Categories
Uncategorized

अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए!

आज मैं फिल्मी दुनिया के बहुत सृजनशील गीतकार स्वर्गीय आनंद बख्शी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बख्शी जी ने बहुत सारे हल्के-फुल्के गीत भी लिखे हैं लेकिन कुछ गीत बहुत सुंदर लिखे हैं|


आज का उनका यह गीत फिल्म- खिलौना में फिल्माया गया था, इसको लता मंगेशकर जी ने लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में बड़े खूबसूरत अंदाज़ में गाया था| इस फिल्म में संजीव कुमार जी, मुमताज़ जी, जितेंद्र जी आदि ने यादगार अभिनय किया था|


लीजिए प्रस्तुत है यह हृदयस्पर्शी गीत-


अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाए,
सनम तू बेवफा के नाम से मशहूर हो जाए|

हमें फुरसत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से,
कई गम पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से,
अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए|

वफ़ा का वास्ता देकर मोहब्बत आज रोती है,
ना ऐसे खेल इस दिल से, ये नाज़ुक चीज़ होती है,
ज़रा सी ठेस लग जाए तो शीशा चूर हो जाए|

तेरे रंगीन होठों को कंवल कहने से डरते हैं,
तेरी इस बेरूख़ी पे हम ग़ज़ल कहने से डरते हैं,
कहीं ऐसा ना हो तू और भी मग़रूर हो जाए|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



*********

Categories
Uncategorized

शकुंतला देवी के बहाने!

ग्रेट मेथमेटिकल जीनियस, गणित के कठिन से कठिन सवाल मिनटों में हल कर देने वाली शकुंतला देवी के जीवन पर बनी फिल्म देख ली, उनके बारे में अनेक जानकारियाँ प्राप्त करके अच्छा लगा|


मुझे आशा है कि इस फिल्म के लिए अच्छी शोध की गई होगी और शकुंतला देवी के किरदार को पर्दे पर विद्या बालन जी के रूप में देखना अच्छी बात है क्योंकि विद्या जी अपनी प्रत्येक भूमिका के लिए पूरी मेहनत करती हैं और निर्देशक अनु मेनन भी इस अच्छी फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं|


शकुंतला देवी का गणित ज्ञान अत्यंत चमत्कारी था यह तो हमने सुना ही था, लेकिन यह मालूम नहीं था कि उनको औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हो पाया था| जैसा फिल्म में दिखाया गया है, गाँव-देहात में रहने वाली इस बालिका के चमत्कार को देखते हुए उनके पिता उनको जगह-जगह स्कूलों, क्लबों आदि में उनका चमत्कार दिखाकर कमाई करने के लिए ले जाते रहते थे| उनको इस बालिका की आवश्यकताओं का बिलकुल खयाल नहीं रहता था, उसके ‘शो’ कराने का अलावा वो बस बैठकर अखबार पढ़ते थे|


इस प्रकार शकुंतला देवी को एक सामान्य बालिका की तरह खेलने-कूदने का अवसर नहीं मिला, बचपन पूरी तरह छिन गया| पिता से तो शकुंतला देवी कोई उम्मीद रखती नहीं परंतु उनको अपनी माँ से शिकायत रहती है कि वो कुछ नहीं बोलती, लेकिन माँ एक सामान्य गृहिणी है जो शांत ही रहती है| बचपन का सिलसिला जवानी तक जारी रहता है और वह पाती है कि उसका प्रेमी भी उसका शोषण करना चाहता था| अंततः ऐसी परिस्थिति बनती है कि वह भारत छोड़कर लंदन चली जाती है, अपने गणित के चमत्कारों के बल पर कमाने के लिए, जबकि उनको अँग्रेजी का भी पर्याप्त ज्ञान नहीं है|


किसी तरह संघर्ष करके वह अपना स्थान बनाती है, इतना ही नहीं, वह अथाह ख्याति और धन अर्जित करती है| वह कलकत्ता के एक अधिकारी से शादी भी करती है| लेकिन उसने चुना था कि वह अपनी माँ जैसी नहीं बनेगी, माँ एकदम बोलती नहीं थी और वह किसी को बोलने नहीं देती| उसकी एक पुत्री होती है और उसके बाद वह अपने शो करने के लिए विदेश भ्रमण पर चली जाती है| कुछ समय बाद वह अपने पति से झगड़कर अपनी बेटी को भी साथ ले जाती है और उसको गणित के चमत्कार सिखाने की कोशिश करती है| लेकिन बेटी महसूस करती है कि प्यार तो उसको अपने पिता से ही मिलता था|


