हुनर तुम सिखा तो चले!

उसको मज़हब कहो या सियासत कहो,
ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले|

कैफ़ी आज़मी

बुझने दो उनको हवा तो चले!

चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम,
ख़ैर बुझने दो उनको हवा तो चले|

कैफ़ी आज़मी

ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम..

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे,
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा|

कैफ़ी आज़मी

मिरे घर में न रौशनी का रहा!

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उसका,
सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा|

कैफ़ी आज़मी

सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा!

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा,
बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा|

कैफ़ी आज़मी

पथ में किरण-छुरे!

आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी उन कवियों में शामिल हैं, जिनके गीतों को मैं कविता का शौक पैदा होने के बाद अक्सर गुनगुनाया करता था|

मैंने पहले भी बेचैन जी की बहुत सी कविताएं और गीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह सुंदर नवगीत–

नित आवारा धूप घोंपती
पथ में किरण-छुरे।
आज के
दिन हैं बहुत बुरे ।

जो चाही
गाली फूलों को
कांटों ने बक दी
पगडंडी के
अधरों पर फिर
गर्म रेत रख दी
चारों ओर
तपन के निर्मम
सौ-सौ जाल पुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

सूखी हुई
झुकी शाखों पर
कोलाहल लटका
क्रुद्ध छाँव को
इधर-उधर
खो जाने का खटका
गाते हैं
अश्लील गीत अब
पावन तानपुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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