54. जीवों का साहचर्य

आज गोवा में आए एक महीना हो गया। 3 जुलाई को दोपहर बाद यहाँ पहुंचे थे, गुड़गांव से। बहुत से फर्क होंगे जीवन स्थितियों में, जिनके बारे में समय-समय पर, प्रसंगानुसार चर्चा की जा सकती है।

एक फर्क जो आज अचानक महसूस किया, सुबह अपनी बालकनी में टहलते हुए, उस पर चर्चा कर रहा हूँ। मुझे अचानक खयाल आया कि यहाँ तो हमारे बालकनी के दरवाजे अधिकांश समय खुले ही रहते हैं, जहाँ से हम बारिश का आनंद लेते रहते हैं, बंद करते हैं तो बस तेज धूप से अथवा रात में मच्छरों के आक्रमण से बचने के लिए।

गुड़गांव में आखिरी 6 महीने हम एक बहुत सुंदर सोसायटी में, नवीं मंज़िल पर रहे, उस अवधि को छोड़ दें तो बालकनी अथवा छत का दरवाज़ा अधिक देर तक खुला रखने की हमारी हिम्मत ही नहीं थी। एकाध बार तो यह हुआ कि दरवाज़ा कुछ देर खुला रहा तो वानरराज आकर, फ्रिज में से कुछ फल आदि निकालकर खा गए, बाकी काफी कुछ फैला गए। यहाँ अभी तक मुझे वानर जाति के दर्शन नहीं हुए हैं। वैसे यहाँ भी हम सोसायटी में हैं, जहाँ इसकी संभावना कम है, लेकिन बाहर भी जितने इलाके में घूमा हूँ, कोई बंदर नहीं दिखा है।

यहाँ जो दिखा है, वह ये कि जिस प्रकार वाराणसी में अथवा उत्तरी भारत के अन्य नगरों में भी, गायों का सम्मेलन सड़क अथवा चौराहे के बीचोंबीच चलता रहता है, यहाँ पर कुत्ते उसी तरह बैठे रहते हैं। कुत्ते उधर भी बहुत हैं, लेकिन उनके बीच भाईचारा मुझे यहाँ ज्यादा लगा, वैसे  कुछ कहते नहीं हैं, लेकिन डर तो बना ही रहता है।

फिर से दिल्ली-गुड़गांव को याद करता हूँ, बंदरों और कुत्तों के कारण होने वाली अप्रिय घटनाएं वहाँ काफी समय से बहुत अधिक हो गई हैं, लेकिन कोई इस तरफ ध्यान देने वाला नहीं है। पिछले दिनों एक खबर पढ़ी थी कि हरियाणा में लंबे समय से कुत्तों की नसबंदी का कार्यक्रम चल रहा है और इस पर बहुत बड़ी राशि खर्च की जा चुकी है। जिस प्रकार वहाँ कुत्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि नसबंदी कुत्तों की नहीं, उन महान लोगों की, किए जाने की ज़रूरत है, जो इस बजट को खपाने में लगे हैं।

वैसे हमारे लोकतंत्र में सभी प्राणियों का कितना आदर है, यह तो अमरीकी राष्ट्रपति ने उस समय महसूस कर लिया होगा, जब राष्ट्रपति भवन में उनके सम्मान के दौरान एक श्वान महोदय वहाँ टहलते हुए आ गए थे। सभी जीवों से प्रेम, दया करना अलग बात है। लेकिन यह भी फैसला करना होगा कि हमारे शहरों में आज़ादी के साथ इंसानों को रहना है या कुत्तों और बंदरों को! इतना ही नहीं, जो गाय आदि आवारा घूमती हुई पाई जाते हैं, उनको गौ-शालाओं में भेज दिया जाना चाहिए और उनके मालिकों पर भारी जुर्माना किया जाना चाहिए।

मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी व्यक्ति की गाय या भैंस ट्रेन के नीचे आकर मर गई, उसने रेलवे पर केस किया। न्यायालय ने उसको लताड़ लगाई कि उसकी लापरवाही के कारण ट्रेन के यात्रियों को जान का खतरा पैदा हो गया था।

मैं मानता हूँ कि इस संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए कि आवारा पशुओं को सड़कों और धार्मिक, सार्वजनिक स्थलों से दूर किया जाए, इसके साथ धार्मिक भावनाओं को न जोड़ा जाए।

गौशालाओं जैसे प्रबंध अन्य आवारा पशुओं के लिए तात्कालिक रूप से करके, उनकी प्रभावी नसबंदी की जानी चाहिए, जिससे उनकी संख्या क्रमशः कम होती जाए।

ऐसा भी कई बार हुआ है कि हवाई जहाज के रनवे पर कोई जानवर आ गया है और दुर्घटना होते-होते बची है। रेलवे लाइन पर तो आवारा पशु घूमते ही रहते हैं, लोगों को कुत्ते अथवा बंदर द्वारा काटे जाने की घटनाएं भी होती रहती हैं। इस संबंध में सरकारें मज़बूत कदम उठाएं, लेकिन सरकार खुद कभी कुछ नहीं करती है, उसको मज़बूर करना होगा। जब आरक्षण की मांग करने से फुर्सत मिले तब इस बारे में भी सोचिएगा।

नमस्कार।

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53. पहाड़ों के कदों की खाइयां हैं

आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है-

पहाडों के कदों की खाइयां हैं

बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं। 

यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल  के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और बहुत उसने जनता पर बहुत  प्रभाव छोड़ा था।

वैसे तो समुद्र के बारे में कहा जाता है कि उसमें पहाड़ समा सकते हैं, इतनी गहराई होती है उसमें! किसी की धीर-गंभीरता के लिए भी समुद्र जैसी शांति की संज्ञा दी जाती है, भूगर्भ वैज्ञानिक ऐसा भी कहते हैं कि पृथ्वी पर जब उथल-पुथल होती है, तब जहाँ पहाड़ थे वहाँ समुद्र बन जाते हैं और जहाँ समुद्र है वहाँ पर पहाड़ !

