149. अंतराल- दोहराव

एक वर्ष से कुछ कम समय हुआ है, जब अचानक ब्लॉग लिखने की सनक सवार हुई थी।
मैंने शुरुआत की थी, अपने जीवन के प्रारंभ से, कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं, व्यक्तियों आदि का, उनके माध्यम से मेरे जीवन पर पड़े प्रभाव आदि का ज़िक्र करते हुए। शायद 50-60 ब्लॉग, मैंने अपने जीवन के घटनाक्रम को फॉलो करते हुए, कभी-कभी अपने आपसे संघर्ष करते हुए लिखे। फिर उसके बाद तात्कालिक विषयों, गीत-कविताओं, फिल्मों, कलाकारों आदि को केंद्र में रखकर लिखना प्रारंभ किया।
अब जबकि एक महत्वपूर्ण पड़ाव आ रहा है, 150 ब्लॉग पूरे होने जा रहे हैं, उसी समय मैं कुछ दिन, लगभग एक सप्ताह के लिए घर से बाहर जा रहा हूँ, इस बीच कोई नया ब्लॉग नहीं लिख सकूंगा।
मैंने विचार किया कि यह अच्छा अवसर है, जबकि मैं अपने कुछ चुने हुए पुराने ब्लॉग फिर से प्रकाशित करूं। विशेष रूप से यह इसलिए उपयोगी होगा कि जब मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब मेरा कोई फॉलोवर इस ब्लॉगिंग साइट पर नहीं था। कुछ उद्यमी लोगों ने तो मेरे पुराने ब्लॉग भी खोज-खोजकर पढ़ लिए हैं, मैं उनका अत्यंत आभारी हूँ, परंतु सबके लिए तो यह संभव नहीं होता।
अगले कुछ दिनों में घर से दूर होने के कारण, मैं प्रयास करूंगा कि कुछ चुने हुए पुराने ब्लॉग प्रकाशित करूं, परंतु मैं सक्रिय रूप से पठन-पाठन, प्रतिक्रिया आदि में भाग नहीं ले सकूंगा, यह काम मैं अवकाश से वापस लौटने पर ही कर पाऊंगा।
आशा है आपको मेरे ये पुराने ब्लॉग रुचिकर एवं सार्थक लगेंगे। अंत में जिगर मुरादाबादी जी का यह प्यारा सा शेर-

उनका क्या काम है, ये अहले सियासत जानें,
मेरा पैगाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुंचे।

नमस्कार।

148. कच्ची दीवार हूँ, ठोकर न लगाना मुझको

इंसान परिस्थितियों के अनुसार क्या-क्या नहीं बनता और अपने आपको किस-किस रूप में महसूस नहीं करता।
कभी-कभी  जीवन में ऐसा भी लगता है कि अब बहुत सहन कर लिया, एक झटका और लगा तो टूटकर बिखर जाएंगे।
अरेे कुछ नहीं  ज़नाब, बस असरार अंसारी जी की एक गज़ल याद आ रही थी, जिसको गुलाम अली जी ने गाकर अमर कर दिया है।
लीजिए प्रस्तुत है ये गज़ल-

कच्ची दीवार हूँ ठोकर न लगाना मुझको,
अपनी नज़रों में बसाकर न गिराना मुझको।

तुम को आँखों में तसव्वुर की तरह रखता हूँ,
दिल में धड़कन की तरह तुम भी बसाना मुझको।

बात करने में जो मुश्किल हो तुम्हे महफिल में,
मैं समझ जाऊंगा नज़रों से बताना मुझको।

वादा उतना ही करो जितना निभा सकती हो,
ख्वाब पूरा जो न हो, वो न दिखाना मुझको।

अपने रिश्ते की नज़ाकत का भरम रख लेना,
में तो आशिक हूँ दिवाना न बनाना मुझको।

नमस्कार।

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147. खुशबू जैसे लोग

अभी कल ही अपने एक पुराने कवि-मित्र का ज़िक्र किया था, मुद्दत हो गई उनसे मिले लेकिन आज भी याद आती है। हाँ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं लोग जो लंबे समय बाद भी यादों में खटकते रहते हैं, हालांकि उनको भुला देना ही बेहतर होता है,  मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे जीवन में ऐसे लोग कम ही रहे हैं, वरना शायद कुछ लोगों का जीवन सीरियल के एपिसोड्स जैसा संकटग्रस्त रहता हो, क्या मालूम! एकता कपूर कुछ देखकर ही अपना मसाला तैयार करती होगी ना!

