Categories
Uncategorized

झूठी कहानी पे रोये!

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रची गई एक संभवतः काल्पनिक प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ से है, जो अपने आप में ही एक ऐतिहासिक फिल्म थी| उस समय तक शायद ऐसे भव्य सेट्स और ऐसी स्टार-कास्ट वाली और फिल्में नहीं बनी थीं| इस फिल्म में पृथ्वी राज कपूर साहब, दिलीप कुमार जी, मधुबाला जी, दुर्गा खोटे जी और अनेक अन्य कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया था| के. आसिफ साहब की यह फिल्म, हिन्दी फिल्मों के इतिहास में एक मील का पत्थर थी|

लीजिए अब मैं लता मंगेशकर जी के गाये इस मधुर गीत को शेयर कर रहा हूँ, जो प्रेम में मिली भयंकर चोट को बयां करता है| गीत लिखा है- शकील बदायुनी साहब ने और इसका मधुर संगीत दिया है नौशाद अली साहब ने| प्रस्तुत है यह गीत-



मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये,

बड़ी चोट खाई
जवानी पे रोये
जवानी पे रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये

न सोचा न समझा
न देखा न भाला
तेरी आरज़ू ने हमें मार डाला
तेरे प्यार की मेहरबानी
पे रोये, रोये|


मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|

खबर क्या थी होठों
को सीना पड़ेगा,
मोहब्बत छुपा
के भी जीना पड़ेगा,
जिए तो मगर
ज़िंदगानी पे रोये रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

कोयल से!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पुरानी पोस्ट|

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता के कुछ भाग का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता का वह भाग प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

कोयल से


मेरे हृदय में पीड़ा होती है, और सुस्ती भरी सुन्नता दर्द पैदा करती है,
मेरी चेतना को लगता है, जैसे मैंने कोई विषैला पेय पी लिया हो,
अथवा कुछ नशीला पदार्थ नाली में उगल दिया हो,
एक मिनट बीता और याद्दाश्त भुला देने वाली पौराणिक ‘लीथी’ नदी डूब गई :

ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारी खुशी से बहुत जलन होती है,
बल्कि इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी खुशी में बहुत खुश हूँ,-
कि हल्के पंखों के साथ तुम हरे-भरे पेड़ों पर बसी आत्मा जैसी हो,
गीतों भरा परिवेश बनाती तुम
हरियाली और असंख्य छायाओं के बीच,
खुले कंठ से ग्रीष्म ऋतु के गीत, बहुत सहजता से गाती हो।


अरे वो, अंगूरी शराब जो लंबे समय तक
धरती के भीतर गहरी दबी रहकर ठंडी हुई थी,
उसमें से फूल-पौधों और हरियाली का स्वाद आता है,
यह नृत्य की थिरकन, जमीन से जुड़े गीत के स्वर
और धूप से भरे उल्लास का वातावरण बनाती है।

दक्षिण का उष्ण सत्व, जैसे किसी ने समुद्र तट की हवा बोतल में भर ली हो,
जिसमें ग्रीक पौराणिक फव्वारे का वास्तविक सुर्ख चमत्कारी जल हो।
ऐसी मदिरा जिसमें निरंतर बुलबुले उठ रहे हों,
और जिसको पियें तो होठों पर बैंगनी निशान बन जाएं।


मेरा मन होता है कि मैं इसे पीकर, दुनिया से गायब हो जाऊं
और तुम्हारे साथ घने जंगलों में खो जाऊं।
कहीं दूर जाकर गायब हो जाऊं, अंतरिक्ष में घुल जाऊं, पूरी तरह भूल जाऊं,
वह सारी परेशानियां, जिनको तुमने पत्तों के बीच रहकर जाना ही नहीं है।

थकान, ज्वर और तनाव,
यहाँ लोग बैठते हैं और एक दूसरे के दुख, उनकी कराह सुनते हैं
जहाँ पक्षाघात वृद्ध लोगों को पूरी तरह लाचार बना देता है
जहाँ युवा पीले पड़ते हैं, दुबले होते हैं और मर जाते हैं।
जहाँ सोचने का मतलब है उदासी से भर जाना,
जहाँ निराशा से बोझिल पलकों के साथ जीना पड़ता है;
जहाँ सौंदर्य की आंखों की चमक भी बनी नहीं रह पाती,
और ऐसा लगता है कि शायद बाद में कोई उन पर सम्मोहित नहीं होगा।


