116. फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा!

दुष्यंत कुमार जी का एक शेर है-

खरगोश बनके दौड़ रहे हैं तमाम ख्वाब,

फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा।

यह शेर वैसे तो आपात्काल में लिखी गई उनकी गज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ से लिया गया है, जिस माहौल में यह शेर और भी अधिक गहन अर्थ ग्रहण करता है, परंतु यह शेर वैसे हर समय के लिए सत्य है, अर्थपूर्ण है।

सचमुच प्रत्येक व्यक्ति को सपने देखने का अधिकार है और सपने सुहाने ही होते हैं, अन्यथा वे दुःस्वप्न कहलाते हैं। यह भी है कि सपने जो हम पूरे मन से देखते हैं, वे पूरे होने चाहिएं। ऐसा महौल होना चाहिए देश और दुनिया में कि जो सपने हम देखते हैं, वे पूरे भी हों।और अगर हम पूरे मन से, संकल्प के साथ सपने देंखेंगे, तो माना यह जाता है कि वे अवश्य पूरे होते हैं।

इस दृष्टि से स्वप्न ही सच्चाई की पहली पायदान हैं। जो आज हमारा सपना है, वो कल हमारी सच्चाई होनी चाहिए, इसलिए सच को डरा हुआ नहीं होना चाहिए, जब तक कि आपात्काल जैसा माहौल न हो। ऐसा वातावरण बनाने में सरकार की कुछ भूमिका हो सकती है, परंतु ज्यादा बड़ी भूमिका समाज की है और जहाँ समाज जागरूक हो, वहाँ कोई सरकार भी इस वातावरण को बिगाड़ नहीं सकती।

लीजिए दुष्यंत कुमार जी की वह गज़ल पूरी पढ़ लेते हैं, जिससे यह शेर लिया गया था-

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा। 

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा। 

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा—भरा। 

लम्बी सुरंग-सी है तेरी ज़िन्दगी तो बोल
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा। 

माथे पे हाथ रख के बहुत सोचते हो तुम
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।

 

नमस्कार

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115. सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं!

आज अपने ही एक गीत के बहाने बात कर लेता हूँ। शायद मैंने यह कविता पहले भी शेयर की हो, जब मैंने शुरू के अपने ब्लॉग, अपने जीवन के विभिन्न चरणों के बहाने, अपने बचपन से प्रारंभ करके लिखे थे, उस समय तो यहाँ ब्लॉग की साइट पर मैं खुद ही लिखने वाला और खुद ही पढ़ने वाला था। बाद में मालूम हुआ कि हम एक-दूसरे को फॉलो करें तभी उनके ब्लॉग पढ़ पाएंगे और तभी हमारे ब्लॉग भी पढ़े जा सकेंगे।

अभी मेरे कुछ ऐसे संपर्क बने हैं, आशा है आगे यह संख्या और बढेगी, तब मैं शायद अपने शुरू के ब्लॉग भी री-ब्लॉग करूंगा, जिनसे मुझे बहुत लगाव है। उनमें उन बहुत से शानदार लोगों का ज़िक्र है, जिनके संपर्क में आने का मुझे अवसर मिला।

अब अपना वह गीत शेयर कर लेता हूँ, जिसे आज आपके समक्ष रखना चाह रहा हूँ। भूमिका के तौर पर इतना कि कुछ वर्षों तक मैंने नवगीत लिखे, थोड़ा बहुत मंचों पर भी गया। वहाँ के नाटक भी देखे, जहाँ कविगण वैसे विद्रोही तेवर दिखाते हैं, लेकिन सुविधाएं पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यह कविता के ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।

प्रस्तुत है मेरा यह नवगीत-

एकलव्य हम

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,

साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,

छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी

यह हमसे कब हुआ।

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,

बालक सी निष्ठा से, लिख दिए विरोध-पत्र,

बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,

खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,

खुले हाथ-पांवों में, बेड़ियां जतानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

                        (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार

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114. वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह!

कुछ विषय ऐसे हैं, कि जब आपके पास बात करने के लिए कोई विषय न हो, तब आप इनको लेकर अपना स्वेटर या कहें कि आलेख बुन सकते हैं।

जैसे एक विषय है मौसम, दूसरा है प्यार!

वैसे प्यार कौन नहीं करता और किसका काम चल पाता है बिना प्यार के?