फिर लौटते हैं शेर पर, समुद्र की गहराई तो उसकी महानता है, गहनता है, लेकिन खाई तो जितनी कम गहरी हो, उतना अच्छा है। क्योंकि खाई का मतलब ही बांटना, अलग करना है। श्री रमेश रंजक के एक गीत की पंक्तियां हैं-

घर से घर के बीच कलमुंही गहरी खाई है, 

छोटे-छोटे पांव ज़िंदगी लेकर आई है। 

असल में बांटने वाली ताकतें आज बहुत अधिक बढ़ गई हैं। मैंने कुछ ताकतों का ज़िक्र पहले भी किया है, एक ताकत जिस पर आज बात करना चाहूंगा वह है आरक्षण। जो पिछड़े हैं उनको आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह व्यवस्था ऐसा नहीं कर रही है। एक विशेष  सुविधा-भोगी वर्ग पैदा हो गया है, आरक्षण का पात्र माने जाने वाले वर्ग के बीच और आरक्षण की यह सुविधा बार-बार कुछ चुने हुए परिवारों को प्राप्त हो रही है। जो वास्तव में पिछड़े हैं, वे आज भी इस सुविधा से उतने ही दूर हैं, जितना प्रारंभ में थे।

इसके अलावा अब हर कोई यह मांग करने लगा है कि हमारी जाति या समुदाय को आरक्षण का लाभ दिया जाए। फिर इस पर तुर्रा यह कि जो जितना ज्यादा नुकसान करेगा, तोड़-फोड़ करेगा, आगजनी करेगा, सड़कें खोद देगा, उसके बारे में मान लिया जाएगा कि यह कमज़ोर तबका है और कोई राज्य सरकार उसके बारे में कानून पारित कर देगी, भले ही बाद में न्यायालय उसको निरस्त कर दे।

असल में होना यह चाहिए कि जो किसी भी दृष्टि से पिछड़े हैं, उनको तैयारी के लिए, अध्ययन के लिए विशेष सुविधा एवं सहायता दी जाए लेकिन उसके बाद उनको प्रतियोगिता का सामना करना चाहिए, वहाँ कुछ आंशिक छूट दी जा सकती है।

लेकिन ऐसा करेगा कौन? किसी राजनैतिक दल में इतनी हिम्मत है? सीधे-सीधे वोट है इसमें जी! ऐसे कानून इस प्रकार की व्यवस्थाओं के संबंध में बने थे कि इतने वर्ष तक यह व्यवस्था रहेगी, लेकिन लगातार इनको बढ़ाया जाता है और बढ़ाया जाता रहेगा, क्योंकि जिनके लिए यह व्यवस्था है,  उनकी स्थिति में न बदलाव आया है न आएगा, बस इतना है कि कुछ सुविधा-भोगी हिस्सा है इन समुदायों का, जिसको इन व्यवस्थाओं का लाभ मिल रहा है और राजनैतिक दलों को वोटों का लाभ मिल रहा है।

है कोई राजनेता जो इस संबंध में कोई निर्णायक फैसला ले सके, जिससे जो वास्तव में पिछड़े हैं उनका भला भी हो और लोगों के बीच में खाइयां बनाने वाली यह वोट दिलाऊ व्यवस्था खत्म हो सके।

नमस्कार।

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52. ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता, पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,

मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं

सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं, 

बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में, 

करते हैं विज्ञापित, कदम दर कदम। 

चलिए आज खुद से एक सवाल पूछता हूँ और उसका जवाब देता हूँ।

सवाल है, आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा किससे मिलती है?

अब इसका जवाब देता हूँ।

आज इंटरनेट का युग है और इसमें लोग अन्य तरीकों के अलावा ब्लॉग लिखकर भी खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

मेरी दृष्टि में तो ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी प्रेरणा तो गोस्वामी तुलसीदास जी थे। रामकथा के बहाने उन्होंने दुनिया की किस समस्या अथवा किस भाव पर अपने विचार नहीं रखे हैं। उनकी लिखी हजारों टिप्पणियों पर आधारित ब्लॉग लिखे जा सकते हैं। जैसे-

वंदऊं खल अति सहज सुभाए, जे बिनु बात दाहिने-बाएं। 

पराधीन सपनेहु सुख नाही। 

मैं यहाँ यही उदाहरण दे रहा हूँ, अन्यथा उदाहरण तो लगातार याद आते जाएंगे।

जो अच्छे फिल्म निर्माता हैं, वे भी ब्लॉगिंग के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा माने जा सकते हैं। मेरे लिए इस श्रेणी में राज कपूर सबसे पहले आते हैं। कई बार उनकी फिल्में, ऐसा लगता है कि अपने आप में एक सुंदर सी कविता अथवा ब्लॉग की तरह लगती हैं। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ से शुरू होकर उनकी शुरुआती फिल्में अनेक संदेश देती लगती हैं। एक देहाती व्यक्ति जो शहर में आता है, शुरू में खूब धोखा खाता है, बाद में चुनौती स्वीकार करता है और सबको अपनी चालाकी के सामने फेल कर देता है।