शकुंतला देवी को बचपन नहीं मिल पाया था उनके पिता के लालच के कारण लेकिन वे अपनी बच्ची के बचपन के बारे में, उसकी आकांक्षाओं के बारे में सोच ही नहीं पातीं, क्योंकि वह उनके साथ दुनिया घूम रही है, बड़े-बड़े लोगों से मिल रही है, अपनी ख्याति की चकाचौंध में यह सोच ही नहीं पातीं कि बच्ची की कुछ और भी अभिलाषाएँ होंगी| परिणाम यह कि उनकी बेटी भी उनसे वैसे ही नफरत करती है, जैसे वो अपनी माँ से करती थीं|


कुल मिलाकर यह कि इस फिल्म से हमने शकुंतला देवी के चमत्कारिक जीवन, उनकी उपलब्धियों की झलक तो देखी ही, उसके अलावा मनोवैज्ञानिक स्तर पर संबंधों की प्रस्तुति और उसका विश्लेषण भी बहुत सुंदर किया गया है|


ये कुछ बातें हैं जो ‘शकुंतला देवी’ फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आईं, सो मैंने आपसे शेयर कर लीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

Categories
Uncategorized

लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


*******

Categories
Uncategorized

Adventure and Misadventures!

Yes, we are talking about adventure. Naturally adventure involves doing something we don’t normally do. It normally needs boldness, taking risk and foresightedness. Mostly we refer to this term while people go for some physical adventure like- mountaineering, river rafting, travelling far away say on cycle or motorcycle. So mostly we refer to physical risk taking when we talk about adventure. But adventures can be of various types, including mental also and risk taking is normally a factor involved in it.

I am suddenly remembering an incident that happened with a friend of mine in Delhi long back. We were a group of young friends who wrote poems, participated in poetic symposia etc. in Delhi. This friend of mine also believed in appearing like a typical poet, he wore kurta-pyjama and had grown beard and mush also.

Anyhow before telling the incident that I want to mention, let me repeat that with his attire and appearance, he didn’t at all appear attractive in worldly terms, he might be considering himself whatever in his mind. Anyway the incident so happened that he went to Khadi gramodyog shop in Connaught place, which was near Regal cinema, now Regal is not there, I am not sure whether Khadi Gramodyog shop is still there or not.


Anyway, my friend went to that store, he saw a beautiful girl there and he thought of complimenting the girl for her beauty. So, my friend suddenly kissed that girl in the shop and in turn received a nice beating from the people around. On being asked why he did so, he said I felt that the girl is very beautiful and should be kissed! I think this was also a kind of adventure for which my friend had to pay heavily.


Anyhow, adventure always involves challenging our limits and taking risk, whether physical or any other type. For physical adventure people go for mountaineering, river rafting, scuba diving and so many such activities. Normally people who don’t want to take risk in life, look for a regular job with good salary. Those who want to take risk often go for business. Those who are ready to take further risk become entrepreneurs. Taking risk in any field is adventure I feel.


As I gave the example of my friend, in India many people go for misadventure rather than a positive adventure. Like going for police or military service involves adventure, which is positive one. But now a days there are many people who don’t follow the right path, one reason for that is also lack of opportunities. When ATMs were introduced in India, I wondered whether these would function properly, since there is lot of money stored in them. We found that there are several people who have mastered withdrawing money from other peoples account by bad use of technology. Further there are some who just take away the ATM machine. The dacoit gangs are also an example of misadventure.

For me the adventure that suits me is travelling to new places, I enjoy visiting places and wish to keep on doing that, but in this wicked Corona period, moving out is completely impossible. I can take the normal risks associated with travelling far-off places, but moving there in Corona period is simply not advisable.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Adventure is not taking risk, adventure is doing what we have not done so far. Coming out of our boundary. What is adventure in your view? and what have you done recently? or planning to do? #adventureboundaryfear

Thanks for reading.



*******

Categories
Uncategorized

प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ

आज फिर से मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है| जिस प्रकार हमारे मन में अनेक भावनाएँ आती हैं, तब कभी हम उनको सीधे अपने शब्दों में व्यक्त कर देते हैं और कभी कुछ उपमाओं, उपमानों आदि का सहारा लेते हैं अपनी बात कहने के लिए और यह काम कविता में अधिक होता है|

आज मुकेश जी का एक ऐसा ही गीत याद आ रहा है, जिसमें आकाश में उड़ते पक्षियों के माध्यम से कवि ने प्रेमियों के मन की बात कही है| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘प्यासे पंछी’ से है और इसे महमूद जी पर फिल्माया गया है| इस गीत के लेखक हैं- कमर जलालाबादी जी और इसका संगीत दिया है कल्याणजी आनंदजी ने|

लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

प्यासे पंछी नील गगन में, गीत मिलन के गाएँ,
ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

ओ मतवाले राही तुझको मंज़िल तेरी बुलाए,
किसको ख़बर है इन राहों में कौन कहाँ मिल जाए|
जैसे सागर की दो लहरें चुपके से मिल जाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

