बूढ़ों का ये विचार है!

अश्कों में भीगकर जो, मिठाता है और भी,
बूढ़ों का ये विचार है, जामुन का पेड़ है।

सूर्यभानु गुप्त

जामुन का पेड़ है!

हम हैं, ख़याले यार है, जामुन का पेड़ है,
बारिश का इंतज़ार है, जामुन का पेड़ है।

सूर्यभानु गुप्त

तीलियों का पुल !

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से अपने संस्मरण भी लिखे हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

मुझे हर तीसरे दिन
तीलियों का पुल बुलाता है
शाम कहती है—कहो क्या बात है ?
एक शीशा टूट जाता है


बिखर जाती हैं सितारों की तरह किरचें
(नंगे) पाँव डरते हैं
और उड़-उड़ कर क़िताबों के नए पन्ने
मना करते हैं
बदन सारा कसमसाता है

धूल से मैली हुई है
पर न मैली हुई जो मन से
झाँकती है जब कभी तस्वीर वह
कभी खिड़की, कभी आँगन से
नींद की दो डोरियों के बँधे पाँवों में
कौन है जो थरथराता है ?
एक शीशा टूट जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे!

जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे,
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

उठते सवालों को क्या करूँ!

मैं जानता हूँ सोचना अब एक जुर्म है,
लेकिन मैं दिल में उठते सवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

मैं शिवालों को क्या करूँ!

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते,
मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

पाँवों के छालों को क्या करूँ!

चलना ही है मुझे मेरी मंज़िल है मीलों दूर,
मुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

उजालों को क्या करूँ!

मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ,
अंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

कहीं तिश्नगी बेहिसाब है!

कहीं आँसुओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ,
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है|

राजेश रेड्डी

कहीं मेहरबां बेहिसाब है!

कहीं खो दिया कहीं पा लिया, कहीं रो लिया कहीं गा लिया,
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबां बेहिसाब है|

राजेश रेड्डी