कुछ लाइनें जो मन में अटकी रह जाती हैं-

उल्टी दुनिया को, सीधा करके देखने के लिए, सिर के बल खड़ा होना पड़ता है।

रोना सीख लो, गाना अपने आप आ जाएगा। 

यहाँ भी, दो ही उदाहरण दे रहा हूँ, क्योंकि ये तो लगातार याद आते जाएंगे।

आज का ब्लॉग लिखने के लिए, दरअसल मुझे एक फिल्म याद आ रही थी। फिल्म के नायक थे- मोती लाल । यह फिल्म मैंने देखी नहीं है लेकिन याद आ रही थी।

असल  में इस फिल्म का एक गीत है, मुकेश जी की आवाज़ में, यह गीत मुझे मेरे एक मित्र- श्री शेज्वल्कर ने सुनाया था, बहुत पहले, जब मैं अपनी शुरुआती सरकारी नौकरी कर रहा था, उद्योग भवन में जहाँ वे मेरे साथ काम करते थे। कहानी भी शायद उन्होंने ही बताई थी।

एक आम आदमी की कहानी, जो लॉटरी का टिकट खरीदता है, मान लीजिए एक लाख के ईनाम वाला (उस जमाने के हिसाब से बोल रहा हूँ) । पत्नी बोलती है कि ईनाम आया तो मेरे लिए यह लाना, कुछ बेटा बोलता है, कुछ बेटी बोलती है, ईनाम की पूरी राशि का हिसाब हो जाता है, उस गरीब के, खुद के लिए कुछ नहीं बचता।

फिल्म का पहला सीन है कि उस व्यक्ति की शव-यात्रा निकल रही है, लॉटरी का ईनाम मिल जाने के बाद, सारी कहानी  फ्लैश-बैक में है, उस शव-यात्रा के साथ मुकेश जी का यह गीत है, ‘रिसाइटेशन’ के अंदाज़ में, ‘रिसाइटेशन’ यह शब्द मैैं  इसलिए जान-बूझकर  इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि बच्चा जब कोई कविता पढ़ता है तो उसकी पूरी आस्था और निष्ठा उसमें शामिल होती है। वैसे मुकेश जी के गायन के साथ भी हमेशा मुझे ऐसा लगा है, कि उसमें यह गुण शामिल रहता है।

मैं भी उसी आस्था और निष्ठा के साथ यह पूरा गीत यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-

ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता

पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,

सुख भी थे, दुख भी थे-दिल को घेरे हुए,

चाहे जैसा था, रंगीन संसार था।

आ गई थी शिकायत लबों तक मगर

इसे कहते तो क्या, कहना बेकार था,

चल पड़े दर्द पीकर तो चलते रहे,

हारकर बैठ जाने से इंकार था।

चंद दिन का बसेरा था अपना यहाँ,

हम भी मेहमान थे, घर तो उस पार था।

हमसफर एक दिन तो बिछड़ना ही था-

अलविदा, अलविदा, अलविदा,अलविदा।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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51. कितने दर्पण तोड़े तुमने, लेकिन दृश्य नहीं बदला है

आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है।

जब जेएनयू में,  करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर पड़े हुए, एक विशेष विचारधारा के विषैले प्राणी हाथ उठाकर देश-विरोधी नारे लगाते हैं, तब एक बार खयाल आता है कि क्या इसको ही बहादुरी कहते हैं!

वैसे आजकल सेना के बारे में उल्टा-सीधा बोलने को भी काफी बहादुरी का काम माना जाता है। कुछ लेखक और पत्रकार इस तरह के लेख, रिपोर्ताज आदि के बल पर अपने विज़न की व्यापकता की गवाही देने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते।

शिव सैनिकों की बहादुरी भी यदा-कदा उत्तर भारतीयों पर और कभी टोल-नाकों पर काम करने वालों पर निकलती रहती है। इसमें और बढ़ोतरी हो जाती है जब अपने को बालासाहब का सच्चा वारिस मानने वाले दोनों भाइयों के बीच प्रतियोगिता हो जाती है कि किसके चमचे ज्यादा बहादुरी दिखाएंगे।

अभी पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान, कांग्रेसी नेताओं ने बड़ी बहादुरी भरी भूमिका निभाई, कांग्रेस की एक विधायक ने जब अपने चमचों से खुले आम यह कह दिया कि थाने में आग लगा दो, तब शायद वे अपने आप को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रही एक महान सेनानी मान रही थीं। वैसे देखा जाए तो वह उस महिला की बेवकूफी ही थी, ऐसी बहादुरी लोग चोरी-छिपे करते हैं।

कोई भी आंदोलन हो, तब ऐसे लोगों को महान मौका मिलता है जो जीवन में कुछ नहीं कर पाए हैं और ऐसा लगता भी नहीं कि कुछ करेंगे, कोई उनकी बात नहीं सुनता, कुंठित हैं ऐसे में वे किसी बस में, ट्रक में या कार में आग लगा देते हैं, किसी दुकान को जला देते हैं और यह बताते हैं कि वो भी कुछ कर सकते हैं।

क्या उस समय मौके पर रहने वाले सभी लोग इसी मानसिकता के होते हैं? इस तरह के लोग, यह नीच कार्य करके कैसे बच निकलते हैं? क्या वहाँ कोई ऐसा नहीं होता, जो स्वयं जाकर या गुप्त रूप से पुलिस को यह बता कि इन महान प्राणियों ने यह निकृष्ट कार्य किया है। क्या पुलिस भी ऐसे में जानते हुए कोई कार्रवाई नहीं करती। विरोध करने का हक़ तो सभी को है लेकिन सार्वजनिक या व्यक्तिगत संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों को ऐसा सबक मिलना चाहिए कि वे दुबारा ऐसी बहादुरी करने के बारे में न सोच सकें।

