खुल के जहाँ बात हो सके!

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

चलो मयकदे चलें!

यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

ग़म अभी सोया है जगाए कौन!

जावेद अख़्तर साहब भारतीय शायरों में और मुंबई के फिल्म जगत में एक जाना-माना नाम हैं| उन्होंने सलमान खान जी के पिता सलीम खान साहब के साथ मिलकर अनेक हिट फिल्मों की पटकथा भी लिखी थी, जिनमें सुपर हिट फिल्म ‘शोले’ भी शामिल थी, और हां फिल्मों में गीत तो वे लंबे समय से लिख ही रहे हैं, अपनी स्वतंत्र शायरी के अलावा|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख़्तर साहब की यह ग़ज़ल –



दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन|

कौन दोहराए वो पुरानी बात
ग़म अभी सोया है जगाए कौन|

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुख झेले आज़माए कौन|

अब सुकूँ है तो भूलने में है
लेकिन उस शख़्स को भुलाए कौन|

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आए कौन|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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इस नगरी क्यूँ आये थे!

रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

क़तील शि
फ़ाई

पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने—

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|

क़तील शिफ़ाई

कुछ फूल मेरे हम-साये थे!

कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू,
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे|

क़तील शिफ़ाई

सौदा जिससे करने आये थे!

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में,
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे|

क़तील शिफ़ाई

मेरे अन्दर चली थी आँधी—

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की,
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे|

क़तील शिफ़ाई

उसके नैन भर आये थे!

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात,
प्यार की बातें करते करते उसके नैन भर आये थे|

क़तील शिफ़ाई

हम जब उसके शहर से निकले—

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

क़तील शिफ़ाई