लेकिन कविता, गीत, शायरी में उस प्यार की बात कम होती है, जिसके बिना ज़िंदगी नहीं चलती। वैसे हर आइटम की हर किस्म का अपना महत्व है। मां और मातृभूमि के प्यार पर भी बहुत सी कविताएं लिखी जाती हैं और मानव-मात्र से किए जाने वाले प्रेम पर भी।

कुल मिलाकर बात इतनी है कि आज मुझे एक गज़ल याद आ रही है, जो मैंने गुलाम अली जी की आवाज़ में सुनी है, वैसे शायद इसे जगजीत सिंह जी और चित्रा जी ने भी गाया है।

तो अब, जब सोचा है तो मैं ये गज़ल आपसे भी शेयर करूंगा, मुझे तो क़तील शिफाई साहब की यह गज़ल बहुत प्यारी लगती है, प्यार में शिकायतें भी होती हैं और आघात भी होते हैं।

तो लीजिए ये गज़ल प्रस्तुत है-

किया है प्यार जिसे हमने ज़िंदगी की तरह,

वो आशना भी मिला हमको अजनबी की तरह।

किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारीक़ी,

छुपेगा वो किसी बदली में चांदनी की तरह।

बढ़ा के प्यास मेरी, उसने हाथ छोड़ दिया,

वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह।

सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना,

क़ुबूल हमने किया जिसका गम खुशी की तरह।

कभी न सोचा था हमने क़तील उसके लिए,

करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह। 

इस क्रम में स्व. इंदुमती कौशिक जी की दो पंक्तियां भी याद आ रही हैं-

हमने जिस कोमल कोने में अपना कक्ष चिना,

उसने अपनी ईंट-ईंट को सौ सौ बार गिना।

इस विषय में वैसे तो बहुत कुछ याद आता है, मुकेश जी के बहुत सारे गीत भी हैं, लेकिन बाद में भी बात करनी है ना! सो फिलहाल इतना ही।

नमस्कार

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113. तानसेन

आज तानसेन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना या पढ़ा था।

अकबर के दरबार में तानसेन गाते थे और सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। अकबर उनकी भरपूर तारीफ करते, कहते तानसेन आप कितना सुंदर गाते हो, एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते हो। आपके जैसा कोई नहीं है।

एक बार इसी प्रकार तानसेन को सुनने के बाद अकबर ने प्रश्न किया- ‘तानसेन, क्या आपके जैसा गाने वाला कोई और भी है?

इस पर तानसेन ने कहा कि मेरे गुरूजी जैसा गाते हैं, मेरा गायन उसके सामने कुछ भी नहीं है। तानसेन ने अपने गुरू- संत हरिदास जी के बारे में बताया।

इस पर अकबर ने कहा कि हम उनको सुनना चाहते हैं, ये बताओ कि वे किस प्रकार यहाँ आ सकते हैं। आप जितना कहोगे, हम उनको दे देंगे।

इस पर तानसेन ने बताया कि संत हरिदास जी का वहाँ आना किसी प्रकार संभव नहीं है, कुछ भी देने पर वे नहीं आएंगे।

इस पर अकबर ने पूछा कि फिर उनको कैसे सुना जा सकता है?

तानसेन ने बताया कि एक ही तरीका है कि उनके आश्रम के पास जाकर, सुबह अथवा शाम के वक्त, जब वे अपनी मस्ती में गाते हैं, तब छिपकर उनको सुन लिया जाए।

इस पर अकबर वेश बदलकर, एक बैलगाड़ी में बैठकर तानसेन के साथ वहाँ गया, ये भी कहा जाता है कि शाम के समय वे देर से पहुंचे तब देर हो गई थी और संत हरिदास अपना संध्या वंदन करके शयन के लिए चले गए थे, अतः अकबर ने रात भर वहीं इंतज़ार किया, सुबह होने पर संत हरिदास जी ने बहुत देर तक मस्ती में प्रभाती गाई, अपने प्रभु के प्रेम में गाते रहे,  अकबर और तानसेन मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे और जब उनका गायन बंद हुआ, वे चुपचाप वापस चले गए।

अगली बार जब अकबर के सामने तानसेन अपना गायन प्रस्तुत कर रहे थे, तब अकबर ने पूछा- तानसेन, आप अपने गुरूजी के जैसा क्यों नहीं गा सकते?

