फिर नशे में 4

मुझको कदम कदम पे भटकने दो वाइजोंतुम अपना कारोबार करो मैं नशे में हूँ| फिर बेख़ुदी में हद से गुजरने लगा हूँ मैंइतना न मुझ से प्यार करो मैं नशे में हूँ| शाहिद कबीर

दूर से देखता हूँ – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी … Read more

मैं नशे में हूँ 2

ढल चुकी है रात कब की, उठ गई महफ़िल,मैं कहाँ जाऊं नहीं मेरी कोई मंजिल,दो क़दम मुश्किल है चलना मैं नशे में हूँ!

मैं नशे में हूँ 1

है ज़रा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,पर न जाने क्या कहेंगे ये जहां वाले,तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ!

मैं नशे में हूँ!

कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम, अब ज़रा आराम से आ जा रहा है दम,कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ!

पढ़कर भी क्या होगा!

हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| उनकी एक गीत पंक्ति जो मैंने कई बार अपने आलेखों में दोहराई है, वो है: फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में,रोशनी को शहर से निकाला गया| एक और काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,देखी हमने अपनी सालगिरह … Read more

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