इस शृंखला में जहाँ शिव सैनिकों की महान भूमिका वहीं भारतीय संस्कृति का रक्षक होने का दावा करने वाले बजरंग दल , गौ रक्षक आदि पर भी जमकर नकेल कसे जाने की ज़रूरत है। सत्तरूढ़ दल को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके दम पर वे सत्ता में फिर से आ सकते हैं।

सबका साथ- सबका विकास, इस नारे को जरा भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं करना चाहिए बीजेपी को, यदि वे वास्तव में देश की सेवा करना चाहते हैं और इसके लिए आगे भी सत्ता में आना चाहते हैं।

आज अपने एक और लघु गीत को शेयर करने का मन हो रहा है, जो हमारी विकास यात्रा की एक झलक देता है-

 

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को

दिन रात छला है। 

कितने दर्पण तोड़े तुमने

लेकिन दृश्य नहीं बदला है। 

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे

थकी चाल में रहीं बदलती, 

दूध धुली सपनीली आंखें

पीत हो गईं- जलती-जलती, 

जब भी छूटी आतिशबाजी-

कोई छप्पर और जला है। 

कितने दर्पण तोड़े तुमने

लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।  

नमस्कार।

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50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह

आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है।

ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं।

मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय के साथ-साथ सहिष्णुता लगातार कम होती गई है और इसका किसी एक राजनैतिक दल से सीधा संबंध नहीं है, हाँ एक प्रकार की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी एक राजनैतिक दल के निकट हो सकतेे हैैं  और दूसरी तरह की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी दूसरे दल के निकट हो सकते हैैं।

जैसे मेरे मन में अक्सर ये खयाल आता है कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद यदि आज जिंदा होते, जिन्होंने उनके उपन्यासों और  कहानियों को पढ़ा है, वे विचार करके देख लें, मेरा मानना है कि यदि वे आज लिखे गए होते तो शायद प्रेमचंद जी न जाने कितने मुकदमों का सामना कर रहे होते और फिर उनका समय लेखन में नहीं, अदालतों के चक्कर काटने में बीतता। इनमें से ज्यादातर मुकदमे बहन मायावती जी की विचारधारा वाले लोगों की तरफ से हो सकते थे, कुछ अपने को उच्च वर्गीय और कुलीन मानने वालों की तरफ से भी हो सकते थे।

वैसे असहिष्णुता का यह वातावरण बनाने में कुछ ख्याति पाने की चाहत रखने वालों की भी काफी बड़ी भूमिका है। मुझे लगता है कि कुछ वकील जिनका धंधा ठीक से नहीं चलता, या वे किसी भी कीमत पर प्रसिद्धि पाना चाहते हैं, वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि किसी नई फिल्म में कुछ तो ऐसा मिल जाए जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जा सके। कोई नाम हो- व्यक्ति का या स्थान का या कुछ भी उनके शैतानी दिमाग में ऐसा कारण बन सकता हो, जिसको लेकर मुकदमा ठोका जा सके, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए तो खयाल आता है कि बेचारे प्रेमचंद जी अथवा अन्य पुराने लेखक इन हालात का सामना कैसे करते।

अभी ‘सामना’ शब्द आ गया पिछली पंक्ति में, तो मुझे खयाल आया कि ‘सामना’ वाले, शिव सैनिक तो मौके के अनुसार कभी भारतीय संस्कृति और कभी क्षेत्रीयता की नफरत भरी भावना के अलंबरदार बन जाते हैं। मुझे अचंभा होता है कि  एक ही व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति और संकीर्ण क्षेत्रीयता की भावना, दोनों का प्रतिनिधित्व कैसे किया जा सकता है। हमारे ये महान सड़क छाप सैनिक, फिल्मों के बारे में भी अपनी राय रखते हैं, कि कौन सी फिल्म चलने दी जानी है और कौन सी नहीं। आश्चर्य इस बात का है कि स्वयं को प्रगतिशील मानने वाली पार्टियां ऐसी पार्टी को क्यों बर्दाश्त करती हैं और न्यायालय द्वारा इनको समुचित दंड क्यों नहीं दिया जाता जिससे पुनः ऐसी संस्थागत गुंडागर्दी न की जा सके।

पिछले दिनों एक निर्माणाधीन ऐतिहासिक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब राजस्थान में गुंडागर्दी की गई, ‘करणी सेना’ नाम दिया गया था इस गुंडों की सेना को, इसका मुखिया टी.वी. पर इंटरव्यू देते भी देखा गया, ऐसा लग रहा था अभी ब्यूटी पार्लर होकर आया है, शुद्ध ढोंगी दिख रहा था, और उसकी मनोकामना भी पूरी हो रही थी क्योंकि टीवी पर लोग उसका इंटरव्यू ले रहे थे। गुंडागर्दी करने के पीछे उसकी जो मनोकामना थी, वह पूरी हो रही थी।

असहिष्णुता का साम्राज्य बहुत लंबा है, निःसंदेह इसमें आरएसएस से जुड़े कुछ संगठन, बजरंग दल, गौ रक्षा दल और न जाने किस-किस नाम से हैं, इनके द्वारा भी आजकल जमकर गुंडागर्दी की जा रही है। मोदी जी समय-समय पर इनके विरुद्ध बोलते हैं, लेकिन इतना काफी नहीं है। इनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि दोबारा ये सिर न उठा सकें।

मुझे सचमुच बार-बार ये खयाल आता है कि आज अगर महात्मा गांधी होते तो वे क्या कर पाते और अगर प्रेमचंद होते तो वे क्या लिख पाते।