इस पर तानसेन ने कहा- यह संभव ही नहीं है। मैं कुछ पाने के लिए गाता हूँ और वे अपने मन की मस्ती में, अपने प्रभु को याद करके गाते हैं। उनके गायन में जो दिव्य तत्व आता, वह मेरे गायन में आना संभव नहीं है।

नमस्कार

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112. बच्चा स्कूल जा रहा है!

आज बिना किसी भूमिका के, निदा फाज़ली साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, यह नज़्म खुद इतना कहती है कि मैं उसके आगे क्या कह पाऊंगा! बच्चा जब स्कूल जाता है, शिक्षा प्राप्त करता है, अपने लिए और अपने समय के लिए, देश के लिए, दुनिया के लिए सपने बुनता है, उससे ही मानवता के, इस दुनिया के आगे बढ़ने का माहौल तैयार होता है। प्रस्तुत है यह बहुत प्यारी सी रचना-

 

 

बच्चा स्कूल जा रहा है..

हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से
आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चा स्कूल जा रहा है।

नदी में स्नान करके सूरज
सुनहरी मलमल की पगडी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ
मुस्कुरा रहा है
कि बच्चा स्कूल जा रहा है।  

हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही हैं
घनेरा पीपल गली के कोने से
हाथ अपने हिला रहा है
कि बच्चा स्कूल जा रहा है।

फ़रिश्ते निकले हैं रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर एक ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है

पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चा स्कूल जा रहा है ।

                                            – निदा फाज़ली

नमस्कार

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111. परदेसियों को है एक दिन जाना!

विख्यात फिल्म अभिनेता शशि कपूर नहीं रहे। वैसे तो वे लंबे समय से बीमार थे, काफी दिन पहले जब उनको दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था, तब वह भी उनके अपने स्थान पर दिया गया था और वे उस समय भी व्हील चेयर पर आए थे।

कुछ यह कपूर परिवार में लगभग सभी के साथ रहा है कि वे जब सक्रिय नहीं रहते, तब बहुत मोटे हो जाते हैं, और शायद यह मोटापा भी उनका सबसे बड़ा दुश्मन है।

कपूर परिवार में जिस शानदार परंपरा की शुरुआत पृथ्वीराज कपूर जी ने की, उसको आज भी आगे बढ़ाया जा रहा है और लगभग हर सदस्य ने एक अलग ढंग से अपनी अलग पहचान बनाई है।

अपने पिता पृथ्वीराज जी और दोनो भाइयों राज कपूर और शम्मी कपूर के अभिनय कौशल की कहीं भी नकल न करते हुए, शशि जी ने अपनी एक अलग पहचान पर्दे पर बनाई। उनका पर्दे पर दिखने वाला वह छरहरा बदन, वे शरारती आंखें और शैतानी से भरी मुस्कान भुलाना आसान नहीं है।

मुझे उनकी शुरू की फिल्मों से एक कैरेक्टर याद आता है फिल्म ‘वक़्त’ का, जिसमें परिवार के उजड़ने और बिछड़ने के बाद वे गरीबी का जीवन बिताते हैं, शायद ड्राइवर की नौकरी करते हैं और अमीर हीरोइन से उनको प्यार हो जाता है। फिल्म में ढ़ेर सारे जाने-माने अभिनेताओं के बीच शशि जी अपनी पहचान बनाते हैं। उस फिल्म में इन पर फिल्माया गया गीत था-

दिन हैं बहार के तेरे मेरे इक़रार के, दिल के सहारे आजा प्यार करें

दुश्मन हैं प्यार के जब लाखों जन संसार के, दिल के सहारे कैसे प्यार करें।

शशि जी ने अपने पिता की परंपरा को जारी रखते हुए, थिएटर का साथ नहीं छोड़ा और उनकी जीवन संगिनी भी थिएटर की श्रेष्ठ कलाकार रही हैं।

शशि जी एक अत्यंत लोकप्रिय रोमांटिक कलाकार रहे हैं, फिल्म में उनका होना जैसे फिल्म की सफलता की गारंटी माना जाता था। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई अत्यंत सफल फिल्में हैं, जिनमें इन दोनों ने मिलकर गज़ब का समां बांधा है।

शशि जी जहाँ लोकप्रिय फिल्मों के अत्यंत सफल अभिनेता थे, वहीं पृथ्वी थिएटर के लिए उनका निरंतर योगदान और उनकी बनाई अपनी कुछ फिल्में भी अपने आप में बेमिसाल हैं, जिनमें उन्होंने क्रिएटिव रिस्क लिया और वाहवाही अर्जित की।