खैर आज गुलज़ार साहब की एक खूबसूरत गज़ल, बिना किसी भूमिका क्र प्रस्तुत है, इसे गुलाम अली साहब ने अपनी दिलकश आवाज़ में गाया है-

 

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में

एक पुराना खत खोला अनजाने में। 

जाने किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में

दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में। 

शाम के साये बालिश्तों से नापे हैं

चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में।

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगे

ज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में।

दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है

किसकी आहट सुनता है वीराने मे ।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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146. इस सूने उदास मौसम में, कुछ तो यार करें

आज फिर पुराने दिनों में झांकने का मन हो रहा है, एक मित्र की याद आ रही है। बात है 1980 से 1983 के बीच की, जब मैं आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक के पद पर कार्यरत था और वहाँ बने कवि मित्रों में से एक थे- श्री कृष्ण कल्पित, वे उस समय जयपुर विश्वविद्यालय  से शोध कर रहे थे।

कृष्ण कल्पित जी का एक गीत मैंने शायद पहले भी शेयर किया है, वैसे दुबारा शेयर करने में क्या बुराई है, लीजिए फिर से वह सुंदर गीत पढ़ते हैं-

राजा-रानी, प्रजा-मंतरी, बेटा इकलौता

मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,

राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई,

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता,

मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।। 

राजा,  राज किया करता था; राजा, राज करे,

परजा भूख मरा करती थी, परजा भूख मरे,

अब मैं किसी कथानक का भी, अंत नहीं ढ़ोता,

एक कहानी सुनी, उसी का अंत नहीं होता॥

खैर जयपुर में प्रवास के दौरान, आकाशवाणी में और गोष्ठियों आदि में कल्पित जी से मिलना होता रहा।

बाद में मैंने घाटशिला, झारखंड (उस समय बिहार) में हिंदुस्तान कॉपर की मुसाबनी माइंस में कार्यग्रहण किया। उसी बीच कल्पित जी आकाशवाणी की सेवा में आ गए और उनकी तैनाती रांची में हो गई। हमारा स्थान, इत्तफाक़ से उस आकाशवाणी के क्षेत्र में आता था, सो उन्होंने, जब तक मैं वहाँ रहा, कई बार काव्य पाठ के लिए बुलाया। फिर मैं खेतड़ी राजस्थान आया और फिर मध्य प्रदेश में, एन.टी.पी.सी के एक प्रोजेक्ट में और उनसे संपर्क छूट गया।

बहुत बाद में मालूम हुआ कि वे आकाशवाणी, महानिदेशालय में किसी बड़े पद पर तैनात थे, शायद अभी भी होंगे।उनके प्रति अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए उनका एक और सुंदर गीत, यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

इस सूने, उदास मौसम में कुछ तो यार करें,

सूरज से गलबहियां करने, मन तैयार करें।

एक नदी है जो भीतर से बाहर आती है,

एक नदी है बाहर से भीतर जाती है,

नदियों से हम, नदियों जैसा ही व्यवहार करें।

कुछ तो यार करें।

जंगल सुनता रहा रात भर , सारी रात कही,

कटते हुए पेड़ ने उससे, सारी बात कही,

चाहे जंगल में हो लेकिन अब घरबार करें।

इस सूने, उदास मौसम में कुछ तो यार करें॥

अपने मित्र कृष्ण कल्पित जी के इन सुंदर गीतों के साथ उनका स्मरण करते हुए, मैं उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

नमस्कार

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145. तेरा दर्द ना जाने कोय

जीवन में अब तक, बहुत से शहरों और क्षेत्रों में रहने का अवसर मिला, हर स्थान की अपनी विशेषता और कमियां हैं। लेकिन कुछ बातें हैं जो भारत में,  हर जगह समान रूप से होती हैं। जैसे रात में आप उठें और बाथ-रूम जाएं तो आपको कुत्तों के रोने का शोर सुनाई देगा।