अंत में, कल ही मेरे मित्र अरुण कुमार मिश्रा जी ने मेरे एक गीत की याद दिलाई, कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, सो आज ही, छोटा सा वह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

बनवासी राम की तरह 

पांवों से धूल झाड़कर,

पिछले अनुबंध फाड़कर

रोज जिए हम-

बनवासी राम की तरह। 

छूने का सुख न दे सके- 

रिश्तों के धुंधले एहसास, 

पंछी को मिले नहीं पर- 

उड़ने को सारा आकाश। 

सच की किरचें उखाड़कर, 

सपनों की चीरफाड़ कर, 

टांक लिए भ्रम,

गीतों के दाम की तरह। 

आज इतना ही सहन कर लीजिए, नमस्कार।

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49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें

कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और  एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,

और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें। 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं, 

उन हक़ीमों से मशविरा कर लें। 

आह के शेर, दर्द की नज़्में, 

इक मुसलसल मुशायरा कर लें। 

अब ये बात तो राजनैतिक मौसम की थी, हालांकि मुझे इस पर आपत्ति है कि ‘राजनैतिक’  में ‘नैतिक’ क्यों आता है।

खैर मेरा मन इस समय चल रहे बरसात के मौसम पर बात करने का है, जो देश भर में बहुत से प्राण ले चुका है। वैसे तो  ये सच्चाई है कि भारत में हर मौसम कुछ जानें लेकर ही जाता है।

यह भी सही है कि  कुदरत की मार जब पड़ती है, तब बड़े से बड़े सूरमा राष्ट्र भी कमज़ोर साबित हो जाते हैं, लेकिन शायद  भारत जैसे देशों में ये मार कुछ ज्यादा घातक होती है।

मैं तो अब गोआ में हूँ, वैसे भी यहाँ के ऊंचे इलाके में हूँ, बहुत बारिश पड़ रही है, यहाँ समुद्र है और ऊंचे-नीचे इलाके हैं। मैंने अभी तक यहाँ, अपने इलाके में, सड़कों पर पानी जमा होते नहीं देखा है। वैसे मैंने पूरा इलाका नहीं देखा है, जितना देखा, उसके आधार पर कह रहा हूँ।

मुझे लगता है, कुदरती तौर पर शहरों में जो ऊंचे-नीचे इलाके होते हैं, बल्कि शहरों की जगह  मैं कहूंगा कि जहाँ शहर बसाए जाते हैं, उन इलाकों में जो चढ़ाइयां और ढलान होते हैं, पानी इकट्ठा होने का जो प्राकृतिक रूट होता है, यदि उसमें अधिक छेड़छाड़ न की जाए, शहरों के किनारे जल संग्रहण के लिए कुछ बड़े-बड़े तालाब- झील आदि बना दिए जाएं, तब कुदरत की यह मार शायद काफी हद तक कम की जा सकती है। इस लिहाज़ से टाउन प्लैनर्स की विशेष भूमिका हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि बाढ़ की, सूखे की जो समस्याएं आती हैं, उनका स्थान आधारित अध्ययन किया जाना चाहिए, ऐसा कोई विभाग यदि है, तो उसमें गंभीर और प्रतिभाशाली लोगों को इस भविष्यमूलक योजना की तैयारी में लगाया जाए, जिससे इन आपदाओं का प्रभाव जहाँ ये कम है वहाँ समाप्त हो और जहाँ अधिक हैं वहाँ कम से कम हो सके और जहाँ तक हो सके, इन आपदाओं के कारण किसी के प्राण न जाएं।

डॉ. राही मासूम रज़ा की कुछ पंक्तियां, इस गंभीर माहौल में शेयर करने का मन हो रहा है, जो शायद उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज़’ में थीं-

कौन आया दिल-ए-नाशाद, नहीं कोई नहीं

राहरौ होगा, कहीं और चला जाएगा, 

गुल करो शमा, बुझा दो, म-औ-मीना-औ-अयाग,

अपनी आंखों के किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो, 

अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आएगा। 

आज मौसम की मार पर यह चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

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कोई तो आसपास हो, होश-ओ-हवास में

जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो यह विचार किया था कि इसमें दलगत राजनीति के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। वैसी कोई बात लिखनी हो तो कहीं और लिख सकता हूँ।

लेकिन जैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, उसी तरह उसके विमर्श का भी कोई स्थाई तरीका या ठिकाना ज़रूरी नहीं है।

कुछ कैरेक्टर लगातार प्रेरित करते हैं कि राजनीति या इसके चरित्रों के बारे में टिप्पणी की जाए। जैसे जब मैं राज्यसभा की कार्यवाही देखता हूँ तो पाता हूँ कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं श्री गुलाम नबी आज़ाद एवं श्री आनंद शर्मा के ठीक पीछे एक बुज़ुर्ग सज्जन बैठते हैं, उनके बुज़ुर्ग स्वरूप को देखते हुए कुछ आदर का भाव भी आता है, लेकिन शायद उनको कोई गंभीर मैडिकल प्रॉब्लम है, वो ज्यादा देर तक कुर्सी पर नहीं बैठ पाते। अचानक हम देखते हैं कि वे कुर्सी छोड़कर सदन के ‘वेल’ में, उपसभापति महोदय के आसन के सामने पहुंच गए हैं और नारे लगाने लगे हैं। और भी लोग होते हैं उनके साथ लेकिन वे क्योंकि अपनी आयु के लिहाज़ से आदरणीय जैसे लगते हैं, इसलिए उनका ज़िक्र किया। ऐसे लोग वैसे जनता के बीच जाकर कोई चुनाव तो नहीं जीत सकते, क्योंकि ऐसा करेंगे तो जनता उनको, उनकी सही जगह, कुंए में पहुंचा देगी।