शशि कपूर जी पर फिल्माए गए कुछ गाने जो याद आ रहे हैं, वे इस प्रकार हैं-

परदेसियों से ना अंखियां मिलाना, एक डाल पर तोता बोले एक डाल पर मैना, मोहब्बत बड़े काम की चीज है, वक़्त करता जो वफा आप हमारे होते, इक रास्ता है ज़िंदगी, यहाँ मैं अजनबी हूँ, कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है, कभी रात दिन हम दूर थे दिन रात का अब साथ है, नैन मिलाकर नैन चुराना किसका है ये काम, चले थे साथ मिलकर चलेंगे साथ मिलकर, सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देतीं, एक था गुल और एक थी बुलबुल, थोड़ा रुक जाएगी तो तेरा क्या जाएगा, लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए…….  आदि। ऐसे सैंकड़ों गीत हैं, जो बरबस इस महान कलाकार की याद दिलाते हैं।

इस महान कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि।

नमस्कार

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110. कभी रो के मुस्कुराये, कभी मुस्कुरा के रोये!

हिंदी फिल्मों के कुछ ऐसे पुराने गीत हैं, जो आज की तारीख में भले ही बहुत ज्यादा सुनने को नहीं मिलते हों, लेकिन जब अचानक सुनने को मिल जाते हैं, तो सुनकर लगता है कि क्या शायर ने अपना दिल उंडेलकर रख  दिया है और गायक, संगीतकार ने कितने मन से इसको प्रस्तुत किया है।

ऐसा ही एक अनूठा गीत है, 1964 में बनी फिल्म ‘आओ प्यार करें’ का जिसकी संगीतकार हैं उषा खन्ना जी और इसे गाया है स्वर सम्राज्ञी- लता मंगेशकर जी ने। गीतकार हैं श्री राजेंद्र कृष्ण जी। लीजिये गीत को पढ़कर अपनी यादें ताज़ा कर लीजिए, नई उम्र के लोगों के लिए शायद यह गीत भी नया हो-

 

मेरी दास्तां मुझे ही, मेरा दिल सुना के रोये,

कभी रो के मुस्कुराए, कभी मुस्कुरा के रोये।

मिले गम से अपने फुर्सत, तो मैं हाल पूछूं इसका,

शब-ए-गम से कोई कह दे, कहीं और जा के रोये।

मेरी दास्तां मुझे ही….

हमें वास्ता तड़प  से, हमें काम आंसुओं से,

तुझे याद करके रोये, या तुझे भुला के रोये।

मेरी दास्तां मुझे ही….  

वो जो आज़मा रहे थे, मेरी बेक़रारियों को,

मेरे साथ-साथ वो भी, मुझे आज़मा के रोये।

मेरी दास्तां मुझे ही, मेरा दिल सुना के रोये,

कभी रो के मुस्कुराए, कभी मुस्कुरा के रोये।।  

बस कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई गीत स्मृतियों में अटककर रह जाता है, कुछ दिन से ये गीत बार-बार याद आ रहा था, तो सोचा आपके साथ ही मैं भी इस गीत का मनन कर लेता हूँ।

नमस्कार।

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109. एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया!

आज सुदर्शन फाकिर जी की एक  गज़ल के बहाने से बात करते हैं, जिसको जगजीत सिंह जी ने बड़े सुंदर तरीके से गाया है। चलिए पहले यह गज़ल देख लेते हैं-

शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया,

क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया।

ता उम्र ढूंढ़ता रहा मंज़िल मैं इश्क की,

अंजाम ये कि गर्द-ए-सफर ले के आ गया।

नश्तर है मेरे हाथ में, कांधे पे मैकदा,

लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर ले के आ गया।

फाकिर सनम कदे में मैं, आता न लौटकर,

एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

ये वास्तव में कुछ ऐसी दुनिया है, जिसके बारे में नीरज जी ने भी कहा है-

मगर प्यार को खोजने जो चला वो

न तन ले के लौटा, न मन ले के लौटा।

और क्या दिव्य इलाज बताया है इस गज़ल में, दर्द-ए-जिगर का- हाथों में नश्तर (चाकू) और कंधे पर मैखाना!