दूर! दूर! क्योंकि मैं उड़कर तुम्हारे पास आऊंगा,
बैकस (यूनानी सुरा देवता) और उसके मित्रों के साथ नहीं,
अपितु काव्य रचनाओं के अदृश्य पंखों पर सवार होकर,
यद्यपि मेरा मस्तिष्क मेरी गति को रोकता है, हतोत्साहित करता है:
पहले से ही तुम्हारे साथ! रात बहुत मृदुल है,
और रात की रानी की तरह चंद्रमा अपने सिंहासन पर विराजमान है,
चारों तरफ से सितारों के रूप में अपने चारणों से घिरा हुआ;
लेकिन कोई प्रकाश नहीं है
सिवाय उसके, जो स्वर्ग से हवा के साथ बहकर आ पाता है,
(पत्तियों से छनकर, घुमावदार रास्तों से)।




और अब अंग्रेजी कविता का वह अंश , जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

Ode to a Nightingale


My heart aches, and a drowsy numbness pains
My sense, as though of hemlock I had drunk,
Or emptied some dull opiate to the drains
One minute past, and Lethe-wards had sunk:
‘Tis not through envy of thy happy lot,
But being too happy in thy happiness, –
That thou, light-winged Dryad of the trees,
In some melodious plot
Of beechen green, and shadows numberless,
Singest of summer in full-throated ease.

O for a draught of vintage! that hath been
Cooled a long age in the deep-delved earth,
Tasting of Flora and the country-green,
Dance, and Provencal song, and sunburnt mirth.
O for a beaker full of the warm South,
Full of the true, the blushful Hippocrene,
With beaded bubbles winking at the brim
And purple-stained mouth;
That I might drink, and leave the world unseen,
And with thee fade away into the forest dim.

Fade far away, dissolve, and quite forget
What thou among the leaves hast never known,
The weariness, the fever, and the fret
Here, where men sit and hear each other groan;
Where palsy shakes a few, sad, last grey hairs,
Where youth grows pale, and spectre-thin, and dies;
Where but to think is to be full of sorrow
And leaden-eyed despairs;
Where Beauty cannot keep her lustrous eyes,
Or new Love pine at them beyond tomorrow.

Away! away! for I will fly to thee,
Not charioted by Bacchus and his pards,
But on the viewless wings of Poesy,
Though the dull brain perplexes and retards:
Already with thee! tender is the night,
And haply the Queen-Moon is on her throne,
Clustered around by all her starry Fays;
But here there is no light
Save what from heaven is with the breezes blown
Through verdurous glooms and winding mossy ways.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

Categories
Uncategorized

तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे!

एक गीत आज फिर से शेयर कर रहा हूँ मुकेश जी का | इस गीत को शेयर करने से पहले ऐसे ही एक शेर याद आ रहा है, वैसे इसका गीत से कोई संबंध नहीं है, ऐसे ही याद आया तो पेश कर रहा हूँ-

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,
जिसमें लगे हैं फूल वो डाली हरी रहे|


एक और शेर था जो अभी याद नहीं आ रहा है, लेकिन उसमें कहा गया था कि छायादार वृक्ष बने रहें|

ऐसे ही खयाल आया कि अब यहाँ पेड़ वाली छाया तो नहीं है, जिसमें राहगीर को ठंडक मिले, ज़ुल्फ़ों के रंगीन साये को लेकर ही कवि/शायर दुआ करता है कि किसी की जवानी सलामत रहे, खैर दुआ ही की है न, तो अच्छी बात है|

लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘अंजाम’ का गीत, जिसे लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसके संगीतकार शायद ‘गणेश’ थे| लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत –


ज़ुल्फ़ों का रंगी साया,
रे तौबा खुदाया,
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|

भीगी फिजाएं देखो, चंचल हवाएं देखो,
दिल की सदा है यही, चुप ना रहो|
जागे हैं अरमां मेरे, मुखड़े पे गेसू तेरे,
दिन है कि रात बोलो, कुछ तो कहो|
बोलो ना बोलो हमसे, हम तो कहेंगे तुमसे
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|


दुनिया में होंगे कई, दिल को चुराने वाले
तुम सा ना देखा कोई, माह-ए-नक़ाब
दुनिया बनाने वाला, तुझको बना के गोरी,
रूप बनाना हाय भूल गया,
तुम्हारा है ज़माना, बना दो तुम दीवाना
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया
|

हाए ये अदाएं तेरी, तुझ से ही बहारें मेरी,
गुल भी पुकारें तुझे बाद-ए-सबा
बिगड़ी बनाना सीखो, दिल का लगाना सीखो,
ज़ुल्फ़ें बनाना छोड़ो, जान-ए-वफ़ा,
लबों पे सदा ही आएं हमारे ये दुआएं
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया||




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

बहारो थाम लो अब दिल!