अब  जबकि परम आदरणीय श्री लालू प्रसाद यादव जी के परिवार  का हर लायक-नालायक सदस्य करोड़पति हो गया है, अगर यह देखते हुए कोई कहे कि लालू जी आप चोर हैंं, तो इसमेंं तो कोई दलगत राजनीति नहीं होगी। इसी शृंंखला मेें अगर आदरणीया बहन मायावती जी का नाम भी ले लिया जाए तो! वैसे और भी बहुत से लोग होंगे, जिनसे कहा जा सकता हैै कि राजनीति आपकी अपनी जगह है, लेकिन भ्रष्टाचार नहीं चलेगा।

हमने देखा है कि श्री बालकवि बैरागी जी लंबे समय से राजनीति में रहे हैं, संसदीय राजभाषा समिति में भी रहे, उनको हमने  कोई छोटी हरकत करते नहीं देखा, राजनीति की शुचिता को उन्होंने बनाये रखा है। ऐसे बहुत से निर्वाचित और मनोनीत साहित्यकार राजनीति से जुड़े रहे हैं, जिन्होंने राजनीति को शुचिता का एक पैमाना दिया है।

श्री बालकवि बैरागी ने अपनी एक कविता में लिखा भी है-

एक और आशीष दो मुझको, मांगी या अनमांगी,

राजनीति के राजरोग से मरे नहीं बैरागी। 

एक कवि हैं श्री संपत सरल, कवि क्या गद्य में व्यंग्य पढ़ते हैं वे, मैंने भी  उनको बुलाया है एक बार अपने आयोजन में, अभी जैसा उभरकर आ रहा है, वे भी अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य लगते हैं। व्यंग्य का एक मुहावरा है जिसको अगर आपने साध लिया है तो आप काफी समय तक तालियां बजवा सकते हैं, लेकिन अंततः ईमानदारी  ही काम आती है। मुझे लगता है कि श्री संपत सरल को कविता की ईमानदारी के बारे में सोचना चाहिए,  मुझे श्री रमेश रंजक जी की पंक्तियां फिर से याद आ रही हैं-

वक्त तलाशी लेगा, वो भी चढ़े बुढ़ापे में,

संभलकर चल, 

वो जो आयेंगे, छानेंगे, कपड़े बदल-बदल

संभलकर चल, 

वैसे अब क्या कहा जाए, पाकिस्तान में भी ‘शरीफ’ का ज़माना नहीं रहा।

राजनीतिज्ञ अपनी ही अलग दुनिया में रहते हैं, चमचों की जयकार के बीच उनको यह एहसास ही नहीं रहता कि उनके पैरों के नीचे ज़मीन है भी या नहीं।

अंत में मुझे अपनी लिखी हुई पंक्तियां याद आ रही हैं-

वे खुद बने हैं रोशनी, लिपटे कपास में, 

कैसे अजीब भ्रम पले दिन के उजास में।

कुछ अपनी बदहवासियां उनको पता चलें, 

कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में। 

नमस्कार।

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47. छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन 

हाल में हुई एक घटना पर टिप्पणी करने का मन हो रहा है।

इस घटना के पात्र हैं सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और आज के लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास ।

घटना के बारे में चर्चा करने से पहले, इन दोनों पात्रों के बारे में कुछ बात कर लेते हैं।

श्री अमिताभ बच्चन जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आज वे पूरी दुनिया में भारत का नाम रौशन कर रहे हैं। एक बात और उनके बारे में मानी जाती है कि जब कोई उनसे बात करता है तो ऐसा लगता है कि अमिताभ बच्चन आप नहीं बल्कि दूसरा व्यक्ति है। इतनी अधिक विनम्रता और दूसरे को सम्मान देने का भाव, यह माना जा सकता है कि आपको, आपके पिताश्री डॉ. हरिवंश राय बच्चन से मिला है, जो हिंदी के एक विख्यात कवि थे, श्रेष्ठतम कवियों में उनकी गिनती होती थी और अपनी रचना – ‘मधुशाला’ के माध्यम से वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे, क्योंकि सामान्य श्रोता समुदाय गंभीर साहित्यिक रचनाओं से अधिक नहीं जुड़ पाता यह भी सच्चाई है, गंभीर रचनाओं को सुनने-पढ़ने वाले अपेक्षाकृत बहुत कम होते हैं।

हाँ तो इस घटना के दूसरे पात्र हैं- डॉ. कुमार विश्वास, जो आज के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। डॉ. कुमार विश्वास से मेरी कई बार मुलाकात हुई है, मैंने उनको एनटीपीसी के कुछ आयोजनों में भी आमंत्रित किया और मुझे यह  कहने में कोई संकोच नहीं कि उनके कारण हमारे ये आयोजन अत्यंत सफल रहे थे। बाद में जब वे राजनीति  से जुड़ गए, उसके बाद उनका फोन उनके स्थान पर उनका पी.ए. उठाने लगा और हमारा संपर्क टूट गया।

यह एक सच्चाई है कि डॉ. कुमार विश्वास भी आज पूरी  दुनिया में लोकप्रिय हैं और देश के सबसे महंगे गीत कवि हैं। साहित्यिक श्रेष्ठता की बहस अपनी जगह है लेकिन शायद हाल के वर्षों में किसी गीत कवि के प्रति श्रोताओं में इतनी दीवानगी नहीं देखी गई है।

