है और इसकी शूटिंग भी वहीं पर हुई थी।

विभूति दा के जन्मदिन समारोह में वहाँ प्रतिवर्ष बिहार, बंगाल और उड़ीसा के मुख्यमंत्री अथवा वरिष्ठ मंत्री आते थे, अब तो एक और राज्य बढ़ गया है क्योंकि अब यह इलाका ‘झारखंड’ में आता है।

खैर अब दफ्तर पर आते हैं, जैसा मैंने कहा घाटशिला स्टेशन से 2 कि.मी. दूर है मऊभंडार कारखाना, जहाँ खदानों से प्राप्त ताम्र अयस्क को प्रोसेस करके उससे तांबा बनाया जाता है। फिर मऊभंडार कारखाने से 8 कि.मी. और आगे जाना होता है, तब मुसाबनी माइन्स आती हैं। जैसा मैंने बताया मेरी पोस्टिंग माइन्स में थी, माइन्स और कारखाने के बीच अधिकारियों के आने-जाने के लिए शटल बस चलती थी। इत्तफाक से मेरी अनुवाद क्षमता से उच्च अधिकारी कुछ ऐसा प्रभावित हुए थे कि मुझे बार-बार कारखाने जाना पड़ता था, क्योंकि वहाँ ई.डी. बैठते थे अतः उसे ई.डी. ऑफिस कहा जाता था और मुझे वहाँ के काम के लिए ही बुलाया जाता था। अक्सर ऐसा होता था कि वहाँ के वरि. प्रबंधक (जन संपर्क)- श्री राजेंद्र कुमार ‘राज’ मुझे गेस्ट हाउस में बिठा देते थे, बोलते थे जो खाना-पीना हो, खाते-पीते रहो और अनुवाद या प्रचार सामग्री लिखने का काम करते रहो।

शुरू में तो बड़ी दिक्कत हुई, एक अनुवाद जो प्रभात जी (हिंदी अधिकारी) कर चुके थे, वह मुझे सुधारने के लिए उच्च अधिकारियों ने दे दिया, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा लिखा गया लेख था। वैसे बहुत भ्रष्ट अनुवाद था और मुझे मालूम भी नहीं था कि किसने किया है। जब मैंने सुधार कर दिया तब प्रभातजी ने मुझसे कहा- आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे अनुवाद में सुधार करने की। खैर अधिक विवरण देकर आपको ‘बोर’ नहीं करूंगा।

कुल साढ़े तीन साल बिताए मैंने वहाँ प्रकृति की गोद में, एकदम जंगल में मंगल का माहौल होता है परियोजनाओं की टाउनशिप में, देश के हर कोने के लोग थे वहाँ, वैसे बंगाल और उड़ीसा के लोग कुछ ज्यादा थे, जितने वहाँ अधिकारी थे, लगभग उतने ही ‘अधिकारी’ उपनाम वाले लोग थे।

एक अधिकारी थे वहाँ सिंह साहब, वो घर से बड़ी सी गाड़ी में निकलते थे, कुछ दूर निकलने पर ही उसका पेट्रोल खत्म हो जाता था, बाकी रास्ता वह धक्के से ही पूरा करती थी। कुछ समय में लोग यह बात समझ गए थे और जब वे गाड़ी लेकर निकलते तो लोग उस रास्ते से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे।

वहाँ के अधिकांश कर्मचारी ऐसे थे कि यदि किसी अधिकारी ने बुलाया है तो वे जूते बाहर उतारकर आते थे। उनसे  बैठने को कहो तो वे नीचे बैठ जाएंगे, कुर्सी पर नहीं बैठेंगे।

वहाँ एक कॉपर क्लब था जिसमें हर सप्ताह प्रसिद्ध विदेशी फिल्में दिखाई जाती थीं। विशेष बात ये कि वे सेंसर्ड नहीं होती थीं। जैसे एक बार मैं वहाँ गया और मैंने पूछा कि फिल्म चालू हो गई क्या तो जवाब मिला कि जल्दी जाओ, दो-तीन सीन निकल चुके हैं।

खैर अपने बॉस श्री जगाती की बात कर लेता हूँ, ऊपर वाले की दया से वे मुझे बहुत पसंद करते थे। उनके पास एक डॉगी भी था, मतलब कुक्कुर! उन डॉगी महोदय को पॉटी वॉक कराने के लिए हमारे यहाँ के दो-तीन कार्मिक अधिकारियों में तगड़ा कम्पिटीशन रहता था।

आगे कुछ और बातें करेंगे, अभी अपना एक गीत शेयर कर लेता हूँ-

एक्लव्य हम

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,

साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,

छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,

बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,

बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,

खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,

खुले हाथ-पांवों में बेड़ियां जतानी थीं,

यह हमसे कब हुआ।

-श्रीकृष्ण शर्मा

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21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे

जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।

मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।

खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।

खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया। जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।

बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।

काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।

अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।

हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-

 

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।

 

सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,

हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,

रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,

इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,

भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,

चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,

ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,

हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,

कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,

पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,

बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,

यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,

जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥  

 

                                    ( पुरइन पात- कमल का पत्ता)

  • डा. बुद्धिनाथ मिश्र

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20. बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!

जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।

एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।

पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-

महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।

दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!

खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।

दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।

अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-

किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,

हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।

जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा।

फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,

जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,

अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,

पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,

तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

 

जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,

नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,

तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,

द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।

प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,

आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।

अब अगले ब्लॉग में, मेरा चयन हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में और उसके विरोध में दो केंद्रीय मंत्रियों के पत्र!

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