आज फिर से एक बार मैं एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| फिल्म – ‘नमस्ते जी’ के लिए यह गीत लिखा था अंजान साहब ने और इसका संगीत दिया था जी एस. कोहली जी ने| मुकेश जी और लता जी के बहुत से रोमांटिक गीतों में यह गीत भी शामिल है|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

कहर अंदाज़ हैं तेरे,
क़यामत हैं तेरी बातें|
मेरी तो जान लेंगे
ये बातें ये मुलाकातें|
सनम शरमाए जब ऐसे,
मज़ा कुछ और आता है|


शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

लबों पर ये हँसी कातिल,
गज़ब जादू निगाहों में,
कसम तुझको मुहब्बत की
मचल ऐसे न राहों में|
मचल जाता है दिल जब
रू-ब-रू दिलदार आता है|

बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
* *****

Categories
Uncategorized

छोड़ गए बालम!

आज एक बार फिर से मैं राज कपूर साहब की एक फिल्म- बरसात का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| यह गीत लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था शंकर जयकिशन की जोड़ी ने| जैसा कि आप गीत के बोल पढ़कर याद कर सकते हैं, यह बहुत ही प्यारा गीत है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए
तोड़ गए बालम
मेरा प्यार भरा दिल तोड़ गए|

छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया|
टूट गया बालम
मेरा प्यार भरा दिल टूट गया|


फूल संग मुस्काएं कलियाँ
मैं कैसे मुस्काऊँ
बादल देख के भर आई अंखियाँ
छम-छम नीर बहाऊँ
मैं छम-छम नीर बहाऊँ|

छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया,
टूट गया बालम
मेरा प्यार भरा दिल टूट गया|


दिल की लगी को क्या कोई जाने
मैं जानूं दिल जाने,
पलकों की छाया में नाचे
दर्द भरे अफ़साने
हाय दर्द भरे अफ़सा
ने,

छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए|
तोड़ गए बालम
मेरा प्यार भरा दिल तोड़ गए|


पहले मन में आग लगी और
फिर बरसी बरसात,
ऐसी चली बिरहा की आंधी
तड़पत हूँ दिन-रात
मैं तड़पत हूँ दीन-रात|


छूट गया बालम
हाय साथ हमारा छूट गया|
छोड़ गए बालम
मुझे हाय अकेला छोड़ गए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना !

हिन्दी फिल्मों के गायकों के एक तरह से गुरु माने जाने वाले स्वर्गीय कुंदन लाल सहगल जी का गाया एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब हर नया गायक ऊअनके गाने के ढंग की नकल करता था, यद्यपि आज वैसा कोई नहीं करता और आज वह स्वीकार्य भी नहीं होगा| मुकेश जी के शुरू के गीतों पर भी उनका प्रभाव दिखाई देता है, जैसे ‘दिल जलता है तो जलाने दे, आंसू न बहा, फ़रियाद न कर’|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय कुंदन लाल सहगल साहब के गाए गीत के बोल, जिनको फिल्म – शाहजाहां के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में इसे सहगल साहब ने गाया था| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


ग़म दिए मुस्तक़िल, इतना नाज़ुक है दिल, ये न जाना
हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना|

दे उठे दाग लो उनसे ऐ महलों कह सुनना
हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना|

दिल के हाथों से दामन छुड़ाकर,
ग़म की नज़रों से नजरें बचाकर
उठ के वो चल दिए, कहते ही रह गए, हम फ़साना,
हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना|

कोई मेरी ये रूदाद देखे, या मोहब्बत के अंदाज़ देखे,
जल रहा है जिगर, पड़ रहा है मगर मुसकुराना,
हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना|


ग़म दिए मुस्तक़िल, इतना नाज़ुक है दिल, ये न जाना
हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

मैं दीन हो जाता हूँ!