यह शोर तब भी हो रहा था जब आप बेड रूम में थे, लेकिन पंखे और ए.सी. के शोर में शायद यह कुक्कुर रुदन की आवाजें दब जाती हैं। अब कुत्तों का स्वभाव और स्थिति ऐसे हैं कि वे रात में खुले में रोते हैं, यह स्थिति भारत में आम है, शायद हर जगह मिल जाएगी।

इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास अपने देश में नहीं होता, वरना जरूरी नहीं कि कुत्तों की ज़िंदगी भी इतना अधिक कुत्तों जैसी हो। इसका इलाज, काफी हद तक उनकी संख्या को नियंत्रित करने में है, मुझे याद है कि मैंने कहीं पढ़ा था कि हरियाणा में बहुत सालों से कुत्तों की नसबंदी पर मोटी रकम खर्च की जा रही थी और परिणाम में उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही थी, मैंने 6 महीने पहले गुड़गांव छोड़ दिया, वैसे मुझे भरोसा है कि आज भी स्थिति वैसी ही होगी।

कुक्कुर रुदन की बात ऐसे ही ध्यान में आ गई, मैंने काफी पहले आवारा पशुओं की समस्या पर एक ब्लॉग लिखा था, आवारा बंदर, कुत्ते और अन्य मवेशी, इस तरफ ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

असल में, आज मैं उस रुदन की चर्चा करना चाह रहा हूँ, जो दुनिया में लगातार चलता रहता है और किसी का ध्यान उस तरफ नहीं जाता। अब और भूमिका नहीं बांधूंगा और अलग से कोई गंभीर बात भी नहीं करूंगा। फिल्म- नागमणि का गीत, कवि- प्रदीप जी का लिखा और उनके द्वारा ही गाया प्रस्तुत है, जो अत्यंत प्रभावशाली है। इसके संगीतकार हैं- अविनाश व्यास और यह गीत अपनी बात खुद कहने में सक्षम है।

 

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द ना जाने कोय 

कह ना सके तू, अपनी कहानी
तेरी भी पंछी, क्या ज़िंदगानी रे
विधि ने तेरी कथा लिखी आँसू में कलम डुबोय 
तेरा दर्द ना जानेे कोय।   

चुपके चुपके, रोने वाले
रखना छुपाके, दिल के छाले रे
ये पत्थर का देश हैं पगले, यहाँ कोई ना तेरा होय
तेरा दर्द ना जानेे कोय। 

बस ऐसे ही कुत्तों के रुदन के बहाने वह रुदन याद आ गया, जो हमारे आसपास लगातार चलता रहता है और हम उससे बेखबर रहना चाहते हैं।

नमस्कार।

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144. बसंती पागल पवन – राज कपूर

आज एक बार फिर मेरे उस्ताद राज कपूर जी की याद आ रही है, फिल्म- ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और उसके एक गीत के बहाने।

जबलपुर में जब भेड़ाघाट जाते हैं, तब वहाँ नाव वाले घुमाते हुए बताते हैं, कि यहाँ ‘मेरा नाम राजू’ गाने की शूटिंग हुई थी और यहाँ पद्मिनी ने ‘ओ बसंती पवन पागल’ गाया था।

आज यह गाना ही आपके साथ शेयर करूंगा, लेकिन उससे पहले ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के उस कैरेक्टर, उसको नायक किस प्रकार कहूं? राजू को याद कर लेता हूँ, जिसके लिए गंगा माई की कसम से बढ़कर कोई कसम नहीं है, जो डाकू के बच्चे को समझाता है कि उसके पिता की गर्दन लंबी हो जाएगी, जो कहता है-

मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है,

ज्यादा की नहीं परवाह हमको, थोड़े मे गुज़ारा होता है, 

बच्चों के लिए जो धरती मां, सदियों से सभी दुख सहती है, 

हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। 

उस ऐसे इंसान के लिए नायिका पद्मिनी यह गीत गाती है, जो पुलिस को बताता है कि डाकू कहाँ हैं और फिर डाकुओं को बताता है कि पुलिस आ रही है, और इसमें कोई चालाकी नहीं है, एक भोलापन है, जो पागलपन के आसपास पहुंचा हुआ भोलापन है, ऐसा व्यक्ति , जब वह डाकुओं की बस्ती छोड़कर जा रहा था, तब उसको  संबोधित करते हुए उसकी प्रेमिका और एक डाकू की बेटी द्वारा गाए गए  इस गीत के बोल ध्यान से पढ़िए-

ओ बसंती पवन पागल, ना जा रे ना जा, रोको कोई 

बन के पत्थर हम पड़े थे, सूनी सूनी राह में, 

जी उठे हम जबसे तेरी बांह आई  बांह में, 

बह उठा नैनों से काजल, ना जा रे ना जा, रोको कोई । 

ओ बसंती पवन पागल—- 

याद कर तूने कहा था, प्यार से संसार है, 

हम जो हारे, दिल की बाज़ी, ये तेरी ही हार है, 

सुन ले क्या कहती है पायल, ना जा रे ना जा, रोको कोई । 

ओ बसंती पवन पागल—- । 

चलिए इस गीत के बहाने हम कुछ देर के लिए सादगी, सरल हृदयता और भोलेपन की जय-जयकार करते हैं, बाकी दुनिया तो वैसे ही चालाकी से चलती रहेगी।

नमस्कार।

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143. मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

आज एक बार फिर से निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है।
गज़ल में अपनी बात कहने का सलीका, और जिस बारीकी से फीलिंग्स को कविता में उकेरा जाता है, यह उनकी पहचान रही है।

हम सभी इस दुनिया में जी रहे हैं, किसी के पास पैसा है, रुतबा है, साधन हैं सब तरह के, लेकिन पता ही नहीं चलता कि वह कौन सी चीज़ है जिससे ज़िंदगी में आराम आएगा, तसल्ली मिलेगी! बेशक प्रेम तो इसमें शामिल है ही, लेकिन वह किस तरफ से मिलने वाला, किस तरह का प्रेम है, जो नहीं होने से हमारी ज़िंदगी में एक बड़ा अधूरापन पैदा कर देगा।

अब बिना किसी भूमिका के, निदा फाज़ली साहब की यह गज़ल शेयर करूं, इससे पहले एक बात और- जब कविता या शायरी को हम लिखित रूप में देखते हैं, तो हम उसके एक-एक शब्द को सिक्के की तरह उछालकर देख सकते हैं। शायद सुनते समय हम ऐसा नहीं कर पाते। प्रस्तुत है ये गज़ल-

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता।

तमाम शहर में, ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इसकी, वहाँ नहीं मिलता ।

कहाँ चराग़ जलाएँ, कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता।

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता।

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता।

नमस्कार।
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142. देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको!

आज राज कपूर जी की  फिल्म – ‘फिर सुबह होगी’ का एक युगल गीत याद आ रहा है, जिसे साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है, खैय्याम जी ने इसका संगीत तैयार किया है और इस गीत को मुकेश जी और आशा भौंसले जी ने गाया है।

गीत का विषय, जैसे कि आम तौर पर होता है, प्रेम ही है। लेकिन यहाँ प्रेमी-प्रेमिका, दोनों एक-दूसरे को सावधान कर रहे हैं, कि देखो फिर मत कहना कि बताया नहीं था, हम प्यार की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।

एक बात कही जा सकती है आज की भाषा में कि प्यार दोनों कर रहे हैं, लेकिन ज़िम्मेदारी, ऑनरशिप लेने को कोई तैयार नहीं है!

