वो फ़लक कि जिसपे मिले थे हम!

तो ये किसलिए शबे-हिज्र के उसे हर सितारे में देखना,
वो फ़लक कि जिसपे मिले थे हम, कोई और था उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

जो बिसाते-जाँ ही उलट गया!

जो बिसाते-जाँ ही उलट गया, वो जो रास्ते से पलट गया,
उसे रोकने से हुसूल क्या? उसे भूल जा…उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल!

ये जो रात दिन का है खेल सा, उसे देख इसपे यकीं न कर,
नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल सरे-आईना उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था!

न वो आँख ही तेरी आँख थी, न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था,
दिले मुन्तज़िर तो है किसलिए, तेरा जागना उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

तेरे बाद कुछ भी नहीं है कम!

किसी आँख में नहीं अश्के-ग़म, तेरे बाद कुछ भी नहीं है कम,
तुझे ज़िन्दगी ने भुला दिया, तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

मेरे साथ आ उसे भूल जा!

मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में, तेरी आस तेरे गुमान में,
सबा कह गयी मेरे कान में, मेरे साथ आ उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

वो तेरे नसीब की बारिशें!

वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पे बरस गईं,
दिले-बेख़बर मेरी बात सुन, उसे भूल जा उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

जो नहीं मिला उसे भूल जा!

कहाँ आके रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

विसर्जन!


छायावाद युग के कवियों और कविताओं का उल्लेख महादेवी जी को याद की बिना कैसे पूरा हो सकता है| महादेवी जी का भी उस युग के साहित्य में अमूल्य योगदान है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता –

निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;

बिछाती थी सपनों के जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर,
गई वह अधरों की मुस्कान
मुझे मधुमय पीडा़ में बोर;

झटक जाता था पागल वात
धूलि में तुहिन कणों के हार;
सिखाने जीवन का संगीत
तभी तुम आये थे इस पार!

गये तब से कितने युग बीत
हुए कितने दीपक निर्वाण!
नहीं पर मैंने पाया सीख
तुम्हारा सा मनमोहन गान।

भूलती थी मैं सीखे राग
बिछलते थे कर बारम्बार,
तुम्हें तब आता था करुणेश!
उन्हीं मेरी भूलों पर प्यार!

नहीं अब गाया जाता देव!
थकी अँगुली हैं ढी़ले तार
विश्ववीणा में अपनी आज
मिला लो यह अस्फुट झंकार!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सुलगती रेत रखकर चल दिया!

मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया,
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे|

बशीर बद्र