आज मैं हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार, तारसप्तक के कवि और बातचीत के लहजे में श्रेष्ठ रचनाएं देने के लिए विख्यात, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से विभूषित स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में भवानी दादा ने कुछ ऐसे मनोभाव व्यक्त किए हैं कि कई बार किसी रईस व्यक्ति से मिलने के बाद ऐसा ऐहसास होता है कि वह रईस होने के अलावा कुछ नहीं है, यहाँ तक कि इंसान भी नहीं और निरंतर उसके सामने लघुता का कृत्रिम बोध होता है| लीजिए प्रस्तुत है भवानी दादा की यह कविता –


सागर से मिलकर जैसे
नदी खारी हो जाती है
तबीयत वैसे ही
भारी हो जाती है मेरी
सम्पन्नों से मिलकर

व्यक्ति से मिलने का
अनुभव नहीं होता
ऐसा नहीं लगता
धारा से धारा जुड़ी है
एक सुगंध
दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है|


तो कहना चाहिए
सम्पन्न व्यक्ति
व्यक्ति नहीं है
वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति
नहीं है

कई बातों का जमाव है
सही किसी भी
अस्तित्व का अभाव है
मैं उससे मिलकर
अस्तित्वहीन हो जाता हूँ


दीनता मेरी
बनावट का कोई तत्व नहीं है
फिर भी धनाढ्य से मिलकर
मैं दीन हो जाता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

बेरोज़गार हम!

डॉक्टर शांति सुमन जी हिन्दी की वरिष्ठ नवागीतकार हैं, बहुत वर्ष पहले शायद 1985 के आसपास झारखंड स्थित हिंदुस्तान कॉपर की परियोजना में आयोजित एक कवि सम्मेलन में गांव की स्थिति पर आधारित उनका नवगीत सुना था, जिसकी पंक्तियां थीं-

थाली उतनी की उतनी ही, छोटी हो गई रोटी,
कहती बड़की भौजी मेरे गांव की|


आज फिर से गांव में गरीब परिवार की स्थितियों को ही दर्शाने वाला गीत शेयर कर रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर शांति सुमन जी का यह गीत –


पिता किसान अनपढ़ मां, बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहां से होगी
घर की चिन्ता कम|

आंगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड़िया-सी
उड़ती इच्छा सुकुमारी

छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।


पटवन के पैसे होते
तो बिकती नहीं ज़मीन
और तकाजे मुखिया के
ले जाते सुख को छीन

पतले होते मेड़ों पर आंखें जाती हैं थम ।

जहां-तहां फटने को है
साड़ी पिछली होली की
झुकी हुई आंखें लगती हैं
अब करुणा की बोली सी
समय-साल ख़राब टंगे रहते बनकर परचम ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

********

Categories
Uncategorized

सौंदर्यपूर्ण अस्तित्व !

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक कविता के कुछ भाग का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

सौन्दर्यपूर्ण अस्तित्व


सुंदरता कहीं भी हो, आनंद प्रदान करती है :
उसका सौंदर्य निखरता जाता है; वह कभी भी
शून्य में विलीन नहीं होता; अपितु बनाए रखता है
एक लता-मंडप हमारे लिए, और एक नींद
सपनों से भरी हुई, और सेहत, और शांत श्वसन।

इसीलिए, हर सुबह हम बुनते हैं
फूलों की एक पट्टी जो हमें धरती से बांधे रहे,
भले ही कितनी ही मायूसी हो, अमानवीय अकाल पड़ा हो-
श्रेष्ठ स्वभावों का, उदासी भरे दिन हों,
अनैतिक और अति अभद्र तरीके
हाँ, कैसी भी परिस्थिति के बावज़ूद हमारी तलाश के

सौंदर्य का, कोई स्वरूप, नक़ाब हटा देता है-
हमारी बुरी आत्माओं से, जैसे- सूरज, चंद्रमा,
वृक्ष पुराने और नये, जो एक छायादार वरदान को अंकुरित करते हैं,
सामान्य भेड़ों के लिए, और ऐसे ही हैं डैफोडिल के फूल;
जो एक हरियाली से भरी दुनिया में रहते हैं; और इस प्रवाह को साफ करते हुए
अपने लिए एक शीतलतापूर्ण परिवर्तन पैदा करते हैं,
गर्म मौसम के विरुद्ध, जो जंगल के बीचोंबीच फैला है,
कस्तूरी-गुलाबों की सुंदर गंध फैलने के साथ:
और ऐसी ही होती है विनाश की भव्यता भी।