एक बात और याद आ रही है जो मैंने उन दिनों पढ़ी थी जब बड़े बच्चन जी, मतलब डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी जीवित थे। घटना जैसी मैंने पढ़ी थी, इस प्रकार थी कि श्री अमिताभ बच्चन शुरू की कुछ फिल्में कर चुके तब उनके पिता- डॉ. बच्चन अपनी जीवन भर की कमाई से कुछ राशि उनके भाई अजिताभ को व्यवसाय में लगाने के लिए देने लगे, तब अमिताभ जी ने कहा कि आप  रख लीजिए, इनसे कुछ नहीं होगा और उससे काफी बड़ी राशि का चेक काटकर अपने भाई को दे दिया।

इस घटना से जैसा बताया गया कि डॉ. बच्चन को काफी सदमा लगा था कि मेरी जीवन भर की कमाई किसी काम की नहीं है। उस रिपोर्ट में ऐसा बताया गया था कि डॉ. बच्चन ने उसके बाद अपनी कुछ रचनाएं भी जला दी थीं।

यह एक  स्टोरी थी जो  कहीं पढ़ी थी, मेरा कोई दावा नहीं है कि यह सही होगी, लेकिन इसमें साहित्य और फिल्मों की कमाई, विशेष रूप से सुपर स्टार की कमाई की जो तुलना दर्शाई गई है, वह तो सही है।

एक बात यह भी मैं कहना चाहता हूँ कि श्री अमिताभ बच्चन जी, डॉ. बच्चन के जैविक पुत्र तो हैं ही और इस नाते उनकी रचनाओं पर व्यवसाय करने का अधिकार तो उनको ही है,  लेकिन डॉ. बच्चन के मानस पुत्र, उनकी परंपरा के वाहक तो हमारे कवि बंधु ही हैं, और उनमें डॉ. कुमार विश्वास भी शामिल हैं।

अब घटना जैसा आप सभी जानते होंगे यह थी कि डॉ. कुमार विश्वास ने बच्चन जी की एक कविता – ‘निशा निमंत्रण’ कहीं, उनका स्मरण करते हुए, अपनी आवाज़ में गाई थी और इस पर अमिताभ जी ने लाखों का दावा कर दिया था।

सचमुच मुझे अमिताभ जी की यह कार्रवाई उनके विनम्र स्वभाव के अनुकूल नहीं लगी, और मुझे यह भी लगा कि कविता के कॉपीराइट को शायद उन्होंने फिल्म जैसा समझ लिया।

सच्चाई यह है कि सामान्य श्रोता समुदाय में अधिकांश लोग ऐसे होंगे जिन्होंने इस गीत को डॉ. कुमार विश्वास ने गाया, इसलिए सुन लिया हो, वरना गंभीर रचनाओं का कोई श्रोता समुदाय नहीं है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच्चाई है।

आज डॉ. गिरिजाकुमार माथुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ-

 

छाया मत छूना मन
होता है दुख दूना मन 

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।

भूली-सी एक छुअन 
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन 

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।

जो है यथार्थ कठिन 
उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन 

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे 
कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

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46. हर-एक कदम पे तलाशा किया रक़ीब नए,  मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं। 

काफी लंबा अंतराल हो गया इस बार।

इस बीच 3 जुलाई को हम गुड़गांव छोड़कर गोआ में आ बसे। यह हमारा नया ठिकाना है और मुझे अभी तक भ्रम रहता है कि ‘गोआ’  लिखूं या ‘गोवा’।

खैर, यह बता दूं कि गुड़गांव छोड़ने से पहले मेरे लैपटॉप ने हल्का सा स्नान कर लिया था, चुल्लू भर पानी चला गया था उसके अंदर, समय नहीं था वहाँ पर, वरना मेरा बेटा नेहरू प्लेस से ठीक करा लाता। वहाँ अच्छे-अच्छे बिगड़े हुए ठीक हो जाते हैं (लैपटॉप), उस जगह का नाम, नेहरू जी के साथ ऐसे ही नहीं जुड़ गया है। यहाँ गोआ का नेहरू प्लेस कहाँ है, है भी या नहीं, ये धीरे-धीरे पता चलेगा। एक ने कुछ दिन अपने पास रखा, फिर वापस कर दिया, कहा कि पार्ट नहीं मिल रहा है और अब जीएसटी के कारण मिलेगा भी नहीं। ये वह बात है जो उन सज्जन ने बताई, जो लैपटॉप ठीक नहीं कर पाए।

इस बीच मेरे लिए नए लैपटॉप का प्रबंध कर दिया गया, अब मैं तो कुछ करता नहीं हूँ। जो गपशप करनी आती है, ज्ञान बांटने का शौक है, वही पूरा कर रहा हूँ।

मैं ब्लॉग पहले ‘वर्ड फाइल’ में लिखता हूँ और उसके बाद यहाँ पेस्ट करता हूँ, नए लैपी में अभी एमएस वर्ड लोड नहीं है, सो पहली बार डायरेक्ट यहाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

पहले लगातार इतने दिनों तक ब्लॉग लिखे कि पढ़ने वाले भी थक गए होंगे, अभी जब इतना लंबा अंतराल आया तब यह देखकर अच्छा लगा कि काफी दिनों के बाद भी कुछ नए लोग मेरे ब्लॉग्स को फॉलो करना शुरू कर रहे हैं। ऐसे में और ज़रूरी लगने लगता है कि कुछ न कुछ तो शेयर किया जाए।

इससे पहले गोआ में कभी टूरिस्ट के रूप में नहीं आया और अब देखना कि टूरिस्ट यहाँ पर क्या देखते हैं! इस बीच दो-तीन ‘बीच’  देखीं, एक तो एरियल डिस्टेंस की दृष्टि से घर के बहुत पास है, लेकिन उतार और चढ़ाई इतनी अधिक है कि अपने स्वभाव के अनुसार एक बार पैदल चला गया और फिर वापस भगवान के किसी दूत को ही अपनी गाड़ी में लाना पड़ा, क्योंकि बारिश भी आ गई थी, जो आजकल कब आ जाए पता नहीं चलता।