अब इसमें मेरे कहने की तो कोई बात नहीं है, बस इतना ही कहूंगा कि इस युगल गीत की सुंदरता को देखिए और मुकेश जी और आशा ताई की अदायगी को याद कीजिए-

मुकेश: फिर ना कीजै मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला
देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: मैं कहाँ तक ये निगाहों को पलटने देती
आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको।

मुकेश: इस कदर प्यार से देखो ना हमारी जानिब  
दिल अगर और मचल जाये तो मुश्किल होगी
आशा: तुम जहाँ मेरी तरफ़ देख के रुक जाओगे
वही मंजिल मेरी तक़दीर की मंजिल होगी  
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

मुकेश: एक यूँहीं सी नजर दिल को जो छू लेती है
कितने अरमान जगाती है तुम्हे क्या मालूम
आशा: रूह बेचैन है कदमों से लिपटने के लिये
तुमको हर साँस बुलाती है तुम्हे क्या मालूम
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

मुकेश: हर नज़र आप की जज़बात को उकसाती है
मैं अगर हाथ पकड़ लूं तो खफ़ा मत होना
आशा: मेरी दुनिया-ए-मोहब्बत है तुम्हारे दम से
मेरी दुनिया-ए-मोहब्बत से जुदा मत होना
मुकेश: देखिये आप ने फिर प्यार से देखा मुझको
आशा: आप के दिल ने कई बार पुकारा मुझको। 

नमस्कार

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141. दिल से दिल की बात कही और रो लिए।

आज लता मंगेशकर जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे राजेंदर कृष्ण जी ने लिखा है और इसके लिए संगीत दिया है, मदन मोहन जी ने।

बड़े सुंदर बोल हैं, दिल को छूने वाले जिनको लता जी की आवाज और मदन मोहन जी के संगीत ने बहुत प्रभावशाली बना दिया है।

कुल मिलाकर बात यही है कि मुहब्बत में कभी ऐसे हालात आ जाते हैं कि सपने, ख्वाहिशें, हसरतें सब लापता हो जाते हैं, प्रेमी (या प्रेमिका) खुद से ही बात करते हुए रह जाते हैं। जो सपने देखे थे वे सब टूट जाते हैं।

सभी को खुशी की तलाश होती है, मुहब्बत में भी खुशी ही पाना चाहते हैं। लेकिन होता यह भी है कि खुशी के स्थान पर दुखों को अंगीकार करना पड़ता है। प्रेम करने वाले का दिल जो फूल की तरह है, वह मुरझा जाता है, और हाँ जब दुखों के बोझ में दबकर वह चुप हो जाता/जाती है, तब लोग कहते हैं, क्या हुआ जी, कुछ बोलिए न!

ये तो मेरा मन हुआ कि कुछ अपने शब्दों में भी कह दूं, लीजिए अब इसको पढ़कर, लता जी की गाई गज़ल के प्रभाव को याद कीजिए-

 

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

घर से चले थे हम तो, खुशी की तलाश में 
ग़म राह में खड़े थे वही, साथ हो लिये।
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

मुरझा चुका है फिर भी ये दिल फूल ही तो है
अब आप की खुशी इसे काँटों में तोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

होंठों को सी चुके तो, ज़माने ने ये कहा 
ये चुप सी क्यों लगी है अजी, कुछ तो बोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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140. एक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए!

चलो एक ख्वाब बुनते हैं,

नई एक राह चुनते हैं।

अंधेरा है सफर तो क्या,

कठिन है रहगुज़र तो क्या,

हमारा फैसला तो है,

दिलों में हौसला तो है।

बहुत से ख्वाब हैं,

जिनको हक़ीकत में बदलना है,

अभी एक साथ में है

कल इसे साकार करना है,

निरंतर यह सफर

ख्वाबों का, इनके साथ पलना है,

नहीं हों ख्वाब यदि तो

ज़िंदगी में क्या बदलना है!

ये बिखरे से कुछ अल्फाज़,

इनमें क्या है कुछ मानी?

हमारे ख्वाब हैं जीने का मकसद

ये समझ लो बस।

ये थे कुछ अपने शब्द, और अंत में- सपनों सौदागर स्व. राज कपूर की तरफ से, शैलेंद्र जी के शब्दों में-

इक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए,

हर शाम को ढलता सूरज, जाते-जाते कह जाए,

वो तय कर लेगा मंज़िल, जो इक सपना अपनाए।

सपनों का सौदागर आया, ले लो ये सपने ले लो,

तुमसे क़िस्मत खेल चुकी

अब तुम क़िस्मत से खेलो।

नमस्कार।

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