हमने कल्पना की है कि मर चुके शक्तिशाली व्यक्तियों के लिए;
अमरत्व देने वाले पेय का एक अनंत झरना,
हमारे ऊपर, स्वर्ग के किनारे से गिरता रहे।

और ऐसा नहीं है कि हम इन सारतत्व को
केवल एकाध घंटे के लिए पाना चाहते हैं,
यहाँ तक कि कोई पेड़,
जो किसी मंदिर के आसपास गुनगुनाते हैं,
वे भी उस मंदिर की तरह प्रिय हो जाते हैं, ऐसा ही चांद करता है
जुनून से भरपूर, अनंत गौरव,
हमें तब तक आंदोलित करते हैं,
जब तक कि वे हमारी आत्मा के लिए
आनंददायी प्रकाश-बिंदु नहीं बन जाते,
और हमको इतनी मजबूती से बांधते हैं
कि भले ही कभी चमक-दमक हो, या उदासी छायी हो,
वे हमेशा हमारे साथ रहें, अथवा हम मर जाएंगे।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

A thing of beauty



A thing of beauty is a joy for ever:
Its lovliness increases; it will never
Pass into nothingness; but still will keep
A bower quiet for us, and a sleep
Full of sweet dreams, and health, and quiet breathing.
Therefore, on every morrow, are we wreathing
A flowery band to bind us to the earth,
Spite of despondence, of the inhuman dearth
Of noble natures, of the gloomy days,
Of all the unhealthy and o’er-darkn’d ways
Made for our searching: yes, in spite of all,
Some shape of beauty moves away the pall
From our dark spirits. Such the sun, the moon,
Trees old and young, sprouting a shady boon
For simple sheep; and such are daffodils
With the green world they live in; and clear rills
That for themselves a cooling covert make
‘Gainst the hot season; the mid-forest brake,
Rich with a sprinkling of fair musk-rose blooms:
And such too is the grandeur of the dooms
We have imagined for the mighty dead;
An endless fountain of immortal drink,
Pouring unto us from the heaven’s brink.



Nor do we merely feel these essences
For one short hour; no, even as the trees
That whisper round a temple become soon
Dear as the temple’s self, so does the moon,
The passion poesy, glories infinite,
Haunt us till they become a cheering light
Unto our souls, and bound to us so fast
That, whether there be shine or gloom o’ercast,
They always must be with us, or we die.

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

Categories
Uncategorized

रास्ते का पत्थर!

आज मैं हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत फिल्म- ‘रास्ते की पत्थर’ का टाइटल सांग है और इसे अमिताभ बच्चन जी पर फिल्माया गया है| आनंद बक्षी जी के लिखे इस गीत का संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी की जोड़ी ने तैयार किया है और इस गीत में यही बताया गया है कि कुछ लोगों की किस्मत ऐसी होती है कि वे जीवन भर ठोकरें खाते रहते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत –


रास्ते का पत्थर
किस्मत ने मुझे बना दिया
जो रास्ते से गुज़रा
एक ठोकर लगा गया
रास्ते का पत्थर|

कितने घाव लगे है
ये मत पूछो मेरे दिल पे

कितनी ठोकर खाई
ना पहुंचा फिर भी मज़िल पे|
कोई आगे फेंक गया तो
कोई पीछे हटा गया|
रास्ते का पत्थर
किस्मत ने मुझे बना दिया|



पहले क्या कर पाया
क्या इसके बाद करूंगा मैं
जा री जा ऐ दुनिया क्या
तुझको याद करूँगा मैं|

दो दिन तेरी महफ़िल में
क्या आया क्या गया|
रास्ते का पत्थर
किस्मत ने मुझे बना दिया|



हीरा बनके चमका
हर एक मुसाफिर को रोका,
ये उम्मीद भी टूटी
लोगों ने ना खाया धोखा,
हर एक उठा कर मुझको
फिर यहीं गिरा गया|


रास्ते का पत्थर किस्मत ने
मुझे बना दिया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******