खैर आज लंबी बात नहीं करूंगा। यह आश्वासन या धमकी नहीं दूंगा कि अब से रोज़ लिखूंगा, लेकिन शायद इतना लंबा अंतराल भी नहीं आने दूंगा।

पता नहीं क्यों, सूर्यभानु गुप्त जी की दो-तीन गज़लें कुछ दिन से ज़ुबान पर आ रही हैं, कुछ शेर जो याद हैं,  आज शेयर कर रहा हूँ-

 

जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं, 

नदी में बांध के पत्थर उतर गया हूँ मै। 

मेरे लहू में किसी बुत-तराश का घर है, 

जिधर बनी हैं चट्टानें, उधर गया हूँ मैं। 

हर-एक कदम पे तलाशा किया रक़ीब नए, 

मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं। 

तेरा बदन जो उठा ज़ेहन में हवा होकर, 

रुई की तरह हवा में बिखर गया हूँ मैं। 

एक अच्छा शेर कह के मुझको ये महसूस हुआ, 

बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं। 

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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45. हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ

हाँ तो कहाँ जाना है- गोआ!

जो एक पर्यटक के रूप में वहाँ गए हैं, उनके मन में एक छवि होगी गोआ की, लेकिन वहाँ रहने वाले के लिए तो गोआ कुल मिलाकर, वही नहीं होता, जो किसी पर्यटक के लिए होता है!

हालांकि जब मैं एक वर्ष तक मुंबई रहा, उस दौरान मेरे लिए समुद्र किनारे का आकर्षण वैसा ही बना रहा था, जैसा किसी पर्यटक के लिए होता है। बाद में जब फिर से 3 महीने मुंबई रहा, तब घुमक्कड़ी की वह प्रवृत्ति काफी कम हो गई थी।

आज की तारीख में मेरी अपनी उम्र और अवस्था को देखते हुए, पता नहीं क्यों गोआ के नाम पर मुझे बॉबी के प्रेम नाथ याद आते हैं, मछुआरों के सरदार।

खे खेखे खेखे ओ रे साहिबा, प्यार में सौदा नहीं

या फिर- तेरा लड़का कहीं मुंसीपॉलिटी के गटर में पड़ा होगा!

दूर से किसी शहर के बारे में पढ़कर, लोगों से सुनकर जो धारणा हम बनाते हैं, वह कितनी सच उतरती है, जब हम वहाँ पहुंचते हैं, घूमने के लिए नहीं, रहने के लिए!

मुंबई में, जैसा मैंने पहले बताया, दो बार रहा मैं, पहली बार तो कंपनी का क्वार्टर था, पवई में प्राइम लोकेशन पर, टॉप 14 वां फ्लोर, कहीं कोई दिक्कत नहीं, बस यही है कि रहने का मन था, लेकिन राजनीति का शिकार होकर लौट आया,एक वर्ष से कम समय में!

दूसरी बार मेरे रिटायर होने के बाद, जब बेटे ने जॉइन किया था एक प्रायवेट कंपनी में, तब अंधेरी पश्चिम में एक सोसायटी में रहे थे, कुल मिलाकर 3 महीने तक। इस बार कारण यह था कि बेटे को काम पसंद नहीं आया और हमने 3 महीने बाद ही वापस लौटने का फैसला किया।

तो इस बार हम एक सोसायटी में रहे थे, ग्राउंड फ्लोर पर। सोसायटी जिसके कर्णधारों को शायद अपने मराठी मानुस होने का काफी घमंड था और उसमें हमारी मकान मालकिन थी, एक पढ़ी-लिखी क्रिश्चियन महिला। इस महिला के पढ़ी-लिखी होने के उल्लेख, का विशेष उद्देश्य शायद यह भी है, कि सोसायटी के कर्णधारों के लिए उनकी असभ्यता ही उनकी पहचान थी, लेकिन ये महिला उनसे जमकर टक्कर ले रही थी।

इस प्रकार कई बार स्थानीय मूल्यों का परिचय काफी असभ्य तरीके से भी होता है, उसी के बीच पता चलता है कि मूल्य क्या हैं और लोगों की अपने बारे में गलतफहमी क्या हैं। हम तो खैर वहाँ कम समय ही रहे, लेकिन इस बीच भी हमारी मकान-मालकिन सोसायटी के सैक्रेटरी को थाने से घुड़की दिलवा चुकी थी।

यह भी बड़े अफसोस की बात है कि मुंबई में, जगह-जगह लहराते शिव सेना के झंडे, सामान्यतः यही संदेश देते हैं, कि यहाँ सदा असभ्यता का, दादागिरी का ही पर्चम लहराता रहेगा। मेरे विचार में पढ़े लिखे और बड़ी सोच वाले स्थानीय लोगों को इसे दूर करना चाहिए, कुछ हद तक हुआ भी है शायद, लेकिन ठाकरे परिवार के कागज़ी शेर अब कुछ ज्यादा उत्तेजित हैं, ऐसा लगता है।

ये इधर-उधर की बातें करने के बाद, आज अहमद फराज़ साहब की एक लंबी गज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, इसके कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं और मैं भी शौक से गुनगुनाता रहा हूँ-

 

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझको दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ।


यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्साँ जानाँ।

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ।

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ।

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ।

मुद्दतों से ये ही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ।


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ।

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जानाँ।

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ।

                                          -ज़नाब अहमद फराज़

 

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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