छुपी हैं आहें किस प्रेमी की, बादल की आहों में,
बिखरी हुई है ख़ुश्बू कैसी, अलबेली राहों में|
किसकी ज़ुल्फ़ें छू कर आईं, महकी हुई हवाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ,

ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

छोड़ दो ये – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Leave This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

छोड़ दो ये



छोड़ दो ये भजन गाना, मंत्र जपना और माला फेरना!
किसकी पूजा करते हो तुम, मंदिर के एकांत अंधेरे कोने में, जबकि सभी दरवाजे बंद हैं?
अपनी आँखें खोलो और देखो, तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे सामने नहीं है!

वह है वहां, जहां हलवाहा किसान कठोर जमीन जोत रहा है
और जहां पथ निर्माता पत्थर तोड़ रहा है|
वह उनके साथ है, धूप में और बारिश में,
और उसके कपड़ों पर धूल जमी है|
अपना आवरण उतारो और उसकी ही तरह धूल भरी मिट्टी में आ जाओ!

मुक्ति?
मुक्ति कहाँ मिल सकेगी?
हमारे स्वामी ने स्वयं ही सहर्ष सृजन के सभी बंधन स्वीकार किए हैं;
वह हमेशा के लिए हमारे साथ संबंध में बंधा है|

अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आओ, अपने पुष्पों और सुगंधियों को रहने दो!
क्या फर्क पड़ता है यदि तुम्हारे कपड़े जीर्ण और दागदार हो जाएँ?
उससे वहाँ मिलो और साथ खड़े रहो, अपने माथे पर पसीने के साथ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Leave This


Leave this chanting and singing and telling of beads!
Whom dost thou worship in this lonely dark corner of a temple with doors all shut?
Open thine eyes and see thy God is not before thee!

He is there where the tiller is tilling the hard ground
and where the pathmaker is breaking stones.
He is with them in sun and in shower,
and his garment is covered with dust.
Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil!

Deliverance?
Where is this deliverance to be found?
Our master himself has joyfully taken upon him the bonds of creation;
he is bound with us all for ever.

Come out of thy meditations and leave aside thy flowers and incense!
What harm is there if thy clothes become tattered and stained?
Meet him and stand by him in toil and in sweat of thy brow.


-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

पिछले सप्ताह में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का जन्मदिन आया था और उसके बाद विख्यात निर्माता, निर्देशक और अभिनेता- मनोज कुमार जी का भी जन्मदिन आया जो अब 83 वर्ष के हो गए हैं| मनोज जी जहां एक बहुत अच्छे अभिनेता रहे वहीं उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना से भारी बहुत प्यारी फिल्में भी बनाई हैं| एक और खास बात कि स्वर्गीय राज कपूर जी की तरह मनोज कुमार जी ने भी मुकेश जी की मधुर आवाज का भरपूर उपयोग अपनी फिल्मों में किया है|


आज मैं इन दोनों से जुड़ा एक गीत फिल्म- शोर से प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे लिखा था संतोषानंद जी ने और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी और लता जी ने गाकर इस गीत को अमर बना दिया था| एक और बात इस गीत में वायलिन का बहुत सुंदर उपयोग किया गया है|
लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-



एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||

कुछ पाकर खोना है,
कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो,
आना और जाना है|
दो पल के जीवन से,
इक उम्र चुरानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|

एक प्यार का नगमा है||

तू धार है नदिया की,
मैं तेरा किनारा हूँ|
तू मेरा सहारा है,
मैं तेरा सहारा हूँ|
आँखों में समंदर है,
आशाओं का पानी है|


ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||


तूफान को आना है,
आकर चले जाना है,
बादल है ये दो पल का,
छाकर ढल जाना है|
परछाइयाँ रह जातीं,
रह जाती निशानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

हमको दिवाना तुमको, काली घटा कहेंगे!

हमारी फिल्में हों अथवा कहानी हो, उपन्यास हो, इन सबमें जीवन को ही तो चित्रित किया जाता है| और जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं| जैसे दर्द भरे नगमे भी हमारी फिल्मों में बहुत सारे हैं, देशभक्ति के भी हैं, किसी भी भाव के लिए, जो हमारे मन में आ सकता है, उससे जुड़े हुए गीत हमारी फिल्मों में मिल जाएंगे|


आज रोमांस और मस्ती से जुड़ा एक युगल गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा है और ‘गंगा की लहरें’ फिल्म के लिए किशोर कुमार जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



-छेड़ो न मेरी जुल्फें,
सब लोग क्या कहेंगे|

-हमको दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-आती है शर्म हमको
रोको ये प्यारी बातें|

-जो तुम को जानते हैं,
वो जानते है तुम्हारी बातें|

तुम कह लो शर्म इसको
हम तो अदा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||


-मैं प्यार हूँ तुम्हारा
मेरा सलाम ले लो|


-तुम इस को प्यार समझो
तुम इसको
चाहत का नाम दे लो,
लेकिन ज़माने वाले
इस को खता कहेंगे|

-हम को दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-तौबा तेरी नज़र के
मस्ती भरे इशारे|


-देखेंगे हमको तुमको
जो मुस्करा के सारे,
उल्फत में दो दिलों को
बहका हुआ कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

What is truth?