और अंतिम शेर में तो कितनी सादगी से शायर महोदय ने अपने आपको प्रस्तुत किया है-

एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

जिस प्रकार जब लोग लंबी मैराथन दौड़ में दौड़ते हैं, तब बीच-बीच में लोग पानी वगैरा लेकर खड़े रहते हैं, जिससे उनको थकान से राहत मिलती रहे। इसी प्रकार ज़िंदगी में, इश्क़ की मैराथन में जो दौड़ रहे हैं, और उनका हासिल-ए-सफर, दिल पर लगे ज़ख्म ही हैं, उनके जीवन-पथ पर भी शायद इस प्रकार के ज़ख्म प्रदान करने वाले सेवा-केंद्र बने रहने ज़रूरी हैं, जिससे उनको यह एहसास बना रहे कि वे सफर में हैं-

आबाद नहीं, बरबाद नहीं

गाता हूँ खुशी के गीत मगर

ज़ख्मों से भरा सीना है मेरा

हंसती है मगर ये मस्त नज़र।

नमस्कार।

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108 . जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो!

अपने प्रिय गायक मुकेश जी के दो गीत एक साथ याद आ रहे हैं, एक है- ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे इससे अपनी खबर मिल रही है’ और दूसरा है- ‘मुझको इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो!’

दो एकदम विपरीत स्थितियां हैं, लेकिन जीवन में लगभग सभी लोग इन एकदम विपरीत मनः स्थितियों से गुज़रते हैं।

छोटा बच्चा ही, जब थोड़ा बड़ा होने लगता है, तो  उसको लगता है कि जिस प्रकार घर के दरवाज़े पर पिता का, माता का नाम लिखा है, उसका भी लिखा जाए, अक्सर वह जगह-जगह दीवारों पर भी अपना नाम लिख देता है।

प्रेम में तो लोग पेड़-पौधों पर, ऐतिहासिक इमारतों पर भी अपना नाम लिख देते हैं, जिससे वे इमारतें तो खराब होती हैं, कोई लाभ भी नहीं हो पाता, क्योंकि एक नाम के बहुत सारे लोग होते हैं। अगर वे वास्तव में इतिहास का हिस्सा बनना चाहते हैं तो उनको अपना पता भी लिखना चाहिए और फोटो भी लगा देनी चाहिए, लेकिन इस कारण यह भी हो सकता है कि उनका अस्थाई पता ‘जेल’ हो जाए।

खैर अब अपनी पहचान की चाह वाले इस गीत की कुछ पंक्तियां शेयर कर लेता हूँ-

पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो

मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है।

कई बार यूं भी हुआ है सफर में,

अचानक से दो अजनबी मिल गए हों।

जिन्हें रूप पहचानती हो नज़र से,

भटकते-भटकते वही मिल गए हों।

कुंवारे लबों की कसम तोड़ दो तुम

ज़रा मुस्कुराकर बहारें संवारो।

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो।

खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी,

कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें।

तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जाकर,

मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें।

बड़ी सर चढ़ी हैं ये ज़ुल्फें तुम्हारी,

ये ज़ुल्फें मेरे बाज़ुओं में उतारो।

पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो॥

ये गीत है उन स्थितियों का, जहाँ इंसान अपनी पहचान और अपने अरमान पाना चाहता है, अपनी पहचान को प्रसारित करना चाहता है।

लेकिन यह जीवन है मेरे मित्र, इसमें ऐसी स्थितियां भी आती हैं, जब निराशा के गर्त में डूबा इंसान, सबसे निगाह बचाकर निकल जाना चाहता है। खुशी पाने के सारे प्रयास करने, हर तरह से असफल होने के बाद, इंसान कुछ समय के लिए गुमनामी में डूब जाना चाहता है।

निराशा में डूबे इंसान की भावनाओं, घोर निराशा की अभिव्यक्ति है यह गीत, जब व्यक्ति यह चाहने लगता है कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए, कोई उसका नाम भी न ले, अपने आपमें बहुत सुंदर गीत है, गीत सुख का हो या दुख का, अगर सुंदर है तो है-

मुझको इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो,

जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो।

रौशनी हो न सकी, दिल भी जलाया मैंने,

तुमको भूला ही नहीं लाख भुलाया मैंने,

मैं परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो,

आवाज़ न दो।

किस क़दर जल्द किया मुझसे किनारा तुमने,

कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने,

छुप गए हो तो मुझे याद भी आया न करो,

आवाज़ न दो।

और शायद इस गीत की मनः स्थिति से आगे बढ़कर ही कोई कहता है-

तुम्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक

अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं।

खैर यही कामना है कि इन सभी मनः स्थितियों से परिचित होत हुए भी, सभी सुखी रहें।

नमस्कार।

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