Let’s talk a bit about truth. What is truth? Often it happens that we gather a number of facts and build a narrative to present something that we want people to believe and accept as truth.


Firstly I would like to quote a Shair by Urdu poet Krishna Bihari ‘Noor’ Ji, he says-


सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इंतेहा ही नहीं|

Which means that if we add a little bit to the truth or decrease it a little bit, it does not remain truth, but when we are presenting some false picture, when we opt to tell lies, there is no limit about how far we can go.


We often listen to political leaders speaking about their parties, their values and achievements. They often know the art of presentation. They build a narrative by choosing the positive points associated with their party and appear to be quite convincing. When we listen to the party opposing them, then also we appear to be convinced. Same is the case with lawyers presenting the case of the victim or accused. The reason being that they choose the points which go in their favor to build the narrative and present the case.


For example, if we talk about the congress party in India, and some leader tells about the past achievements of the party, their role in the freedom movement, he can very well impress. But the fact remains that the congress party of today is in no way, the party that participated in the freedom struggle. The fact remains that it only has the same name, nothing else. Congress of that time was actually a movement, with all who wanted to fight for freedom gathered together for that mission. Today it has become a family owned party as per my narrative. But still one can present it any other way.


There could be so many examples, like the Sushant Singh Rajput suicide case. Suddenly we find that the Bollywood film fraternity appears to be having so many villains. Those people must have always been there, but suddenly when we find that a sensitive and creative young person lost his life due to bad behavior of some people there, this truth has surfaced. The guilty must be punished but the fact remains that the industry is the same which we adored earlier. There have always been all type of persons there. The nice people must be appreciated and the wicked must be exposed and punished, according to their acts.


Actually, truth does differ from person to person! For us truth is the way we see it. The color of the glasses we wear, we may call it our ideology or say political leaning, does determine how we see a particular activity, organisation or may be a person. There are people in the field of journalism who would never find anything done by Mr. Modi to be a positive step, while they never have the courage to oppose the senseless utterings of Mr. Rahul Gandhi, who keeps doing so.


So I would like to conclude that everybody has his or her own version of truth, depending on how he or she perceives it, political leaning and also vested interests, for which many people become part of some very powerful lobbies sometimes.


One more thing, in case of some activity done by somebody, whether it is some criminal act or one which benefits the society and which can’t be ignored by anybody, we can say that it is ‘naked truth’, since we can’t ignore some facts, inspite of the glasses of some ideology we wear, we can say that ‘it is naked truth’.

One more thing, in the present circumstances it is not easy to say that truth always wins, but I feel that our efforts and our faith should be so strong that it does make it happen. In any circumstances we must not lose this faith.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Why is it so difficult to establish the truth? Why is it called naked truth? Does truth really win? #NakedTruth

Thanks for reading.



********

Categories
Uncategorized

सर्द है अंगार की भाषा!

हिन्दी काव्य मंचों के अद्भुद हस्ताक्षर माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मंचों के मतलब का कम और पढ़ने और मनन करने का अधिक है| गीत में हमारे भटकाव और लक्ष्यों के ओझल होने की बात है| गीत में हमारे रोशनी से भरे संकल्पों की भी बात की गई है|


लीजिए प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह अनूठा गीत –




दिन चढ़े ही भूल बैठे हम
धूप के परिवार की भाषा,
बोलती है रोशनी भी अब
मावसी आँधियार की भाषा|

गालियाँ देगी उन्हे मंज़िल
वक्त उनके नाम रोएगा,
भोर का इतिहास भी उनकी
सिर्फ़ ज़िंदा लाश ढोएगा,
नाव पर चढ़कर करेंगे जो
अनसुनी मझदार की भाषा|

स्वप्न हैं बेशक बहारों के
है ज़रूरत आगमन की भी,
मानते है बेड़ियाँ टूटी
तोड़िए जंजीर मन की भी,
गीत – क्षण से कर सकेंगे हम
प्यास को संसार की भाषा|

तू थकन का नाम मत ले रे
पर्वतों को पार करना है,
मरुथलों को मेघ देने हैं
फागुनो में रंग भरना है,
रंज है इस बात का हमको
सर्द है अंगार की भाषा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******